मैंने यह कविता १६ अगस्त १९९१ को (पुरानी दस्तयाब डायरी के मुताबिक़) भगवत रावत की कविता, जहाँ तक मेरी स्मृति है; 'गिद्ध' से 'बेहद' प्रभावित होकर अपने गाँव की बाढ़ को बार-बार भोगकर लिखी थी.
'कबाड़खाना' में केदारनाथ जी की कविता पढ़कर इसे खोजना पड़ा. कच्ची कविता समझकर मैंने अपनी कविता को स्वयं निरस्त कर दिया था. लेकिन अब देखता हूँ तो मुझे अपनी यह कविता काम की लगती है. आप सुधीजन हैं-
बाढ़ से घिरे लोग
बाढ़ से घिरे घरों की खपरैल पर
घर-गृहस्थी लेकर टंगे लोग जानते हैं-
कोई नहीं बचायेगा उनकी फसलें,
पानी में डूबते-उतराते ढोर-डंगर,
कोई नहीं मिटाएगा पेड़ों पर लगे बाढ़ के निशाँ
जब पेड़ ही बह गए तो कहाँ से कोई लगायेगा बाढ़ का अनुमान?
बाढ़ रह जायेगी अखबारों की सुर्खियों में
राहत रकम खो जायेगी काग़जात की मुरकियों में
लोग जानते हैं
और कूद पड़ते हैं उफनते पानी में
चलाते रहते हैं अपनी बाहें धारा के ख़िलाफ़
किनारा मिलने तक.
शुक्रवार, २९ अगस्त २००८
बाढ़ से घिरे लोग
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विजयशंकर चतुर्वेदी
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मंगलवार, १२ अगस्त २००८
डॉ. भारती के 'अँधा युग' की भूमिका और अपनी बात
पहली वजह तो यही है है कि यह एक सर्वकालिक कंटेंट है. दूसरी बात इसका गीतात्मक होना. सबसे विशेष बात है मौके का चयन. यह युद्ध के १८वें दिन बाद की कथा है. मजे की बात यह है कि दुर्योधन और भीम के बीच जंघाफाड़ युद्ध अभी शेष है. दुर्योधन का मरना अभी नहीं हुआ है. किसी को पता नहीं है कि युद्ध सच्चे अर्थों में किसने जीता है. अश्वत्थामा प्रतिशोध की आग में जल रहा है. वह जान गया है कि उसके और उसके पिता के साथ छल हुआ है.
यों पढ़ने के लिए मैंने उनका उपन्यास 'ग्यारह सपनों का देश' भी पढ़ा है. आप में से बहुत कम लोगों ने यह नाम सुना होगा! लेकिन यह बाकायदा छपा हुआ उपन्यास है. यहाँ मुझे यह कहने में कोई गुरेज नहीं हैं कि यह सिर्फ प्रयोग करने के लिए प्रयोग था. यह ११ लोगों द्वारा लिखा गया एक उपन्यास है. इसके बाद लोगों ने चंद ऐसे प्रयोग किए जो असफल रहे. ताजा उदाहरण राजेन्द्र यादव और धीरेन्द्र अस्थाना का है. खैर यह एक और करुण कथा है.
जब भारतीजी जीवित थे तब मेरी इस बारे में मुंबई के सेंट जेवियर कोलिज में एक कार्यक्रम के दौरान उनसे बात भी हुई थी. वह 'धर्मयुग' से सेवानिवृत्त हो गए थे. इस कार्यक्रम में वह अध्यक्ष थे और मेरी उस बातचीत में वह थोड़ा खिन्न भी हो गए थे. यह उनका स्वभाव था. लेकिन मुझसे पता नहीं क्यों उनका स्नेह मृत्यु के करीब के दिनों में बढ़ गया था. मैं उनके अन्तिम संस्कार में शामिल था और सबसे भयावह दृश्य भी वही था. न.. न.. चिता जलने का नहीं, बल्कि चिता जलती छोड़कर भागने वालों का दृश्य! अंत तक मैं अपने जनवादी लेखक संघ के कुछ दोस्तों के साथ वहाँ खडा रहा. कैसी विडम्बना है!
याद उन क्षणों की भी है कि कैसे भारती जी के निधन के बाद कमलेश्वरजी अपने बैग में कोई पुराना विदेशी दौरे का टैग लगा बैग लिए उनके कलानगर, बांद्रा, मुंबई स्थित निवास पर बदहवास भागे-भागे आए थे. भारती जी की पत्नी पुष्पाजी से कमलेश्वरजी बात करने तक में कैसा असहज महसूस कर रहे थे और उसी दौरान अमिताभ बच्चन पत्नी जयाजी के साथ आकर गए थे. बहरहाल....
