शनिवार, 31 मई 2008

तुझे सोमरस कहूं या शराब? (भाग-२)


पिछली कड़ी में आपने सवाल उठते देखा कि आर्य इसे सोमरस ही क्यों कहते थे? अब आगे...
ईसा पूर्व ८००० ईस्वी तक भिन्न-भिन्न आकारों के भांड (बर्त्तन) बनने शुरू हो गए थे. निकट पूर्व में उत्तरी जाग्रोस पर्वत के हाजी फिरूज़ (तेपे, आज का ईरान) नामक स्थान पर मेरी ए. वोइट ने जब खुदाई की तो वहाँ से उन्होंने दुनिया में पहली बार एक बड़ा जार बरामद किया. इसमें तकरीबन ९ लीटर यानी २.५ गैलन द्रव आ सकता था. मिट्टी का एक मकान था. उसमें ऐसे ५ जार और फराहम हुए जो फर्श पर एक दीवार से सटे रखे थे. यह कमरा किसी रसोईघर जैसा लगता था. इन जारों को तकरीबन ५४००-५००० ईसा पूर्व का आँका गया. इन जारों में पीले रंग की सामग्री चिपकी हुई मिली जिसे प्रयोगशालाओं में गहन परीक्षणों के बाद वाइन करार दिया गया.


सम्भव है इसके सेवन से ऐसे बल का संचार होता रहा हो कि पीने वाला महायोद्धा यहाँ तक कि युद्ध का देवता तक बन सकता था. आश्चर्य नहीं है कि ऋगवेद में इन्द्र को नगरों का नाश करने वाला कहा गया है और सोमरस इन्द्र जैसे देवताओं को प्रस्तुत किया जाता था. तब कहीं इन्द्र येहोवा की परम्परा का वाहक तो नहीं था जो कालांतर में स्वयं एक पीठ बन गया था!

अब हम ज़रा पश्चिम में नशे के आम जरिये वाइन की जड़ें तलाशने की कोशिश करेंगे. आज भी पश्चिमी देशों में व्हिस्की, रम या जिन से कहीं ज्यादा वाइन का सेवन अधिक प्रतिष्ठित माना जाता है. ध्यान देने की बात यह है कि प्राचीन काल में लोग वाइन और बीयर में फ़र्क करते थे. वाइन काफी पहले ईजाद कर ली गयी थी. प्राचीन ईरान तथा मिस्र से प्राप्त चित्रों में दर्शाया गया है कि वाइन पीने के लिए प्यालों का प्रयोग होता था जबकि बीयर सीधे बैरलों से पतली सटक के जरिये पी जाती थी. मदिरापान अक्सर सामूहिक होता था.

मिस्र में एक परम्परा थी कि वर्ष के प्रथम माह में एक स्थान पर सैकड़ों स्त्रियाँ इतनी शराब पीती थीं कि सुबह तक उनमें से कोई अपनी टांगों पर खड़ी नहीं हो पाती थी. यह विराट शराब आयोजन एक अंधविश्वास के तहत किया जाता था. इस पर यहाँ विस्तृत बात करने से विषयांतर हो जाने का खतरा है.
नियोलिथिक युग(ईसा पूर्व ८५००-४००० वर्ष) तक निकट पूर्व तथा मिस्र की आबादियां स्थायी हो गयी थीं. इसके चलते पेड़-पौधों और घरेलू पशुओं से लोगों का सम्बन्ध करीबी होने लगा. घुमंतू जातियों के मुकाबले स्थायी खाद्य-श्रृंखला और व्यंजन अस्तित्व में आ गए. खाद्य संरक्षण में किण्वन, सोकिंग, पकाना, तिक्त करना आदि विधियां प्रचालन में आयीं. नियोलिथिक लोगों को ब्रेड, बीयर और अनाजों के उत्पादन का आदि मानव-समूह माना जाता है.

प्राचीनकालीन मिस्र में अंगूर की खेती नहीं होती थी. लेकिन फिलिस्तीन से व्यापार के कारण नील डेल्टा में शाही शराब का उत्पादन होता था. वे कांस्ययुग के शुरुआती दिन थे. इसे 'पुराने राज्य' का शुरुआती दौर भी कहा जाता है. बात २७०० ईसा पूर्व की है. तब के फिलिस्तीन में आज का इजरायल, पश्चिमी तट, गाज़ा और जोर्डन शामिल थे. नील डेल्टा में अंगूर की खेती बहुत बाद में शुरू हुई. यहाँ शराब के जार तीसरे वंश के फिराओनों की क़ब्रों में दफ़न किए जाने के प्रमाण मिले हैं. एब्रीडोस की क़ब्रों में ऐसे कई जार मिले हैं.

मेसोपोटामिया में दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से पहले का शराब-इतिहास दस्तावेज़ के तौर पर लगभग न के बराबर मिलता है. लेकिन जारों के अन्दर पाये गए द्रव्य के परीक्षण ने यह साबित कर दिया कि ३५००-३१०० ईसा पूर्व के दरम्यान यहाँ का उच्च वर्ग शराब का छककर सेवन करता था. यह सिलसिला उरुक काल के बाद के दौर तक चला. शराब के सिलेंडरों पर मिली शाही सीलों से पता चलता है कि बीयर ट्यूबों में स्ट्राओं के जरिये तथा शराब (वाइन) प्यालों में पी जाती थी, जैसा कि मैंने पहले ही अर्ज़ किया है. यह आज के इराक़ का दक्षिणी इलाका था. पांचवी शताब्दी ईसा पूर्व के 'father of history' कहे जाने वाले ग्रीक इतिहासकार हेरोडेटस ने लिखा है कि यूफ्रेतस या टिगरिस से लेकर आर्मीनिया के इलाकों में शराबनोशी काफी बाद तक होती थी.

आज के जोर्जिया में भी ६००० वर्ष ईसा पूर्व के जार मिले हैं. यह सुलावेरी का इलाका था. पैट्रिक एडवर्ड मैकगवर्न ने अपनी किताब एनसियेंट वाइन: द सर्च फॉर द ओरीजिंस ऑफ़ विनी कल्चर में लिखा है कि यूरेशियाई वाइन (अंगूर की खेती और शराब का उत्पादन) आज के जोर्जिया में शुरू होकर वहाँ से दक्षिण की तरफ़ पहुँची होगी. यह किताब प्रिंसटन यूनिवर्सिटी प्रेस से साल २००३ में छपी थी.

दूसरा भाग यहीं समाप्त होता है.. इतिश्री रेवाखंडे द्वितीयोध्याय समाप्तः...

अगली पोस्ट में ज़ारी...

शुक्रवार, 30 मई 2008

तुझे सोमरस कहूं या शराब? (भाग-१)

ऋगवैदिक कालीन साहित्य में सोमरस का उल्लेख आता है. कुछ विद्वान इसे सुरा या शराब समझते हैं. हालांकि आज तक यह साबित नहीं हो पाया है कि सोमरस शराब था या नहीं. यह बात और है कतिपय लोगों ने इसे बनाने की विधि और रहस्य जान लेने का समय-समय पर दावा किया है. कहते हैं कि इसे सोमलता की पत्तियों से तैयार किया जाता था जिसमें विशेष प्रकार का आटा तथा चूर्ण मिलाया जाता था और इसका स्वाद मीठा होता था लेकिन नशा नहीँ होता था. यज्ञकर्म में देवताओं को यह प्रस्तुत किया जाता था. कहा जा सकता है कि यह एक उच्चकोटि की वाइन थी.

एक पोस्ट भंग का रंग जमा लो चकाचक में मैंने शिवजी की बूटी भांग की महिमा गाई थी. क्या भांग ही सोम रस है? ---नामक लेख में भाई अभय तिवारी ने उस सिल पर निर्मल-आनंद घोंटते हुए सोमरस का उद्गम ढूँढने की कोशिश की थी. वह कुछ-कुछ थाह ले पाये थे. सच कहूं तो उनका लेख पढ़ कर मुझमे गज़ब उत्साह पैदा हुआ. सहयोगी गोताखोर की हैसियत से मैंने भी लंगोट कस कर सोमरस के अथाह सागर में डुबकी लगाई और जो हाथ लगा है, आपके प्यालों में उंडेल रहा हूँ. 'सोमरसभांड' ज़रा बड़ा हो गया है. एक-दो दौर में ख़त्म होगा. लीजिये, नोश फरमाइये-

... सो मुर्गीखेत में जो कथा सनके दिक् मुनि ने मुझसे कही थी वह अब मैं आप श्रवणों से कहता हूँ....

'अगर उचित तरीके से ली जाए तो बढ़िया शराब एक बहुपरिचित जीव है'- विलियम सेक्सपियर.

ओल्ड टेस्टामेंट में भी वाइन का ज़िक्र कई जगह आया है. लेकिन इसे बनाने के प्रथम प्रमाण मध्य-पूर्व एशिया में मिले है.

भारतवर्ष में वैदिक सभ्यता ईसा से ३००० से २००० वर्ष पहले मानी जाती है. इसमें सोम देवता था. सोम को 'द्रव आनंद' (लिक्विड प्लेजर) का देवता माना गया है. ऋगवेद में एक स्थान पर कहा गया है- 'यह सोम है जो शराब बहाता है, जो स्फूर्ति एवं शक्तिदायक है. सोम अंधों को दीदावर बना देता है तथा लंगडों को दौड़ा देता है.'
यहाँ ईश्वर की प्रशस्ति में कहा गया गोस्वामी तुलसीदास का एक दोहा याद आता है-

'मूक होंहिं वाचाल, पंगु चढें गिरिवर गहन,
जासु कृपा सो दयाल, द्रवहुं सकल कलिमल दहन.'

चरक संहिता में सोमरस को अनिद्रा, शोक, सदमा एवं थकान की दवा बताया गया है. चरक संहिता भारत में मौर्यकाल के दौरान लिखी गयी थी. यह लगभग ३०० वर्ष ईसा पूर्व का काल था. चरक का मतलब होता है घुमंतू विद्वान या घुमंतू चिकित्सक. इस संहिता में आठ खंड तथा १२० अध्याय हैं.

