रविवार, 30 दिसंबर 2007

माता-पिताओं के लिए साल का मेरा अन्तिम प्रवचन


कई लोग इस उसूल पर चलते हैं कि 'हम नहीं सुधरेंगे'. उनका काम चल जाता है. लेकिन अगर आप एक औसत माता-पिता हैं और सचमुच बेहतर अभिभावक साबित होना चाहते हैं तो आपको सुधरना ही पड़ेगा. साल २००८ में आप निम्नलिखित नुस्खे आजमा सकते हैं---

आप अपने बच्चों के लिए एक रोल मॉडल नहीं बन सकते; न सही। कम से कम उनके सामने छोटी-छोटी बातों पर कुत्ते-बिल्लियों की तरह उलझिये तो मत. क्रोध में भी बुरे शब्दों का इस्तेमाल बच्चों के सामने न करें.


घर में अपने बच्चों के सामने नशा-पत्ता की चीजें न पड़ने दें। उनके सामने पेप्सी-कोक जैसी वाहियात चीजें न पियें. बच्चों को सामने बिठाकर हरी-भरी चीजें खाएं. टीवी के सामने बैठकर कभी भोजन न करें और घर में दफ्तर की फाइलें मुंह पर ओढ़कर तो कभी न सोयें.


हमारी आदत होती है कि गुस्सा किसी का और निकालते हैं किसी और पर। दफ्तर का गुस्सा अक्सर हम घर आकर पत्नी पर उतारते हैं. लेकिन विशेष ध्यान रखें, गुस्सा कहीं का भी हो, बच्चों पर हरगिज न उतारें. इससे आप उन्हें मनोरोगी बना देंगे. बच्चों को अपनी संपत्ति समझकर भी हम उन्हें पीट देते हैं. यह प्रवृत्ति दूर होनी चाहिए.


बच्चों की मांगों या शिकायतों को उनकी ही नजरों से देखने की कोशिश करें। अगर वे किसी चीज की मांग कर रहे हैं, चाहे वह कितनी भी असंभव क्यों न हो, आप भड़कें नहीं. कई बार वे जननेन्द्रियों के बारे में जिज्ञासा दिखाते हैं. उन्हें इस बारे में भ्रमित न करें; न ही थप्पड़ जमाएं. हंस कर टालना भी अनुचित होगा. उचित ढंग से उनकी उत्सुकता का समाधान करें.


बच्चों के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताने की कोशिश करें। अगर वे शिकायत करते हैं कि आप उन्हें पर्याप्त समय नहीं देते तो उन्हें डाँटें-फटकारें नहीं, बल्कि विनम्रता से इसका उपयुक्त कारण बताने की कोशिश करें.


रात में सोने से पहले कोई न कोई कहानी बच्चों को सुनाने की अवश्य कोशिश करें, चाहे वह अपने ही परिवार की कोई प्रशंसा भरी कहानी ही क्यों न हो। इसके लिए ख़ुद आपको पढ़ने का वक्त निकालना पड़ेगा. बार-बार किचन चमकाने से यह बेहतर ही होगा कि आप अपने बच्चों को पढ़ने-लिखने के संस्कार दें.


अगर अपने बच्चों के साथ आप साल भर बच्चों जैसे रह सके, तो आपका और उनका भविष्य उज्जवल होने के अवसर कई गुना बढ़ जायेंगे।


अजी, आजमा कर देखिये तो सही!

बंधु, इस साल जहाँ रहो वहीं रोशनी लुटाओ!

एक और साल गया, लेकिन समाज व्यवस्था में बदलाव के संकेत दिख नहीं रहे हैं. कोई अगर यह कहे कि यूपी में मायावती का सरकार बना लेना किसी क्रांति की शुरुआत है या मोदी का गुजरात में फिर सत्तारूढ़ होना पतन की; तो वह समझ उसे मुबारक हो. इन दोनों घटनाक्रमों में पुनरावृत्ति है, नवीनता नहीं।

नए साल से सिर्फ़ उम्मीद रखकर क्या होगा? सक्रिय होना पड़ेगा बंधु! सक्रिय होने का यह मतलब नहीं है कि 'नौकरी छोड़ो, व्यापार करो." बल्कि मुराद ये है कि जहाँ रहो, वहीं रोशनी लुटाओ. अगले साल अगर आप इतना भी कर ले जाते हैं कि अपनी मान्यताओं और आदर्शों से समझौता न करें, सही-ग़लत में फर्क करना सीख सकें, बड़े से बड़े रिस्क की परवाह न करते हुए सही पक्ष का साथ दे सकें, तो साल सार्थक समझियेगा।

अपने आस-पास नज़र डालिए, जो लोग समाज परिवर्त्तन के काम में लगे हैं, उनकी सूची बनाइये, उनका साथ देने की कोशिश कीजिये. कोई व्यक्ति अगर आपके विचार से सहमत नहीं है तो उसके साथ ज़ोर-जबरदस्ती मत कीजिये. अपने व्यवहार तथा काम से अपनी बात साबित कीजिये. कवियों के कवि शमशेर ने कहा भी है- 'बात बोलेगी हम नहीं, भेद खोलेगी बात ही.'

'मेरे अकेले के बदल जाने से क्या होगा?'- अगर यह प्रश्न आपको निस्तेज कर दिया करता है तो मैं यहाँ एक किस्सा सुनना चाहूंगा।

एक राजा ने राजकुमारी की शादी में प्रजा के बीच ढिंढोरा पिटवाया कि बारातियों के स्वागत के लिए जिसके पास जितना हो सके, लोग आज की रात दूध दान करें. नगर के बीचों बीच एक हौज बनवाया गया ताकि लोग उसमें दूध डालें।

रात में एक दम्पति ने सोचा कि अगर वे एक लोटा दूध की जगह पानी डाल दें तो हौज भर के दूध में किसे पता चलेगा? उन्होंने ऐसा ही किया।

सुबह लोगों ने देखा तो जाहिर हुआ कि पूरा हौज ही पानी से भरा हुआ है।

तो देखा आपने एक आदमी की बेईमान सोच का क्या नतीजा निकला. इसी तरह अगर ज्यादा से ज्यादा लोगों की सोच जनहित वाली हो जाए तो पूरा मंजर ही बदल सकता है।

**प्रतिज्ञा कर लीजिये कि अगर आप लाभ के पद वाली किसी कुर्सी पर बैठे हैं तो उसका नाजायज फ़ायदा नहीं उठाएंगे और न ही किसी को उठाने देंगे।

** लांच-घूस से तौबा करेंगे और इसमें लिप्त लोगों का भंडाफोड़ करेंगे।

** अपने आस-पास के लोगों की समस्याओं को सुलझाने में ख़ुद दिलचस्पी दिखाएँगे और बदले में कोई उम्मीद न रखेंगे।

साल २००८ में इतना कर ले गए, तो समझो गंगा नहाई. मैं मानता हूँ कि पर उपदेश कुशल बहुतेरे. लेकिन यह शराब और सिगरेट छोड़ने जैसे अवास्तविक 'न्यू इयर रेजोल्यूशंस' जितना दुर्धर्ष भी नज़र नहीं आता.


और अंत में एक आजमाया हुआ नुस्खा: किसी का ब्लॉग पढ़कर यदि गुस्सा आ जाए तो कुर्सी से सीधे उठकर २० मिनट की दौड़ लगा आयें तथा लौटने पर धीरे-धीरे एक गिलास पानी पी जाएं.

शुक्रवार, 28 दिसंबर 2007

तलछट-5: सुबह की 'चा' है जिसके दम से

(सर्वप्रथम निवेदन कर दूँ कि 'शुक्रवार का स्तम्भ' के चरित्र काल्पनिक नहीं हैं. ये हाड़-मांस से बने अपने आस-पास रहने वाले लोग हैं, जिन्हें समाज ने हाशिये पर धकेल दिया है. यह स्तम्भ इन लोगों के मुंह से बाकायदा उनकी रामकहानी सुनकर लिखा गया. टीप लिख दीनी चिट्ठाकार विजयशंकर चतुर्वेदी ने, ताकि सनद रहे और वक्त पर काम आए).

