रविवार, 29 जून 2008

उठाना है जो पत्थर इश्क़ का तो हल्का-भारी क्या- निदा फाज़ली





निदा फाज़ली उन बड़े शायरों में से हैं जिनके अश'आर लोगों की ज़ुबां पर रच-बस जाते हैं. यही बात आज के अधिकांश शायरों या हिन्दी कवियों के बारे में दावे से नहीं कही जा सकती. अपनी इस बात के समर्थन में मैं उनके कुछ शेर रखूंगा-


अपना ग़म लेके कहीं और न जाया जाए,
घर में बिखरी हुई चीज़ों को सजाया जाए.

घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूँ कर लें,
किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए.


या

नक्शा उठा के कोई नया शहर ढूँढिये,
इस शहर में तो सबसे मुलाक़ात हो गयी.


ऐसे कई शेर हैं जिनका हवाला दे सकता हूँ लेकिन बात उनकी चंद नई और नायाब ग़ज़लों की है.

एक दौर था जब उस्तादों के यहाँ, मुशायरों या नशिस्तों में तरही गज़लें लिख-लिख कर शायर प्रशिक्षित हुआ करते थे. मसलन, बशीर बद्र साहब का वह मशहूर शेर- 'उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए' ; ऐसी ही एक नशिस्त के दरम्यान मिनटों में हो गया था.

निदा साहब के मामले में उलटा हो रहा है. अब वह ख़ुद एक उस्ताद शायर हैं लेकिन पिछले दिनों कई गज़लें उन्होंने दूसरों की ज़मीन पर कही हैं. यह बात और है कि ये सभी शायर उस्तादों के उस्ताद रहे हैं. निदा साहब ने जिन महान शायरों का इंतखाब किया है उनमें अमीर खुसरो, कबीर, कुली कुतुब शाह, नज़ीर अकबराबादी, मीर तकी मीर, मिर्जा ग़ालिब... सूची लम्बी है. चलिए बिना वक्त बरबाद किए निदा साहब की तीन ऐसी ही ग़ज़लें पढ़ी जाएँ:-

सबसे पहले अमीर खुसरो. खुसरो की एक ग़ज़ल का मत्तला है-

जो यार देखा नैन भर मन की गयी चिंता उतर
ऐसा नहीं कोई अजब राखे उसे समझाय कर.


अब इसी ज़मीन पर निदा साहब की ग़ज़ल-

मन्दिर भी था उसका पता, मस्जिद भी थी उसकी ख़बर
भटके इधर, अटके उधर, खोला नहीं अपना ही घर.

मेला लगा था हर जगह बनता रहा वो मसअला
कुछ ने कहा वो है इधर, कुछ ने कहा वो है उधर.

वो रूप था या रंग था हर पल जो मेरे संग था
मैंने कहा तू कौन है....उसने कहा तेरी नज़र.

कल रात कुछ ऐसा हुआ अब क्या कहें कैसा हुआ
मेरा बदन बिस्तर पे था, मैं चल रहा था चाँद पर.

अब कबीर दास. उनकी पंक्तियाँ हैं-

हमन हैं इश्क़ मस्ताना हमन को होशियारी क्या
रहे आज़ाद या जग में हमन दुनिया से यारी क्या.

और अब कबीर की ज़मीन पर निदा साहब की ये ग़ज़ल-

ये दिल कुटिया है संतों की यहाँ राजा-भिखारी क्या
वो हर दीदार में ज़रदार है, गोटा-किनारी क्या.

ये काटे से नहीं कटते ये बांटे से नहीं बंटते
नदी के पानियों के सामने आरी-कटारी क्या.

उसी के चलने-फिरने-हँसने-रोने की हैं तस्वीरें
घटा क्या, चाँद क्या, संगीत क्या, बाद-ए-बहारी क्या.

किसी घर के किसी बुझते हुए चूल्हे में ढूँढ उसको
जो चोटी और दाढ़ी में रहे वो दीनदारी क्या.

हमारा मीर जी से मुत्तफिक़ होना है नामुमकिन
उठाना है जो पत्थर इश्क़ का तो हल्का-भारी क्या.


...और आख़िर में पेश कर रहा हूँ नज़ीर अकबराबादी की ज़मीन पर निदा साहब की ये ग़ज़ल. नज़ीर का शेर है-

इस्लाम छोड़ कुफ़्र किया फिर किसी को क्या
जीवन था मेरा मैंने जिया फिर किसी को क्या.

और अब निदा साहब की ये ग़ज़ल नज़ीर की ज़मीन पर देखें-

जो भी किया, किया न किया, फिर किसी को क्या
ग़ालिब उधार लेके जिया फिर किसी को क्या.

उसके कई ठिकाने थे लेकिन जहाँ था मैं
उसको वहीं तलाश किया फिर किसी को क्या.

होगा वो देवता मेरे घर में तो साँप था
ख़तरा लगा तो मार दिया फिर किसी को क्या.

अल्ला अरब में, फ़ारसी वालों में वो ख़ुदा
मैंने जो माँ का नाम लिया फिर किसी को क्या.

दरिया के पार कुछ नहीं लिक्खा हुआ तो था
दरिया को फिर भी पार किया फिर किसी को क्या.