भारत के पहले ज्ञात सर्जन सुश्रुत ने सोमरस को एनेस्थीशिया के तौर पर इस्तेमाल करने की सलाह दी है. वहीं चरक भी कहते हैं कि शल्यक्रिया (ऑपरेशन) से पहले मरीज को इच्छानुसार भोजन तथा सोमरस पीने को दिया जाए ताकि वह नश्तर की धार का अनुभव न कर सके और शल्यक्रिया के दौरान बेहोश न होने पाये. चरक ने यह भी कहा है कि सोमरस के पान से भूख, पाचन क्रिया और आनंद में वृद्धि होती है. यह शरीर के प्राकृतिक द्रवों का प्रवाह सुचारू करता है नतीजतन शरीर हमेशा स्वस्थ रहता है. समझा जा सकता है कि ऋगवैदिक काल से लेकर मौर्य काल तक वाइन को सोमरस ही कहा जाता था.

तंत्र एवं शास्त्रों में सोमरस को ईश्वर की मदिरा कहा गया है. प्राचीन चिकित्सक इसे अमृत कहते थे. दिलचस्प बात यह है कि सोमरस और बकरी के दूध को टीबी के इलाज के लिए उपयोग में लाने की सलाह दी जाती थी. पश्चिम के जाने माने विद्वान एमडी गाउल्डर ने वर्ष १९९६ में बताया था कि ईसाई धर्मग्रन्थ 'बांकेल' बयान करती है-
'सोमरस येहोवा की उपाधि थी जिसका मतलब है- प्राचीन युद्ध देवता. वह अपने देवदूत के पंखों वाले सिंहासन पर बैठा था.' इसका अर्थ यह हुआ कि सोमरस शब्द हमें 'जेंद अवेस्तां' ग्रन्थ में तलाशना चाहिए. उससे और स्पष्ट हो जायेगा कि आर्य इसे सोमरस ही क्यों कहते थे?...

पहला भाग यहीं समाप्त होता है.. इतिश्री रेवाखंडे प्रथमोअध्याय समाप्तः...

अपनी पीठ इन्द्रपीठ- यह लेख 'दैनिक भास्कर' की रविवारीय पत्रिका 'रसरंग' में गुजिश्ता २५ मई, २००८ को पंजाब, हरियाणा और पता नहीं कहाँ-कहाँ के संस्करणों में कवर स्टोरी बन कर रोशनी में आ चुका है. सैकड़ों फोन इस आशय के आ चुके हैं कि मैं उन्हें सोमरस बनाने की विधि बता दूँ. मेरा जवाब है लागत लगाओ, बता देंगे. लेकिन कोई खर्चा देने को तैयार नहीं है इसलिए घर में ही महुए का सोमरस बनाना पड़ रहा है.

अब पल्ला झाड़नेवाली सूचना:- यह लेख ब्लॉगकालीन सोमरस की हांडी चढाए रहने के चार घटी, तीन पल बाद ३० अक्षांश, १८३ देशांतर में लिखा गया है. विद्वज्जनों को अगर कोई गफलत पकड़ में आए तो यह मेरी नहीं, सोमरस की जिम्मेदारी मानी जाए.

सत्यकथा:- बीड़ी बीवी ने छिपा दी है उसे ढूँढना वैदिककालीन ऋषि को अतिआवश्यक जान पड़ रहा है...

अब अगले भाग का इंतज़ार करें. इन्द्र का बहुत आवाहन किया लेकिन वह नहीं आया. थक-हार कर ख़ुद ही इन्द्र बनना पड़ा. टूटी खाट में पड़े रहकर ब्लोगिंग नहीं हो पा रही है...

गुरुवार, 29 मई 2008

अंगरेजी का खतरनाक अंडरवर्ल्ड (अन्तिम)

पिछली पोस्ट में आपने पढ़ा कि यह बात सही है कि आप भाषा किसी पर थोप नहीं सकते पर राष्ट्रीय भावना के विकास के सहारे राष्ट्रीय भाषा का विचार धीरे-धीरे अपनी जगह ले सकता है। लेकिन विज्ञान और तकनीक की विचारधारा पर जब तक संप्रभु वर्ग का नियंत्रण बना रहेगा तब तक अंगरेजी को भारतीय भाषायें पदच्युत नहीं कर सकतीं। अब आगे....

स्थितियां यह हैं कि भारतीय भाषाएं वैज्ञानिक और तकनीकी संस्कृति के विकास में योगदान नहीं कर पा रही हैं. इससे उनका हाशिये पर चला जाना आश्चर्य की बात नहीं. विशेषज्ञता, विविधता और महत्वपूर्ण होने के बावजूद भारतीय भाषाओं के विद्वानों ने मिल कर काम करने की सीख अब तक नहीं ली. इसीलिए उनकी भाषाओं में अंगरेजी के मुकाबले बुनियादी परिवर्त्तन नहीं हो सका है. भाषा और सत्ता के संबंधों में मौजूदा पैटर्न नहीं बदला जा सका. अंगरेजी की दबंग प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने में भारतीय बुद्धिजीवी नाकामयाब रहे हैं और गाहे-बगाहे अंगरेजी बुद्धिजीवियों की जमात में शामिल होकर दण्डवत मुद्रा में आ जाते हैं.

यहाँ मैं अपने गिरेबान में झांकने का प्रसंग शुरू कर रहा हूँ.
उच्च शिक्षा के लिए हमारे पास वैकल्पिक भाषा या भाषाएं क्या हैं? क्या आईआईटी, आईआईएम्, एमबीए, चिकित्सा या क़ानून की उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रमों के लिए आधुनिक भारतीय भाषाओं में ज्ञान के शास्त्र लिखे जा रहे हैं, या मौजूद हैं?

सत्ता की भाषा की राजनीति इतनी सूक्ष्म होती है कि अंग्रेजों को हमने दैहिक तौर पर तो भगा दिया लेकिन अंगरेजी को मानसिक तौर पर नहीं हटा पाये. वह दैत्य बनकर हमसे अपना काम करवा रही है. जिसे हम आजादी के बाद पनचक्की समझते थे, वह सचमुच का राक्षस निकला. तुर्की और इजरायल जैसे देशों से हमने कोई सबक हासिल नहीं किया. आज हालत यह है कि अंगरेजी के लिए भारतीय जनता जाने-अनजाने अपनी ही भाषाओं का कत्लेआम मचाये हुए है.


जो लोग बार-बार कहते हैं कि वे अंगरेजी के विरोधी नहीं हैं, समस्या की जड़ वही हैं. उन्हें अंगरेजी आती है और वे अंग्रेजियत का चरम लाभ इस व्यवस्था से उठा रहे हैं. ऐसे में वे अंगरेजी का विरोध क्यों करेंगे? वे अंगरेजी के विरोधी हुए बिना हिन्दी को उरूज पर लाना चाहते हैं! कितने भोले लोग हैं ये! इन्हीं लोगों की वजह से अंगरेजी सिंहासन पर चढ़ती गयी और हिन्दी पददलित होती चली गयी. दूसरी भाषाओं की स्थिति अंगरेजी के बरक्श हिन्दी से कहीं बेहतर है क्योंकि वे यह कभी नहीं कहते कि वे अंगरेजी के विरोधी नहीं है.


अंगरेजी का विरोध जड़ से ही न होने के कारण आज़ादी के ६० सालों में करोड़ों लोग भारतीय भाषाएं नहीं, अंगरेजी सीख गए हैं. ऐसे माहौल में कैसी फसल उग रही है, यह सब देख रहे हैं. इसकी वजह यह है कि भाषा की संरचना समाज संरचना में परजीवीपन, जटिलता और विकृत रुचियाँ विकसित करती जाती है. नतीजतन विज्ञान और तकनीक, शिक्षा तथा भाषा योजना में उन्हीं का बर्चस्व बढ़ता जाता है जिनकी मुखालफत में हम अभियान चला रहे होते हैं.


ज्यादा विकट स्थितियां शोध के क्षेत्र में है. सारे शोध अंगरेजी में हो रहे हैं. ऐसे में कोई शोध भारतीय भाषाओं से तादात्म्य स्थापित नहीं कर पाता. भाषाई साजिश के तहत भारतीयों के मन में यह बात भर दी गयी है कि वैज्ञानिक शोध और वैज्ञानिक शिक्षा सिर्फ़ और सिर्फ़ अंगरेजी में ही सम्भव है. इसमें सबसे बड़ा खेल सत्ता-संस्थानों, पूँजी के तांडव और राज्य की उदासीनता का है. भारतीय भाषाओं में शोध के लिए न तो पूँजी उपलब्ध है न ही राज्य का प्रोत्साहन, और सत्ता चूंकि अंगरेजी संस्कृति के लोग चलाते है, इसलिए वे सहयोग करने के बजाये अवरोधी कारक बने रहते हैं.


इस पसमंजर में 'भारतीय ज्ञान आयोग' ने पिछले दिनों खतरनाक सिफारिशें की हैं. इनमें सबसे ज़्यादा घातक वह सिफारिश है जिसमें भारतीय स्कूलों में पहली कक्षा से ही अंगरेजी पढ़ाने की बात ज़ोर देकर कही गयी है. यह कदम भारत को वैश्वीकरण के इस दौर में प्रतिष्ठित करने के लिए जरूरी बताया जा रहा है. लेकिन ज़रा कल्पना कीजिये कि अंगरेजी संस्कारों वाली वह भारतीय नस्ल इस देश को विश्व में महान भारतवर्ष के तौर पर प्रतिष्ठित करेगी या पश्चिम और अमेरिका के पिछलग्गू के रूप में?