डॉक्टर धर्मवीर भारती की अधिकाँश कवितायें मुझे नापसंद हैं. न...न. .बात उनकी भाषा की नहीं, उसके कंटेंट की है. बहुत अच्छे शब्दों में बात कही जाए, और उसमें विचार न हों, तो बात भूसा हो जाती है. गेंहूं कहीं नहीं नज़र आता. लेकिन उनका नाटक 'अंधा युग' मुझे कई वजहों से आकर्षित करता है और उसमें प्रकट किए गए विचार भी...सिर्फ प्रयोग के लिए प्रयोग करने का भी मैं हामी नहीं हूँ. भारतीजी ने इस नाटक को सिर्फ प्रयोग के लिए नहीं लिखा था. इस बात को स्थापित करने के लिए मैं स्वयं कुछ कहने की बजाए 'अंधा युग' के लिए लिखी गयी डॉक्टर भारती की भूमिका उद्धृत करता हूँ.... भारतीजी ने लिखा है---
'अंधा युग' कदापि न लिखा जाता, यदि उसका लिखना-न लिखना मेरे वश की बात रह गयी होती. इस कृति का पूरा जटिल वितान जब मेरे अन्तर में उभरा तो मैं असमंजस में पड़ गया. थोड़ा डर भी लगा. लगा कि इस अभिशप्त भूमि पर एक कदम भी रखा कि फिर बच कर नहीं लौटूँगा!
पर एक नशा होता है- अन्धकार के गरजते महासागर की चुनौती को स्वीकार करने का, पर्वताकार लहरों से खाली हाथ जूझने का, अनमापी गहराइयों में उतरते जाने का और फिर अपने को सारे ख़तरों में डालकर आस्था के, प्रकाश के, सत्य के, मर्यादा के कुछ कणों को बटोर कर, बचा कर, धरातल तक ले जाने का--- इस नशे में इतनी वेदना और इतना तीखा सुख घुला-मिला रहता है कि उसके आस्वादन के लिए मन बेबस हो उठाता है. उसी की उपलब्धि के लिए यह कृति लिखी गयी.
एक स्थल पर आकर मन का डर छूट गया था. आस्था, कुंठा, निराशा, रक्तपात, प्रतिशोध, विकृति, कुरूपता, अंधापन-- इनसे हिचकिचाना क्या! इन्हीं में तो सत्य के दुर्लभ कण छिपे हुए हैं. तो इनमें क्यों न निडर धंसूँ! इनमें धंस कर भी मैं मर नहीं सकता! "हम न मरें, मरिहै संसारा!'
पर नहीं, संसार भी क्यों मरे? मैंने जब वेदना सबकी भोगी है, तो जो सत्य पाया है, वह अकेले मेरा कैसे हुआ? एक धरातल ऐसा भी होता है जहाँ 'निजी' और 'व्यापक' का बाह्य अन्तर मिट जाता है. वे भिन्न नहीं रहते. 'कहियत भिन्न न भिन्न.'
यह तो 'व्यापक' सत्य है जिसकी 'निजी' उपलब्धि मैने की ही--- उसकी मर्यादा इसी में है कि वह पुनः व्यापक हो जाए.....
--धर्मवीर भारती
डॉक्टर भारती की उपर्युक्त भूमिका पढ़ने के बाद लगता है कि वह जानते बहुत कुछ थे लेकिन अपनी अन्य कृतियों में 'निजी' को 'व्यापक' नहीं बना सके. जीवन के महाभारत में वह कृष्ण की रासलीला ढूँढते रहे. नतीजा आपके सामने है. उनकी 'मुनादी' और 'ठंडा लोहा' जैसी दो-चार कवितायें छोड़ दें तो पाठक को वह कहीं नहीं पहुंचाते.
अब 'अंधा युग' से मेरा पसंदीदा एक अंश-
धृतराष्ट्र (विदुर से) -
...पर वह संसार
स्वतः अपने अंधेपन से उपजा था
मैंने अपने ही वैयक्तिक संवेदन से जो जाना था
केवल उतना ही था मेरे लिए वस्तु-जगत
इंद्रजाल की माया-सृष्टि के समान
घने गहरे अंधियारे में
एक काले बिन्दु से
मेरे मन ने सारे भाव किए थे विकसित
मेरी सब वृत्तियाँ उसी से परिचालित थीं!
मेरा स्नेह, मेरी घृणा, मेरी नीति, मेरा धर्म
बिल्कुल मेरा ही वैयक्तिक था
उसमें नैतिकता का कोई बाह्य मापदंड था ही नहीं
कौरव जो मेरी मांसलता से उपजे थे
वे ही थे अन्तिम सत्य
मेरी ममता ही वहाँ नीति थी,
मर्यादा थी.
यह पंक्तियाँ कोई भी लिखे, भौतिकवादी दृष्टि है. लेकिन रचनाकार को उसकी सम्पूर्णता में देखा जाता है, देखा ही जाना चाहिए. इति.
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विजयशंकर चतुर्वेदी
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१०:११ AM
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Labels: अँधा युग, डॉ. धर्मवीर भारती, भूमिका, महाभारत
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