निदा साहब का ग़ज़लों की इस श्रृंखला पर कहना है-
'एनडीए की सरकार के दौरान इतिहास के कपबोर्ड से राजे-महाराजे निकाले गए, उन्हें राजनीतिक खिलौना बनाया गया. ऐसे में मैंने उन मूल्यों की तलाश की जो मूल्य राजनीति ने नष्ट करने की कोशिश की थी.
भारतीय संस्कृति ५००० साल से अधिक पुरानी है. इसमें जो मानव-मानव का रिश्ता, मानव-ईश्वर का रिश्ता बना उसे बीच के एजेंटों ने ख़राब किया है. इसे कलमबद्ध करने की कोशिश मैंने इन ग़ज़लों में की है और सियासत को मोहब्बत सिखाने का प्रयास किया है. खुसरो से लेकर कबीर, नज़ीर, मीर आदि के छंदों के जरिये आधुनिक युगबोध द्वारा उन मूल्यों को पकड़ने की कोशिश की है जो आदमी को आदमी से जोड़ते हैं, मिलाते हैं.

वैसे भी कविता-शायरी में आम आदमी और निम्न मध्य वर्ग की बात तो सभी करते हैं लेकिन ज़ुबाँ मध्यवर्ग या उच्च मध्य वर्ग की होती है. आम आदमी की ज़बान में खुसरो, कबीर, नज़ीर, मीर ने बात की है, आगे नागार्जुन, धूमिल, दुष्यंत कुमार ने बात की है, लेकिन अज्ञेय, मुक्तिबोध की भाषा आम आदमी की भाषा नहीं है. वह बात करने की कोशिश मैंने की है.
'

गुरुवार, 26 जून 2008

इस बार पढ़िये सिब्बन बैजी की चंद गज़लें

शायर सिब्बन बैजी का मूल नाम सीबी सिंह है, मुझे इसका इल्म बहुत बाद में हुआ. करीब १८ साल पहले जब मैं मुम्बई में उनसे मिला था तो उन्हें तमाम दोस्त सिब्बन नाम से पुकारते थे. वह फक्कड़ तबीयत के, छपने-छपाने के मामले में बेपरवाह शायर रहे हैं. तभी तो उनका एकमात्र ग़ज़ल संग्रह २००७ में आ पाया है वह भी नौकरी से रिटायर होते-होते.



सिब्बन मूलतः अलीगढ़ जनपद स्थित विजयगढ़ नामक क़स्बे के हैं. जिंदगी भर पोस्ट ऑफिस में चाकरी की लेकिन शायरी का चस्का ऐसा कि मनीआर्डर फॉर्म पर भी शेर लिख लेते थे. सिब्बन की और मेरी उम्र का फासला बहुत है लेकिन पहले दिन से ही हम दोस्तों की तरह रहते आए हैं, न मैंने महसूस किया कि वह उम्रदराज़ हैं और न उन्होंने यह महसूस होने दिया कि मैं उनसे २५ वर्ष छोटा हूँ. यही सरलता उनकी शायरी की भी खासियत है. पछाहीं लोक संस्कृति की छौंक और तुर्शी उनके अश'आर में सर्वत्र मिलेगी. पेश हैं उनके संग्रह 'आग उगलने की जिद में' से चंद गज़लें-

कैसा है यह शहर कि हर पल गज़र सुनाई देता है
ढलती हुई रात का तन दोपहर दिखाई देता है.

बाहर से हर शख्स यहाँ का हरा-भरा-सा है लेकिन
भीतर जले हुए जंगल का शजर दिखाई देता है.

दूर तलक बस्ती है लेकिन कहीं घरों का नाम नहीं
घर रहते हर शख्स यहाँ दर-ब-दर दिखाई देता है.

किस्सों में खो गयीं नेकियाँ या दरिया में डूब गयीं
जित देखो उस ओर बदी का असर दिखाई देता है.

चलते रहे सहर से शब तक आख़िर वहीं लौट आए
जीवन जाने क्यों अंधों का सफर दिखाई देता है.

मेरी मानो तो 'सिब्बन जी' इस नगरी को छोड़ चलो
चंद सयानों की मुट्ठी में शहर दिखाई देता है.

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रख अपनी मुख्तारी बाबा
अपन भले बेगारी बाबा.

हम अपने बंजर खेतों की
हैं सब मालगुज़ारी बाबा.

रस्ते लहूलुहान कर गयी
राजा की असवारी बाबा.

जब देखो हंसते रहते हो
ऐसी क्या लाचारी बाबा.

आख़िर कब तक ख़ैर मनाती
'सिब्बन' की महतारी बाबा.


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इसका सर उसकी दस्तार
सबसे बढ़िया कारोबार.

दिन में लोग लगें दरगाह
रातों में मीना बाज़ार.

हर इक लब पे लिखा मिला
नानक दुखिया सब संसार.

है इन दिनों वही बीमार
जिसके आँगन पका अनार.

कलम कटारी मीठे बोल
सबके अलग-अलग औज़ार.

हर मजहब है 'सिब्बन जी'
धोती के नीचे सलवार.

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रास्तों से जिस रोज़ सफ़र डर जायेगा
दरिया हो या बँजारा, मर जायेगा

दो की रंजिश में ये बस्ती उजड़ी है
पर इल्ज़ाम तीसरे के सर जायेगा

कितनों को आबाद कर गया देखेंगे
जिस दिन ये तूफ़ान लौट कर जायेगा.

ये तो ज़ख्म दोस्ती का है सच मानो
अगला धोखा आने तक भर जायेगा.

मालूम है अंजाम, भटक ले फिर भी
'सिब्बन' साला भोर भये घर जायेगा.


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झूठी आस बंधाने वाले दिल को और दुखइयो न
माज़ी की मुस्कान लबों को हरगिज याद दिलइयो न.

दुनिया इक रंगीन गुफा है ऐयारी से रौशन है
मेरी सादगी के अफसाने गली-गली में गइयो न.