अंगरेजी की वासना आज इतनी प्रचंड है कि छोटे-छोटे गाँवों तक में टपरे बाँध कर अधकचरे कॉन्वेंट स्कूल खोले जा रहे हैं. मैं अपने अनुभव से बताता हूँ. मेरी आयु अभी ३८ वर्ष है. हमारे बचपन में सरकारी प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों में हिन्दी शिक्षा का डंका बजता था. देखते-देखते निजी स्कूल खुले जिनमें पढ़ाई का माध्यम तो हिन्दी ही रहा लेकिन शिक्षा का स्तर गिरता चला गया. अब टपरा छाप कॉन्वेंट स्कूल जम कर पैसा वसूल रहे हैं लेकिन गाँव वाले इस उम्मीद में अपने बच्चों को निजी स्कूलों से निकाल कर इन कोन्वेंटों में दाखिल करा रहे हैं कि इन्हीं में पढ़ने से उनके बच्चों को नौकरी मिल सकती है.

अगर आप चाहते हैं कि यह स्थिति बदले तो बाज़ार की शक्तियों से टकराना होगा. अंगरेजी के बाज़ार से लड़े बिना अगर आप भारतीय भाषाओं को प्रतिष्ठा दिलाना चाहते हैं तो वह दिवास्वप्न ही साबित होगा. भारतीय भाषाओं के पक्ष में युद्ध छेड़ने वालों के रवैये से स्पष्ट होता है कि अंगरेजी बाज़ार की भाषा बनी रहे तथा हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाएं अस्मिता की भाषा के रूप में प्रतिष्टित हों. विचार करने की बात है कि अगर अंगरेजी बाज़ार और अच्छे रोज़गार (ऊंची नौकरी और बड़े कारोबार) की भाषा बनी रहती है तो आप समाज के लोगों पर कैसे दबाव डालेंगे कि वे अपने बच्चों को मातृभाषा (हिन्दी, मराठी, बांगला, तमिल, तेलुगु, कन्नड़ आदि) में शिक्षा दिलाएं?

आख़िर में यही कहूंगा कि जो लोग इस बात से भयातुर हैं कि जल में रह कर मगरमच्छ से बैर कौन करे तो उनको समझ लेना चाहिए कि मगरमच्छ विदेशी है और जल हमारी मातृभाषा का है. अंग्रेजों से आजीवन भाषाई संग्राम छेड़ने वाले भारतेंदु हरिश्चन्द्र की यह सीख हमेशा याद रखिये-

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल
बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटै न हिय को सूल.

बुधवार, 28 मई 2008

अँगरेजी का अंडरवर्ल्ड

भारतीय भाषाओं की एक विराट दुनिया है। संविधान की आठवीं अनुसूची में २२ भाषाओं को मान्यता दी जा चुकी है लेकिन भारत में १००० से ज्यादा भाषाएं एवं बोलियाँ अस्तित्व में हैं।
शोषकों की भाषा अंगरेजी भारतीय भाषाओं को वहाँ ले जाकर मारती है जहाँ पानी न मिले। आप विश्वबैंक या अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की भाषा देखिये. किसी भी विकासशील देश को क़र्ज़ इस अंदाज में देते हैं जैसे दान दे रहे हों. हमारे समाचार-पत्र उस भाषा को ही छापते हैं जो इन दैत्यनुमा वित्तीय संस्थानों से उन्हें मुहैया कराई जाती है. क्रेडिट कार्ड कंपनियों की भाषा और शर्तें तो कोई वित्त-विशेषज्ञ ही समझ सकता है. इनकी भाषाई चालें साहूकारों को भी शर्मिन्दा करती हैं. साहूकार की तो बहुत क्रोध आने पर आप लाठी मार कर हत्या कर सकते थे, लेकिन क्रेडिट कार्ड के निजाम में तो आप सिर्फ आत्महत्या कर सकते हैं.



आँकड़े बताते हैं कि विश्व में हर वर्ष औसतन एक भाषा मृतप्राय हो जाती है। और जब कम्यूटर तकनीक का हमला अपने उफान पर है तब भारतीय भाषाओं का क्षरण तीव्रतर हो रहा है। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि महानगरीय क्षेत्रों में जो कम्प्यूटर कार्यशालाएं चलती हैं उन्हें ज़िला, तहसील तथा गाँव स्तर तक लाया जाए। इन कार्यशालाओं के दौरान क्षेत्रीय भाषाओं में डेमो दिखाए जाएं और इन्हें संचालित करने के लिए क्षेत्रीय स्तर पर ही स्वयंसेवक तैयार किए जाएं. साथ ही सस्ते में कम्प्यूटर मुहैया कराये जाएं और इनका प्रशिक्षण भी मुफ्त हो.

इस दिशा में व्यक्तिगत स्तर पर काम हो रहा है। मैंने पिछले दिनों बैंगलौर में हुई एक ऐसी ही कार्यशाला की रपट पढ़ी थी. यहाँ साइंस एज्यूकेशन' के नागार्जुन जी। ने बताया कि वह माइक्रोसोफ्ट जैसी विदेशी कंपनियों की मिल्कियत वाले फोंटों के मुकाबले वैकल्पिक, निःशुल्क तथा स्वतन्त्र आधार पर देवनागरी फॉण्ट विकसित कर रहे हैं. एम्. अरुण नमक सज्जन एक सम्पूर्ण मलयालम आधारित संचालन-प्रणाली विकसित करने में जुटे हैं; जो जीएनयू लिनक्स के वितरण पर काम करती है, इसे नॉपिक्स के नाम से जाना जाता है.

भारतीय फोंटों पर लगभग डेढ़ दशकों से काम चल रहा है। इनमें देवनागरी के अलावा कन्नड़, तमिल, मलयालम और तेलुगु भाषाओं के फॉण्ट शामिल हैं। लेकिन ये प्रयास व्यक्तिगत हैं और बेहद नाकाफी हैं. वैश्वीकरण के इस दौर में अफ्रीका और एशिया की भाषाओं को अंगरेजी नाना प्रकार के तकनीकी अवतार लेकर नेस्तनाबूद करने में जुटी है. ऐसे में भारतीय भाषाओं के फॉण्ट न तो वह विकसित होने देगी न ही भारत में किसी शोध को समर्थन देगी. यहाँ तक कि आज जर्मन और फ्रांसीसी भी अंगरेजी से भयाक्रांत है. जिन भाषाओं की मौखिक परम्परा है, लिपि नहीं है, उनका इस सदी के अंत तक नामोनिशान बच पाना मुश्किल है. अंगरेजी चाहती है कि पूरे विश्व में ५० से ज्यादा भाषाओं का अस्तित्व नज़र ही आना नहीं चाहिए.

भारतीय भाषाओं के परिप्रेक्ष्य में मूल समस्याओं और संकट को समझने के लिए अंगरेजी के अंडरवर्ल्ड को समझना जरूरी है। भारतीय भाषाओं के खलनायक वही हैं जो समाज के अन्य क्षेत्रों में होते हैं। समाज के दबंग, बाहुबली, आर्थिक संसाधनों पर कब्जा जमाये बैठे लोग ही भाषा का भविष्य तय करते हैं। इन्हें हम इलीट (संप्रभु) तबका कहते हैं. भाषाशास्त्री या भाषाओं से जुड़े अन्य लोग सिर्फ सुझाव दे सकते हैं. भाषाई नीति बनाने और उसे अमल में लाने की हैसियत इनकी नहीं होती. ऐसे में यह और महत्वपूर्ण हो जाता है कि वृहत्तर भारतीय समाज में भाषाओं की अवस्था पर हम 'क्रिटिकल पर्सपेक्टिव' रखें.

भारतीय भाषाओं का भविष्य उज्जवल बनाने के लिए मैं डॉक्टर राम मनोहर लोहिया के फार्मूले पर सहमत हूँ। शिक्षा, अदालती कामकाज, विधानसभा और स्थानीय निकायों की भाषा क्षेत्रीय भाषा में हो तथा राष्ट्रीय स्तर का कामकाज हिन्दी में। लेकिन दुःख की बात है कि ऐसा आज़ादी के ६० वर्षों बाद भी मुमकिन नहीं हो सका है.

चक्रवर्ती राजगोपालाचारी (कांग्रेस) ने तमिलनाडु में हिन्दी चलाने की कोशिश की, उनके बाद कामराज ने भी, तो वहाँ अन्नादुरै हिन्दी के विरोध के दम पर द्रविड़ मुनेत्र कझगम ले आए। नतीजा ये है कि दक्षिण भारत में जो स्थान हिन्दी को मिलना था उस पर एक विदेशी भाषा अंगरेजी विराजमान है।

यह बात सही है कि आप भाषा किसी पर थोप नहीं सकते लेकिन राष्ट्रीय भावना के विकास के सहारे राष्ट्रीय भाषा का विचार धीरे-धीरे अपनी जगह ले सकता है। लेकिन विज्ञान और तकनीक की विचारधारा पर जब तक संप्रभु वर्ग का नियंत्रण बना रहेगा तब तक अंगरेजी को भारतीय भाषायें पदच्युत नहीं कर सकतीं।

शेष अगली पोस्ट में जारी ...

सोमवार, 26 मई 2008

India’s language challenge (भारत की भाषाई चुनौती) -2

(श्री राहुल देव के लेख का दूसरा और अन्तिम भाग)
पहले भाग में आपने पढ़ा...
...Ask any Bihari student of Delhi University. She/he may be infinitely more, or equally at least, intelligent, hardworking and ambitious but she faces a daily disadvantage if she has had a largely Hindi education. There are no good books on major subjects in ‘national language’ Hindi, classroom lectures and notes are all in English – both making comprehension difficult.
अब आगे...

It also gives them a complex। It creates barriers to social mixing, marking out the ‘bhaiyas’ and ‘behenjis’ from the ‘cool’ metro crowd. Some of these students from the great Indian language hinterland do surmount all social, educational and psychological hurdles and succeed through sheer grit and hunger for success. Please do read Shekhar Gupta about his theory and his pride on these HMTs (Hindi Medium Types). Not all, alas, are thus gifted with grit or luck.