नींद अभी सातवें चरण में है कि किसी ने संकोच भरी दस्तक दी है दरवाज़े पर. हर कोई जानता है कि इस वक्त यह कौन हो सकता है. दरवाज़ा खोलने से पहले आँखें मिचमिचाते हुए एक बरतन ढूंढा जाता है, जिसमें वह दूध डालेगा अपने सधे हुए हाथों से. कंधे पर पीला गमछा, झकाझक सफ़ेद धोती और कुर्ता पहने, तमाखुआये दांतों से भोर का प्रथम नमस्कार करता हुआ हृदय नारायण दुबे. जी हाँ, इस नाका का बच्चा-बच्चा जानता है उन्हें. यह इलाका ठाणे का है.
हृदय नारायण अब पचहत्तर साल के हो चुके हैं. लेकिन कर्तव्यविमुख कभी नहीं हुए. वह सिर्फ़ एक खांटी दूधवाले ही नहीं हैं बल्कि उत्तर भारतीय संस्कृति की उज्जवल परम्परा की मिसाल भी हैं. देह भले ही सूख कर छुहारे जैसी हो गयी है लेकिन कहीं भी रामचरितमानस का पाठ करवा लीजिये; बा-आवाज़े बुलंद शुरू हो जाते हैं. 'दशरथ मरण' का प्रसंग आ जाए तो उनके आंसू छलक पड़ेंगे. 'राम-रावण युद्ध' के प्रसंग में तो वह साक्षात हनुमान हो उठते हैं.
हृदय नारायण जौनपुरिया दुबे हैं. जहाँ मिलेंगे आपको आत्मीयता से भर देंगे. कोई उन्हें दूधवाला 'भैया' कह कर पुकारता है तो वह बिलकुल बुरा नहीं मानते. वह कहते हैं- 'पहले बंबई के बहुत सारे शब्द छाती में बरछी की तरह चुभ जाते थे. अब आदत हो गयी है.' अपने पेशे को लेकर कोई कुंठा या हीनभाव नहीं है हृदय नारायण के मन में.
हृदय नारायण का जीवन कोई दूसरा क्या बखानेगा? वह ख़ुद अपनी कविताई के जरिये अपना जीवनचरित खोलते चलते हैं. ज़रा उनकी अपने ही बारे में रची गयी चौपाइयां सुनें-
उत्तर-प्रदेश राज्य एक भारी जिला जौनपुर है हितकारी.
मडियाहूँ तहसील निवाडिया थाना गाँव सोनारी सब कोऊ जाना.
रामसुचित दुबे के जाए हृदय नारायण नाम कहाए.
रामसुचित के सुत भे जेते कहौं कथा अब सुनहूँ सचेते.
ज्येष्ठ पुत्र श्रीहृदय सुजाना विष्णुभक्त पुर सकल बखाना.
सकल नारायण भे पुनि आयी कीरत जासु जगत में भाई.
तीसर सुत सभाजीत कहावा तामस कछुक हृदय मंह आवा.
मानव स्वयं भाग्यनिर्माता दृढनिश्चय सबकर फलदाता.
हृदय नारायण की यह मानस-कथा पुरखों की नामावली से शुरू होती है. ज़रा विचार कीजिये, आपको अपनी कितनी पुश्तों के नाम पता हैं. हृदय नारायण अपनी बारह पुश्तों का उल्लेख इस स्वरचित जीवनावली में करते हैं. लेकिन उसे लिखना यहाँ विषयांतर होगा. उनका आगे का परिचय तथा जीवनगति उन्हीं के शब्दों में--
द्वादश वर्ष केर अनुमाना बाम्बे नगर कियो प्रस्थाना.
मनपा शाला नाम लिखायो कछुक समय तंह विद्या पायो.
दुग्ध व्यवसाय कीन्ह हम नीके खर्च वहन पर पड़े सुफीके.
न्यू महालक्ष्मी मिल जो भाई वाचमैन पोस्ट तहां हम पायी.
दिवस तीन सौ वहाँ बिताए पर परमानेंट नहीं ह्वै पाये.
इंडियन मिल तब लाग्यौ जाई रहेऊ माह नौ टिक नहीं पायी.
ता पीछे खटाऊ मिल आवा कछुक दिवस हम तहां बितावा.
आई ओ डब्ल्यू में किए कामा वाचमैन गए कांदिवली धामा.
मास अढ़ाई तहां बिताए वेतन अल्प मनहिं नहीं भाये.
एलफिनस्तन डाइंग मंह आवा वर्ष पाँच मैं वहाँ बितावा.
पर मन खिन्न भयाहूँ मम भाई दशा देख चित थिर न रहाई.
सर्विस छांड वतन निज गयऊ देखि लोग मन बिसमय भयऊ.
हृदय नारायण का यह वृतांत काफी लंबा है. पूरा पोथन्ना बन सकता है. आज भी इसमें वह दो-चार चौपाइयां जोड़ रहे हैं. उनका जीवन भी एक-दो दशक का नहीं, पूरे पचहत्तर साल लंबा है. छप्पन साल तो उन्होंने मुम्बई में ही गुजारे हैं.
उनके पिताजी माटुंगा जी आई पी ( डी ग्रेट इंडियन पेनिनसुला) रेलवे में मुलाजिम थे. माटुंगा में ही रहते थे और वहीं उन्होंने आठ-दस गायें पाल रखी थीं. सुबह शाम दूध बेचते थे और राम भजते थे. हृदय नारायण जब बारह साल के हुए तो पिता ने उन्हें बंबई बुला लिया. हृदय नारायण पहले तो पढ़ने गए लेकिन जब लाख कोशिशों के बाद मन बिदक गया तो वह भी पिता के नक्शेकदम पर दूध बेचने लगे.
इसी समय पिता को गर्मियों में गाँव जाना पड़ा. माँ गाँव में ही रहती थीं. दोनों ने मिलीभगत करके हृदय नारायण की शादी करा दी. हृदय नारायण को शादी-ब्याह का मतलब तो पता नहीं था. इधर उनका 'दरवाज़ा-चार' हो रहा था, उधर उनका दिल गाँव के लड़कों के साथ गढा- गेंद खेलने को कर रहा था. खैर, गाँव का कामकाज निबटाकर जब पिता मुम्बई लौटे तो उन्हें भी साथ पकड़े लाये.
हृदय नारायण ने वे दिन भी देखे हैं जब 'गान्ही महात्मा' के गवालिया टैंक आने पर वहाँ बम्बई वालों के जत्थों के जत्थे उमड़ पड़े थे और 'जै हिन' के नारों से आसमान गुंजा रहे थे. यह १९४२ की बात थी. उस दिन गान्ही जी के आगमन के बाद भगदड़ मच गयी थी. जिसको जहाँ जगह मिली, वहीं भागा. हृदय नारायण ग्रांट रोड की तरफ़ भागे थे और रास्ते में ही उन्हें पुलिस ने पकड़ लिया था. फिर कैसे-कैसे छूटे यह अलग कहानी है.
पिता की मौत के बाद हृदय नारायण ने भायंदर के झोपड़े में रहते हुए अपने चार बेटे-बेटियों को पढ़ाने-लिखाने की जी-तोड़ कोशिश की थी. इस दौरान कभी मिल की वाचमैनी छूटी तो कभी दूध का धंधा बंद हुआ. लेकिन स्वभाव की सरलता उनके लिए जैसे वरदान ही थी. फाकाकशी की नौबत आने पर कोई न कोई सज्जन उन्हें वाचमैनी का काम दे ही देता था. अब यह बात दीगर है कि उस पगार में क्या पहनते और क्या निचोड़ते!
कई बार ऐसा भी हुआ कि स्थानीय लोगों ने उनका धंधा बंद कराने की कोशिश की. लेकिन वह किसी धमकी ने नहीं डरे. बच्चे पढ़ते रहे, बेटियों की जैसे-तैसे शादियाँ कीं. लेकिन उन्होंने अपने स्वाभिमान पर कभी आंच नहीं आने दी. 'एक बार तो छोटी बेटी की आँख का ऑपरेशन करवाने के लिए बच्चों की माँ के गहने बेचने पड़ गए थे'- पनीली आंखों के साथ याद करते हैं हृदय नारायण दुबे.
आजकल बड़ा बेटा उनसे अलग रह रहा है. भई, उसका भी परिवार बढ़ रहा है तो इसका मलाल क्या करना! बेटियाँ अपनी-अपनी ससुरालों में है. छोटा बेटा आवारा हो गया है. कहता है मजदूर यूनियन में काम करेगा. अब जिसकी जो मर्जी करे, समझा के थक गए हैं वह. हाँ, अपने काम में हृदय नारायण से कोई चूक नहीं होती. रोज़ सुबह चार बजे उठ जाते हैं. पचीस लीटर दूध से भरी केन साइकल पर टांगते हैं... और पन्द्रह-बीस इमारतों में; कहीं लिफ्ट तो कहीं सीढियाँ नापते हुए आठ बजे के पहले घर वापस.
'यह सिलसिला तब तक ऐसे ही चलाये रखूंगा, जब तक रामजी मेरी साँस चलाये रखेंगे'-- कहना है हृदय नारायण का.
वैसे भी, जिस दिन झकाझक धोती-कुर्ता में ठिगने कद के छुहारा बन चुके हृदय नारायण दूध के लिए संकोच भरी दस्तक दरवाजे पर नहीं देते, हमारी सुबह की 'चा' फीकी पड़ जाती है.

गुरुवार, 27 दिसंबर 2007

हिन्दी लेखकों के बारे में एक टिप्पणी

रियाज़ उल-हक़ ने जो कहा है उसे ज्यों का त्यों दे रहा हूँ- (नेट की विकट समस्या है)

लेखक-पत्रकार तभी घटनाओं के बारे में पहले से बता सकते हैं जबकि वे समाज के तमाम अंतर्द्वंद्वों को साफ़-साफ़ समझ सकते हों, चीज़ों को आपस में जोड़ कर देखने की उनके पास नज़र हो और घटनाओं का द्वंद्ववादी विश्लेषण करने की समझ हो. कई लेखक ऐसे रहे हैं कि उन्होंने कमाल की भविष्यवाणियां की हैं. नहीं मैं ज्योतिषवाली भविष्यवाणी की बात नहीं कर रहा, बल्कि भविष्य की दिशा के बारे में कह रहा हूं. इसमें जैक लंडन का नाम शायद सबसे पहले लिया जायेगा. उन्होंने 1908 के अपने उपन्यास आयरन हील में जिस तरह की घटनाओं का ज़िक्र किया है वे बाद में, 1936 तक और उसके बाद तक घटीं. अगर आप देखें तो सोवियत क्रांति, लेनिन जैसे नेता, हिटलर जैसे फ़ासिस्ट और अमेरिकी खुफ़िया पुलिस के गठन जैसी अनेक परिघटनाएं बाद में जो घटीं, उनके बारे में साफ़ साफ़ ज़िक्र आयरन हील में किया गया है. यह किसी चमत्कार के ज़रिये नहीं हुआ और न ही आयरन हील एक फैंटेसी है. यह बेहद यथार्थवादी उपन्यास है. एक कम्युनिस्ट क्रांति इसका विषय है.
इसी तरह शोलोखोव के उपन्यास एंड क्वायट फ़्लोज़ द डोन के बारे में भी कहा जा सकता है जिसमें सोवियत संघ के विघटन के सूत्र आसानी से तलाशे जा सकते हैं.अजित भाई, आपके सवाल का जवाब भी शायद इसी में है.
लगता है कि हमारे देश के अधिकतर समकालीन फ़िक्शन लेखकों के पास वह नज़र या समझ ही नहीं है, भले ही उनके साथ वामपंथी या प्रगतिशील या कम्युनिस्ट होने का टैग लगा हुआ हो. टैग लगा लेने से कोई वही नहीं हो जाता.एक और बात है कि हमारे यहां केवल सांप्रदायिक नहीं होने या इसका विरोधी होने भर से लेखक को वाम या प्रगतिशील लेखक मान लिया जाता, भले की उसके सोच में सामंती तत्व बने हुए हों और वह उतनी सूक्ष्मता से न सोच-देख पाता हो. भ्रम इसलिए भी बनता है.
इसके अलावा हिंदी लेखक जगत में एक बडी़ कमी यह है कि लेखक किसी आंदोलन से जुडे़ हुए नहीं हैं. वे पूरी तरह जनता के संघर्षों से कटे हुई हैं. उन्हें कई बार ज़मीनी हालात का पता भी नहीं होता और वे सिर्फ़ दिल्ली और दूसरे शहरों में बैठ कर बस लिखते रहने को अपने आप में एक महान कार्य समझते हैं. ऐसे में जो हो सकता है वही उनके साथ हो रहा है. न उनके पास वैसी रचनाएं हैं और पाठक.
(यह टिप्पणी मुझे ठीक लगी; सहमत-असहमत होना आपकी मनोदशा हो सकती है, अब कृपया सुधीजन यह न कहें कि मुझे मनोदशा का अर्थ पता है नहीं. पिछले दिनों मैंने ऐसी ही नुक्ताचीनी 'कबाड़खाना' पर देखी है. उसका नुकसान लगभग होते-होते बचा. इस बारे में अब भी भ्रम बना हुआ है. कई लोग उन्हें मनाने की कोशिशें कर रहे हैं).

बुधवार, 26 दिसंबर 2007

ईसा मसीह किस भाषा में बात करते थे?

गालिब का एक शेर है-


इब्ने मरियम हुआ करे कोई
मेरे दुःख की दवा करे कोई


यह इब्ने मरियम ईसा मसीह थे. २५ दिसम्बर वह दिन है जिसे हम दुनिया का सबसे बड़ा जन्मदिवस कह सकते हैं. इसी दिन उनका जन्म हुआ था. विश्वास किया जाता है कि ईसा मसीह के पास संसार के हर दुःख की दवा थी. उनके उपदेश सुनकर लोग भलाई का रास्ता अपना लेते थे. उनकी वाणी में ऐसा जादू था कि हजारों लोग मंत्रमुग्ध होकर उन्हें सुनते थे और उनके पीछे-पीछे चल पड़ते थे. लेकिन कभी आपने विचार किया है कि ईसा मसीह किस भाषा में बात करते थे?
विद्वानों के अनुसार ईसा मसीह का असली नाम जीजस था. लेकिन हम उन्हें जीजस क्राइस्ट के नाम से अधिक जानते हैं. जीजस शब्द ग्रीक के 'लेसअस' से आया है और क्राइस्ट ग्रीक के ही 'क्रिसटोज' शब्द से निकला. क्रिसटोज का ग्रीक में अर्थ होता है 'अभ्यंजित करना'. मसीहा हिब्रू का शब्द है और यह क्राइस्ट का अर्थ देता है.

ईसा के जन्म और जीवनचरित के बारे में विस्तृत जानकारी हमें गोस्पेल ऑफ़ मैथ्यू तथा गोस्पेल ऑफ़ ल्यूक या लूका में मिलता है. इसे प्रामाणिक माना जाता है. मैथ्यू और ल्यूक के मुताबिक ईसा मसीह का जन्म बेथेलहम (जूडिया) में हुआ था. ल्यूक कहता है कि अक्षतयौवना मैरी के सपने में देवदूत गैब्रियल ने कहा था कि ईश्वर ने उसे अपने बेटे को धारण करने के लिए चुना है. यही ल्यूक बताता है कि रोमन सम्राट सीज़र ऑगस्टास ने मैरी तथा जोजफ को नाज़रेथ के घर से बाहर निकलने पर मजबूर कर दिया था. क्विरिनियेस की जनगणना के लिए दोनों को अपने पुरखों के मकान में रहने जाना पड़ा था, जो डेविड का मकान था.

ईसा मसीह का बचपन अधिकांशतः नाज़रेथ तथा गैलिली में बीता. इसमें वह समय छोड़ दिया जाए जो उसके माता-पिता को शिशु जीजस के साथ मिस्र में बिताना पड़ा था. दरअसल राजा हेरोड शिशुओं का सामूहिक नरसंहार करवा रहा था. इससे बचने के लिए मैरी और जोजफ अपने शिशु को लेकर मिस्र भाग गए थे और राजा हेरोड की मौत होने तक वहीं रहे.