रमता जोगी बहता पानी इनका कहाँ ठिकाना है
कोरे आँचल को नाहक में गीला रोग लगईयो न.

हम हैं बादल बेरुत वाले बरसे बरसे, न बरसे
मौसम के जादू के नखरे मेरी जान उठइयो न.

रुसवाई के सौ-सौ पत्थर क़दम-क़दम पर बरसेंगे
दिल के टूटे हुए आईने दुनिया को दिखलइयो न.

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खाली बोतल, टूटी चूड़ी, कपड़े फटे-पुराने से
हमने सुना है हुए बरामद मन्दिर के तहखाने से.

बाहर शोर कीर्तन का और भीतर चीख़ कुमारी की
ठाकुरजी की खुली न खिड़की महतो के चिल्लाने से.

सारा दोष बिजूकों का है फसलों को भरमाने में
नाहक ही बदनाम हो गया मौसम रंग जमाने से.

शोहदों से तो ख़ैर बच गयी इज्जत एक कुंआरी की
लगता है मुश्किल बच पाना पंच-कचहरी-थाने से.

शायद कोई जादूगरनी रहती होगी शहरों में
तभी लोग डरते रहते हैं गाँव लौटकर आने से.

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((मेरा मानना है कि जब तक किसी कवि या शायर की चार-छः कवितायें-गज़लें एक साथ पढ़ने को न मिलें तब तक उसके मिज़ाज को समझ पाना ज़रा कठिन होता है. उम्मीद है उपर्युक्त ग़ज़लों से गुजरने के बाद सिब्बनजी के बारे में आप कोई राय बना पायेंगे. आपकी राय यकीनन उन तक पहुंचा दी जायेगी.
सिब्बन बैजी के घर का पता है- बी/३०९, अरुणोदय अपार्टमेंट, गोड़देव नाका, भायंदर (पूर्व), ज़िला-ठाणे (महाराष्ट्र), पिन- ४०११०५)).

मंगलवार, 24 जून 2008

बाल कविता या प्रौढ़ कविता?

दोस्तों, कुछ दिनों पहले मुझसे एक कविता हो गयी. दोस्तों को पढ़वाई तो कहने लगे कि यह बाल कविता है. मैंने कहा कि अच्छा है, आजकल बाल-साहित्य पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जा रहा है, लेकिन मुझसे बेध्यानी में ही सही; बाल-साहित्य के खाते में कुछ दर्ज़ हो गया.

उसके बाद कुछ और दोस्त कहने लगे कि यह सिर्फ बाल-कविता नहीं है, इसे प्रौढ़ लोग भी पढ़ सकते हैं. अब मैं दुविधा में पड़ गया. यह बाल-कविता है या प्रौढ़ कविता? मेरी इच्छा है कि सुधीजन इसे पढ़ें और बताएं कि मैं क्या समझूं?







गुरुजन

चींटी हमें दयावान बनाती है
बुलबुल चहकना सिखाती है
कोयल बताती है क्या होता है गान
कबूतर सिखाता है शांति का सम्मान.

मोर बताता है कि कैसी होती है खुशी
मैना बाँटती है निश्छल हँसी
तोता बनाता है रट्टू भगत
गौरैया का गुन है अच्छी सांगत.

बगुले का मन रमे धूर्त्तता व धोखे में
हंस का विवेक नीर-क्षीर, खरे-खोटे में
कौवा पढ़ाता है चालाकी का पाठ
बाज़ के देखो हमलावर जैसे ठाठ.

मच्छर बना जाते हैं हिंसक हमें
खटमल भर देते हैं नफ़रत हममें
कछुआ सिखा देता है ढाल बनाना
साँप सिखा देता है अपनों को डँसना.

उल्लू सिखाता है उल्लू सीधा करना
मछली से सीखो- क्या है आँख भरना
केंचुआ भर देता है लिजलिजापन
चूहे का करतब है घोर कायरपन.

लोमड़ी होती है शातिरपने की दुम
बिल्ली से अंधविश्वास न सीखें हम
कुत्ते से जानें वफ़ादारी के राज़
गाय से पायें ममता और लाज.

बैल की पहचान होती है उस मूढ़ता से
जो ढोई जाती है अपनी ही ताकत से
अश्व बना डालता है अलक्ष्य वेगवान
चीता कर देता है भय को भी स्फूर्तिवान.

गधा सरताज है शातिर बेवकूफ़ी का
ऊँट तो लगता है कलाम किसी सूफी का
सिंह है भूख और आलस्य का सिरमौर
बाकी बहुत सारे हैं कितना बताएं और...

सारे पशु पक्षी हममें कुछ न कुछ भरते हैं
तब जाकर हम इंसान होने की बात करते हैं.

-विजयशंकर चतुर्वेदी.

रविवार, 15 जून 2008

कौन ज्यादा कुत्सित- अमेरिकी या भारतीय मीडिया?

'मोहल्ला' में अंशुमाली जी का यह लेख और उससे पहले दिलीप मंडल का. मैंने टिप्पणी के रूप में कुछ बातें की थीं. शायद वे इन दोनों लेखों से जुड़ती हैं. दिलीप भाई के लेख पर कुछ इस तरह की शिकायत भी टिप्पणी के रूप में आयी थी कि बहस को दूसरी दिशा में क्यों मोड़ दिया गया. पूर्व और पश्चिम की बात करते हुए अक्सर हम एक अतिवादी दृष्टिकोण का शिकार हो जाते हैं. कुछ-कुछ मनोज कुमार की भारतीयत की तरह. उम्मीद है कि मित्रगण इसे वस्तुस्थिति और तथ्यपरकता की राह पर लायेंगे. फिलहाल बात मीडिया की हो रही है.