Close your eyes, visualise the size and immensity of this country, its land, its people, its languages, its regional cultures। Think of bright, talented children taking birth all over this land, from the remote ramshackle hut to the swank metro heavens. Will all of them get the same nurturing environment, education and opportunity to realise their full potential? No. Those luck enough to receive English education will corner a hugely disproportionate share of the big opportunities. Those growing up and learning through their own languages will have to be content with second and third rate jobs, careers, businesses and opportunities.

The options are only two। One, make English the first medium of education from nursery. Let every Indian, present and future, share the same linguistic prowess and conquer the world. Two, make every child study through her/her own mother tongue or local language upto class ten, with very strong English learning alongside. Then let them choose the language after this level according to their aptitudes, needs, choice and abilities.

These children will have higher comprehension, better grasp of subjects, knowledge closer to their local cultures। They will be more rooted in their socio-cultural milieu, more in touch with their heritage and more self-confident of their Indian identity than the present products of exclusively English medium educational institutions – Indians by birth, western (largely American) by lifestyle, language, aspirations, value systems and dreams.

I recently saw a long letter a friend of my daughter had sent her। It was handwritten and touchingly affectionate। The language was Hindi. The script roman. Just as I was ruminating over the meaning and the implications of it, I chanced upon a very perceptive article by Ajit Balakrishnan, founder and CEO of rediff.com. it shocked the daylights out of me. Trust a tech visionary and an entrepreneur to see the future, at least its trends. Ajit is wondering whether the next decades will see millions of young Indians growing up using the universal English QUERTY type keyboards in computers and mobile phones for all essential written communication writing Hindi, Bangla, Marathi, Tamil etc in the roman script. Will we have poetry, short stories, novels, text books, newspapers, magazines, websites in all Indian languages in the roman script?


Think। Think of the implications for our languages, our sense of being Indians, our cultures, our literatures, our cultural text resources, the scriptures, and above all, our different scripts. Will our languages become ‘bolies’, only to be spoken in social discourse, in entertainment, in songs and Indipop, while English becomes the sole language of knowledge, growth, prosperity, power, prestige, business, science and governance.

I cannot speak for other languages, but about my beloved Hindi I make a prediction। Within the next 25 years it will become the language of the poor, the backward-the drivers, servants, the subziwallas. I hope I am wrong.

-Rahul Dev

रविवार, 25 मई 2008

India’s language challenge (भारत की भाषाई चुनौती)

'महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी' तथा 'सम्यक न्यास' के तत्वावधान में आयोजित 'भारतीय भाषाएं और उनका भविष्य' विषय पर मुम्बई में २४ मई २००८ को एक संगोष्ठी हुई। विभिन्न भाषाओं के अधिकारी विद्वान् इस अवसर पर उपस्थित थे. यहीं 'सम्यक न्यास' के कर्ता-धर्ता तथा प्रिंट व इलेक्ट्रोनिक मीडिया की जानी-मानी सख्शियत राहुल देव से लंबे समय बाद मेरी भेंट हुई।


जून, २००७ में उन्होंने 'सम्यक भारत' नामक एक ब्लॉग शुरू किया था। उसमें भारत की भाषा समस्या पर उन्होंने कुछ महत्वपूर्ण लेख लिखे थे। बाद में राहुलजी अन्य कामों में मशरूफ हो गए और ब्लॉग नियमित न चल सका। बहरहाल, मैंने उनसे उनके भाषा समस्या पर लिखे लेखों को अपने ब्लॉग में उपयोग करने की इजाज़त मांगी, जो उन्होंने स्नेहवश मुझे दे दी. मैं इस लेख को दो कड़ियों में ज्यों का त्यों प्रस्तुत कर रहा हूँ। लेख अंगरेजी में है; उम्मीद है पाठकगण इसे अन्यथा न लेंगे।

(पहला भाग)
The issue of language is in much currency of late in India, as indeed it is in many parts of the world which are opening to globalisation. Not just any language, but the language that will take India forward, enable it to face and conquer the world in this great age of global and globalising technologies, markets, corporations, economies, services, knowledge, talent and opportunity. And the great chorus rises up, reverberating throughout the English media and its captive consuming class – it is English.It is one sure currency the rising, shining India has that will smoothen the way of her onward march to becoming a world power. It is the key to growth, to the realisation of the dreams of the suddenly globally ambitious Indian middle class.

Apart from the much feted and now feared Indian brain power, it is the educated Indian’s facility with and easy mastery of English that everyone agrees is the critical important strategic advantage India has over many other developing countries, particularly China.

Therefore, as every parent who can earn or borrow enough scrambles to send her children to an English medium school, as ‘Saint Vivekananda Public School’ and its like sprout faster than paan-shops on crowded roads, dirty lanes and in every mohalla worth its salt throughout the length and breadth of the country, as English-speaking training centres and language institutes and courses and products flood the booming vocational education and career market, increasingly shrill and strong voices ring out – make English India’s national language, promote it with all your might, let every child and her parent have access to English education at the earliest possible age, unleash her talent and thus let us all achieve our individual and national nirvana। Through English.

Anyone who dares do otherwise beware. You will be criticized, hounded, and worst of all, ridiculed. See what happened to the poor Karnataka Education Minister. He took action against some 2000 schools that were using English as the medium of instruction when they had obtained permissions to run them on the promise of having Kannada as the medium.

The entire English media went after him as if he had committed treason, questioning his and his government’s wisdom, ridiculing him and all those who would still in this day be stupid enough to promote Indian languages over English, calling them jingoistic, medieval minded morons blind to the benefits of English for a globalising India. They were simply jeopardizing the future of the children of these schools. How could anyone in his senses deny them basic education in English?
The pressure and ridicule brought to bear on the Karnataka government was so much that it had to reverse its decision. Why, even the West Bengal government has had to swallow its high cultural affectations and forced to have English as a medium of instruction in basic education instead of Bangla.Now don’t get me wrong. I am not against teaching English in primary schools. I am not against the language.


I am a student of English literature myself and have spent close to a decade as an English journalist. I am fully aware of the benefits of proficiency in English in a country where speaking English well and using all the mannerisms, behaviors, mores, attitudes, knowledge and access that come automatically with it give an instant comparative advantage to any individual and group. I am also aware of the comparative advantage it gives the country as a whole in all walks of life globally.


It makes me proud that some of our companies are teaching English to the Chinese and Indian teachers are teaching English in England as well as the US. The continuing string of global literary successes Indian or Indian-origin writers is a matter of justifiable pride for every Indian. The almost daily headlines of Indian companies listing on the New York Stock Exchange and the NASDAQ, taking over companies almost all over the developed world looking to win global markets and more and more Indians featuring on the lists of the rich and powerful and glamorous, and more and more Indian thinkers, academicians, scientists receiving global recognition and rewards – these are all very heartening developments.

The problem, briefly stated, is this English is further dividing this. country- socially, culturally, educationally, politically and economically. While growing numbers of English-educated young Indians get better access to knowledge, opportunities and skills important for success, it is denying these very things to over 90 % of Indians who know only their own languages. It is not English per se that is doing it. It is its status and social perceptions attached with it that are the problem. It is the exclusive and exclusivist, almost proprietary relationship English has increasingly acquired with power, access, knowledge, skills and social prestige in governance, business, academics and the professions that is the problem.

Talent, of all varieties, is born evenly distributed, knowing no boundaries of region, class, caste, economic status or language. How it blossoms, however, depends on the environment and nurturing and opportunity it receives. While it makes me happy to see English-educated urban children, including my own, marching ahead in all fields with the unbounded confidence that comes when talent and aspirations meet opportunity and enabling environment, it breaks my heart to see the terrible social disadvantage, inferiority complex, plain discrimination and not-so-subtle disdain non-English speakers suffer in their own country.

Ask any Bihari student of Delhi University. She/he may be infinitely more, or equally at least, intelligent, hardworking and ambitious but she faces a daily disadvantage if she has had a largely Hindi education. There are no good books on major subjects in ‘national language’ Hindi, classroom lectures and notes are all in English – both making comprehension difficult.

continued....
-Rahul Dev

शनिवार, 24 मई 2008

भारतीय भाषाओं का भविष्य: मुम्बई में एक गोष्ठी

कल शाम चर्चगेट के सामने स्थित इंडियन मर्चेंट्स चेंबर के दूसरे माले पर एक सभागृह में 'भारतीय भाषाओं के भविष्य' पर चर्चा हुई। यह आयोजन 'महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी' तथा 'सम्यक न्यास' के तत्वावधान में हुआ. समारोह की अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार तथा 'महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी' के अध्यक्ष नन्दकिशोर नौटियाल ने की. 'सम्यक न्यास' के कर्ताधर्ता राहुल देव प्रमुख अतिथि वक्ताओं में से थे.


पेंसिलवेनिया विश्वविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष रह चुके सुरेन्द्र गंभीर इस अवसर पर विशेष तौर पर अमेरिका से आए थे। उनके साथ स्वित्ज़रलैंड से आए एक विद्वान भी मौजूद थे जो अपने देश में हिन्दी के लिए काम करते हैं. फिल्मकार महेश भट्ट भी थोड़े समय के लिए आए और अपनी बात रखकर चले गए. महेश भट्ट ने अपने उदबोधन में कहा- 'भारतीय भाषाओं पर संकट इसलिए गहरा गया है कि अब हमारे अन्दर भाषाई अस्मिता की भावना उतनी तीव्र नहीं रह गयी है. हमसे कहा जाता है कि अपनी भाषा और संस्कृति गिरवी रख दो, इसके बदले आकर्षक पैकेज दिया जाता है. भट्ट के अनुसार गुलामी का यह नया चेहरा है जो हमें लुभावने प्रस्तावों के जरिये प्रस्तुत किया जाता है, इससे सावधान रहने की जरूरत है'.