जीजस आरमेइक भाषा का इस्तेमाल करते थे. हिब्रू और ग्रीक भाषाएं भी जीजस की थीं लेकिन रोजमर्रा की बातचीत आरमेइक में ही करते थे. आर्मेनिक प्राचीन सेमेटिक कुल की भाषा है जिसमें हिब्रू तथा अरबी शामिल हैं. नाम एक जैसे लग सकते हैं लेकिन अरबी और आरमेइक एक जैसी कतई नहीं हैं. आरमेइक में २२ अक्षर होते हैं और यह दायें से बाएँ लिखी जाती है. यह उन लोगों की भाषा थी जो उत्तर-पश्चिमी मेसोपोटामिया/सीरिया के निवासी थे.

यह दज़ला-फ़रात के किनारे की आबादी और बेबीलोन के चाल्डीयनों की भी भाषा थी और जीजस के सैकड़ों साल पहले से बोली जा रही थी. जीजस के दिनों में तो यह मध्य-पूर्व की 'लिंगुआ फ्रैन्का' थी. आगे के वर्षों में जिस तरह लैटिन- इतालवी, फ्रांसीसी, स्पेनी, रोमानियाई, पुर्तगाली तथा ऐत्टिक ग्रीक भाषा आधुनिक ग्रीक में तब्दील हो गयी, ठीक इसी तरह प्राचीन अर्मेनिक आधुनिक आर्मेनिक के डायलेक्टों में बदल गयी. ये डायलेक्ट हैं- चाल्डियाई, असीरियाई, सीरियक आदि.

आज की आरमेइक बोलनेवाले संख्या में थोड़े तथा सीरिया, तुर्की, इजरायल, रूस, जोर्जिया, ईरान और इराक़ में फैले हुए हैं. तथ्य यह है कि इनकी संख्या दिनोंदिन तेजी से घटती जा रही है.

वह दिन दूर नहीं जब हजरत ईसा मसीह की भाषा बोलने वालों का नामोनिशान ढूँढे नहीं मिलेगा. मैं यह किसी धार्मिक भावना या विश्वास के वशीभूत होकर नहीं लिख रहा हूँ. बस, करुणा और 'ईश्वर के राज्य' का संदेश दुनिया को देनेवाली भाषा के बारे में सोचकर रोमांच हो आता है. कभी-कभी सोचता हूँ कि श्रीकृष्ण किस अंदाज़ में अपनी बातें कहते रहे होंगे? क्या सिर्फ़ ब्रज भाषा में ही बोलते थे या और भी कोई भाषा थी उनकी? आप क्या सोचते हैं?

सोमवार, 24 दिसंबर 2007

याद हैं त्रिलोचन, नागार्जुन, केदार, शमशेर

दादा कवि त्रिलोचन के जाने से उस युग का पटाक्षेप हो गया है जिसने छायावादी दिग्गजों के बाद आधुनिक हिन्दी कविता की बागडोर थाम रखी थी. पन्त, प्रसाद, निराला और महादेवी के बाद जब हम नागार्जुन, त्रिलोचन, केदार और शमशेर की कविता देखते हैं तो एक आश्वस्ति होती है कि समर्थ परम्परा की रास समर्थ कवियों के हाथ में आयी थी.
त्रिलोचन के जाने के बहाने मैं यहाँ उस महान चौकड़ी को उनकी एक-एक कविता के साथ याद कर रहा हूँ। तो सबसे पहले त्रिलोचन जी-

एक सॉनेट

ताज्जुब है मुझको त्रिलोचन कैसे इतना
अच्छा लिखने लगा? धरातल उसके स्वर का
तिब्बत के पठार-सा ऊंचा अब है. जितना
ही गुनता हूँ इस पर, कुछ रहस्य अन्दर का
मुझे भासने लगता है. यह उसके बस का
काम नहीं है. होगा कोई और खिलाड़ी
जिसका यह सब खेल है, मुझे तो अब चस्का
लगा रहस्योद्घाटन का है. खूब अगाड़ी
और पिछाड़ी देख-भालकर बात कहूंगा
मैंने तो रहस्य अब तक कितनों के खोले
हैं. न इस नई धारा में निरुपाप बहूंगा
मेरे आगे बड़ों-बड़ों के धीरज डोले
एक फिसड्डी आकर अपनी धाक जमाये
देख नहीं सकता हूँ मैं यों ही मुंह बाए।


(रचनाकाल : मई १९५३)

नागार्जुन की 'अकाल और उसके बाद'


कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास
कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उसके पास.
कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त
कई दिनों तक चूहों की भी हालत4 रही शिकस्त.
दाने आए घर के अन्दर कई दिनों के बाद
धुआं उठा आँगन से ऊपर कई दिनों के बाद
चमक उठी घर भर की आँखें कई दिनों के बाद
कौए ने खुजलाई पाँखें कई दिनों के बाद.
(रचनाकाल: मार्च १९५२.)


केदारनाथ अग्रवाल की 'बागी घोड़ा'

मैंने बागी घोड़ा देखा
आज सबेरे
उछल-कूद करता, दहलाता-
जोरदार हड़कंप मचाता.
गुस्से की बिजली चमकाता-
लप-लप करती देह घुमाता-
पट-पट अगली टांग पटकता-
खट-खट पिछली टांग पटकता-
कड़ी सड़क की
कड़ी देह को
कुपित कुचलता
मुरछल जैसी देह घुमाता-
बड़ी-बड़ी क्रोधी आंखों से-
आग उगलता-
ऊपर-नीचे के जबड़ों के लंबे-पैने दांत निपोरे,
व्यंग भाव से, ऐसे हंसता
अट्टहास करता हो जैसे.
पशु होकर भी नहीं चाहता पशुवत जीना,
मानववादी मुक्ति चाहता मानव से अब;
चकित चमत्कृत सबको करता,
मैंने बागी घोड़ा देखा,
आज सबेरे,
चौराहे पर।

(रचनाकाल: १९५४)

और आख़िर में शमशेर की 'महुवा'

यह अजब पेड़ है जिसमें कि जनाब
इस कदर जल्द कली फूटती है
कि अभी कल देखो
मार पतझड़ ही पतझड़ था इसके नीचे
और अब
सुर्ख दीये, सुर्ख दीयों का झुरमुट
नन्हें-नन्हें, कोमल
नीचे से ऊपर तक-
झिलमिलाहट का तनोवा मानो-
छाया हुआ है. यह अजब पेड़ है.
पत्ते कलियाँ
कत्थई पान की सुर्खी का चटक रंग लिए-
इक हंसी की तस्वीर-
(खिलखिलाहट से मगर कम-दर्ज़े)
मेरी आंखों में थिरक उठती है.
मुझको मालूम है, ये रंग अभी छूटेंगे
गुच्छे के गुच्छे मेरे सर पै हरी
छतरियाँ तानेंगे: गुच्छे के गुच्छे ये
सरसब्ज चंवर झूमेंगे,
फ़िर भी, फ़िर भी, फ़िर भी
एक बार और भी फ़िर सावन की घनघोर घटाएं
-आग-सी जैसे लगी हो हर-सू--
सर पै छा जायेंगी:
कोई चिल्ला के पुकारेगा कि देखो, देखो
यही महुवे का महावन है!

(रचनाकाल: मई १९५३)


गुरुवार, 20 दिसंबर 2007

तलछट-4 : उसके लिए हर आदमी एक जोड़ी जूता है

उसके पिता के पाँव मुड़े हुए थे। वह ज़मीन पर सीधे चल नहीं पाते थे. लेकिन वह हारे नहीं, लगातार दूसरों के जूते चमकाते रहे और उनमें अपनी शक्ल आईने की तरह देखी. उनके बेटे भी इसी राह के राही बने. पन्नालाल तीसरे नंबर का बेटा है. वह भी जूते चमकाता है.

पन्नालाल 'काशी' का नहीं सोनीपत (हरियाणा) के घनाना गाँव का जुलाहा है। जब वह चार-पाँच साल का था तब से ही जिंदगी की चादर बुन रहा है. यह चादर अब भी पूरी नहीं हो पायी है. उसके पिता दीपचंद जब मुम्बई आए थे तब कामकाज की इतनी मारामारी नहीं थी. बांद्रा (मुम्बई का एक उपनगर) के प्लेटफॉर्म नंबर ५ पर ट्रेनों का आना-जाना हुआ करता था. वहीं बक्सा लेकर बैठते थे और 'बूटपॉलिश' करते थे. गाँव में मेहनत का काम उनके वश में नहीं था. पैरों से लाचार जो ठहरे. इसीलिए मुम्बई आना पड़ा था.

गाँव में भी सिर्फ़ कहने के लिए एक मकान था. ज़मीन एक इंच नहीं थी. इसकी वजह यह थी कि पुश्तैनी पेशा था कपड़ा बुनने का. लेकिन मशीनों पर बुने कपड़े के सामने हाथ के काते कपड़े को कौन पूछता? फ़िर उनकी पीढ़ी के हाथ से यह हुनर ऐसा निकला कि किसी तरह न लौट सका.

दो जून की रोटी मुहाल होने लगी तो पन्नालाल और उसके भाई भी माँ के साथ मुम्बई चले आए। पिता बहरामपाड़ा के रेलवे गेट नंबर १८ के सामने रज्जाक सेठ की चाल में रहते थे. माँ मुसलमान लड़कों के साथ खेलने, उठने-बैठने से रोकती थी. लेकिन शायर कहता है-

'परिंदों में कभी फिरकापरस्ती क्यों नहीं होती.
कभी मन्दिर पे जा बैठे, कभी मसजिद पे जा बैठे.'


पन्नालाल बांद्रा तालाब के पास एक स्कूल में पढ़ने जाने लगा था। भाई भी जाते थे. सबसे छोटा वाला चौथी फेल होने के बाद लोकल ट्रेनों में घूम-घूम कर पॉलिश करने लगा. पिता ने पहले तो बड़ा गुस्सा किया लेकिन घर में कमाई का छोटा ही सही, एक और हाथ जुड़ने से उन्हें भी तसल्ली हुई. अब उनका जी भी नहीं चलता था. यह १९६७ का साल था.

तालाब के बगल वाली स्कूल से छूटने के बाद पन्नालाल पिता का साथ देने बांद्रा के प्लेटफॉर्म पर कभी-कभार आ बैठता था। कुछ ही दिनों में उसका भी हाथ साफ हो गया। इधर पांचवीं कक्षा के बाद उसका मार्शलिंग यार्ड के रेलवे स्कूल में दाखिला हो गया था। पिता ने अफसरों के हाथ-पाँव जोड़कर यह काम करवाया था. उन्हें बड़ी ललक थी कि पन्ना पढ़ ले. चारों लड़कों में उसका दिमाग पढ़ाई में सबसे अच्छा था. पन्नालाल ने सातवीं यहीं से पास की.

बड़ा भाई मनीराम आठवीं के बाद पढ़ाई छोड़ चुका था और परेल की एक दूकान में रेडियो के कल-पुर्जे सुधारता था. पन्नालाल की जिंदगी भी इसी दिशा में सरक रही थी लेकिन एक शिक्षक की कृपा उस पर बरसी और उसे बिना फीस दिए तुलसी हिन्दी माध्यमिक विद्यालय परेल में दाखिला मिल गया. आठवीं से आगे की पढ़ाई यहीं होनी थी. लेकिन यह हो नहीं सका.

हुआ यह था कि पिताजी बूटपॉलिश करने वालों की यूनियन में शामिल हो गए थे। कोई विवाद हुआ और इन्हीं दिनों यूनियन वालों ने उन्हें निकाल दिया. यूनियन से निकालने के बाद अब बांद्रा प्लेटफॉर्म पर बैठने की इजाजत नहीं थी. भायखला स्टेशन भागना पड़ा. यहाँ दूसरी यूनियन ने सदस्य बना लिया और फिर वही सिलसिला शुरू हो गया. इसी यूनियन ने माटुंगा और दादर रेलवे स्टेशन के अड्डे भी दिला दिए. बस, पन्नालाल की पढ़ाई का सिलसिला यहीं से बिखर गया. तीनों भाई जूता पॉलिस के तीन अड्डे संभालने लगे.

ख़ुद पन्नालाल की इच्छा थी कि किसी ख़ास हुनर का प्रशिक्षण ले। लेकिन अब जूता पॉलिस से फुरसत नहीं थी. भायखला की चाल में सुबह तीन-चार बजे के बीच उठना पड़ता था. फिर पानी भरने के झगड़ों से निबटने के बाद संडास की लम्बी लाइन में पेट पकड़े खड़ा रहता होता था. फिर नहा-धो कर दादर स्टेशन भागना पड़ता था. रात ग्यारह बजे तक तरह-तरह के जूतों का स्वागत करना कर्तव्य बन गया था. ऐसे में पढ़ाई का सपना टूट गया. अब पन्नालाल को सपनों में भी जूते नज़र आते थे.

