मंगलवार, 14 अप्रैल 2009

अर्थशास्त्री भीमराव अम्बेडकर ने कहा था...

दलितों की अवस्था को सुधारने के लिए प्रयास तो गौतम बुद्ध के समय से ही शुरू हो गए थे. बुद्ध के बाद भारतीय समाज में कई संत और समाज सुधारक हुए हैं जिन्होंने दलितों की दीनदशा के लिए आंसू बहाए हैं लेकिन ज़मीनी कार्य पहली बार बाबासाहेब अम्बेडकर ने ही किया. उन्होंने यह क्रांतिकारी समझ दी कि दलितों को अपनी दशा खुद सुधारना होगी. किसी की दया पर उनकी हालत नहीं बदल सकती. इसलिए उन्हें शिक्षित होना पड़ेगा, संगठित होना पड़ेगा और नेतृत्व करना पड़ेगा. दलितों को संगठित करने के लिए रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया की रूपरेखा उन्होंने ही बनाई थी, यह बात और है कि पार्टी उनके महाप्रयाण के पश्चात ही अस्तित्व में आ सकी. ख़ैर..

भारतीय संविधान के मुख्य शिल्पकार एवं भारतरत्न बाबासाहेब डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर की आज ११८वीं जयन्ती है (१४ अप्रैल २००९). समाज ने उन्हें 'दलितों का मसीहा' की उपाधि भी दी है. भारतीय समाज में स्त्रियों की अवस्था सुधारने के लिए उन्होंने कई क्रांतिकारी स्थापनाएं दीं हैं. कहते हैं कि कामकाजी महिलाओं के लिए मातृत्व अवकाश (Maternity Leave) का विचार डॉक्टर अम्बेडकर ही पहले पहल सामने लाये थे. डॉक्टर अम्बेडकर के योगदान को आम तौर पर सार रूप में हम सभी जानते हैं लेकिन आज मैं उनके एक और रूप से परिचित कराता हूँ. और वह रूप है उनके अर्थशास्त्री होने का.

पहले विश्वयुद्ध के बाद भारतीय मुद्रा विनिमय की व्यवस्था में आमूलचूल सुधार करने के उद्देश्य से सन् १९२४ में रॉयल कमीशन ऑफ़ इंडियन करेंसी एंड फायनांस की स्थापना लन्दन में की गयी थी. प्रख्यात अर्थशास्त्री ई. हिल्टन यंग की अध्यक्षता में यह आयोग १९२५ में भारत आया. इसमें आरएन मुखर्जी, नॉरकोट वारेन, आरए मन्ट, एमबी दादाभाय, जेसी कोयाजी और डब्ल्यू ई. प्रेस्टन जैसे विद्वानों की मंडली इस आयोग की सदस्य थी. भारतीय मुद्रा विनिमय की व्यवस्था में सुधार के अंगों को चिह्नित करने के लिए इस आयोग ने ९ प्रश्नों की एक सूची तैयार की और सम्पूर्ण भारत की अवस्था के मद्देनजर विचार-विमर्श करने लगे.

इसी सिलसिले में १५ दिसम्बर सन् १९२५ को डॉक्टर अम्बेडकर ने इस आयोग के सामने पूरी प्रश्नावली को लेकर अपने बिन्दुवार और आँख खोल देने वाले स्पष्ट विचार रखे. इस प्रश्नावली का चौथा प्रश्नसमूह था- 'निश्चित की गयी विनिमय दर पर रुपये को दीर्घकाल तक स्थिर रखने के लिए क्या उपाय किए जाने चाहिए? विश्वयुद्ध के पहले से चली आ रही सुवर्ण विनिमय प्रणाली (Gold Exchange Standard System) इसी रूप में आगे चलानी चाहिए या इसमें कुछ फेरबदल किए जाएँ? स्वर्ण भण्डार का स्वरूप क्या होना चाहिए? यह भण्डार कितना होना चाहिए तथा कहाँ रखा जाना चाहिए?'

