Saturday, May 24, 2008

भारतीय भाषाओं का भविष्य: मुम्बई में एक गोष्ठी

कल शाम चर्चगेट के सामने स्थित इंडियन मर्चेंट्स चेंबर के दूसरे माले पर एक सभागृह में 'भारतीय भाषाओं के भविष्य' पर चर्चा हुई। यह आयोजन 'महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी' तथा 'सम्यक न्यास' के तत्वावधान में हुआ. समारोह की अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार तथा 'महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी' के अध्यक्ष नन्दकिशोर नौटियाल ने की. 'सम्यक न्यास' के कर्ताधर्ता राहुल देव प्रमुख अतिथि वक्ताओं में से थे.


पेंसिलवेनिया विश्वविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष रह चुके सुरेन्द्र गंभीर इस अवसर पर विशेष तौर पर अमेरिका से आए थे। उनके साथ स्वित्ज़रलैंड से आए एक विद्वान भी मौजूद थे जो अपने देश में हिन्दी के लिए काम करते हैं. फिल्मकार महेश भट्ट भी थोड़े समय के लिए आए और अपनी बात रखकर चले गए. महेश भट्ट ने अपने उदबोधन में कहा- 'भारतीय भाषाओं पर संकट इसलिए गहरा गया है कि अब हमारे अन्दर भाषाई अस्मिता की भावना उतनी तीव्र नहीं रह गयी है. हमसे कहा जाता है कि अपनी भाषा और संस्कृति गिरवी रख दो, इसके बदले आकर्षक पैकेज दिया जाता है. भट्ट के अनुसार गुलामी का यह नया चेहरा है जो हमें लुभावने प्रस्तावों के जरिये प्रस्तुत किया जाता है, इससे सावधान रहने की जरूरत है'.


सुरेन्द्र गंभीर का कहना था कि भारत के अलावा अन्य किसी भी विकासशील देश ने अपनी भाषा की कीमत पर विकास का रास्ता नहीं चुना। यहाँ अंगरेजी का बर्चस्व है. उन्होंने नीदरलैंड्स का हवाला देते हुए कहा कि डच लोग बेहतरीन अंगरेजी जानते हैं लेकिन घरेलू व्यवहार में अंगरेजी का प्रयोग कभी नहीं करते. भारत में हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं की दुर्दशा देखकर हैरानी होती है.


अकादमी के सदस्य सचिव और 'नवभारत टाइम्स' के वरिष्ठ संवाददाता अनुराग त्रिपाठी विषय प्रवर्त्तन कर रहे थे। कई बार चर्चा पटरी से उतरी तो राहुल देव ने बीच-बीच में अपनी बात रख कर उसे फिर सही जगह ला खड़ा किया. राहुल देव ने महेश भट्ट से आग्रह किया कि वे हिन्दी की रोटी खाने वाले शाहरुख खान जैसे उन फ़िल्म अभिनेताओं तक संदेश पंहुचाएं जो मीडिया में मुंह खोलते ही अंगरेजी झाड़ने लगते हैं.


इस चर्चा में मलयालमभाषी लेखक के. राजेंद्रन, बांग्ला का प्रतिनिधित्व कर रहे कवि-पत्रकार आलोक भट्टाचार्य, गुजराती के हेमराज शाह (अध्यक्ष, महाराष्ट्र राज्य गुजराती साहित्य अकादमी) , उर्दू के सत्तार साहब (अध्यक्ष, महाराष्ट्र राज्य उर्दू साहित्य अकादमी), मराठी के प्रकाश जोशी (टाइम्स ऑफ़ इंडिया) ने अपनी बात रखी. प्रकाश जोशी का कहना था कि महाराष्ट्र सरकार ने महाराष्ट्र की प्राथमिक पाठशालाओं में पहली कक्षा से ही मराठी के साथ-साथ अंगरेजी पढ़ाना अनिवार्य कर दिया है लेकिन किसी समाचार पत्र ने यह बात सामने नहीं रखी.


आलोक भट्टाचार्य ने कहा कि बांग्ला, तेलुगु, तमिल, कन्नड़ को अंगरेजी से कोई संकट नहीं है, यह सारा संकट हिन्दी को है। इसकी वजह यह है कि हिन्दी के अलावा सभी भारतीय भाषाओं के लोग अपनी भाषा से बेहद लगाव रखते हैं जबकि हिन्दी भाषी हिन्दी की राजनीति में उलझे रहते हैं. उन्होंने कहा कि हर बांग्लाभाषी बांग्ला के लिए अपना तन-मन-धन न्यौछावर कर सकता है लेकिन हिन्दी भाषी सिर्फ लफ्फाजी कर सकता है.