''यूनियन का तो ऐसा है कि एक बार आपने अड्डा छोड़ा तो अगले ही दिन दूसरा आदमी हाजिर कर देते हैं। इसीलिए लोग मर जाने के बाद ही अड्डे छोड़ते हैं. आजकल तो ऐसी हालत है कि बीए-एमए पास लड़के भी प्लेटफॉर्म पर जूता पॉलिस का अड्डा पाने के लिए जान देते हैं'.-- बताता है पन्नालाल. वह चर्मकार को-ऑपरेटिव प्रोड्यूसर्स सोसाइटी का सदस्य है. उसे 'परिचय पत्र' भी मिला हुआ है.

मैं उसे पिछले १० सालों से भायंदर रेलवे स्टेशन पर अड्डा जमाते देख रहा हूँ। जूता पॉलिस का उसका कैरियर अब ४० सालों का हो गया. कई घाम-शीत-वर्षा-बसंत उसने मुम्बई के रेलवे स्टेशनों पर लोगों के जूते चमकाते गुज़ार दिए हैं. पन्नालाल कहता है- 'अब तो मुझे हर पॉलिस कराने वाले की शक्ल एक जैसी नज़र आती है.'

मुझे धूमिल का 'मोचीराम' याद आ जाता है-

'रांपी से उठी हुई आंखों ने मुझे क्षण भर टटोला
और फिर जैसे पतियाये हुए स्वर में वह हंसते हुए बोला-
बाबूजी, सच कहूं तो मेरी निगाह में
न कोई छोटा है, न कोई बड़ा है
मेरे लिए हर आदमी एक जोड़ी जूता है
जो मेरे सामने मरम्मत के लिए खड़ा है
और असल बात तो यह है कि वह चाहे जो है, जैसा है, जहाँ कहीं है,
आजकल कोई आदमी
जूते की नाप से बाहर नहीं है....

बुधवार, 19 दिसंबर 2007

इस बार गाँव में मैंने सुनी महिला रामायण


'निराला की साहित्य साधना' में डॉक्टर रामविलास शर्मा ने लिखा है कि किशोरवय सूर्जकुमार तेवारी को उनसे भी उम्र में ३ साल छोटी उनकी पत्नी मनोहरा देवी के गले में साक्षात् सरस्वती नज़र आयी थीं। प्रसंग तब का है जब निरालाजी अपनी ससुराल डलमऊ मनोहरा देवी को लिवाने पहुंचे थे। सरस्वती नज़र आने की वजह थे बाबा तुलसीदास। मनोहरा देवी के मधुर कंठ से उन्होंने यह सुना-


'श्रीरामचन्द्र कृपालु भज मन हरण भय-भव दारुणम्.
नवकंज लोचन कंज कर पद कंज मुख कन्जारुणम.
कंदर्प अगणित अमित छवि नव नील नीरज सुन्दरम।
पट-पीत मानहुं तडित रूचि-सुचि नौमि जनकसुता वरम।'


तुलसी बाबा की ध्वन्यात्मक शब्द योजना ने निराला के किशोर मन पर कैसा असर डाला होगा, यह सहज ही समझा जा सकता है। यों ही नहीं है कि आधुनिक कविता में निराला से बड़ा ध्वन्यात्मक शब्दों का समर्थ उपयोग करनेवाला कवि दूसरा नहीं है। याद कीजिये-


'बांधो न नाव इस ठाँव बंधु, पूछेगा सारा गाँव बंधु'

ठाँव तथा गाँव का कोई और सानी है भला?


यह सब मुझे निराला की वजह से नहीं बल्कि तुलसीदास की वजह से याद आ गया. हुआ यों कि पिछले दिनों मैं मध्य प्रदेश स्थित अपने गाँव गया था. इच्छा जागी कि क्यों न रामायण करवाई जाए. हमारे यहाँ 'रामचरितमानस' के ढोल-ढमाका पूर्ण गायन को रामायण करवाना कहते हैं. ज्यादा खर्चा-पानी नहीं लगता. धार्मिक से अधिक यह भावना-प्रधान आयोजन होता है. संगीत की प्रमुखता होती है इसमें. भगवान के लिए दो-तीन नारियल और भक्तों के लिए पान-सुपाड़ी बस. पाठ भी ऐसा होता है कि कोई प्रसंग उठा लिया और जब तक पेट न भरे तब तक खूब झूम-झूम कर गाते रहो। आठ-दस आदमी इस तरफ़ और इतने ही दूसरी तरफ़.


आमने-सामने रामचरितमानस रखी जाती हैं रहलों पर। तुलसीबाबा ने श्रीगणेश करने के लिए मंगलाचरण पहले ही लिख रखा है. एक पक्ष शुरू करता है-

रामा, जेहि सुमिरत सिध होय, गन नायक करिवर बदन,

करहुं अनुग्रह सोय, बुद्धिरासि सुभ गुन सदन'।
'रामा, मूक होंय बाचाल, पंगु चढें गिरिबर गहन,

जासु कृपा सों दयाल, द्रवहूँ सकल कलिमल दहन।'


मंगलाचरण कई दोहों और सोरठों के बाद संपन्न होता है। अब तक कुछ लोगों को तमाखू की तलब लग आती है तो कुछ को बीड़ी पीनी होती है। पाँच मिनट का ब्रेक और उसके बाद हाथ-पाँव प्रच्छालित कर एक बार फिर सब आ जमते हैं दरी या जाजम पर.


अब तय होता है कि कौन-सा प्रसंग ठीक रहेगा उस दिन का माहौल देखते हुए। 'पुष्पवाटिका में रामजी' हमारे टोले का प्रिय प्रसंग है। इसके लिए पोथी देखने की भी जरूरत नही समझी जाती. ज्यादातर लोगों को मुखाग्र है यह प्रसंग. हाँ, नए लड़के ज़रूर चोरी-छिपे तुलसीबाबा की मदद ले लेते हैं. वरना पूरा दोहा पटरी से उतरने का भय रहता है. इसके साथ-साथ लोगों के बीच शर्मिन्दा होने की भी तो नौबत आ जाती है.


बहरहाल, पुष्पवाटिका प्रसंग शुरू होता है। एक पक्ष का प्रमुख गायक इस प्रसंग का पहला दोहा शुरू करता है-


'उठे लखन निस बिगत सुनि, अरुण सिखा धुन कान।

गुरु तें पहले जगतपति, जागे रामसुजान'

सियावर रामचंद्र की जय!


चलिए श्रीगणेश तो विधिवत हो गया। अब बारी है संपुट लगाने के लिए किसी गाने की, गीत की या फिर किसी भी ऐसी चीज की कि मज़ा आ जाए आज की रामायण का. ढोलक वाले ने यों ही नहीं ललकारा था- 'बोलो आज के आनंद की जय!'


तभी कोई छेड़ता है तान- 'कन्हैया अपनी बंसी को बजा दो, फिर चले जाना',

इसीके के साथ दोनों पक्ष इस पंक्ति को संभालते-संभालते यहाँ तक ले आते हैं कि 'बजा दो फिर चले जाना' ही बचता है। और शुरू हो जाता है आज का आनंद-


'रामा, तात जनकतनया यह सोई ,बजा दो फिर चले जाना

रामा, धनुषजज्ञ जेहि कारण होई ,बजा दो फिर चले जाना।"


लेकिन इस बार रंग में भंग पड़ने के सौ प्रतिशत अवसर पैदा हो गए॥ ढोलक वाले ने कहलवा भेजा कि अगर मैं उसे रामायण के बाद गांजा पीने के पैसे दूँ तो ही वह आयेगा वरना जय राम जी की। अब बगैर ढोलक के रामायण कैसे हो! बुलौवा भी गाँव में लग चुका था. लोग जुटना शुरू हो गए थे. पेटी मास्टर, करताल वाला और झांझ-मजीरे वाले पहुँच गए थे. पान-सुपारी का एक दौर भी हो चुका था.

किसी ने सुझाया कि आजकल गाँव की महिलाओं ने भी एक मानस-मंडली बना रखी है। यह मेरे लिए चौंका देनेवाली बात थी. अपने ३७ साल के जीवन में मैंने अपने ही गाँव में इस तरह की कोई बात कभी नहीं सुनी थी. बातों-बातों में पता चला कि इस महिला मंडली में सभी नयी बहुएँ हैं. वह भी गाँव में मौजूद सभी जातियों की. पेटी-ढोलक ऐसा बजाती हैं कि वह गंजेड़ी इनके सामने पानी भरेगा.


आनन-फानन में तय हुआ कि आज महिला मानस-मंडली की रामायण ही हो जाए। लोग दौड़े और आधे घंटे में पन्ना वाली, सुंदरा वाली, दमोह वाली, छतरपुर वाली बहुएँ आन पहुँचीं। इनमें से ज्यादातर बुन्देलखंड की थीं। फिर कुछ और जमा हो गयीं। रामायण शुरू हुई। विधिवत मंगलाचरण हुआ और प्रसंग चुना गया 'सीता का गौरी से वर माँगना।'


महिलाओं का समवेत स्वर गूंजा-


जय-जय-जय गिरिराज किशोरी, जय महेश मुख चंद चकोरी।


जय गजबदन षडानन माता, सत्य शपथ दामिनि दुखदाता.'

सनाका छा गया। सब मंत्रमुग्ध-से बैठे थे. मेरी तो दशा ही मत पूछिए. बुन्देलखंड की नारियों के गले में भी सरस्वती मैया ही विराजती हैं. बुन्देली लोकगीतों में जैसी मिठास, लचक और लोच है, वैसी और कहीं ढूँढे नहीं मिलेगी। फिर इन नारियों का गायन और यह प्रसंग. रोएँ खड़े हो गए. मैं अंदाजा ही लगा सकता हूँ कि मनोहरा देवी के कंठ से तुलसी बाबा का वह संस्कृत-पद सुनकर निरालाजी पर कैसा असर पड़ा होगा.


गाँव की महिलाओं के इस नए रूप को देखकर मैं अभिभूत तो था ही, उनके प्रति कृतज्ञ भी कम नहीं लौटा.

सोमवार, 17 दिसंबर 2007

ज्योतिष और भारत-अरब विद्वान


दोस्तो, कल नेट ने हमारे यहाँ दिन भर ऐसा सताया कि यह लेख अधूरा ही जा सका। आज इसे पुनः टाइप करके पूरा दे रहा हूँ फोटो के साथ. फोटो में बाएँ आचार्य द्विवेदी, दायें महापंडित राहुल सांकृत्यायन.