प्रश्न क्रमांक ४ के उत्तर में डॉक्टर अम्बेडकर ने आयोग को बिन्दुवार समझाया था कि स्वर्ण विनिमय प्रणाली जनता की भलाई में किस प्रकार बाधक है, यह प्रणाली असुरक्षित क्यों है, और कैसे अस्थिर है. उन्होंने यह भी समझाया कि इस विनिमय प्रणाली के तहत सरकार को मिली नोट छापने की खुली छूट जनता के लिए किस तरह नुकसानदायक है. डॉक्टर अम्बेडकर की आयोग के साथ चली यह प्रश्नोत्तरी मिनिट्स ऑफ़ इवीडेन्स में दर्ज़ है.

मिनिट्स में दर्ज़ बयान के छठवे बिंदु में आम्बेडकर ने तत्कालीन समाज व्यवस्था, अर्थव्यवस्था की औद्योगिक एवं व्यापारिक परिस्थिति, प्राकृतिक आपदा, जनता की सहूलियत, लोगों के स्वभाव और सम्पूर्ण जनता का हित जैसे महत्वपूर्ण पक्षों को ध्यान में रखते हुए उपाय सुझाए थे. जैसे कि उन्होंने कहा था कि टकसाल में उचित मूल्य वाली स्वर्ण मुद्राएँ ही ढाली जाएँ. इसके अलावा इन स्वर्ण मुद्राओं तथा प्रचलित रुपये का परस्पर विनिमय मूल्य पक्का किया जाए. उन्होंने यह सुझाव भी दिया था कि प्रचलित रुपया सोने के सिक्के में परिवर्त्तनीय नहीं होना चाहिए, इसी तरह सोने का सिक्का भी प्रचलित रुपये के स्वरूप में परिवर्त्तनीय नहीं होना चाहिए. होना यह चाहिए कि दोनों का परस्पर मूल्य निश्चित करके पूर्ण रूप से दोनों को नियमानुसार चलन में लाया जाना चाहिए.

डॉक्टर आंबेडकर जानते थे कि भारतीय जनता की भलाई के लिए रुपये की कीमत स्थिर रखी जानी चाहिए. लेकिन रुपये की यह कीमत सोने की कीमत से स्थिर न रखते हुए सोने की क्रय शक्ति के मुकाबले स्थिर रखी जानी चाहिए. इसके साथ-साथ यह कीमत भारत में उपलब्ध वस्तुओं के मुकाबले स्थिर रखी जानी चाहिए ताकि बढ़ती हुई महंगाई की मार गरीब भारतीय जनता को बड़े पैमाने पर न झेलनी पड़े. एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने आयोग के सामने कहा था कि रुपये की अस्थिर दर के कारण वस्तुओं की कीमतें तेजी से बढ़ती हैं लेकिन उतनी ही तेजी से मजदूरी अथवा वेतन नहीं बढ़ता है. इससे जनता का नुकसान होता है और जमाखोरों का फ़ायदा.

रॉयल कमीशन ऑफ़ इंडियन करेंसी एंड फायनांस के सामने दिए गए डॉक्टर अम्बेडकर के तर्कों को पढ़कर कहा जा सकता है कि भारत के आर्थिक इतिहास का वह एक महत्वपूर्ण पन्ना है.

सोमवार, 13 अप्रैल 2009

काला धन कैसे वापस लायेंगे आडवाणी जी?

काला धन छिपाने के धरती पर जो अन्य स्वर्ग हैं- जैसे मलयेशिया, फिलीपीन्स, उरुग्वे, कोस्टारिका, सिंगापुर, स्विट्जरलैंड, बहामा, बरमुडा, ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड और केमैन आइलैंड आदि- इनके नाम तो सब बता देंगे, लेकिन यहाँ कितने भारतीयों का कितना काला धन छिपा है, और इन भारतीयों में कितने कांग्रेसी हैं, कितने भाजपाई, कितने हिन्दू, कितने मुसलमान, कितने सिख, कितने ईसाई और इस मामले में ये सब हैं कितने बड़े मौसेरे भाई, यह कौन बताएगा?