सरकारी नीतियों, धर्मांध समूहों, जाति की राजनीति करने वाले दलों का महिमामंडन करने, जनता से सच छिपाने, महानगरों और वहाँ की ही खबरों तथा जनजीवन को पूरा भारत समझ लेने जैसे कई मामलों में भारतीय मीडिया भी अमेरिकी मीडिया के नक्श-ए-कदम पर चल रहा है या कहें कि पश्चिम की भोंडी नक़ल करने की कोशिश कर रहा है. मीडिया में अमेरिकी तकनीक का पिछलग्गू बने रहना तो खैर उसकी मजबूरी ही है.


मैंने लिखा था-

दिलीप भाई, सर्वे वहाँ कराया जाता है जहाँ इसकी आवश्यकता होती है. हमारा मीडिया अंतर्यामी है और तय करता है कि जनता को क्या पढ़ना-देखना-सुनना चाहिए. हमारे यहाँ मीडिया का बाज़ार और न्यूज रूम की सुर-ताल का एक नमूना एक हिन्दी राष्ट्रीय चैनल पर मैंने चंद दिन पहले ही देखा. ऐसे उदाहरण लगभग हर चैनल से दिए जा सकते हैं. पतित होने की स्पर्द्धा चल रही है-

'एक महिला को साईं बाबा साक्षात दर्शन देने के बाद माला थमा कर चले गए, उसके बाद इसे ख़बर की तरह पेश करके उस तथ्य से जोड़ दिया गया कि साईं बाबा ने देह त्यागने से पहले अपने ९ सिक्के सेवा करने वाली लक्ष्मी अम्मा को दे दिए थे. उस महिला की पोती ने यह भी बताया कि वह वर्ष १९१८ का कोई दिन था.'

दर्शन देने वाली इस गल्प को कई ब्रेक लेकर बताया गया और हर ब्रेक में भरपूर विज्ञापन भी थे. सोचिये इन विज्ञापनों के जुटने से पहले साईं बाबा को टीवी पर ख़बर बन कर आने के लिए समाधि में कितनी करवटें बदलना पड़ीं होंगी!

वैसे, यह ख़बर देखने के बाद साईं बाबा मेरे सपने में भी आये थे और इस तरह 'यूज कर लिए जाने' की अपनी असहायता पर फूट-फूट कर रो रहे थे! (भक्तजनों से क्षमायाचना सहित!)

... अब अमेरिकी मीडिया इंडस्ट्री के इस सर्वे की बात (कृपया दिलीप मंडल की उसी पोस्ट में तालिका देखें). वह समाज या पाठकों के हितों वाला सर्वे नहीं है, बल्कि अपनी जान बचाए रखने का सर्कुलेशन सर्वे है. वहाँ पारंपरिक मीडिया की हालत पर्याप्त पतली हो चली है. भारत में भी कई संस्थाएं मेहनताना वसूल कर अखबारों-पत्रिकाओं के लिए इस तरह के सर्वे करती रहती हैं कि किस आयु वर्ग के लोग किस तरह की सामग्री पढ़ना पसंद करते हैं, वगैरह.

नॉम चोम्स्की ने सच ही कहा था कि अमेरिकी समाज दरअसल, एक बन्द समाज है. इसमें मैं यह और जोड़ना चाहूंगा कि अमेरिकी मीडिया की भूमिका इसमें बहुत ज़्यादा है. पड़ताल की जाए तो अमेरिकी मीडिया दुनिया भर के मीडिया, ख़ास कर भारतीय मीडिया से कई गुना ज़्यादा कुत्सित है.

अमेरिका कितना ही लोकतंत्र का दम भरे, वह अपने नागरिकों को किसी भी वैध माध्यम से दुनिया की सही तस्वीर नहीं पहुँचने देता. ख़ास तौर पर तब; जब उसके अत्याचारों की पोल अपनी ही जनता के सामने खुल रही हो. वहाँ का पूरा मीडिया इस खेल में शामिल होता है. ताज़ा उदाहरण इराक़ युद्ध का है. अमेरिकियों को इराक़ हमले के शुरुआती दो साल तक यह पता ही नहीं लगने दिया गया कि अमेरिकी सैनिकों की अगुवाई में क्या-क्या कहर निर्दोष इराकी जनता पर ढाये जा रहे हैं. वहाँ सद्दाम को आज-कल में पकड़ लेने और इराक में लोकतंत्र का झंडा एक-दो दिनों में फहरा दिए जाने की खबरें चलायी जा रही थीं. तमाम आरोपों के बावजूद इराक़ युद्ध की कहीं ज़्यादा व्यवस्थित खबरें भारत पहुँच रही थीं.
दिनांक ११ सितम्बर २००१ को न्यूयार्क स्थित ट्विन टावर पर हुए हमले के बाद गिरफ्तार अल-कायदा कार्यकर्ताओं को रखने के लिए क्यूबा की धरती पर गुआंतानामो जेल(ख़ास प्रकोष्ठ) साल २००२ में बनायी गयी थी. बाद में इसमें अफ़गानिस्तान युद्ध के तालिबान बंदी लाये गए, उसके बाद इराक़ युद्ध के दौरान पकड़े गए लोग ठूंसे गए. इस जेल में अमरीकियों द्वारा विदेशी कैदियों पर ढाये गए अमानुषिक, लोमहर्षक लैंगिक अत्याचारपिशाचों को भी शर्मिन्दा कर देने वाले हैं. लेकिन अमेरिकी जनता को इनकी भनक भी नहीं लगने दी गयी. अत्याचार करने वालों में यूएस महिला सैनिक भी शामिल थीं!