गणित और फलित ज्योतिष के क्षेत्र में हिन्दू-मुस्लिम सम्पर्क कैसा गंभीर रहा है, यह बात शायद बहुत कम लोग ही जानते हैं। कुछ लोग इतना तो जानते हैं कि हिन्दू ज्योतिष के कई ग्रंथों का अरबी में अनुवाद हुआ था, पर अरबी ज्योतिष के अनेक पारिभाषिक शब्द और विचार-पद्धतियां भी संस्कृत ग्रंथों में गृहीत हुई हैं, यह बात लोग एकदम नहीं जानते। इस विषय की चर्चा प्रायः नहीं के बराबर ही हुई है। होना वांछनीय है।
सन् ७७१ ईस्वी में भारतीयों का एक जत्था बगदाद गया था। उसी के एक विद्वान सदस्य ने अरबों को 'ब्रम्हस्फुट सिद्धांत' से परिचित कराया। यह ग्रंथ ब्रम्हगुप्त नामक प्रसिद्ध भारतीय ज्योतिषी का लिखा हुआ है। अरब लोग इसे 'अस-सिन्द-हिंद' कहते हैं। इब्राहीम इब्न हबीब अल फजारी ने इसी ग्रंथ के आधार पर मुस्लिम चन्द्रवर्ष के लिए अपनी सारणी बनायी थी।
'ब्रम्हस्फुट सिद्धांत' तथा एक अन्य भारतीय ज्योतिषी की गणना के आधार पर याकूब इब्न तारिक ने अपना 'तरकीब-अल-अफ्लाक' (गोलाध्याय) लिखा। यह दूसरा ज्योतिषी सन् १६१ हिजरी में अरब की ओर गया था। इसका नाम अरबों ने क्-न्-म्-ह् लिखा है।
ब्रम्हगुप्त का एक अन्य ग्रन्थ 'खंडकखाद्य' भी 'अल्-अरकंड' नाम से अरबी में अनूदित हुआ था. अल् फजारी और याकूब इब्न तारिक के समसामयिक अबुल हसन अल् अहवाज़ी ने अरबों को भारतीय ग्रहगणित अल्-अर्ज्मंद (आर्यभट्ट का ग्रहगणित) का परिचय कराया. सन् ईसवी की ग्यारहवीं शताब्दी के अंत तक हिन्दू ग्रंथों के अनुकरण पर मुसलमान ग्रन्थ लिखते रहे. कुछ अरब ज्योतिषी (हब्श-अननैरीजी, इब्न अस्-सबाह आदि) भारतीय प्रणाली और अरब तथा ग्रीस की सामग्रियों का उपयोग करके नए ग्रन्थ लिखते रहे.
एक अन्य श्रेणी के ज्योतिषियों ने भारतीय युगमान के आदर्श पर लंबे-लंबे युग वर्षों की कल्पना पर ग्रन्थ लिखे. इनमें मोहम्मद-इब्न-इसहाक-अस् सरासी, अबुल वफ़ा, अल् बेरूनी तथा अल् हजीनी का नाम उल्लेखनीय है (एनसाइक्लोपीडिया ऑफ़ रिलीजन एंड एथिक्स, ११२वीन् जिल्द, प्रष्ठ ९५).
अरबों ने भारतीय ज्योतिष और गणित शास्त्र को स्वयं ही ग्रहण नहीं किया, सारे यूरोप में उसे फैला भी दिया. भारतीय ज्योतिषियों के साथ उनका दशगुणोत्तर अंकक्रम भी बगदाद पहुंचा था. नौवीं शताब्दी के प्रारम्भिक समय में अबू ज़फर मुहम्मद अल् खारिज्मी ने उक्त दशगुणोत्तर क्रम का विवेचन किया और तब से यह क्रम अरब में प्रतिष्ठा पाता ही गया.
यह पूरा अंक क्रम ईसवी सन् की बारहवीं शताब्दी में अरबों ने यूरोप को सिखाया. इस क्रम से बना हुआ सारा अंकगणित अल्गोरित्मस (अलैगोरिथ्म) नाम से प्रसिद्ध हुआ जो वस्तुतः अरबी गणितज्ञ 'अल् खारिज्मी' के नाम का ही यूरोपीय रूपांतर है.
अनुमान किया गया है की परवर्ती काल में दशगुणोत्तर अंकक्रम में गुणन-क्रिया को सरल बनाने के लिए जो 'लोगोरिथ्म' पद्धति प्रचलित हुई, वह इसी शब्द से सम्बद्ध है। कुछ लोग ग्रीक 'लोगस' शब्द से इसकी व्युत्पत्ति बताते हैं. परन्तु पूर्ववर्ती अनुमान यदि थीक है तो एक अत्यन्त मनोरंजक सम्बन्ध का स्मरण हो जाता है. लोगोरिथ्म को संस्कृत के आधुनिक गणित ग्रंथों में 'लघुरित्त्थ' नाम दिया गया है. यह नाम स्वर्गीय महामहोपाध्याय पंडित सुधाकर द्विवेदी का दिया हुआ है. जिस अरबी पंडित ने भारतीय अंकविद्या का प्रचार यूरोप में किया था उसका नाम नानाभाव से बदलता हुआ भारतीय अंकगणित की एक शाखा का नाम हो गया. अरबी में हिन्दुओं से गृहीत इस अंकक्रम को 'हिन्दसे' कहते हैं.


-आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी

रविवार, 16 दिसंबर 2007

ज्योतिष के क्षेत्र में हिन्दू-मुस्लिम सम्पर्क

महामना डॉक्टर हजारी प्रसाद द्विवेदी का यह महत्वपूर्ण लेख पिछले दिनों मेरे हाथ लगा। ज्योतिष के क्षेत्र में हिन्दू-मुस्लिम सम्पर्क पर उनसे बढ़कर भला और कौन लिख सकता था? लेख का आरंभिक अंश आप सबको पढ़वाने की सोची है।

- विजयशंकर चतुर्वेदी।

शुक्रवार, 14 दिसंबर 2007

तलछट-३: वह लड़ रहा है अपने चोर से


पलक झपकते ही माल साफ कर देता था पोन्नामैया. ऐसा कुशल चोर कि अच्छे-अच्छों की आँख से सुरमा चुरा ले. यह बात दीगर है कि आजकल कोई आंखों में सुरमा नहीं लगाता. लेकिन जब पोन्नामैया चोरी-चकारी करता था तब सुरमा खूब लगाया जाता था. वह तीस साल पहले की बात है. अब उसे सुरमा चुराने की जरूरत नहीं. मुम्बई में इन दिनों वह साहब की गाड़ी चलाता है.

''मजबूरी थी साहब! अंधी माँ कहती थी कि बेटा खाना ले आ.''

बालक पोन्नामैया नेल्लूर की तंग गलियों में दिन भर सरपट दौड़ता फिरता. लेकिन उसे कोई न पैसे देता था, न काम. सांझ होते ही घर पहुंचता तो माँ बेहोश मिलती. ख़ुद उसका हाल बेहाल हो जाता. तब वह नुक्कड़ के हलवाई की दूकान के सामने पड़े जूठे दोने इकट्ठा करता. किसी दोने से भजिये का टुकड़ा, किसी से इडली, किसी से दोसे का जूठन. यह सब एक दोने में जमा करके माँ के पास ले जाता. उसके मुंह पर पानी के छींटे मारकर उसे होश में लाता और ये पकवान खिलाता. रोज-रोज पोन्नामैया यही करता था. अब दस-बारह साल के छोकरे पर हलवाई भी चंद तेलुगु गालियों के सिवा और क्या बरसा सकता था. फिर पोन्नामैया इस बहाने हलवाई की गंदगी भी तो साफ कर जाता था.

हलवाई का एक पेशा और भी था. वह चोरी से पेट्रोल बेचता था. एक दिन उसने पोन्नामैया को लालच दिया कि अगर वह बड़ा बाज़ार की पेट्रोल टंकी से ५ लीटर पेट्रोल रोज़ रात में लाकर देगा तो वह उसकी माँ को खाना मुफ्त में देगा. पोन्नामैया को यह बड़ा सस्ता सौदा मालूम हुआ. उसने फौरन हाँ कर दी.

पोन्नामैया नेल्लूर की इस अंधी गली में कब और कैसे पैठ गया, उसे कुछ याद नहीं. तब पिताजी जिंदा थे और माँ अंधी थी. शराब पी-पीकर जब पिताजी स्वर्ग सिधारे तो माँ का भार उस पर आ गया. 'अच्छे-बुरे का भेद तब नहीं था'- कहता है पोन्नामैया. बस एक ही उद्देश्य था कि माँ भूखों न मरने पाये. लेकिन मौत को रोक पाना उसके वश में कहाँ था. साल भर बेहद बीमार रहने के बाद आखिरकार माँ ने भी उससे मुंह फेर लिया.

'माँ की हालत देखकर लगता था कि अब अगर वह मर ही जाए तो अच्छा, उसकी तकलीफ देखी नहीं जाती थी.'- एक गहरी उसांस भरकर याद करता है पोन्नामैया.

जब माँ मरी तब तक पोन्नामैया की पहचान शहर के नामी चोरों में हो चुकी थी. उसका अपनी खोली में जीना मुहाल होने लगा था. चोर मण्डली में तो उसका रुतबा बढ़ रहा था लेकिन पुलिस की आंखों में वह चढ़ चुका था. बस्ती के लोग भी उससे बचाकर चलने लगे थे. लेकिन उसे अपने काम में कुछ भी बुरा नहीं नजर आता था.

अब तो शहर के कुछ 'बड़े' लोगों के ऑफर भी उसे मिलने लगे थे. प्रलोभन भी बड़े थे. स्थानीय गैंग उसे अपने साथ रखने की स्पर्द्धा कर रहे थे. कुछ लोग पोन्नामैया से डरते भी थे. उनके माल छिपाने के अड्डे उसे मालूम थे. पुलिस को वह इस सबकी सूचना दे सकता था. लेकिन वह इस सबसे बेखबर हलवाई के लिए हाईवे से टैंकरों का डीजल-पेट्रोल चुराने में लगा रहा.

पोन्नामैया से डरनेवालों में एक लड़की भी थी क्योंकि उसे मालूम था कि रात के अंधेरों में वह कहाँ-कहाँ जाती है. कमाल तब हुआ जब उस लड़की ने पोन्नामैया को अपना भाई बना लिया ताकि उसके बारे में वह कहीं मुंह न खोल सके. पोन्नामैया ने भाई-धर्म निभाया भी.

इन्हीं दिनों उसका एक दोस्त चेन्नई ( तब मद्रास) में चोरियाँ करके खूब माल बना रहा था. कभी नेल्लूर आता तो उसकी चकाचौंध देखते ही बनती. पोन्नामैया ने सोचा कि चोरी के मामले में उसके सामने यह दोस्त कुछ भी नहीं है, इसलिए क्यों न चेन्नई चलकर हाथ की सफाई दिखाई जाए! आख़िर नेल्लूर में अब रखा भी क्या है. माँ तो रही नहीं, बस एक खोली है. लेकिन इससे वह चिपका रहा तो चोरी का कैरियर ख़त्म हो जायेगा.

...और जल्दी ही उसे नेल्लूर छोड़ना भी पड़ गया. इसका कारण उसका चेन्नई वाला दोस्त नहीं बल्कि वह पुलिस थी, जो शहर में हुई किसी बड़ी चोरी के शक में उसके पीछे हाथ धोकर पड़ी हुई थी. राशन का एक ट्रक उड़ा लिया गया था और शक पोन्नामैया पर था. पुलिस ने उसे दबोच कर खूब मज़े ले-लेकर धुलाई की. तीन-तीन डंडे टूट गए, लेकिन पुलिसवालों ने पीटना नहीं बंद किया. वह तो जब पोन्नामैया बेहोश हो गया तब पिटाई का अहसास ही जाता रहा. इसे ही कहते हैं- 'दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना.'

पोन्नामैया की धाक 'खलमण्डली' में अचानक घटने लगी थी. इसलिए नहीं कि उसने मार खाई थी बल्कि इसलिए कि वह इतनी आसानी से पुलिस के हत्थे चढ़ गया था. 'असली चोर वही है जो लोगों के हाथों चाहे जितना पिट जाए लेकिन पुलिस के हाथों न पड़े'- अनुभव बांटता है पोन्नामैया.

चोर बिरादरी में घटती प्रतिष्ठा के चलते उसने नेल्लूर छोड़ने का फैसला कर लिया था. अब वह २६ वर्ष का हो चुका था. उसके भरोसे शहर में रात-रात भटकने वाली वह बहन भी उसे रोक नहीं सकी. चलते वक्त उस बहन ने इतना जरूर कहा था-'लाइन चेंज करो. वरना बुढ़ापे तक सिवा टूटी हड्डियों के कुछ जमा न कर सकोगे.' पोन्नामैया ने यह बात गाँठ बाँध ली और चेन्नई के बजाए उसने मुम्बई की रेलगाड़ी पकड़ी. यहाँ उसके किसी चोर-मित्र के मिलने की संभावना नहीं थी. मुम्बई आया पोन्नामैया चोर नहीं था. वह एक बदला हुआ शख्स था. यह और बात है कि यह साबित करने में उसे पूरे चार साल लग गए.

इन चार सालों में उसने शेट्टीयों के उड़पी होटलों में जूठे बरतन साफ किए, फर्श और मोरियाँ चमकायीं. माटुंगा, दादर, चेम्बूर, चर्नी रोड, बोरीवली, अंधेरी के एक-एक होटल उसकी उँगलियों पर हैं. लेकिन इसी दौरान एक होटल मालिक ने उसे गाड़ी चलाना भी सिखा दिया. बस यहीं से पोन्नामैया की लाइन सचमुच चेंज हो गयी. उसी होटल मालिक ने बाद में पोन्नामैया को अपना ड्रायवर रख लिया.