ताजा हल्ला के अनुसार भारतीयों के १४५६ अरब डॉलर नकद रूप में स्विस बैंकों में रखे हुए हैं. यह सफ़ेद नहीं काला धन है. एक आँकड़ा और है- अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने देश की अर्थव्यवस्था में थोड़ी जान फूंकने के लिए जो ताज़ा स्टिम्युलस पैकेज मंजूर करवाया है वह राशि है ८३० अरब डॉलर. इसका अर्थ यह हुआ कि सिर्फ स्विस बैंकों में जमा भारतीयों का काला धन अमेरिकी स्टिम्युलस पैकेज से ६२५ अरब डॉलर अधिक है. रेखांकित करने वाली बात यह है कि यह मात्र स्विस बैंक में जमा काला धन है. भारतीयों के लिए मॉरीशस तो काला धन गलाने और कर चोरी का स्वर्ग है. वहां का पिटारा खुले तो क्या हाल हो!

अगस्त 1982 में भारत और मॉरीशस के साथ एक कर संधि हुई थी जिसको 'डबल टैक्सेशन एवोइडेन्स ट्रीटी' कहा जाता है. भारत ने इस संधि के तहत मॉरीशस निवासियों को भारत में शेयर की खरीद बिक्री पर हुई कमाई पर टैक्स न लेने का वचन दिया था. इसी तरह की छूट मॉरीशस ने भी दी.. भारतीय निवेशक राउंड ट्रिपिंग करते हैं. इसके तहत निवेशक विदेश में जाकर मॉरीशस के रास्ते धन वापस भारत ले आते हैं.

ऑर्गनाइजेशन ऑफ इकोनामिक को-ऑपरेशन एंड डेवलपमेंट (ओईसीडी) ने काले धन की निकासी में सहयोग न करने वाले देशों की काली सूची जारी की है और अनुमान व्यक्त किया है कि काले धन की सैरगाह बने देशों में १७०० अरब डॉलर से ११५०० अरब डॉलर मूल्य के दायरे में परिसंपत्तियाँ जमा हैं. यहाँ आप गणित लगा लीजिये कि यह काला धन 'जी-२०' नेताओं द्वारा वैश्विक अर्थव्यवस्था को उबारने के लिए प्रस्तावित की जाने वाली राशि के मुकाबले दस गुना से भी अधिक है.

चुनाव प्रचार में भाजपा काला धन वापस लाने का कनकौव्वा उड़ा रही है. जबकि भाजपा अच्छी तरह जानती है कि विदेशों में जमा काला धन यज्ञ-हवन करके वापस नहीं लाया जा सकता है. हाँ, धर्मगुरुओं के आशीर्वाद से धन जमा करने वालों का पता अवश्य लगाया जा सकता है. काला धन विदेश में रखने वाले भी उन्हीं के चेले होते हैं और आशीर्वाद लेकर चुनाव जीतने वाले भी. आडवाणी जी ने अभी कहा भी था कि वह साधु-संतों और धर्मगुरुओं से मार्गदर्शन लेते रहेंगे. कुछ वर्ष पहले धर्मगुरुओं के मार्गदर्शन में 'काले' को 'सफेद' बनाया जा रहा था जिसका स्टिंग ओपरेशन हुआ था, पता नहीं लोग उसे क्यों भूल गए? उसका कोई नामलेवा नहीं! बाबा रामदेव भी चुनाव के समय वह मामला नहीं उठाते जबकि 'राष्ट्र का जिम्मेदार नागरिक' होने के नाते काला धन वाले मुद्दे पर उन्होंने कांग्रेस की कम घेराबंदी नहीं कर रखी है.

स्विस बैंकों का तो हाल यह है कि वहां खातादार का नाम पता होता ही नहीं, एक कोड नंबर होता है. यह कोड नंबर खातादार की धर्मपत्नी और धर्मबच्चों तक को वे नहीं बताते. आपका तलाक हो जाने अथवा वसीयत जैसे कानूनी मामले में भी ये बैंक आपके खाते की गोपनीयता भंग नहीं करते. और नाम खुल जाने के भय से खातादार भी भला क्यों किसी को बताएगा. इतना जरूर होता है कि खातादार की मौत के बाद अगर जमा राशि पर ७ से १० वर्ष के बीच किसी ने दावा नहीं किया तो वह पूरी राशि बैंक की हो जाती है. क्या पता कुछ पूज्य महात्मा अपनी नश्वर किन्तु पार्थिव देह का परित्याग करने से पूर्व अपने बीवी-बच्चों को वह कोड नंबर बता भी जाते होंगे!