उर्दू के सत्तार साहब ने कहा कि जिस भाषा में रोजगार मिलेगा आदमी वही भाषा सीखने की कोशिश करेगा। उन्होंने कहा कि उनका अंगरेजी से विरोध नहीं है लेकिन यह ख़याल रहे कि अपनी शिनाख्त न मिट जाए. हेमराज शाह ने अपने अनुभव बाँटते हुए बताया कि मुम्बई के गुजराती समाज में यह बात पहुंचा दी गयी है कि हर परिवार कम से कम गुजराती का एक अखबार जरूर खरीदेगा, घर में सिर्फ गुजराती बोलेगा और जब भी कोई आयोजन होगा तो गुजराती की स्थिति की समीक्षा अवश्य की जायेगी.


चर्चा में वरिष्ठ पत्रकार गोपाल शर्मा, दीपक पाचापोर (बालको, मार्केटिंग विभाग), डॉ. सोहन शर्मा (लेखक एवं वामपंथी विचारक), वरिष्ठ साहित्यकार नन्दलाल पाठक, शायर राकेश शर्मा, जागरण के ब्यूरोप्रमुख ओमप्रकाश तिवारी, शायर सिराज मिर्जा, संजीव शर्मा ने भाग लिया. इस मौके पर मैंने जो बात रखी उसे किसी पोस्ट में प्रकाशित करूंगा.


वक्ताओं के अलावा न्यू जर्सी से आयीं हिन्दी सेवी देवी नागरानी, कथाकार संतोष श्रीवास्तव, प्रमिला श्रीवास्तव, उद्योगपति भट्टड़ जी, रामनारायण सोमानी, शायर राकेश शर्मा आदि मौजूद थे। आभार एसएनडीटी महिला विश्वविद्यालय की हिन्दी विभागाध्यक्ष रह चुकीं डॉक्टर माधुरी छेड़ा ने प्रदर्शित किया. मुम्बई विश्वविद्यालय के पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉक्टर रामजी तिवारी ने आख़िर में इस गोष्ठी का सार-रूप प्रस्तुत किया.


अपने अध्यक्षीय भाषण के बाद नौटियाल जी ने घोषणा की कि अक्टूबर ३,४,५ को सर्व भारतीय भाषा संगम आयोजित करने का संकल्प 'महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी' ने लिया है. सब पधारें!

Wednesday, May 21, 2008

ब्लॉग आईपीएल: बेनामी वर्सेज सुनामी

हिन्दी ब्लॉग जगत में कुछ लोग बहस फंसाये रहते हैं। भाषा, वर्ण, लिंग, जाति आदि आजकल के लोकप्रिय विषय हैं. आगे चल कर इनका स्वरूप क्या होगा कह नहीं सकते. पर इतना तय है कि हरि अनंत हरिकथा अनंता की तर्ज पर ब्लॉग जगत के संत इसे अपनी-अपनी तरह से अपनी-अपनी स्टाइल में कहते-सुनते रहेंगे. जय हो!


...तो हुआ ये कि एक ब्लॉग ने भाषा की अशुद्धता पर बहस छेड़ दी। अब बहस छिड़ी तो टिप्पणियों का दौर दौरा शुरू हुआ. कुछ शीरीं जबान में तो कुछ कुल्हड़कट भाषा में. और एग्रीगेटरों का पोस्ट दिखाना था कि ठपाक से टिप्पणी आ गयी-


रामचंद्र डेविड ने कहा- बोले तो, तुम अपना पोस्टिंग में जो बी फरमायेला है। पण अपुन को बरोबर जमेला नहीं है. तुम बोलता है लैंग्वेज प्योर होना मांगता, पण अपुन का लैग्वेज जितना मांगता है उतना प्योर नहीं है. तो क्या अपुन पोस्टिंग नईं करने का?


टिप्पणी पढ़कर बहस छेड़ने वाले अर्द्धसत्य त्रिपाठी ने यथासंभव शालीनता से जवाब सरकाया- बन्धु, पोस्टिंग नहीं, चिट्ठी लिखिए और यह लिखने में कठिनाई हो तो पोस्ट लिखिए पोस्टिंग नहीं। ॥और यहाँ विचार-विमर्श भाषा पर चल रहां है, और आप तनिक अपनी जिह्वा तो देखिये..!


रामचंद्र डेविड- क्या बोल रेला है हव्वा? मैं अपना हव्वा देखूं? हलकट कहीं का!


अर्द्धसत्य (क्रोध पीकर) - हव्वा नहीं बन्धुवर, जिह्वा।


रामचंद्र डेविड- अबी अपुन को समझ में आ रेला है, तुम साला लोग अपुन का लैंग्वेज सुधारने का चांसइच नई देना चाहता। अपुन ऐसाइच लेखेंगा, जो उखाड़ना है उखाड़ लो.