सुरेन्द्र गंभीर का कहना था कि भारत के अलावा अन्य किसी भी विकासशील देश ने अपनी भाषा की कीमत पर विकास का रास्ता नहीं चुना। यहाँ अंगरेजी का बर्चस्व है. उन्होंने नीदरलैंड्स का हवाला देते हुए कहा कि डच लोग बेहतरीन अंगरेजी जानते हैं लेकिन घरेलू व्यवहार में अंगरेजी का प्रयोग कभी नहीं करते. भारत में हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं की दुर्दशा देखकर हैरानी होती है.


अकादमी के सदस्य सचिव और 'नवभारत टाइम्स' के वरिष्ठ संवाददाता अनुराग त्रिपाठी विषय प्रवर्त्तन कर रहे थे। कई बार चर्चा पटरी से उतरी तो राहुल देव ने बीच-बीच में अपनी बात रख कर उसे फिर सही जगह ला खड़ा किया. राहुल देव ने महेश भट्ट से आग्रह किया कि वे हिन्दी की रोटी खाने वाले शाहरुख खान जैसे उन फ़िल्म अभिनेताओं तक संदेश पंहुचाएं जो मीडिया में मुंह खोलते ही अंगरेजी झाड़ने लगते हैं.


इस चर्चा में मलयालमभाषी लेखक के. राजेंद्रन, बांग्ला का प्रतिनिधित्व कर रहे कवि-पत्रकार आलोक भट्टाचार्य, गुजराती के हेमराज शाह (अध्यक्ष, महाराष्ट्र राज्य गुजराती साहित्य अकादमी) , उर्दू के सत्तार साहब (अध्यक्ष, महाराष्ट्र राज्य उर्दू साहित्य अकादमी), मराठी के प्रकाश जोशी (टाइम्स ऑफ़ इंडिया) ने अपनी बात रखी. प्रकाश जोशी का कहना था कि महाराष्ट्र सरकार ने महाराष्ट्र की प्राथमिक पाठशालाओं में पहली कक्षा से ही मराठी के साथ-साथ अंगरेजी पढ़ाना अनिवार्य कर दिया है लेकिन किसी समाचार पत्र ने यह बात सामने नहीं रखी.


आलोक भट्टाचार्य ने कहा कि बांग्ला, तेलुगु, तमिल, कन्नड़ को अंगरेजी से कोई संकट नहीं है, यह सारा संकट हिन्दी को है। इसकी वजह यह है कि हिन्दी के अलावा सभी भारतीय भाषाओं के लोग अपनी भाषा से बेहद लगाव रखते हैं जबकि हिन्दी भाषी हिन्दी की राजनीति में उलझे रहते हैं. उन्होंने कहा कि हर बांग्लाभाषी बांग्ला के लिए अपना तन-मन-धन न्यौछावर कर सकता है लेकिन हिन्दी भाषी सिर्फ लफ्फाजी कर सकता है.


उर्दू के सत्तार साहब ने कहा कि जिस भाषा में रोजगार मिलेगा आदमी वही भाषा सीखने की कोशिश करेगा। उन्होंने कहा कि उनका अंगरेजी से विरोध नहीं है लेकिन यह ख़याल रहे कि अपनी शिनाख्त न मिट जाए. हेमराज शाह ने अपने अनुभव बाँटते हुए बताया कि मुम्बई के गुजराती समाज में यह बात पहुंचा दी गयी है कि हर परिवार कम से कम गुजराती का एक अखबार जरूर खरीदेगा, घर में सिर्फ गुजराती बोलेगा और जब भी कोई आयोजन होगा तो गुजराती की स्थिति की समीक्षा अवश्य की जायेगी.


चर्चा में वरिष्ठ पत्रकार गोपाल शर्मा, दीपक पाचापोर (बालको, मार्केटिंग विभाग), डॉ. सोहन शर्मा (लेखक एवं वामपंथी विचारक), वरिष्ठ साहित्यकार नन्दलाल पाठक, शायर राकेश शर्मा, जागरण के ब्यूरोप्रमुख ओमप्रकाश तिवारी, शायर सिराज मिर्जा, संजीव शर्मा ने भाग लिया. इस मौके पर मैंने जो बात रखी उसे किसी पोस्ट में प्रकाशित करूंगा.


वक्ताओं के अलावा न्यू जर्सी से आयीं हिन्दी सेवी देवी नागरानी, कथाकार संतोष श्रीवास्तव, प्रमिला श्रीवास्तव, उद्योगपति भट्टड़ जी, रामनारायण सोमानी, शायर राकेश शर्मा आदि मौजूद थे। आभार एसएनडीटी महिला विश्वविद्यालय की हिन्दी विभागाध्यक्ष रह चुकीं डॉक्टर माधुरी छेड़ा ने प्रदर्शित किया. मुम्बई विश्वविद्यालय के पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉक्टर रामजी तिवारी ने आख़िर में इस गोष्ठी का सार-रूप प्रस्तुत किया.


अपने अध्यक्षीय भाषण के बाद नौटियाल जी ने घोषणा की कि अक्टूबर ३,४,५ को सर्व भारतीय भाषा संगम आयोजित करने का संकल्प 'महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी' ने लिया है. सब पधारें!

बुधवार, 21 मई 2008

ब्लॉग आईपीएल: बेनामी वर्सेज सुनामी

हिन्दी ब्लॉग जगत में कुछ लोग बहस फंसाये रहते हैं। भाषा, वर्ण, लिंग, जाति आदि आजकल के लोकप्रिय विषय हैं. आगे चल कर इनका स्वरूप क्या होगा कह नहीं सकते. पर इतना तय है कि हरि अनंत हरिकथा अनंता की तर्ज पर ब्लॉग जगत के संत इसे अपनी-अपनी तरह से अपनी-अपनी स्टाइल में कहते-सुनते रहेंगे. जय हो!


...तो हुआ ये कि एक ब्लॉग ने भाषा की अशुद्धता पर बहस छेड़ दी। अब बहस छिड़ी तो टिप्पणियों का दौर दौरा शुरू हुआ. कुछ शीरीं जबान में तो कुछ कुल्हड़कट भाषा में. और एग्रीगेटरों का पोस्ट दिखाना था कि ठपाक से टिप्पणी आ गयी-


रामचंद्र डेविड ने कहा- बोले तो, तुम अपना पोस्टिंग में जो बी फरमायेला है। पण अपुन को बरोबर जमेला नहीं है. तुम बोलता है लैंग्वेज प्योर होना मांगता, पण अपुन का लैग्वेज जितना मांगता है उतना प्योर नहीं है. तो क्या अपुन पोस्टिंग नईं करने का?


टिप्पणी पढ़कर बहस छेड़ने वाले अर्द्धसत्य त्रिपाठी ने यथासंभव शालीनता से जवाब सरकाया- बन्धु, पोस्टिंग नहीं, चिट्ठी लिखिए और यह लिखने में कठिनाई हो तो पोस्ट लिखिए पोस्टिंग नहीं। ॥और यहाँ विचार-विमर्श भाषा पर चल रहां है, और आप तनिक अपनी जिह्वा तो देखिये..!


रामचंद्र डेविड- क्या बोल रेला है हव्वा? मैं अपना हव्वा देखूं? हलकट कहीं का!


अर्द्धसत्य (क्रोध पीकर) - हव्वा नहीं बन्धुवर, जिह्वा।


रामचंद्र डेविड- अबी अपुन को समझ में आ रेला है, तुम साला लोग अपुन का लैंग्वेज सुधारने का चांसइच नई देना चाहता। अपुन ऐसाइच लेखेंगा, जो उखाड़ना है उखाड़ लो.



अब अर्द्धसत्य त्रिपाठी को तो प्रचंड क्रोध आ गया। वह बेनामी मोड में चले गए- अरे सठ! कनगोजर की संतान. तुझ जैसा तुच्छ चिठ्ठाकार मुझसे इस भाषा में बात करने का दुस्साहस कर रहा है?


उधर रामचन्द्र डेविड सुनामी मोड में आकर बोला- अबे वरली के गटर, पारसी बावा के सड़ेवे अंडे के छिलके! वट है तो सामने आ। ये बेनामी-तेनामी होके क्या बोलबचन दे रेला है?


अर्द्धसत्य त्रिपाठी ने क्रोध में की-बोर्ड तीन बार पटक दिया। पास बैठकर एबीसीडी लिख रहे उनके बच्चे सहम गए. लेकिन संयत होकर अगली टिप्पणी टाइप की- हमारा तात्पर्य यह है कि आप जैसा सज्जन पुरूष इस जीवन में आज तक नहीं मिला है. अभी-अभी आपने जो गालियाँ दी हैं वह बेनामी मैं नहीं था. मैं तो यह अनुरोध कर रहा था कि-


तभी उधर से रामचन्द्र डेविड की टिप्पणी आ गयी- अबे, कोन से बिल में घुस गएला है? हिम्मत है तो सामने आ झाडू से बिछड़े हुए तिनके...


अब पंडित जी हत्थे से उखड़ गए और बेनामी मोड में पहुँचकर बोले- तुम अवश्य किसी शूद्र खानदान से हो। वरना भाषा की बहस में भाषा की शालीनता का ध्यान अवश्य रखते...


उधर रामचन्द्र डेविड भी सुनामी मोड में आ गया- अबे भाषा की तो अलटम की पलटम। तू डिबेट को अब लैंग्वेज से कास्ट पे ले जा रेला है॥अबे डर गएला है क्या? लोकल को पटरी से उतार रेला है हटेले?


अब अर्द्धसत्य जी पाजामे से बाहर हो गए। कम्प्यूटर के सामने चुल्लू में पानी लेकर बेनामी मोड में ही बोले- अबे मैं मारण, उच्चाटन, वशीकरण सारी विद्याएँ जानता हूँ. यहीं से ऐसी मंत्रबिद्ध टिप्पणी करूगा कि तेरे प्राण-पखेरू उड़ जायेंगे. ले यह रहा-- ओइम फट स्वाहा॥ ओइम ह्रीं क्लीं..बिच्चई-बिच्चई..