स्विट्ज़रलैंड में दुनिया भर का काला धन छिपाने के कारोबार में एक-दो नहीं पूरे ४०० बैंक लगे हुए हैं. इनमें से करीब ४० शीर्ष बैंक बेनामी खाता खोलने की सुविधा देते हैं. यूबीएस और एलटीजी ऐसे ही बाहुबली स्विस बैंक हैं. खाता खोलने के लिए आप एक पत्र भेज दें, बस हो गया काम. बेनामी खाता खुलवाने के लिए सिर्फ एक बार आपको व्यक्तिगत रूप से बैंक में उपस्थित होना पड़ता है. फिर आप चाहें तो खाता ऑनलाइन संचालित करें या फ़ोन पर आदेश देकर. आपके खाते की गोपनीयता कायम रखने के लिए स्विस सरकार ने ऐसे नियम बनाए हैं कि अगर किसी बैंक अधिकारी या कर्मचारी ने राज खोला तो उसे सश्रम कारावास दिया जा सकता है. स्विस बैंकों के लिए यह कोई गुनाह ही नहीं है कि खातादार ने अपने देश में कर चोरी करके पैसा उनके यहाँ जमा किया है. स्विस कानून में आपके लिए कमाई और संपत्ति का ब्यौरा देने की भी कोई बाध्यता नहीं है.

सन् १९३४ के बाद से बैंकिंग गोपनीयता का कानून स्विस सरकार ने दीवानी से बदलकर फौज़दारी कर दिया था. इसके तहत हथियारों की अवैध बिक्री और नशीली दवाओं की तस्करी के जरिए हुई कमाई के मामलों में गोपनीयता के नियम थोड़े शिथिल किये गए थे. लेकिन सवाल यह है कि किस मुद्रा में लिखा होता है कि वह किस ढंग से कमाई गयी है. करोड़ों-अरबों के भारतीय रक्षा सौदों तथा उनमें वसूला गया कमीशन किस रास्ते से कहाँ पहुंचा, कोई इसका माई-बाप आज तक पता चला है क्या? क्वात्रोची का ही कोई क्या उखाड़ पाया?

विदेशों से काला धन वापस लाने की एक सूरत हो सकती है. जिस तरह कुछ वर्ष पहले 'ब्लैक' को 'व्हाइट' करने के लिए केंद्र सरकार ने देश में एमनेस्टी स्कीम चलायी थी उसी तरह काला धन वापस लाने वालों के लिए एमनेस्टी स्कीम चलाये और उनकी पहचान स्विस बैंकों की ही तरह गुप्त रखे. तब संभव है कि कुछ धर्मात्मा भारतीय जीव भारत के भूखों-नंगों पर तरस खाकर अपना धन यहाँ लगा दें. गणित लगाइए कि अगर एक प्रतिशत काला धन भी लौट आया तो वह कितने खरब होगा?

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2009

क्यों है ग़ालिब का अंदाज़-ए-बयाँ और?

किसी ने आपसे ये कहा है क्या कि रोग़न किया कीजिये? ये तो शौक की बात है कि आप रोग़न करेंगे या सिर्फ रंग भरके रह जायेंगे... या रंग-रोग़न कोई रोग है?

लोग कहते आये हैं कि ग़ालिब का है अंदाज़-ए-बयाँ और. ये तस्लीम भी किया गया है.
लेकिन ग़ालिब ख़ुद यह क्यों कहता है कि उसका है अंदाज़-ए-बयाँ और. ..और दीगर क्यों तसलीम करते हैं.