यह तो तकरीबन 3 साल पहले भांडा फूटा और दुनिया के सामने अमेरिका का मुंह काला हो गया. अब जाकर गुरु (१२/०६/२००८) को यूएस सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इन कैदियों को अमेरिकी संविधान के तहत न्याय मिलेगा, इस पर यूएन ने भी ताली बजाई है. देखने वाली बात यह है कि जनता के सामने बात खुल जाने के बाद अब आगामी राष्ट्रपति चुनाव के दोनों प्रतिद्वंद्वी डेमोक्रेट बराक ओबामा और रिपब्लिकन जॉन मकैन भी इस जेल को ख़त्म कर देने के वादे करते नहीं अघा रहे.

इसी तरह जिस दिन से ब्लोगों और अन्य माध्यमों से इराक़ युद्ध की विभीषिका की तस्वीर साफ होना शुरू हुई उसी दिन से राष्ट्रपति बुश को अपनी जनता से नज़रें चुरानापड़ रही हैं. हर दूसरे-चौथे दिन सफाई देते रहते हैं और इस बार का राष्ट्रपति चुनाव जिन मुद्दों पर लड़ा जाना है, उनमें से यह एक बड़ा मुद्दा होगा. और अमेरिकी मीडिया हर बार के राष्ट्रपति चुनाव की तरह अमेरिका की शानदार 'हेट कैम्पेन' परम्परा का सक्रिय सहयोगी बन जायेगा.आख़िर विश्व में अमेरिकी पूंजी का तांडव होने से उसकी झोली में भी तो डॉलर बरसते हैं.

गुरुवार, 12 जून 2008

बारिश जो न करवाए, गीत लिखवा लिया!




बारिश जो न चाहे करवा ले!
कल वर्षा में सराबोर होकर जब घर पहुंचे तो हल्का-हल्का सुरूर छा चुका था. गली में बैठने वाले बुजुर्ग घड़ीसाज़ रियाज काका से सुबह ही छतरी सुधरवाई थी. रास्ते में हवा-पानी की मार से वह क्षत-विक्षत हो चुकी थी. पैराहन से पानी टपक रहा था. घर में घुसने से पहले ताकीद हुई कि ज़रा बाहर ही निचुड़ लो. फिर तौलिया आया, सूखे कपड़े आए, तब अपन घर के अन्दर दाखिल हुए.

मेथी के पकौड़े तैयार थे. फिर चाय का दौर चला. इसी बीच मन में एक गीत उमड़ने-घुमड़ने लगा. कागज़ पर उतरने के बाद कुछ यों हो गया है. पढ़िये और कहिये कैसा लगा-


बारिश की बूँदें चुईं
टप...टप...टप
कांस की टटिया पे
छप...छप...छप
बरखा बहार आयी
नाच उठा मन
घनन घनन घन,
घनन घनन घन

उपले समेट भागी
साड़ी लपेट भागी
पारे-सी देह भई
देहरी पे फिसल गयी
अपनी पड़ोसन
घनन घनन घन,
घनन घनन घन

बिल में भरा पानी
दुखी चुहिया रानी
बिजली के तार चुए
जल-थल सब एक हुए
पेड़ हैं मगन
घनन घनन घन,
घनन घनन घन

फरर-फरर बहे बयार
ठंड खटखटाये दुआर
कैसे अब आग जले
रोटी का काम चले
मचल रहा मन
घनन घनन घन,
घनन घनन घन.

शनिवार, 7 जून 2008

'बकरी जो मैं-मैं करती है....'


'मौर्यध्वज और ताम्रध्वज' नाटक हमारे यहाँ रामलीला का राज्याभिषेक समाप्त होने के बाद देसी मंडलियाँ खेला करती थीं. अब तो टीवी ने रामलीला मंडलियों को लील लिया है. बचपन में सतना जिले के दुरेहा कस्बे की रामलीला मंडली बड़ी नामाजादिक थी. उसका साजो-सामान और कलाकार ख्यातनाम थे. बीस बैलगाड़ियों में उसका सामान पहुंचता था. परशुराम का अभिनय करने वाले कलाकार रामरतन शुक्लाजी की प्रतिष्ठा इस बात में थी कि वह लक्ष्मण से वार्तालाप करते-करते तख्त तोड़ दिया करते थे - 'भा कुठार कुंठित कुलघाती...
'देखो बेटा, किसी को फालतू में गरब नहीं करना चाहिए. जिस प्रकार बकरी मैं-मैं करती है उसी तरह आदमी घमंड में जिंदगी भर मैं-मैं करता है, और बकरी के मरने के बाद जब उसकी खाल से रुई धुनने का तकुआ बनाया जाता है तब धुनिया के रुई धुनते समय उसकी खाल से तुही-तुही आवाज आती है, यानी तब बकरी मैं-मैं नहीं करती बल्कि तूही-तूही कहने लग जाती है. इसी प्रकार मरने के बाद आदमी को अपने घमंड का फल नरक में भोगना पड़ जाता है. अगर आदमी जिंदा रहते मैं-मैं छोड़कर भगवान को माने और कहे कि हे भगवान सारे काम तूही करता है तो उसे स्वर्ग मिलेगा.'