अब अर्द्धसत्य त्रिपाठी को तो प्रचंड क्रोध आ गया। वह बेनामी मोड में चले गए- अरे सठ! कनगोजर की संतान. तुझ जैसा तुच्छ चिठ्ठाकार मुझसे इस भाषा में बात करने का दुस्साहस कर रहा है?


उधर रामचन्द्र डेविड सुनामी मोड में आकर बोला- अबे वरली के गटर, पारसी बावा के सड़ेवे अंडे के छिलके! वट है तो सामने आ। ये बेनामी-तेनामी होके क्या बोलबचन दे रेला है?


अर्द्धसत्य त्रिपाठी ने क्रोध में की-बोर्ड तीन बार पटक दिया। पास बैठकर एबीसीडी लिख रहे उनके बच्चे सहम गए. लेकिन संयत होकर अगली टिप्पणी टाइप की- हमारा तात्पर्य यह है कि आप जैसा सज्जन पुरूष इस जीवन में आज तक नहीं मिला है. अभी-अभी आपने जो गालियाँ दी हैं वह बेनामी मैं नहीं था. मैं तो यह अनुरोध कर रहा था कि-


तभी उधर से रामचन्द्र डेविड की टिप्पणी आ गयी- अबे, कोन से बिल में घुस गएला है? हिम्मत है तो सामने आ झाडू से बिछड़े हुए तिनके...


अब पंडित जी हत्थे से उखड़ गए और बेनामी मोड में पहुँचकर बोले- तुम अवश्य किसी शूद्र खानदान से हो। वरना भाषा की बहस में भाषा की शालीनता का ध्यान अवश्य रखते...


उधर रामचन्द्र डेविड भी सुनामी मोड में आ गया- अबे भाषा की तो अलटम की पलटम। तू डिबेट को अब लैंग्वेज से कास्ट पे ले जा रेला है॥अबे डर गएला है क्या? लोकल को पटरी से उतार रेला है हटेले?


अब अर्द्धसत्य जी पाजामे से बाहर हो गए। कम्प्यूटर के सामने चुल्लू में पानी लेकर बेनामी मोड में ही बोले- अबे मैं मारण, उच्चाटन, वशीकरण सारी विद्याएँ जानता हूँ. यहीं से ऐसी मंत्रबिद्ध टिप्पणी करूगा कि तेरे प्राण-पखेरू उड़ जायेंगे. ले यह रहा-- ओइम फट स्वाहा॥ ओइम ह्रीं क्लीं..बिच्चई-बिच्चई..


पंडित जी को पता नहीं था कि रामचन्द्र डेविड के यहाँ बिजली चली गयी है और वह आलमारी से रम का अद्धा निकाल कर बिजली आने का इंतज़ार कर रहा है।


कुछ देर तक अर्द्धसत्य त्रिपाठी क्रोध में थर-थर कांपते रहे फिर कोई टिप्पणी न आयी देख संतोष से बोले- मृत्यु को प्राप्त हो गया साल्ला...


उनका यह कहना था कि अचानक सिर पर बड़े ज़ोर का बेलन पड़ा। पंडिताइन को लगा कि वह उसके भाई को गाली दे रहे हैं. शाम को ही दहेज न लाने को लेकर अर्द्धसत्यजी ने उनके पिता और भाई को भला-बुरा कहा था, सो वह पहले से ही चिढी बैठी थीं. बेलन के प्रहार से पंडितजी के सिर पर अमरूद के आकार का एक गूमड निकल आया और वह तत्काल प्रभाव से मूर्छित होकर भू-लुंठित हो गए. उनके मुंह से निकला- 'ओ मीन गोत्ट'. पंडितजी इन दिनों जर्मन सीख रहे थे.


लेकिन भाई साहब, यह सब तो ठीक है। अब चंद प्रतिरक्षात्मक उपाय कर लूँ:---


सावधानिक चेतावनी: 'भाइयो और भाइयो! उपर्युक्त संवाद और घर का माहौल पूर्णतः काल्पनिक था. अगर यह किसी जीवित ब्लोगर से मेल खा जा जाए (मृत की कौन परवाह करता है!) तो इसे महज संयोग माना जाए. फिर भी अगर कोई असंतुष्ट आत्मा मुझे लपेटे में लेना चाहे तो ब्लॉग जगत के प्रख्यात वकील दिनेश राय द्विवेदी जी से बात हो चुकी है. उनकी फीस उड़नतस्तरी जी फायनेंस कर रहे हैं सौदा द्विवेदी जी की हर पोस्ट (अच्छी हो बुरी) पर कम से कम बीस टिप्पणियों का हुआ है.... और गाली-गलौज करने से पहले ज्ञानदत्त पांडे जी की मुखमुद्रा उनके ब्लॉग पर जाकर अवश्य देख लें.'