दरअसल ग़ालिब को समझ और समझा पाना वैसे ही कठिन है जैसे कि कबीर को समझ और समझा पाना. दोनों बड़े कवि हैं. दुनियावी मुहावरों में बात की जाये तो महाकवि. मुझे चेतना के स्तर पर यह समझ में नहीं आता कि कवि और महाकवि क्या होता है. बात कहने की होती है कि कोई किसी फ़िक्र को किस अंदाज़ में कितने कमाल से कह पाता है... और अगर कहने का कमाल न हो तो फ़िक्र कितना टटका और टोटका होती है. बस.

चलिए देखते हैं कि ग़ालिब का अंदाज़-ए-बयाँ और किस तरह और क्योंकर है.

ग़ालिब से पहले ये अंदाज़ नहीं था किसी के पास; ख़ुदा-ए-सुख़न मीर के पास भी नहीं कि वह अमल को दर रदद्-ए-अमल की तरह निभा सकता. मीर बड़ी से बड़ी बात सहल अंदाज़ में कह सकता था लेकिन ग़ालिब शेर में जीवन का काम्प्लेक्स लाया. उसने यह तरीका अपनाया कि जो रद्द-ए-अमल है दरअसल अमल हो जाए. ग़ालिब ने चीज़ों को जटिल होते हुए देखा.

आप ग़ालिब के चंद अश'आर देखिएगा. उसका एक मशहूर शेर है-

ये लाश बेकफ़न असद-ए-ख़स्ता जाँ की है
हक मगफिरत करे अज़ब आज़ाद मर्द था

और शेर सुनिए-

रंज से खूगर हुआ इंशां तो मिट जाता है रंज
मुश्किलें मुझ पर पड़ीं इतनी कि आसाँ हो गयीं

फिर एक और शेर-

उनके देखे से जो आ जाती है मुंह पर रौनक
वह समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है

आशिक हूँ प माशूक फरेबी है मिरा काम
मजनूं को बुरा कहती है लैला मिरे आगे

गिनाने को तो बहुत शेर हैं गालिब के, जो उसके अंदाज़-ए-बयाँ की तारीख़ खुद लिखते हैं. लेकिन आप सब शोहरा को एक और सवाल में गाफ़िल किए जाता हूँ कि ग़ालिब का यह शेर पढ़िए और बताइये कि किस तारीखी शायर ने ये ख़याल अपने बेहद मक़बूल शेर में इस्तेमाल किया है. गालिब का शेर ये रहा-

खूँ होके जिगर आँख से टपका नहीं अय मर्ग
रहने दे मुझे याँ कि अभी काम बहुत है.

आखिर में इस नाचीज़ की एक बात-

आप मुझसे ज़ियादा पढ़े-लिक्खे अफ़राद हैं.
और यह बेवजह किया गया मज़ाक नहीं है.

सोमवार, 6 अप्रैल 2009

चुनाव प्रचार में साहित्य की रेड़ लगाई!

संसद में शेर-ओ-शायरी जगह पाती थी तो अख़बार वाले (अब टीवी चैनल वाले भी) उसका बड़ा शोर करते थे कि फलां मंत्री ने अपने भाषण के दौरान यह शेर पढ़ा, ढिकां कविता की लाइनें पढ़ीं वगैरह-वगैरह. लेकिन अब साहित्य चुनाव प्रचार में भी जगह पा रहा है. यह हम जैसे पढ़ने-लिखने से थोड़ा-बहुत वास्ता रखने वालों के लिए सुकून की बात है. 'आज तक' में प्रभु चावला और उनके एक एंकर अजय कुमार के साथ अमर सिंह कुछ फिल्मी और कुछ इल्मी शेर कहते-सुनते देखे गए. लेकिन मैंने यह पोस्ट एक अन्य कार्यक्रम की वजह से लिखी है

विदेश में जमा काला धन को लेकर एनडीटीवी इंडिया में ५ अप्रैल की शाम एंकर अभिज्ञान और सिकता के साथ एक बहस चल रही थी. बाबा रामदेव, कपिल सिब्बल, रविशंकर प्रसाद, शिवानन्द तिवारी भाग ले रहे थे. उस बहस में मैं फिलहाल जाना नहीं चाहूंगा. लेकिन जिस एक बात ने मेरा ध्यान खींचा वह थी जेडीयू के वरिष्ठ नेता शिवानन्द तिवारी के मुखारविंद से मुंशी प्रेमचंद की कहानी का उल्लेख किया जाना.