जब मैं पोन्नामैया से चर्चगेट स्थित आयकर भवन के सामने मिला तब वह किसी बैंक अधिकारी का ड्रायवर था और साहब का इंतज़ार कर था. इसी वक्फे में मैंने उससे जितना हो सका; बाहर निकालने की कोशिश की. तभी आयकर भवन से उसका साहब आता दिखाई दिया. जाते-जाते उसने बड़े प्यार से हाथ मिलाया और कहा- ''मैं जिंदगी भर अपने चोर से लड़ता रहा हूँ. अक्सर मैंने उसे पटखनी दी है. लेकिन आज चालीस साल बाद भी कभी-कभी मेरे भीतर का चोर मुझे उठाकर पटक देता है."

गुरुवार, 13 दिसंबर 2007

विकास किस चिड़िया का नाम है?

1.

विकास किस चिड़िया का नाम है

क्या उस चिड़िया का जिसका पेड़ काट डाला गया
विकास के नाम पर

या उस चिड़िया का
जिससे प्यार करता था विकास

चाहिए,
हमें विकास अवश्य चाहिए
लेकिन प्यार के लिए.

2.

मैंने विकास को घड़े में भर लिया
सोचा शाम को इससे रोटियां बनाऊंगा
पर बैरी वहाँ से नदारद था

अगले दिन बाँध लिया गमछे में
सोचा रात में इसकी चादर बुनूंगा
पर जुल्मी वहाँ भी नहीं था

फिर रख आया संदूक में
सोचा इससे घर रफू करूंगा
पर यह वहाँ से भी काफूर हो गया.

अब सोचता हूँ कि
विकास हमारी दुनिया से बाहर की कोई शै है.

3.

मैं अच्छी तरह पहचानता हूँ विकास को
वह हमारे खेतों में पहरा देता था 'पूस की रात' में
गिल्ली-डंडा, कबड्डी का आला खिलाड़ी
तब इतना दुबला-पतला नहीं था.
उसकी बहनों को भी पहचानता हूँ
उनके नाम थे- प्रगति, समृद्धि, खुशी

जबसे शहर गयीं हैं ब्याहकर, लोग कहते हैं-
'दुःख और गरीबी हमारे विकास की तरह दिखते हैं'.

-विजयशंकर चतुर्वेदी

रविवार, 9 दिसंबर 2007

फुटबाल कैसे बना सॉकर?


फुटबाल मेरा प्रिय खेल रहा है। यह दीगर बात है कि मैं इसका दर्शक ज्यादा रहा हूँ. लेकिन अन्तरराष्ट्रीय फुटबाल मैचों के दौरान स्टेडियमों में लगनेवाले नस्लवादी नारों से मेरा ह्रदय दुखी हो जाता है. मुझे याद है १९८१ में डेपफोर्ड अग्निकांड में १३ अश्वेत युवक जल कर मर गए थे जिसके शक की सुई श्वेतों की तरफ गयी थी और मिकवाल में नारे लगाए जाते थे- 'वी आल एग्री, निगरस बर्न बेटर दैन पेट्रोल'.

इसी तरह हीज़ल स्टेडियम में एक दीवार ढहने से अश्वेतों के प्रिय लीवरपूल क्लब के ३९ प्रशंसक मारे गए थे। मौके से ब्रिटिश नेशनल पार्टी के पर्चे बरामद हुए थे. यह जगजाहिर है कि इंगलैण्ड के दक्षिणपंथी संगठन अपने फासीवादी उद्देश्यों के लिए फुटबाल प्रशंसकों का हमेशा इस्तेमाल करते रहे हैं.

इंग्लैंड में फुटबाल मैचों के दौरान यह नारा लगते आपने सुना ही होगा- 'स्टैंड बाय द यूनियन जैक, सेंड दोज निगरस बैक, इफ यू आर व्हाइट, यू आर आलराइट, इफ यू आर ब्लैक, सेंड देम बैक'।

फुटबाल से जुड़ी इस नफ़रत की राजनीति के अलावा मेरी यह जानने में भी बड़ी दिलचस्पी पैदा हुई कि आख़िरकार फुटबाल शब्द 'सॉकर' में तब्दील कैसे हुआ। सरल जवाब तो यही सामने आता था कि यह अवश्य किसी यूरोपीय भाषा का शब्द होगा। मैंने तलाशी अभियान चलाया लेकिन कामयाबी हाथ न लगी। अपुष्ट जानकारी यह मिली कि यह किसी स्थानीय भाषा का शब्द है। लेकिन मैं हाथ पर हाथ धरे अभी बैठा ही था कि एक पत्रिका ने मेरे ज्ञान-चक्षु खोल दिए। सॉकर का भेद खुल गया था। आपके साथ बाँट रहा हूँ-

'सन् १८८० के दशक में ऑक्सफोर्ड विश्विद्यालय के छात्र बोलते समय, अक्सर जिन शब्दों को छोटा करना होता था, उनके आख़िर में 'ईआर' जोड़ दिया करते थे। युवाओं के लिए यह दिलचस्प खेल बन गया था और उस दौर का ख़ास स्लैंग भी. उदाहरण के लिए, रग्बी फुटबाल को 'रगर' कहा जाने लगा.

चार्लस रीफोर्ड ब्राउन नामक छात्र से एक बार पूछा गया कि क्या वह 'रगर' खेलना चाहेगा? उसने मज़ाक में जवाब दिया- 'नो सॉकर'। दरअसल ब्राउन ने सोसिएशन (फुटबाल) को छोटा करके उसमें 'ईआर' जोड़ दिया। फ़िर क्या था. यह शब्द सबकी जुबान पर चढ़ गया. ब्राउन आगे चलकर इंग्लैंड की फुटबाल यानी सॉकर टीम में भी शामिल हुआ था।'

मुझे यह सब जानना बेहद दिलचस्प लगा. आप क्या कहते हैं?

गुरुवार, 6 दिसंबर 2007

तलछट-२: मैं तेलिया लिबास में पुरज़े सुधारता हूँ

'मैं तुम लोगों से इतना दूर हूँ
कि तुम्हारे लिए जो विष है
मेरे लिए अन्न है
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मैं शेवरले डॉज के नीचे लेटा
तेलिया लिबास में पुरज़े सुधारता हूँ
तुम्हारी आज्ञायें ढोता हूँ।'


गजानन माधव मुक्तिबोध की ये पंक्तियाँ धीरेन पर तेलिया लिबास की ही तरह फिट होती हैं. २ सालों तक वह वडाला के एक गैरेज में शेवरले डॉज के नीचे तो नहीं, ऑटो रिक्शा, टैक्सी, ट्रक और इसी तरह के अन्य वाहनों के नीचे लेटकर उनके कल-पुरज़े दुरुस्त करता था. आजकल उसे वहाँ से चलता कर दिया गया है क्योंकि उसने एक होंडा सिरिक गाड़ी की मालकिन की आज्ञायें नहीं ढोयीं.
दरअसल हुआ यों था कि २ दिन से पड़े एक ऑटो की मरम्मत छोड़कर धीरेन होंडा सिरिक की विंड स्क्रीन तत्काल ठीक करने दौड़ा नहीं आया और मालिक ने बोरिया-बिस्तर बांधने को कह दिया। स्वाभिमान धीरेन की कमजोरी है. उसने अकड़कर जवाब दे दिया कि वह काम करने के पैसे लेता है किसी की गाड़ी देखकर नहीं.
धीरेन को इस बात का गुरूर था कि हाथ में हुनर है तो काम हज़ार हैं, लेकिन मुम्बई में अब जाकर उसे पता चला कि यह उसका दीवानापन था. दो सालों तक मारा-मारा फिरना पड़ा. इस बीच उसने मंत्रालय के पास आरजे ट्रेवेल्स कम गैरेज में जरूर कुछ दिन लगा रहा. लेकिन मामूली दिहाड़ी पर काम करते-करते आजिज आ गया और घर बैठ गया.

यह भी खूब कही! घर बैठ जाना तो एक मुहावरा है. जिसके पास रहने को घर ही न हो वह घर कैसे बैठ सकता है भला? कह सकते हैं कि धीरेन फुटपाथ पर बैठ गया. कुछ दिन बाद फिर उसने हिम्मत जुटाई और मराठा मन्दिर सिनेमा के पास फुटपाथ पर रिक्शों की मरम्मत करनेवाली एक गैरेज में लग गया.
यहाँ दिक्कत यह थी कि गैरेज का मालिक महीने भर काम करके १५ दिनों की मजदूरी अपने पास रखता था ताकि कोई भागने न पाये. काम पर रखने से पहले कई लोग उससे पूछ चुके थे कि कोई पहचान वाला हो तो गारंटी के लिए ले आये. अब पश्चिम बंगाल के आसनसोल से आया धीरेन यहाँ कोई पहचान वाला कहाँ से ले आता? तब वह जुहू स्कीम के पास स्थित कूपर अस्पताल के पास की जीजामाता नगर झोपड़पट्टी में रहा करता था. वहाँ से कौन उसकी गारंटी लेने आता? मुम्बई सेन्ट्रल तक का किराया-भाड़ा कहाँ से आता? यहाँ तो खाने के लाले पड़े थे. मजदूरी को लेकर मालिक के साथ हुई खटपट के चलते आखिरकार कुछ दिनों बाद उसे यहाँ से भी चलता कर दिया गया.
धीरेन बताता है, साल १९८८ में एक दिन वह अंधेरी लोखंडवाला की एक गैरेज में पहुंचा. मालिक एक सरदार जी थे. तब यह इलाका इतना विकसित नहीं था. ढाबे थे, खाड़ी थी, बदहाल सड़कें थीं. गैरेजों में काम करनेवाले ज्यादातर पंजाबी थे. धीरेन बांग्ला के सहारे हिन्दी बोलता था. सरदार जी उसकी बात समझ ही नहीं पाये. चाय पिलाई और हाथ जोड़ लिये।

जीजामाता नगर में धीरेन एक देह व्यापार करने वाली युवती के साथ रहा करता था. युवती क्या थी हड्डियों का ढांचा थी. तरह-तरह की बीमारियों ने उसे घेर रखा था. यों ही एक दिन वह धीरेन को जुहू चौपाटी पर मिल गयी थी.
वह ग्राहक की तलाश में थी और धीरेन काम की तलाश में। दोनों में संयोगवश बातचीत हुई और उस यौनकर्मी ने धीरेन पर तरस खाकर उसे अपने पास रख लिया. धीरेन बताता है कि उस बदबूदार झोपड़ी में उसका दम घुटता था. उस पर वह लड़की दिन भर गुटखा खाकर थूकती रहती थी और ऑर्डर देती रहती थी. दोनों में एक चीज फेवीकोल का काम करती थी, वह था दोनों का बांग्ला में बात करना.