उनकी कद-काठी और मूछें ओरिजिनल थीं. उन्हें सामान्य रूप में देख कर भी हम डर जाया करते थे. लेकिन हमारे बाबा के साथ जब वह अपनी खेती-बाड़ी और घर के सुख-दुःख बयान करते समय बच्चों की तरह निर्मलता से हंसते तो हमारा डर जाता रहता था. पंडित जी रामलीला की घटती लोकप्रियता पर भी चार आंसू बहाना नहीं भूलते थे. उन्हें इस बात से भी तकलीफ होती थी कि जमींदार लोग आमोद-प्रमोद में धन लुटाते हैं लेकिन रामलीला के लिए चन्दा देने के नाम पर इनकी नानी मरती है. मंडली के गाँव में मौजूद रहने तक प्रेमचंद की 'रामलीला' के बालक की तरह हमारी दशा रहती थी. लीजिए, विषयांतर हो ही गया.

तो यही पंडितजी 'मौर्यध्वज और ताम्रध्वज' नाटक के दिन राजा मौर्यध्वज बना करते थे. पांडवों के दिग्विजयी घोड़े पर कब्जा होने से क्रोधित अर्जुन कहते-

'रे सठ बालक कालवश वृथा होय क्यों आज?
विश्वविदित पाण्डवों का पकड़ लियो तैं बाज़!'

मौर्यध्वज पुत्र ताम्रध्वज अर्जुन की अहंकार भरी बातों के जवाब में संवाद गाकर पढ़ते-

'बकरी जो मैं-मैं करती है, वह गले छुरी चलवाती है
जब धुनिया रुई को धुनता है, तब तूही-तूही चिल्लाती है.'


इस पूरे प्रसंग के दौरान पंडितजी परदे के पीछे से ताम्रध्वज को प्रोम्प्टिंग करते रहते थे क्योंकि ताम्रध्वज का किरदार उनका भतीजा निभाता था और मंडली में उसके कई प्रतिद्वंद्वी तैयार हो गए थे.

नाटक के अगले दिन हम लोग उनसे ऊपर की लाइनों का मतलब पूछते तो वह बताते- (कृपया ऊपर का बॉक्स मैटर देखें)

उनकी यह व्याख्या सुनकर हम लोग उनके बताये अनुसार पाप शांत करने के लिए अपनी कोपियों में एक दिन में २०० बार राम-राम लिखने का संकल्प लिया करते और कुछ दिन अमल भी करते थे.

आज सोचता हूँ तो लगता है कि लोकजीवन में चीजों की समझ कितनी मौलिक और गहरे तक पैठी हुई है. यह बात दीगर है कि अब मैं न तो स्वर्ग-नरक के चक्कर में पड़ता न ही कर्मफल के. हालांकि यहाँ तक पहुँचने में मुझे व्यक्तिगत स्तर पर भारी मानसिक और व्यावहारिक श्रम करना पड़ा है. लेकिन रामरतन शुक्लाजी की एक बड़े काम की बात अब भी याद रखता हू- 'बकरी जो मैं-मैं करती है....'

मंगलवार, 3 जून 2008

पढ़िये लीलाधर जगूड़ी की 'पुरुषोत्तम की जनानी'


हमारे समय के बहुत बड़े कवि लीलाधर जगूड़ी की यह कविता मैं चाहता हूँ कि ब्लॉगर साथी पढ़ें. 'पहल' के हालिया अंक में छपी यह कविता आजकल चर्चा में है.

जगूड़ी जी से इस कविता को लेकर फोन पर मेरी बात हुई. उन्होंने कहा- "पेड़ तटस्थ समाज का प्रतीक न समझा जाए बल्कि विवश मनुष्यता का साक्ष्य प्रस्तुत करने वाला या आंखों देखा हाल बयान करने वाला एक संवाददाता मात्र भी पेड़ वहाँ नहीं है बल्कि पेड़ एक बहुत बड़े अपराध-बोध से ग्रस्त दिखलाई देता है और वह पुरुषोत्तम की जनानी की आत्महत्या वाले अपराध की जैसे समीक्षा कर रहा हो. यह मरने वाले की और जीने वाले पेड़ की ग्लानि से उत्पन्न कथानक है."

मुझे लगता है कि यह कविता जैसी न लगने वाली कविताई है. हिन्दी में यह नया फिनामिना है. यह बहुप्रचलित शिल्प को तोड़ती हुई कविता है. जगूड़ीजी की कविता का यह नया शिखर है जो अनुभव और अवस्था के साथ माउन्ट एवरेस्ट होता चला जा रहा है. महाकवि पाब्लो नेरूदा की कविताओं में जिस तरह पेड़ आते हैं जगूड़ी जी की कविता में भी पेड़ तरह-तरह से आते हैं और हर बार वे एक नए मनुष्य की भूमिका निभाते दिखते हैं.

जगूड़ी जी चंद कवितायें पिछले दिनों कबाड़खाना में साथी अशोक पांडे ने पढ़वाई थीं. अब पढ़िये यह कविता-

पुरुषोत्तम की जनानी

एक पेड़ को छोड़कर फ़िलहाल और कोई ज़िंदगी मुझे
याद नहीं आ रही
जो जिस समय डरी हो और उसी समय मरी न हो

जिसने मरने का पूरा उपाय रचे जाते देखा हो
और न जी पाने वालों के बाद भी ज़िंदा रहना और बढ़ना न छोड़ा हो
जो न कह पाते हुए भी न भूल पाने का हवाला देकर
फांसी के फंदे की याद दिला देता हो

भले ही ऐसे और जो ऐसे नहीं हैं वैसे पेड़ अंधेरे में भूत नज़र आते हों
पर वे रातों को घरों में
खिड़कियों के सींखचे पार करके आ पहुँचते हैं
और घर की सब चीज़ों को छूकर
नाक से फेफड़ों में चले जाते हैं
और बालों, नाखूनों तक से वापस होकर
रोशनदानों से बाहर निकलकर फिर सींखचों से अन्दर चले आते हैं

वैसे वे पेड़ अंधेरे में भूतों-से और उजाले में देवदूतों-से नज़र आते हैं
कि जैसे अलग-अलग किस्म का दरबार लगाए हुए हों
कुछ उत्पादन का, कुछ व्यक्तित्व की छाया का
कुछ अपने छोटेपन का, कुछ अपनी ऊँचाइयों का दरबार...