जेडीयू के तिवारी जी यूपीए सरकार एवं गठबंधन पर हमला करते हुए कह रहे थे कि भ्रष्टाचार आज से नहीं है, समाज में इसकी जड़ें गहरी हैं और प्रेमचंद ने 'नमक का दारोगा' कहानी में इसी भ्रष्टाचार का जिक्र किया था. वह कहानी उनके अनुसार सन् १९३६ में लिखी गयी थी. एक दूसरा हवाला उन्होंने महात्मा फुले के लेखन का दिया. लेकिन वह महात्मा फुले के भ्रष्टाचार संबन्धी किसी लेख का कोई उद्धरण नहीं दे सके. हालाँकि उन्होंने यह अवश्य कहा कि फुले १८वीं शताब्दी में हुए थे.

मैं तिवारी जी का शुक्रिया अदा करना चाहता हूँ. जेपी आन्दोलन में लालू यादव के वरिष्ठ नेता रहे डॉक्टर शिवानन्द के मुंह से प्रेमचंद का नाम सुनकर अमर सिंह जैसा हल्कापन नहीं लगता. लेकिन मैं विनम्रता से कहना चाहता हूँ कि महात्मा ज्योतिबा फुले १८वीं नहीं १९वीं शताब्दी में पैदा हुए थे. उनका जन्म महाराष्ट्र के सातारा जिले में ११ अप्रैल १८२७ को हुआ था. सन् १८२७ का अर्थ १८वीं शताब्दी नहीं होता जैसा कि सन् २००९ का अर्थ किसी भी गणित से २०वीं शताब्दी नहीं हो सकता.

दूसरी बात यह है कि प्रेमचंद की कहानी 'नमक का दारोगा' सन् १९३६ में लिखी गयी कहानी नहीं है. उर्दू की 'प्रेम पचीसी' नामक पत्रिका में यह सन् १९१४ के पूर्व ही छप चुकी थी. इससे साबित होता है कि डॉक्टर शिवानन्द तिवारी ने मुंशी प्रेमचंद और महात्मा फुले का भी अपनी पार्टी के लिए किस तरह इस्तेमाल कर लिया!

जय हो! और हो सके तो इस तरह के तथ्यों से भय भी हो!! सच्चे पत्रकार और नेता अपनी बात कहने से पहले यों ही नहीं ख़ाक छाना करते!

फिर भी आज के दौर में साहित्य को किसी बहाने हमारे देश के 'आम आदमी' के सामने लाने का धन्यवाद!

शनिवार, 4 अप्रैल 2009

ख़ूब गुज़रेगी जो मिल बैठेंगे दीवाने दो

हाँ, तो पिछली पोस्ट में जो शेर मैंने आपको पढ़वाया था वह शेर कहा था जगतमोहन लाल रवां साहब ने.

मैं कह रहा था कि यह शेर दो दिन पहले सैयद रियाज़ रहीम साहब के साथ बातचीत के दौरान मेरे सामने आया. मैंने यह मिसरा तो बहुत सुन रखा है- 'ख़ूब गुज़रेगी जो मिल बैठेंगे दीवाने दो.' मक़बूलियत ऐसी कि यह लोगों की ज़बान पर है और इसका इस्तेमाल विज्ञापन तक में हुआ है. लेकिन 'क़ैस जंगल में अकेला है मुझे जाने दो' वाला मिसरा मैंने पहली बार सुना. (कई अच्छी बातें ज़िन्दगी में पहली बार ही होती हैं:))

बात आगे बढ़ी तो रियाज़ साहब ने इस शेर के ताल्लुक से जो कहा वह आपको भी सुनाता हूँ- 'इस शेर का नाम लिए बगैर उर्दू शायर की तारीख नामुकम्मल है क्योंकि यह शेर आमद (प्रवाह) का शेर है. शायरी के ताल्लुक से उर्दू में आमद और आवर्द- दो बातें कही जाती हैं. आवर्द की शायरी में फ़िक्र तो हो सकती है लेकिन ज़रूरी नहीं कि वह शायरी दिलों को छू जाए. जहां तक आमद की शायरी है तो वह दिलों को तो छूती ही है; इसके साथ-साथ सोचने के लिए नए रास्ते भी पैदा करती है.'