पंडित जी को पता नहीं था कि रामचन्द्र डेविड के यहाँ बिजली चली गयी है और वह आलमारी से रम का अद्धा निकाल कर बिजली आने का इंतज़ार कर रहा है।


कुछ देर तक अर्द्धसत्य त्रिपाठी क्रोध में थर-थर कांपते रहे फिर कोई टिप्पणी न आयी देख संतोष से बोले- मृत्यु को प्राप्त हो गया साल्ला...


उनका यह कहना था कि अचानक सिर पर बड़े ज़ोर का बेलन पड़ा। पंडिताइन को लगा कि वह उसके भाई को गाली दे रहे हैं. शाम को ही दहेज न लाने को लेकर अर्द्धसत्यजी ने उनके पिता और भाई को भला-बुरा कहा था, सो वह पहले से ही चिढी बैठी थीं. बेलन के प्रहार से पंडितजी के सिर पर अमरूद के आकार का एक गूमड निकल आया और वह तत्काल प्रभाव से मूर्छित होकर भू-लुंठित हो गए. उनके मुंह से निकला- 'ओ मीन गोत्ट'. पंडितजी इन दिनों जर्मन सीख रहे थे.


लेकिन भाई साहब, यह सब तो ठीक है। अब चंद प्रतिरक्षात्मक उपाय कर लूँ:---


सावधानिक चेतावनी: 'भाइयो और भाइयो! उपर्युक्त संवाद और घर का माहौल पूर्णतः काल्पनिक था. अगर यह किसी जीवित ब्लोगर से मेल खा जा जाए (मृत की कौन परवाह करता है!) तो इसे महज संयोग माना जाए. फिर भी अगर कोई असंतुष्ट आत्मा मुझे लपेटे में लेना चाहे तो ब्लॉग जगत के प्रख्यात वकील दिनेश राय द्विवेदी जी से बात हो चुकी है. उनकी फीस उड़नतस्तरी जी फायनेंस कर रहे हैं सौदा द्विवेदी जी की हर पोस्ट (अच्छी हो बुरी) पर कम से कम बीस टिप्पणियों का हुआ है.... और गाली-गलौज करने से पहले ज्ञानदत्त पांडे जी की मुखमुद्रा उनके ब्लॉग पर जाकर अवश्य देख लें.'

मनुष्य का पिशाचयोनि में रूपांतरण अमेरिका में हुआ

बुर्जुआ समाज और संस्कृति-१६

पिछली कड़ी में आपने पढ़ा कि हर सरकार सिर्फ़ समझौते ही नहीं तोड़ती थी, अन्तरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन करने में भी माहिर रही। तानाशाह या लोकतंत्र- सभी का एक ही हाल था. अब आगे-

समसामयिक अन्तरराष्ट्रीय संधियों के विवरण से यह साफ ज़ाहिर है कि इन संधियों का महत्त्व कागज़ के टुकड़े से ज्यादा कभी नहीं रहा। किसी भी पक्ष द्वारा शुरुआत होनी चाहिए. संधि करनेवाले इसे मानने के अभिप्राय से संधियाँ नहीं करते और दूसरा पक्ष भी इसका पालन करेगा, ऐसा विश्वास नहीं पालते थे. राष्ट्रसंघ के सदस्य, इस संस्था के साथ जो समझौते हुए हैं, या परस्पर भी जो हुए हैं- सभी तोड़ चुके हैं.

सरकारें तक आतंरिक मामलों में वादाखिलाफी करती हैं। Gold certificate के स्वर्ण-भुगतान से लेकर अनगिनत सुधार और संशोधन के कार्यक्रमों के नकार की एक सुदीर्घ परम्परा है. प्रतिज्ञा-पालन के नाम पर आया है सुविधावाद (expediency) परिस्थितियों के अनुकूल काम करना. अद्भुत नीति है यह सुविधावाद- मनोरंजन, मद्दपान और नृत्य की तरह वर्त्तमान सुखद होते हुए भी भविष्य अन्धकारमय ही रहता है.

'सुविधावादी सिर्फ समझौते ही नहीं, किसी भी नैतिक या सामाजिक दायित्व को भी नकार सकता है. बाहुबल के स्वीकार के अलावा सामाजिक, धार्मिक और मानवीय मूल्यबोध का नकार है. अगर किसी के पास अस्त्रबल है तो मुनाफ़े के लिए जबरन शर्तें आरोपित की जा सकती हैं. अभी हूबहू यही हालत है. इसलिए अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर नग्न बाहुबल ही मीमांसा का पर्याय हो तो आश्चर्यजनक नहीं है।' (ए. पिटरिन सरोकिन/सोशल डायनामिक्स, संक्षिप्त संस्करण, पृष्ठ: ५६६-६७).

बुर्जुआ संस्कृति समाजविरोधी है, फलतः मानवविरोधी भी है। इस संस्कृति का विकास स्वार्थपरता और हिंसा से कदमताल मिलाकर होता है. अमेरिका की सामाजिक-स्थितियां इसका पूरा अक्स है. हिंसक जंतु और मनुष्य में जो अन्तर है वह अमेरिकी नागरिकों और बची हुई दुनिया के लोगों में उससे भी ज्यादा ही है. मनुष्य का पिशाचयोनि में रूपांतरण अमेरिका में ही सर्वप्रथम हुआ है.

वियतनाम के युद्ध में माँओं के पेट चीर कर गर्भस्थ शिशुओं की हत्या, उनकी योनियों में कांच के टुकड़े और विष धर सौंप डालकर त्रास देना, बंदूक के कुंडे से नवजात शिशु के सिर के टुकड़े करना, असहाय जनता की अंतडियों से फुटबाल खेलना, पानी-हवा और खाद्य वस्तुओं में ज़हर मिलाकर आम नागरिकों की हत्या करना, अस्पतालों, शिक्षा प्रतिष्ठान और प्रसूतिगृहों पर बम वर्षा करने जैसे काम जिन्होंने किए, उन्हें मनुष्य की सामान्य संज्ञा देकर भी मनुष्य कैसे कहें?


अमेरिकी सैनिकों ने वियतनाम में जैसे कारनामे किए हैं, उसके लिए अच्छी-खासी मानसिक तैयारी होनी चाहिए; अचानक ऐसी क्रूरता कोई नहीं कर सकता. वे लोग पूरी तैयारी के साथ ही जाते हैं. दरअसल जैसा वे विदेश जाकर करते हैं, स्वदेश में भी वैसा ही करते हैं, वह भी बिना किसी ऊहापोह के.
(कल्पना कीजिये कि इराक़ में इन्होनें क्या गुल खिलाये होंगे- विजयशंकर)

अमेरिकी अपने यहाँ की शिक्षा, संस्कृति और परम्परा के प्रभाव से जन्म लेते ही इन सब कारनामों में अभ्यस्त होने लगते हैं। जिन अपराधों की कल्पना भी अन्य देशों के लोग नहीं कर पाते, उन्हें वे निहायत ठंडे दिमाग़ से अंजाम देते हैं. कोई भी क्रूरतम कार्य बिना हिचकिचाए करना उनका जातीय चरित्र है.

अगली कड़ी में जारी...

'पहल' से साभार, मूल आलेख (बांग्ला) : राधागोविंद चट्टोपाध्याय, अनुवाद: प्रमोद बेडिया.

सोमवार, 19 मई 2008

पूँजीवाद का शास्त्रीय विधान है स्वार्थ-सिद्धि

बुर्जुआ समाज और संस्कृति-१५

पिछली कड़ी में आपने पढ़ा कि न्यूयॉर्क के सौ संपन्न लोगों में बीस मानसिक रूप से विक्षिप्त हैं। अब आगे-

सामग्री-धर्म का तीसरा परिणाम है, हिंसा और निष्ठुरता का विकास। सामग्री और मनुष्य में कोई फ़र्क नहीं, इसलिए दूसरों के दुःख हमें दुखी नहीं कर पाते। सामग्री से मानवीय सम्बन्ध कैसे हो सकता है? छाते में जाते वक्त छाते को धूप या बारिश से तकलीफ़ होती है, यह क्षणिक सोच भी नहीं हो सकता है.

बाज़ार का नियम पालन करते हुए व्यक्ति को भूलना होता है, उसी तरह व्यक्ति को महत्त्व देने से बाज़ार के नियम नहीं चलेंगे. जिंस की तरह ही व्यक्ति का महत्त्व उसकी उपयोगिता ही निर्धारित करती है. तीसरे दर्जे का भाड़ा अदा कर अध्यापक अपनी विद्वता के लिए या रोगी अपनी लाचारी के लिए प्रथम श्रेणी की सुविधाएं नहीं पा सकता. गरीबों के लिए सस्ते में माल नहीं मिलेगा, यही बाज़ार का नियम है. जोन एटन के अनुसार-

'To consider only oneself and not one's neighbours is the economic law of the market Ideal of humanism and comradeship, if rewarded in heaven are not crtainly rewarded in our capital earth. So, a terrible contradiction tears men between their Ideals as human beings and the economic law of existence in the society, in which they find themselves.'

और इसी नियम की हमें आदत हो गयी है। अधिकांश समाज का जीवन तकलीफ़ से गुज़रता है, यदि वे अनाहार या बगैर इलाज से कीड़े-मकौडों की तरह मरते जाते हैं, पेड़ों के तले रहने को बाध्य होते हैं, अगर उनके बच्चे अनपढ़ रहते हैं, तो हमें जिम्मेदारी की थोड़ी-सी भी अनुभूति नहीं होती है. हमें लगता ही नहीं कि हम किसी पर कोई अत्याचार करते हैं, ऐसा भी नहीं लगता कि कहीं न कहीं हम शोषण में सहायक हो रहे हैं, सिर्फ़ क़ानून-सम्मत बाज़ार के नियम मान कर चलते हैं.