पर जो पेड़ खेत किनारे पगडंडी से थोड़ा ऊँचाई पर दिखते हैं
जैसे जन्म से ही सिंहासनारूढ़ हों
भले ही कुछ तो सिपाहियों जैसे दिखते हैं
पर एक जो सयाना-सा बीच में कुछ ज़्यादा उचका हुआ नेता-सा दिखता है
उससे पता नहीं पुरुषोत्तम की जनानी ने
कब क्या और कैसे कोई आश्वासन ले लिया कि बेचारी ने वह योजना
बना डाली
सारे विकल्प बेकार हो जाने पर जिसका नम्बर आता है

पुरुषोत्तम की जनानी द्वारा आत्महत्या के अनजाने कारणों वाली रात से
वह नेताओं वाली शैली में नहीं बल्कि पेड़ वाली खानदानी शैली में
लाश के साथ टूटने की हद तक झुका रहा काफी दिन
जैसे मनुष्य मूल्यों के अनुसार अटूट सहारा देना चाह रहा हो
जो मनुष्य होकर पुरुषोत्तम नहीं दे सका अपनी जनानी को

बकौल लोगों के इस जनानी में धीरज न था
और पेड़ की चुप्पी कहती है कि उसमें उतना वज़न न था
कि टहनी फटकर टूट जाती या इतना झुक जाती
कि मरने से पहले ही वह ज़मीन छू लेती और बच जाती

मकानों में जो घर होते हैं और घरों में जो लोग रहते हैं
और लोगों में जो दिल होते हैं और दिलों में जो रिश्ते होते हैं
और रिश्तों में जो दर्द होते हैं
और दर्द में जो करुणा और साहस रहते हैं
और उनसे मनुष्य होने के जो दुस्साहस पैदा होते हैं
वे सब मिलकर इस टीले वाले पेड़ तक आए थे रात
पुरुषोत्तम की अकेली जनानी का साथ निभाने या उसका साथ छोड़ने
एक व्यक्ति के निजी कर्त्तव्य और दुखी निर्णयों ने भी
अन्तिम क्षण कितनी पीड़ा से उसका साथ छोड़ा था यहाँ पर,
चरमराया पेड़ मारे घबराहट के कभी बता न सकेगा

पूरे इलाके में छह महीने से एक मनुष्य की मृत्यु टँगी हुई है
उस पेड़ पर
जो कैसे और क्यों ज़िंदा रहने पर पछताया हुआ दिख रहा है
मजबूत समझकर पुरुषोत्तम की जनानी ने उस पर फंदा डाला होगा
जो पहली बार डरा होगा उसकी कमज़ोरी और अपनी मजबूती से
कई दिन तक रोज़ जुटने वाली भीड़ के बावजूद उसकी निस्तब्धता तो
यही बताती थी

अब इस पेड़ के सिवा पुरुषोत्तम की जनानी की ज़िंदगी के बारे में
कोई दूसरी ज़िंदगी मुझे फ़िलहाल याद नहीं आती
जो किसी के सामने जिस समय डरी हो और उसी समय मरी न हो...

बाकायदा फंदा डालते हुए उसने
कुछ तो और समय मरने की तैयारी में लगाया होगा
पहले बिल्ली की तरह चिपककर, तने पर वहाँ तक पहुँची होगी
जहाँ से पेड़ चौराहे की तरह कई शाखाओं में बँट गया है
फिर कमर से रस्सी खोलने के बाद टहनी पर फंदा बनाया होगा
तब एक छोर गले में बाँध कर कूदने का इरादा किया होगा
तब सुनिश्चित होकर अनिश्चित में छलाँग लगाई होगी
मरने से पहले कुछ देर पहले वह जीवित झूली होगी

उसकी कोई झिझकी या ठिठकी मुद्रा बची रह गयी हो
तो पेड़ की अंधेरी जड़ों में होगी
आसमान में कहीं कुछ अंकित नहीं है

पता नहीं पेड़ और पुरुषोत्तम की जनानी में जीने के बदले
मरने का यह रिश्ता कैसे बना?
जिस पर मरने वाले के बजाय जीने वाला पेड़ होकर भी शर्मिन्दा है
इसी शर्मिन्दगी में से पैदा होने हैं इस साल के फूल-फल और पत्ते
पर इस देश में वसंत पर शर्मिन्दगी का संवाद सुनने-पढ़ने की परम्परा नहीं है.

(jagoodi ji ka photo: ashok pande ka blog 'kabadkhana' se sabhaar)

रविवार, 1 जून 2008

तुझे सोमरस कहूं या शराब? (अन्तिम)


पिछली कड़ी में आपने पढ़ा कि पैट्रिक एडवर्ड मैकगवर्न ने अपनी किताब 'एनसियेंट वाइन: द सर्च फॉर द ओरीजिंस ऑफ़ विनी कल्चर' में लिखा है कि यूरेशियाई वाइन (अंगूर की खेती और शराब का उत्पादन) आज के जोर्जिया में शुरू होकर वहाँ से दक्षिण की तरफ़ पहुँची होगी. यह किताब प्रिंसटन यूनिवर्सिटी प्रेस से साल २००३ में छपी थी. अब आगे...
'चिकित्सक के लिए औषधियों का वही महत्त्व है जो कि राजा के लिए मंत्रियों की प्रशासनिक संस्था का होता है. जो औषधियों का ज्ञान रखता है, चिकित्सक है और वही शरीर की गड़बडियों को ठीक कर सकता है. मैं कई औषधियों को जानता हूँ जैसे- अश्ववटी, सोमवटी, उर्जयंती, उदौजस आदि.'--- ऋगवेद: अध्याय १०/९७, ऋचा ६,७).'