अचानक एक दिन झोपड़ी का मालिक परिवार के साथ आ गया और तत्काल झोपड़ी खाली करा ली. दरअसल उसका कांदिवली (पूर्व) वाला झोपड़ा मुंशीपाल्टी (म्यूनिसिपल्टी) ने उजाड़ दिया था. नतीजतन वह यहाँ आ धमका. धीरेन उस यौनकर्मी के साथ झोपड़पट्टी के बगल में ही स्थित कूपर अस्पताल के पीछे बने मुर्दाघर के पास रहने लगा. लेकिन बारिश आते ही दोनों बिछड़ गए. कोई यहाँ गिरा, कोई वहाँ गिरा. उसके बाद दोनों आज तक नहीं मिले.
धीरेन ने १९८८ की गर्मियों में आसनसोल से हावड़ा की ट्रेन पकड़ी थी. उसके परिवार में दो बड़े भाई रामाजी लाहिड़ी तथा दादेनजी होनहार विरवान थे. पिता की लाख कोशिशों के बावजूद धीरेन नवमी कक्षा से आगे नहीं बढ़ सका. जबकि दोनों भाई पढ़ाई में अव्वल थे. पिताजी ने माथा ठोक कर उसे वहीं के एक गैरेज कम स्पेयर पार्ट्स की दूकान में हेल्परी पर रखवा दिया.
पिता की बड़ी इच्छा थी कि उनके तीनों बेटे इन्जीनियर बनकर उनका नाम रोशन करें, लेकिन सबसे बड़े भाई दादेनजी ने प्रेम-विवाह कर लिया और रामाजी शादी के बाद परिवार से अलग होकर कोलकाता रहने चला गया. पिता के लिए यह दोहरा आघात था. घर में गरीबी अपने पैर पसार रही थी. धीरेन इसके निशाँ मां की आंखों और पिता की साँसों में पहचानने लगा था।

एक दिन उसने पिता को फूट-फूट कर रोते हुए देखा. तभी उसने तय कर लिया कि वह दादेनजी तथा रामाजी की कमी पूरी करेगा और पिता के आंसू पोंछेगा. आसनसोल में यह सम्भव नहीं था. वह हावड़ा जा पहुंचा. काम की तलाश की तो पाया कि यहाँ तो आसनसोल से भी ज़्यादा बेरोज़गारी है. उसे यहाँ काम तो नहीं मिला, अलबत्ता रेल्वे स्टेशन पर मुम्बई जाने वाला एक आदमी जरूर मिल गया.
इस आदमी ने काम दिलाने का भरोसा देकर धीरेन का जनरल टिकट कटाया और अपने साथ रिजर्वेशन वाले डिब्बे में बिठा लिया. रास्ता इतना लंबा था कि धीरेन इस अनजान आदमी से डर गया और जब वह आदमी गहरी नींद में था तो धीरेन एक स्टेशन पर चुपके से उतर गया. यह स्टेशन नागपुर से पहले का भंडारा स्टेशन था. बाहर निकला तो घुप अँधेरा! वह उल्टे पाँव भागा और प्लेटफोर्म लगभग छोड़ चुकी ट्रेन के एक डिब्बे में किसी तरह जा लटका. फिर उसने वह ट्रेन नहीं छोड़ी. पकड़े जाने का डर इतना था कि अब उस आदमी को कहाँ ढूँढता?
आखिरकार कल्याण स्टेशन आ गया. यहाँ उसका स्वागत एक टीसी ने किया. टिकट छीन कर उसे बेटिकट बताया गया और गरदनियाँ देकर पुलिसवालों ने जामातलाशी ली. जब माल नहीं मिला तो रेल्वे पुलिसवाले उसे तीन-चार थप्पड़ जड़कर रेल्वे स्टेशन के बाहर तक छोड़ने आये. मुम्बई में यह उसका पहला सबक था.
फुटपाथ पर लोग उसे अपने पास सोने तक नहीं देते थे. धीरे-धीरे जब उन्हें यकीन हो गया कि धीरेन भी उनकी ही बिरादरी में शामिल हो चुका है तब कहीं जाकर उसे सोने की अनुमति मिली. जो कपड़े पहनकर घर से चला था, वे धीरे-धीरे मुंह बाने लगे. उन्हीं दिनों उसे एक फुटपाथिये की सिफारिश पर भान्डुप की एक गैरेज में हेल्परी मिल गयी थी।

सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था कि उन्हीं दिनों मैकेनिकों ने वेतन बढ़ाने को लेकर हड़ताल कर दी. धीरेन ने उनका जमकर साथ दिया. वे यूनियन के लोग थे. हड़ताल ख़त्म हुई तो बाकी मैकेनिक बढ़ी हुई तनख्वाहों के साथ काम पर लौट आए लेकिन नाराज़ प्रबन्धन ने धीरेन को बाहर का रास्ता दिखा दिया और उसे ताज्जुब हुआ कि किसी ने उसके लिए आवाज़ नहीं उठायी.
यहीं से चप्पलें चटकाता हुआ वह वडाला की एक गैरेज के सामने पहुंचा था जहाँ ऑटोरिक्शा, कारों, ट्रकों की मरम्मत का काम हाथ लग गया था. यहीं से मैंने उसे बातचीत के लिए पकड़ा था.
पिछले दिनों मैंने उसे नरीमन पॉइंट पर मूंगफली चबाते देखा. बता रहा था कि फिर से सड़क पर है. वह कह रहा था कि जल्द ही घर जायेगा और पिताजी को चौंका देगा. फिर सोच में डूबकर कहता है कि यह बात तो उसने बीते १० सालों में कई बार सोची है, लेकिन जाने की हिम्मत कब जुटा पाया? उसे कोफ्त है कि इतने सालों तक तेलिया लिबास धारण किए रहने के बावजूद पिता के आंसू पोंछने लायक नहीं बन सका. सौ-सौ रुपयों में वह अब भी रोज़ सबकी आज्ञायें ढोता फिरता है.
धीरेन मुझसे कहता है- 'किया मालूम, बाबा आभी जिंदा है की मार गिया, नेही बोलने सकता!'
... और उसकी आंखों के आंसू मुझसे छिप नहीं पाते.

मंगलवार, 4 दिसंबर 2007

सरदारजी, बारह बज गए!

अक्सर यह जुमला उछालकर लोग सिखों का मजाक बनाया करते हैं. लेकिन ज़रा सोचिये कि इससे उनके दिलों पर क्या गुज़रती होगी. अपनी अज्ञानता के चलते दूसरों की कुरबानियों का मजाक उड़ाना कहाँ तक जायज़ है? यह तो सिख कौम की दरियादिली है जो ख़ुद पर बनाए गए लतीफों पर भी ठहाके लगा कर बात आयी गयी कर देती है. लेकिन पानी जब सर से ऊपर गुज़र जाए तो क्या हो?
दरअसल इस जुमले के पीछे सिख कौम के बलिदान का इतिहास छिपा है. इसे लतीफे में बदलने वालों की अक्ल पर तरस खाना चाहिए. मैं विशेषज्ञ तो नहीं, लेकिन मुझे मेरे एक सिख मित्र गुरविंदर सिंह ने इस बारे में जो कुछ बताया था, वह संक्षेप में आपके साथ बांटना चाहता हूँ--
'मुगलिया सल्तनत के दौरान सत्रहवीं शताब्दी में हिन्दूजन के हालात बद से बदतर होते चले जा रहे थे. हिन्दू महिलाओं के साथ मुग़लों का रवैया निजी संपत्ति की तरह था. जनता को इस्लाम कबूलने के लिए तरह-तरह की यातनाएं दी जाती थीं, यहाँ तक कि उनकी हत्या तक कर दी जाती थी. कश्मीरी पंडितों के बचाव में खड़े होनेवाले सिखों के नौवें धर्मगुरु श्री तेगबहादुर जी ने मुग़ल बादशाह को चुनौती दी कि अगर वह किसी तरह उनसे इस्लाम कबुलवाने में कामयाब हो गया तो बाकी लोग भी कबूल कर लेंगे. लेकिन अगर ऐसा न हो सका तो उसे अपनी ये गतिविधियाँ बंद करनी होंगी. बादशाह को यह बड़ा आसान लगा. लेकिन जब अमल में लाने की बारी आयी तो उसके होश फाख्ता हो गए.
श्री तेगबहादुर जी को उनके ४ अनुयायियों समेत भीषण यातनाएं दी गयीं लेकिन उन्होंने इस्लाम किसी तरह न कबूला. आखिरकार उनको मार डाला गया.
उस समय की घटनाओं को देखते हुए श्री तेगबहादुर जी के बेटे और सिखों के दसवें गुरु श्री गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना की. उन्हीं दिनों, १७३९ में नादिरशाह ने हिन्दुस्तान और दिल्ली लूटी. वह अपने साथ अकूत धन और २२०० से ज्यादा हिन्दू स्त्रियाँ लूटकर लिए जा रहा था. यह ख़बर आग की तरह फैली और उस समय के सिख सेना कमांडर जस्सा सिंह के पास भी पहुँची. जस्सा सिंह ने उसी आधी रात को नादिर शाह के काफिले पर धावा बोलकर तमाम हिन्दू स्त्रियों को रिहा करा लिया और उन्हें उनके घर भेज दिया.
तब से यह सिलसिला शुरू हो गया. जब भी कोई अब्दाली या ईरानी हिन्दुस्तान का धन और स्त्रियाँ लूटकर लिये जा रहा होता, सिख सेना आधी रात को जैसे ही १२ बजते; घात लगाकर हमला कर देती तथा स्त्रियों को आजाद करा लेती. अन्यथा, ये स्त्रियाँ अब्दाल के बाज़ार में नीलाम कर दी जाती थीं.
इसके बाद जब भी ऐसा संकट आता; आसपास के इलाकों के लोग सिख सेना से सम्पर्क करते और सिख सेना रात को १२ बजे के आसपास लुटेरों पर धावा बोल देती थी. इस समय तक सिखों की बढ़ती ताकत से जलनेवाले तथा 'कुछ चालाक टाइप' लोगों ने यह फैलाना शुरू किया कि रात को १२ बजते ही सिखों का दिमाग सनक जाता है.
उस समय का यह ऐतिहासिक सच आज कुछ लोगों के लिए मनोरंजन का सबब बना हुआ है. इसीलिए ये किसी भी सिख को देखकर जुमला उछालेंगे- 'सरदार जी बारह बज गए", और हँसेंगे.
अपने मित्र गुरविंदर सिंह के मुंह से यह हकीकत सुनने के बाद तो अब मैं सपने में नहीं सोच सकता कि 'सरदार जी बारह बज गए' कहकर हंसा भी जा सकता है.

रविवार, 2 दिसंबर 2007

संबंधीजन

साथियो,
यह कविता कई जगह छ्प चुकी है। सम्भव है आपमें से कुछ का ध्यान इस पर पहले भी गया हो. लेकिन इस मंच पर नए सुधी पाठकों के सामने इसे प्रस्तुत करने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूँ. यह मेरी अपनी कुछ प्रिय कविताओं में से एक है. आपको कैसी लगी, बताना न भूलियेगा. मुलाहिजा फरमाइये-


मेरी आँखें हैं माँ जैसी
हाथ पिता जैसे
चेहरा-मोहरा मिलता होगा जरूर कुटुंब के किसी आदमी से।

हो सकता है मिलता हो दुनिया के पहले आदमी से
मेरे उठने-बैठने का ढंग
बोलने-बतियाने में हो उन्हीं में से किसी एक का रंग
बहुत सम्भव है मैं होऊँ उनका अंश
जिन्होंने देखे हों दुनिया को सुंदर बनाने के सपने
क्या पता गुफाओं से पहले-पहल निकलने वाले रहे हों मेरे अपने
या फिर पुरखे रहे हों जगद्गुरू शिल्पी
गढ़ गए हों दुनिया भर के मंदिरों में मूर्तियाँ
उकेर गए हों भित्ति-चित्र
कौन जाने कोई पुरखा मुझ तक पहुंचा रहा हो ऋचाएं
और धुन रहा हो सिर

निश्चित ही मैं सुरक्षित बीज हूँ
सदियों से दबा धरती में
सुनता आया हूँ सिर पर गड़गडाते हल
और लड़ाकू विमानों का गर्जन

यह समय है मेरे उगने का
मैं उगूंगा और दुनिया को धरती के किस्सों से भर दूंगा
मैं उनका वंशज हूँ जिन्होनें चराई भेड़ें
और लहलहा दिए मैदान

सम्भव है कि मैं हमलावरों का कोई होऊँ
कोई धागा जुड़ता दिख सकता है आक्रांताओं से
पर मैं हाथ तक नहीं लगाऊंगा चीजों को नष्ट करने के लिए
भस्म करने की निगाह से देखूंगा नहीं कुछ भी
मेरी आँखें हैं मां जैसी
हाथ पिता जैसे।

-- विजयशंकर चतुर्वेदी.