प्राचीनकाल में शास्त्रीय विधान से सामाजिकता निर्धारित होती थी। व्यक्तिगत प्रतिभा के अनुसार उस शास्त्रीय विधान की व्यवस्था और प्रयोग का अधिकार नहीं था। हिन्दू मानते थे ब्राह्मण अवध्य है और मुसलमान सूद को महापाप समझते थे. ऐसी अनेक प्रथाएं थीं, जिनके तार्किक होने के बारे में विचार करने की स्वाधीनता नहीं थी. लेकिन इन नीतियों का उल्लंघन असंभव था.

उस युग में शास्त्रीय विधान की जो मर्यादा थी, बुर्जुआ समाज में बाज़ार के नियम का वही स्थान है। इस विधान में अगर ब्राह्मण-वध लाभदायक है तो वह भी हो सकता है. ब्राह्मण ही क्यों, मुनाफ़े के लिए, वह थोक में नर-हत्याएं कर सकता है, खाने की चीजों में मिलावट कर सकता है, कर-चोरी भी करता है, कुल मिलाकर मनमानी कर स्वार्थसिद्धि करना ही पूँजीवाद का शास्त्रीय विधान समझा गया है.

इस विधान के पालन में व्यक्ति से टक्कर भी होती है। तब भी इसी नियम से साम, दाम. दण्ड, भेद से अपने स्वार्थ साधेगा, ताकत होगी तो विजयी होगा. इससे अलग दूसरी कोई नीति बुर्जुआ समाज की नहीं होती, क़ानून के रंगीन परदे तो इस नीति की ओट मात्र हैं. वैसे ही व्यापार भी होता है. बारिश होने पर धूप नहीं रहने की तरह किसी प्राकृतिक नियम से कुछ नहीं होता है. माल की आमद कम होने से ही बाज़ार-भाव ऊंचा होने लगता है. व्यवसायी, उपभोक्ता की लाचारगी का फ़ायदा उठाते हैं.

आधुनिक शासकों के चरित्र के बारे में सरोकिन ने कहा है- 'बेल्जियम से निरपेक्ष रक्षा के संधिपत्र को रद्दी के कागज़-सा फाड़ कर जर्मनी ने बेल्जियम पर आक्रमण करते हुए प्रथम विश्व-युद्ध का सूत्रपात किया था। फ़िर तो अन्तरराष्ट्रीय समझौते तोड़ने की बाढ़-सी आ गयी. समझौते की स्याही सूख भी नहीं पाती थी कि समझौते तोड़ दिए जाते थे. वर्साई संधि का निरीक्षण होने से पहले ही हस्ताक्षर करने वाले उसमें परिवर्त्तन की मांग करने लगे. फ़िर तो अन्तरराष्ट्रीय संधियों से मुकरने की होड़-सी लग गयी. प्राच्य और पश्चिमी राष्ट्र लगातार संधियाँ तोड़ते गए.'

द्वितीय विश्वयुद्ध में भी यही हाल रहा। हर सरकार सिर्फ़ समझौते ही नहीं तोड़ती थी, अन्तरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन करने में भी माहिर रही. तानाशाह या लोकतंत्र- सभी का एक ही हाल था.

अगली कड़ी में जारी...
'पहल' से साभार, मूल आलेख (बांग्ला) : राधागोविंद चट्टोपाध्याय, अनुवाद: प्रमोद बेडिया.

शनिवार, 17 मई 2008

मानव-मन की अन्तर्निहित प्रवृत्ति नहीं है धनोपार्जन

बुर्जुआ समाज और संस्कृति-१४


पिछली कड़ी में अपने पढ़ा कि सामान्य मानव-धर्म के बदले सामग्री-धर्म अपनाते-अपनाते मानव-चरित्र के नए दिगंत प्रकट हो रहे हैं। अब आगे...


विक्रेता के रूप में मनुष्य अपनी कार्यक्षमता, मेधा और व्यक्तित्व बेचता है। स्वभावतः क्रेता इसे अपने स्वार्थ में ही उपयोग करता है. क्रेता की पसन्द से ही माल तैयार होता है. पूँजीवाद में साधु, सत्यवादी, स्पष्टवादी, स्वाभिमानी, निष्कपट और सहृदय लोगों की मांग नहीं है. इसलिए इन गुणों की चर्चा भी कोई नहीं करता, वरन कोढ़ की तरह इन्हें गुप्त रखना ही श्रेयस्कर समझता है.


जो हत्या को आत्महत्या मानकर नहीं चल सकते , ऐसे लोग इस समाज में 'स्वर्गीय' ही हैं। खुशामद, बेईमानी, झूठ, खलता, निष्ठुरता और चालाकी आदि 'गुणों' की मांग है- इसलिए इन गुणों की परीक्षा में उत्तीर्ण होने की होड़-सी लगी रहती है. इस समाज में यदि मिलावटहीन द्रव्य, बेईमान व्यापारियों के उत्पातों से परेशान जनता और घूस तथा दुर्नीति से ग्रस्त व्यवस्था है तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए. सामग्री से मानव-धर्म की अपेक्षा भी तो नहीं की जाती.


अपनी इच्छाओं का दमन करते हुए, रूचि को ठेंगे पर रखते हुए, दूसरे की पसंद के अनुसार अपने को ढालना सामग्री धर्म की दूसरी नियति है। लगातार दमित होते-होते, अंतर्द्वद्व के फलस्वरूप, सकारात्मक मानसिकता का लोप होता जाता है, हालांकि सांस्कृतिक प्रभाव कुछ ऐसा होता है कि इसका आभास भी नहीं हो पाता. बुर्जुआ संस्कृति में, जहाँ सार्थकता का पैमाना धन है, ऐश्वर्य के प्रति नमन और गरीबी के प्रति अवज्ञा इतनी स्पष्ट है कि हर कोई दरिद्र होना अपमान और हेठी का बायस समझता है. इस सामाजिक वातावरण से पैदा हुई इस सफलता की अवधारणा के फलस्वरूप कोई भी धनोपार्जन कर अपमान और ग्लानि से मुक्त हो, मान-मर्यादा का अधिकारी होना चाहता है.


धनोपार्जन मानव-मन की अन्तर्निहित प्रवृत्ति नहीं है, दूसरी कई प्रवृत्तियों की पूर्ति का उपाय मात्र है। अपूर्ण इच्छाओं की पूर्ति के लिए ही धन की जरूरत होती है. लेकिन ऐसा करते-करते उपाय ही उद्देश्य हो जाता है. इस प्रक्रिया में अहं और प्रभुत्व आदि नकारात्मक प्रवृत्तियाँ चरितार्थ करते-करते धन की लालसा का नशा सवार होने लगता है. शराबी की ललक जैसे बढ़ती ही जाती है, वैसी ही धनोपार्जन की लालसा भी होती है.


लेकिन सफल होने पर भी अंत में यही लगता है कि कुछ भी नहीं मिला जीवन में. वांछित मूल्यबोध के अभाव में, पारिवारिक संबंधों की हताशा में, यौवन की संध्या में समझ पाता है कि सोने के हिरन के पीछे-पीछे ही सब कुछ बीत गया,. पारिवारिक सुख, प्रेम और मित्रता आदि की उपेक्षित दमित वासनाएं, स्वार्थी मन को निरंतर और भी चंचल और अस्थिर करती हैं. इन अतृप्त वासनाओं से व्यर्थताबोध और आक्रोश पैदा होता है और अपने नुकसान की भरपाई के लिए प्रतिशोध की भावना भड़कती है. पश्चिमी समाज में ऐसी हताशा के फलस्वरूप लाखों तलाक होते हैं. (Mass,Class and Bureasucracy (page-95)- Divorce (in USA) are now so high that they cover one out of every three or four marriages.
न्यूयोर्क के सौ संपन्न लोगों में बीस मानसिक रूप से विक्षिप्त बताये जाते हैं।


शेष अगली पोस्ट में जारी...


'पहल' से साभार

शुक्रवार, 16 मई 2008

यह ब्लॉग भाड़े पर देना है (जहाँ है, जैसा है के आधार पर)

'तमिल टाइम्स' में दो दिन पहले एक विज्ञापन छपा था। नहीं-नहीं मुझे तमिल पढ़ना नहीं आता, वह तो बगल में बैठे मेरे मित्र और तमिल के युवा कवि मदिअलगन सुब्बैयाह यह अखबार पढ़ते-पढ़ते अचानक जोर-जोर से हंसने लगे। मैंने पूछा कि अभी तक तो सकुशल थे अचानक यह क्या हो गया? क्या आलोक पुराणिक जी की कोई अगड़म-बगड़म पढ़ ली? वह बोले- 'यह बात नहीं है, एक विज्ञापन छपा है।'

उन्होंने विज्ञापन पढ़ कर सुनाया- 'ओरली पगुदियिल दिनमुम २५० किलोग्राम मावू विरापनैयागुम लेन विरापनैक्कू उल्ल्दु! नोडरबु कोलग: ०९८०.......'

मेरा पूरा शरीर सवाल बन गया, पूछा- 'अर्थात्?????????"

मदि ने बताया कि मुम्बई के वरली इलाके में कोई गली है जिसमें २५० किलोग्राम आटा की इडली रोजाना खप जाती है यानी एक दिन में बिकती है। यह आदमी गाँव जा रहा है और यह लेन यानी गली भाड़े पर देने के लिए इसने यह विज्ञापन दिया है.

हम दोनों यह सोचकर हैरान रह गए कि महानगर में कैसे-कैसे 'व्यौपार' चलते हैं।

इस प्रसंग से मुझे याद आया मुम्बई के ही मालाड इलाके का एक किस्सा। तब मैं मुम्बई नया-नया आया था. गर्मियों के दिन थे. एक सुबह हमारा अखबारवाला सूचित करने लगा कि वह तीन महीने के लिए गाँव जा रहा है इसलिए अब अखबार दूसरा आदमी देगा. कोई शिकायत हो तो उसी से कीजियेगा. हमने इसका कारण पूछा तो उसने बताया कि तीन माह के लिए उसने अपना धंधा उस आदमी को भाड़े पर दे दिया है.