अब फ़ैसला आप कीजिए कि रवां साहब के इस शेर के ताल्लुक से रियाज़ साहब जो फ़रमा रहे थे वह दुरुस्त है या नहीं. मुझे तो एकदम दुरुस्त लगा जी!

रवां साहब के चंद और अश'आर पेश-ए-खिदमत हैं-

हिरास-ओ-हवस-ए-हयात-ए-फ़ानी न गयी
इस दिल से उम्मीद-ए-कामरानी न गयी

है संग-ए-मज़ार पर तेरा नाम रवां
मर कर भी उम्मीद-ए-ज़िंदगानी न गयी

पाबन्दि-ए-ज़ौक, अहल-ए-दिल क्या मा'नी
दिलचस्पि-ए-जिंस-ए-मुज़महल क्या मा'नी

ऐ नाज़िम-ए-कायनात कुछ तो बतला
आखिर ये तिलिस्म-ए-आब-ओ-गुल क्या मा'नी


धन्यवाद!

गुरुवार, 2 अप्रैल 2009

क़ैस जंगल में अकेला है मुझे जाने दो

आपको आज एक शेर सुनाता हूँ शेर अर्ज़ है-

क़ैस जंगल में अकेला है मुझे जाने दो
खूब गुज़रेगी जब मिल बैठेंगे दीवाने दो

दोस्तो, इस शेर के बारे में बातचीत अगले दौर में....

बुधवार, 1 अप्रैल 2009

एटीएम ने अप्रैल फूल बना दिया!

बड़ा शोर था कि एक अप्रैल २००९ से नकद राशि निकालने के लिए किसी भी बैंक का एटीएम अपना हो जाएगा. कहीं-कहीं शायद हो भी गया हो लेकिन मुझे तो मेरे पड़ोसी एटीएम ने ही अप्रैल फूल बना दिया.

दरअसल मेरा बचत खाता एचडीएफसी बैंक में है. इसका एटीएम घर से दूर पड़ता है. लेकिन इस बात का कभी मलाल नहीं होने पाया. बगल का आईसीआईसीआई बैंक एटीएम हमेशा संकटमोचक बनकर काम आता रहा. एचडीएफसी बैंक में वेतन खाता होने के चलते यह सुविधा भी थी कि आईसीआईसीआई बैंक एटीएम से नकद निकालना निःशुल्क था. लेकिन शायद आईसीआईसीआई बैंक एटीएम को सुबह-सुबह ही पता चल गया था कि आज पहली अप्रैल है.

घर से निकलते समय पड़ोसी के घर रफ़ी साहब का यह गाना भी बज रहा था- 'अप्रैल फ़ूल बनाया तो उनको गुस्सा आया.' लेकिन कमबख्त उधर ध्यान नहीं गया तो नहीं ही गया. जल्दी में था सो हांफते, दम साधते आईसीआईसीआई बैंक के एटीएम में दाखिल हुआ. इस कियोस्क में ३ मशीनें हैं. लेकिन मेरी किस्मत देखिए कि वे अन्य ग्राहकों के लिए पैसे उगल रही थीं लेकिन मेरे एचडीएफसी एटीएम कार्ड से सौतन का रिश्ता निभाने लगीं. बार-बार प्रयास करने के बावजूद उनमें से धेला भी नहीं निकला. अब मैं सर पकड़ कर बैठ गया. शुल्क लगने के ज़माने में जो एटीएम मुझे निःशुल्क पैसे दिया करता था, आज बेमुरव्वत बना बैठा था.

अभी मैं उधेड़बुन में था कि बगल में खड़े एक ग्राहक का मोबाइल बज उठा. उसका रिंगटोन भी यही था- 'अप्रैल फ़ूल बनाया तो उनको गुस्सा आया.' बात भेजे में आ गयी. इंसान ही नहीं, कभी-कभी मशीनें भी अप्रैल फूल बना दिया करती हैं!