शुक्रवार, 30 नवंबर 2007

तलछट- 1 : उम्र होने को है पचास के पार

सिर पर एक बड़ी-सी आलमारी उठाये बरसात में एक आदमी धरती पर मज़बूती से क़दम जमाता हुआ छप्प-छप्प करता चला जा रहा है। पीछे से देखने में वह उन लाखों मेहनतकश लोगों की ही तरह दिख रहा है, जो इस महानगर की मज़दूर बिरादरी का हिस्सा हैं। लेकिन अगर आपकी उत्सुकता जागे तो आप दौड़कर उसके आगे जाइए और गौर से देखिए- चौंकाने वाली कोई बात उसके चेहरे पर नहीं। वजन से फूली उसकी आँखें और अकड़ी गरदन नज़र आयेगी, जो यहाँ के हर गली-कूचे में नज़र आती है। इस आदमी का नाम है मोहम्मद रईस, जिसे साथ के लोग 'प्रधान' कहकर बुलाते हैं।
भायंदर (जिला-ठाणे) की नवघर रोड, केबिन रोड, वीपी रोड, मीरा रोड, सिल्वर पार्क, काशी-मीरा या इसके आस-पास के इलाकों में कभी-भी नज़र आ सकता है यह शख्स। उसी मुद्रा में- तौलिये को पाँच-छः परत करके सिर पर जमाये, टीवी-रेफ्रीजरेटर, वाशिंग मशीन, टेबल-कुर्सियाँ या ऐसी ही कोई चीज उठाये। या फिर टूटी-फूटी काली-सी गैलन लिये पानी की तलाश में भटकता दिखाई दे सकता है प्रधान।
ऊपर जिस घरेलू और सजावटी सामान का ज़िक्र है, वह प्रधान के ढोने के लिए है। यह सामान सिर से उतरकर उसके घर कभी नहीं जाता। जाता है उन जगहों पर, जहाँ प्रधान जैसे लोगों का घर नहीं हो सकता. वह नवघर रोड पर ही एक जर्जर इमारत के गाला में रहता है। दरवाजे की जगह शटर है, जिसे रात में बंद कर लेने पर हवा तक पर नहीं मार पाती। गाला के अन्दर ही एक संकरी-सी मोरी है, जिसमें बर्तन धोये जाते हैं और खाने-पीने से शरीर में बना अपशिष्ट पदार्थ भी वक्त-जरूरत विसर्जित किया जाता है। संडास (पाखाना) बगल में है। खुदा बड़ा नेकदिल है।
अब्बा ने बहुत मना किया था प्रधान को कि जो थोड़ी-बहुत खेती-पाती है, उसी में गुज़ारा करो; वहाँ बंबई (अब मुम्बई) में नौकरी तौलायी नहीं धरी है, लेकिन बेटे ने इसे एक कान से सुना और दूसरे से निकाल दिया। तब अब्बा ने कहा- 'जो न माने सयाने की सीख, लिये कटोरा मांगे भीख'।
प्रधान ने मुम्बई आकर भीख तो नहीं मांगी, पर कोई राजपाट भी उसे नहीं मिला। पढ़ा-लिखा तो था नहीं कि बाबूगिरी जैसा कोई प्रतिष्ठित काम हाथ लग जाता। उसको मिली हबीब भाई की भट्ठी। संयोग की ही बात है कि प्रधान के बड़े भाई का नाम भी हबीब ही है।
दोनों भाई पढ़ने जाते थे। घर से साथ निकलते थे। स्कूल दूसरे गाँव में यही कोई एक किलोमीटर की दूरी पर रहा होगा। लेकिन दोनों भाई कभी स्कूल नहीं पहुंचे। कभी पास की अरहरी में घुस जाते थे, तो कभी किसी बाग़ में। अब्बा हुज़ूर ने कई मर्तबा जूतियों से नवाजा लेकिन प्रधान के मुताबिक- 'लड़कई बुद्धि, कोई असर नहीं होता था। वरना क्या किसी के माँ-बाप औलाद के दुश्मन होते हैं?' नतीज़ा, पहली पास का प्रमाण-पत्र भी नहीं है दोनों भाइयों के पास।
प्रधान का गाँव हर्रैया पहले बस्ती जिला में पड़ता था, अब सिद्धार्थनगर में है। अलबत्ता तहसील वही है- इटवा. चार बीघा ज़मीन पहले थी, अब भी है। प्रधान की किस्मत में पढ़ना नहीं लिखा था वरना अपने अब्बा से कोई शिकायत नहीं। बल्कि इस बात का बेहद मलाल है कि जब वह गाँव छोड़कर मुम्बई के लिए रवाना हुआ तो अब्बा की बात अनसुनी करके चला। दो महीने बाद ही ख़बर आ गयी कि वह इंतकाल फरमा गए। आख़िरी वक्त में मुंह देखना भी नसीब न हुआ. इस वाकये को १४ साल गुजर गए, पर छाती में वह पछतावा आज भी कसकता है। प्रधान को ताज्जुब है कि वक्त को लोग मरहम क्यों कहते हैं!
प्रधान जब यूपी का अपना गाँव छोड़कर महाराष्ट्र की राजधानी के एक बहुत व्यस्त इलाके में हबीब भाई के यहाँ पहुंचा तो उसको समझ में नहीं आया कि क्या काम करे, क्या खाए और कैसे बसर करे। मानव जीवन की तीनों बुनियादी जरूरतों ने यहाँ कदम रखते ही उसके साथ हाथापाई शुरू की। प्रधान ने पहले तो कुछ देर सोचा, फिर यूपी के अपने अक्खड़ अंदाज़ में इन जरूरियात के साथ पंजे भिडा दिए।
हबीब भाई का दौलतखाना कुर्ला की सीएसटी रोड पर आबाद था। यहीं उनका कारखाना भी था। उनके यहाँ भट्ठियाँ थीं। इनमें ज़स्ता, एल्यूमिनियम, ताँबा, शीशा वगैरह पिघलाया जाता था। फिर इसे सांचे में ढालकर लादी की शक्ल दी जाती थी। प्रधान की इस काम में दिलचस्पी पैदा नहीं हो सकी तो हबीब भाई ने कहा- 'काम इधर-उधर कर लिया करो, रहा यहीं करो, यहीं खाना भी बना सकते हो, ओके?'
प्रधान ने कहा- 'ओक्क्के'।
इस इलाके में भंगार, लकड़ी और लोहे से भरी गाडियाँ बहुत आती थीं। प्रधान दूसरों की देखादेखी इन्हें खाली करने और भरने की मज़दूरी कराने लगा। काम हाड़तोड़ था। दर्द से रात भर नींद नहीं आती थी। अम्मी-अब्बा बेतरह याद आते। लेकिन धीरे-धीरे देह ने दर्द से समझौता कर लिया। अगले छः महीनों तक ये सिलसिला चला। उसी दौरान अब्बा के गुजर जाने की मनहूस ख़बर आयी थी।प्रधान उल्टे पाँव गाँव भागा.
प्रधान घोड़ी पर तो अब्बा के सामने ही चढ़ चुके थे। एक बच्चा भी हो गया था। अब उनकी परदेश निकालने की हिम्मत नहीं हुई। अब्बा तो गुजर गए, कहीं अम्मी भी!... नहीं अब वह कहीं नहीं जानेवाला। खेती करेगा, उसमें जो उपजेगा उसी में पेट पालेगा. प्रधान का यह निश्चय २ सालों तक अडिग रहा. इस बीच वह और एक बच्चे का वालिद बना. बड़े भाई के बाल-बच्चे तो खैर बड़े-बड़े थे. तीन बेटे. बाद को एक बेटी और हुई.
हर्रैया हिन्दू-मुसलमानों की मिली-जुली बस्ती है. फिफ्टी-फिफ्टी का अनुपात. लेकिन यहाँ कभी तनातनी नहीं होती. प्रधान को याद नहीं आता कि महजिद के मामले में भी किसी ने फसाद की बाद की हो. हाँ, मुसलमान मुसलमानों से तथा हिन्दू हिन्दुओं से काफी लड़ते-झगड़ते रहते हैं. वजह, वही जर-जमीन का चक्कर. प्रधान को बहुत लोगो ने दबाया कि छोडो मुम्बई-उम्बई, यहीं उनकी मज़दूरी करो लेकिन वह समझ गया कि ये लोग उसे अपनी ही खेते से बेदखल करना चाहते हैं. उसने न कर दी. 'गाँव में अमीर मुसलमान गरीब मुसलमान को तथा अमीर हिन्दू गरीब हिन्दू को इसी तरह दबाते है'- कहता है प्रधान।
दो सालों का अटल निश्चय आखिरकार टूट ही गया. फाकों की नौबत के चलते उसने एक बार फिर मुम्बई की राह पकड़ ली है.
प्रधान की बेगम वहीं पास के परसा गाँव की हैं. पढ़ने-लिखने की डिग्री के मामले में मरद से बिलकुल कम नहीं. खेती के काम में उन्हें लगना पड़ा था दुल्हन बनाकर आते ही. बच्चे पैदा करना तो खैर कुदरती काम ठहरा! कुदरत की ही कृपा है कि प्रधान आज ५ बेटों के वालिद बन चुके हैं. बड़ा वाला मुश्ताक तीसरी तक पढ़कर आजिज आ गया और गाँव की पढाई को आख़िरी सलाम थोक चुका है. भायंदर में ही बाप के साथ रहता है और लकड़ी को फर्निचर बनाने का हुनर सीख रहा है. बाप-बेटा रोज़ रात ढले उसी संदूकनुमा गाले में बंद हो जाते हैं. रोज़ स्टोव जलाया जाता है, रोज़ काम पर निकला जाता है.
इन सालों में प्रधान की यह हिम्मत नहीं हुई कि कभी अपनी खोली के बारे में सोच सके. मुम्बई में ख़ुद की खोली कोई मजाक है क्या. इसीलिए उन्होंने अपनी बेगम को कभी साथ रखने की नहीं सोची. साल में पूरा एक महीना गाँव को समर्पित है. प्रधान इसका पालन नियम से करते आ रहे हैं.
बरसात का मौसम प्रधान के लिए मुसीबतों का मौसम है. खरीदारी घटती है तो सामान ढुलाई का काम भी कम हो जाता है. लेकिन स्टोव पर चढ़ने वाला राशन, ब्लैक में मिलनेवाला मिट्टी का तेल बराबर मंहगा होता जाता जाता है. तबीयत ख़राब होती है तो खुदा का नाम लेते हैं प्रधान. डॉक्टर एक इंजेक्शन के सौ रुपये गाँठ लेता है. यह भी कोई बात हुई भला?
प्रधान ने तीन बच्चों का नाम स्कूल में लिखा रखा है. अल्लाह की मर्जी हुई तो इनमें से कोई दसवीं के पार भी जा सकता है. प्रधान रहते यहाँ हैं लेकिन जी घर में लगा रहता है. आख़िर वाला बेटा तो अभी 'बहुतै' छोटा है. खैर जब तक चलेगा चलायेंगे, वरना प्रधान मुलुक लौट जायेंगे. आखिरकार, उम्र भी तो पचास के पार होने को है!

'तलछट' का ताना-बाना

दोस्तो,
20 अक्टूबर १९७२ को हिन्दी के महान आलोचक स्वर्गीय डॉक्टर रामविलास शर्मा ने स्वनामधन्य आलोचक विजयबहादुर सिंह को एक पत्रोत्तर में लिखा था- 'हिन्दी के 'क्रांतिकारी' लेखकों की विशेषता है कि वे जिंदा मजदूर के बारे में कुछ नहीं जानते, सर्वहारा वर्ग पर घंटों बोल सकते हैं, महीनों लिख सकते हैं। हाड़मास के मजदूर को प्रत्यक्ष जीवन में न जानने वाले सब लेखक idealist हैं, भले ही वे अपने को बहुत बड़ा द्वंद्वात्मक भौतिकवादी मानते हों। उपन्यास न सही, दस मज़दूरों के संक्षिप्त जीवन-चरित लिखो। परिवेश, परिवार जीविकोपार्जन आदि का वृतांत देखकर, पूछकर लिखो। यह कार्य उपन्यास लेखन से कम रोचक न होगा। बोलो, तैयार हो?'

यह सोचकर रोमांच होता है कि उस समय मैं २ साल का रहा हूँगा। यह पत्र मैंने 'वसुधा' में बरसों बाद पढ़ा। सच मानिए, जनसत्ता 'सबरंग' के लिए यह काम मैं साल २००० के पहले सीमित अर्थों में सम्पन्न कर चुका था। मेरा 'लोग हाशिये पर' स्तंभ इसी तरह के चरित्रों पर आधारित था। उसके कुछ चुने हुए चरित्रों को आप सबसे मिलवाने की तमन्ना है 'तलछट' नाम से। तो काम पर लगा जाए?

गुरुवार, 29 नवंबर 2007

आभास


उठा नहीं हूँ उठ-सा गया हूँ
गिरा नहीं हूँ गिर-सा गया हूँ
भरा नहीं हूँ भर-सा गया हूँ
डरा नहीं हूँ डर-सा गया हूँ
जिया नहीं हूँ जी-सा गया हूँ
मरा नहीं हूँ मर-सा गया हूँ।