एकदम आरंभ में किसान जंगली फलों तथा अंगूर से एल्कोहलिक पेय बनाते थे. इन फलों तथा अंगूरों को ग्रीक में वितिस सिल्वेस्त्रिस कहा गया है. लेकिन पेय को संरक्षित रखने के लिए बर्त्तन नहीं होते थे. जब आज से करीब ९००० वर्ष पूर्व नियोलिथिक युग के निकट-पूर्व में मिट्टी के बर्तन बनने लगे तो इन पेयों को सुरक्षित रखना आसान हो गया और शराब उत्पादन को भी गति मिली.

सुमेर में 2750 साल ईसा पूर्व शराब बनाए जाने के प्रमाण मिले हैं. उधर प्राचीनकाल में चीनवासी पर्वती अंगूरों से शराब बनाते थे, लेकिन जब दूसरी शताब्दी में मध्य-एशिया से उन्होंने बजरिये सिल्क-रूट घरेलू अंगूर आयात करने शुरू किए तो चीन में शराब उत्पादन का नया युग आरंभ हो गया.

कहा जाता है कि एकदम आरंभिक काल में जंगली अंगूर उत्तरी अफ्रीका से मध्य एशिया में आते थे. लेकिन शराब बनाने लायक घरेलू अंगूर निकट-पूर्व में सबसे पहले उगाये गए, जो आज के ईरान का इलाका है. यह विवादास्पद है फिर भी इस बात को काफी हद तक माना जाने लगा है कि आर्य ईरान की तरफ़ से आए थे, जिसके कई प्रमाण मिल चुके हैं. इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि यही आर्य अपने साथ घरेलू अंगूर की कई किस्में लेते आए होंगे. क्योकि वह उनकी संस्कृति का एक अभिन्न अंग बन चुके थे.

सिंधु सभ्यता में शराब के सेवन का अब तक कोई संकेत नहीं मिला है. अलबत्ता उत्खनन से प्रमाण मिले हैं कि सिंधुवासी मछली का सेवन करते थे. जबकि आर्य दुग्ध, सोमरस और सुरा से परिचित थे. दूध में पकाए गए चावलों की खीर को 'क्षीरणकोदन' कहा जाता था. आर्य भेड़ और बकरी का मांस बड़े चाव से खाते थे. सोम का प्रयोग यज्ञों में होता था जबकि सुरा आम प्रयोग में थी. जाहिर है सोम एक पवित्र पेय था जिसे सुरा से भिन्न किस्म के अंगूरों एवं भिन्न विधि से निर्मित किया जाता रहा होगा. उल्लेखनीय बात यह यह है कि सोम में मादकता नहीं होती थी जबकि सुरा में मदिरा की तरह नशा होता था.

यहाँ दो बातें जहन में आती हैं- एक, गाय-भेड़-बकरी ईरान की तरफ के मूल पशु थे. दो, जिसे हम सोमलता के नाम से जानते हैं वह अंगूर की किसी अनोखी किस्म की लता रही होगी. लेकिन यह निश्चित है कि आर्य अपने समय में वनस्पतियों को बहुत महत्त्व एवं मान देते थे. ऋगवेद में दृष्टव्य है-(कृपया बॉक्स मैटर देखें)
'ये औषधियाँ प्रकृति से मिली हैं. ये पूर्व समय में थीं, हैं और रहेंगी. अपने चिकित्सकीय गुणों के चलते ७०० औषधियाँ सर्वज्ञात हैं. सोम सबसे महत्वपूर्ण औषधि है. हजारों जन इन औषधियों का प्रयोग करके बार-बार लाभान्वित हुए हैं.'-- ऋगवेद: अध्याय १०/९७, ऋचा १,२).

स्पष्ट है कि सोमवटी को कितना महत्त्व दिया गया है. यह श्रेष्ठ औषधियों में से एक थी. इसीलिए इससे बना पेय देवताओं को अर्पित किया जाता था; सामान्यजन को नहीं.

कहने का तात्पर्य यह है कि सोमरस और सुरा जैसे पेय आर्यों के जीवन का अभिन्न अंग थे. नियोलिथिक युग से शराब की जो यात्रा शुरू हुई थी वह आर्यों के जरिये भारतवर्ष तक चली आयी. यह अनंत यात्रा आज भी ज़ारी है. और अब तो शराब के शहस्त्रबाहु एवं कोटिसिर हैं. इसे चाहे जिन नामों से पुकारिये लेकिन यह तय है कि दुनिया में शराब का डंका बजता है और यह आज के बड़े-बड़े इन्द्रों के सर चढ़कर तांडव करती है.

इति श्रीरेवाखंडे अन्तिमोध्याय समाप्तः -- बोलो वृन्दावन बिहारी लाल की जै!

(सनका दिक् मुनि टोटल सनक गए हैं. सुबह-सुबह उठे तो कहने लगे कि दण्डक अरण्य में कुछ दिन सोमरस बनाने की नयी-नयी विधियां ईजाद करेंगे! ताज़ा रपट यह है कि अभी-अभी अपनी लकुटि-कमरिया लेकर प्रस्थान कर गए हैं).

ईश्वर उन्हें शांति दे!