पहली बार ज्ञान हुआ कि मुम्बई में लोग दूकान और मकान ही नहीं; धंधे भी किराए पर उठा कर चले जाते हैं... और वापस आने पर फिर से उसी धंधे में जुट जाते हैं।

गुरु, इन प्रसंगों से एक आइडिया आया है। हिन्दी ब्लॉग जगत में काफी गड़बड़ी कर चुका हूँ। क्यों न कुछ दिनों के लिए दण्डक अरण्य चला जाऊं और किसी ऋषि से गुफा भाड़े पर लेकर माह भर तपस्या करूँ? तब तक लोगों का गुस्सा भी ठंडा हो जायेगा.

तो ठीक है. मैं अपना ब्लॉग जहाँ है, जैसा है के आधार पर महीने भर के लिए भाड़े पर देना चाहता हूँ- 'नॉन येनदु 'ब्लॉग' उल्लदु उल्लपडीये माठ्ररंगल येदुमिललादु ओरु मादनिरकु वाडहैकु विड विरुम्बुगिरेन! नोडरबु कोलग: ०९८०.......मोबाइल नंबर।'

इच्छुक व्यक्ति शीघ्र सम्पर्क करें!

गुरुवार, 15 मई 2008

पीएम की पत्नी के फ्राड मेल से सावधान!

दोस्तो, मुझे आज एक ई-मेल मिला। इसे hotmail।com भी दबोच नहीं पाया. और यह जंक मेल की जगह मेरे इनबॉक्स में आ घुसा. आप लोग भी सावधान रहियेगा. इसे अंग्रेजी में ज्यों का त्यों दे रहा हूँ ताकि आप भाषा का भी पूरा फ़रेब पकड़ सकें.

ASSALAMU ALAIKUM
From:Mrs Fatima Hinga.
Dearest,
Thanks for finding time to go through my mail. I am Mrs. Fatima Hinga, the wife of Lieutenant Colonel John Garang Hinga the Leader of Sudanese People's Liberation Govement (SPLM) one of the leading political parties in Sudan which was formed in 1983. He died during the out brake of the recent civil war in Sudan. Before his death, he held many important offices which includes being the prime minister in a coalition government between 1986 to 1989.
He also was the leader of the Umma Party a strong political organization in Sudan. After his tenure as coalition prime minister, he was made to be in-charge of the payment of Sudanese Media communications department in 2001.
My husband was killed by a group known as Sadiq al Mahdi at the on set of the civil war while fighting for the liberation of the Sudanese people from the hands of a dictatorship government.
I am 47 years old now and seriously ill although I am now receiving treatment in a hospital here in Thailand. During the period of our marriage we were blessed with a male child by name Abdul Hinga who is also here taking care of me. After the death of my husband, I inherited a huge amount of money (12million US dollars) which my late husband deposited with a Security Company in Thailand for safe keeping.
I now decided to contact you to assist me and my son to claim this money from where it was deposited and probably guide us in investing the fund in a worthwhile flourishing business over there. I hereby ask for your help and assistance. Although I am a novice in business, I have an eye on rigid properties. Your advice on other areas of private sector will be highly appreciated. I believe that you would be of great help in guiding my son to a successful business investment in your country even when I am gone.
I will appreciate if you will show interest in collaborating with us, as this transaction will benefit both of us on joint venture partnership।Furthermore I am ready to give you a good negotiable percentage cash reward for your assistance. Detailed information on other proceedings will be made available to you upon receiving your reply showing interest in collaborating with us as I look forward to your urgent reply.

Sincerely Yours
Fatima Hinga।

पहले ये लोग लाटरी लगने का झांसा देते थे. अब यह तरीका अख्तियार किया है. आखिर में एक बार फिर पीएम की बेगम साहिबा फ़ातिमा हिंगा से सावधान करता हूँ. धन्यवाद!

बुधवार, 14 मई 2008

एक जिन्स होकर रह गया है मनुष्य!

(बुर्जुआ समाज एवं संस्कृति- १३)


इस लेखमाला में पिछले दिनों आपने पढ़ा था कि पूंजीवाद एक हाथ से देकर दूसरे से दुगुना लेता है। स्वाधीनता दी है, जीविका का निश्चित उपाय और सुरक्षा नहीं दी है. इससे जनता में अस्थिरता पैदा हुई है जो प्राचीनकाल में नहीं थी. अब आगे...


तब समाज की विषय व्यवस्था में सभी का स्थान निश्चित था। धनी-दरिद्र, ऊँच-नीच, मालिक-नौकर, ज़मींदार-दास, ब्राह्मण-शूद्र विषमता के आधार पर गठित होते हुए भी निर्दिष्ट कार्यों के लिए स्वीकृत थे और सम्बद्ध दायित्व पालन करते थे. इस समाज में निचले तबके के लोगों को दारुण दुःख, वंचना और लान्छ्ना सहनी होती थी लेकिन आधुनिक समाज के जैसा भय, उद्वेग एवं अस्थिरता नहीं थी. 'स्वर्गीय असंतोष' के साथ स्वर्ग के पीछे भागने की प्रेरणा भी नहीं थी, शूद्र को ब्राह्मण होने के लिए सात बार जन्म लेना होता था. (इस प्रसंग में मनु का वक्तव्य है-


शूद्रायाम ब्राह्मनाज्जातः श्रेयसा चेत प्रजायते,
अश्रेयान श्रेयासिम जातिम गच्छत्यासप्रमादयुगात।) मनु १०/६४.


धनोपार्जन कर ब्राह्मण या क्षत्रिय के समकक्ष होने की कल्पना भी किसी शूद्र ने नहीं की होगी।


प्रतियोगिता के अलावा भी एक महत्वपूर्ण कारण है क्रय-विक्रय सम्पर्क। प्राचीनकाल में सामाजिक सम्बन्ध प्रत्यक्ष थे. राजा-प्रजा, प्रभु-दास, ब्राह्मण-शूद्र सभी के परस्पर संबंधों में निश्चित अपेक्षाएं थीं.

बुर्जुआ समाज में परस्पर कोई निश्चित, विधिवत सम्पर्क नहीं है॥ माल का क्रय-विक्रय ही सम्बन्ध बनाते हैं। जनता जरूरत की चीजों के लिए उत्पादक पर निर्भर है, लेकिन उत्पादक से सामना नहीं होता. कई हाथों से गुज़रते हुए वह सामान उपभोक्ता के पास आता है. हम लोग अन्न के लिए किसान के पास नहीं जाते हैं और न ही वह हमारे पास आता है. इससे एक दूसरे पर निर्भरता का सम्पर्क स्वाधीन क्रेता-विक्रेता के आर्थिक लेन-देन में बदलता है. इसी लेन-देन पर बाज़ार का नियम चलता है. (कार्ल मार्क्स ने दास कैपिटल के प्रथम खंड में यह निष्कर्ष व्यक्त किया था: There is definite social relation between men, that assumes, in the eyes, the fantastic forms of a relation between things... PROGRESS PUBLISHERS, Moscow, 1965, page -72.)


इस लेन-देन के परदे में सामाजिक-निर्भरता की भावना मद्धिम हो जाती है। मोलभाव करके खरीदने और बेचने के साथ सामाजिक न्याय-अन्याय की प्रक्रिया जुड़ी है, यह सोच पैदा ही नहीं होता है. फिर भी यह सच है कि मुनाफ़ा, बाज़ार की अराजक अवस्था, श्रमजीवी और उपभोक्ताओं की दुर्गति, सभी सस्ते में खरीद कर मंहगे में बेचने से ही पैदा होती है.


सामाजिक सम्पर्क का क्रेता-विक्रेता सम्पर्क में बदलाव इस दौर पर आ पहुंचा है कि मनुष्य भी एक जिन्स होकर रह गया है। सामान्य मानव-धर्म के बदले सामग्री-धर्म अपनाते-अपनाते मानव-चरित्र के नए दिगंत प्रकट हुए हैं.


अगली पोस्ट में जारी...


'पहल' से साभार.

रविवार, 11 मई 2008

हमारा रेफ्रीजिरेटर चोर है!

श्रीमती जी को सोने की लत है। रात के ९ बजे नहीं कि वह गड़प! अपन ठहरे निशाचर! रात-रात कम्प्यूटर पर बैठे रहेंगे या कोई किताब पढ़ते रहेंगे.

लेकिन बात किताब book या निशाचरी की नहीं है। बात है रेफ्रीजिरेटर refrigerator की. उसे शक है कि वह रात में जो भी चीजें रेफ्रीजिरेटर में रख कर सोती है सुबह उसे गायब मिलती हैं, या उनकी मात्रा कम हो जाती है.
एक सुबह वह उठी तो उसने पाया कि बेसन के जो लड्डू उसने घर में निर्मित घी में भून कर शाम को बनाए थे वे संख्या में छः कम है! अगली सुबह उसे पनीर-कोफ्ता का डोंगा खाली मिला था। ऐसे ही एक दिन छेने के रसगुल्ले अदृश्य हो गए थे.

उस दिन तो हद ही हो गयी जब सुबह उठने पर उसे रेफ्रीजिरेटर का दरवाज़ा खुला मिला। यहाँ मैं स्पष्ट कर दूँ कि मैं बाहर की मिठाई पसंद नहीं करता. उसने देखा तो अपन सोये पड़े थे. हालांकि लड़ने के लिए उसने दोनों कमर हाथ पर रखकर मुद्रा बना ली थी लेकिन सोते हुए आदमी से भला कोई कैसे लड़ सकता है!

उसे शक हो गया है कि हमारा रेफ्रीजिरेटर चोर है। हालांकि कल रात उसने सोने से पहले वैधानिक चेतावनी statutory warning दे ही डाली- 'गिन के जा रही हूँ, पूरे दर्ज़न भर आम रखे हैं. एकाध कम निकला तो ठीक वरना...!"

कोई बात नहीं, कल अलफांसो आम रस alfanso mango juice का मज़ा चखेंगे!

शनिवार, 10 मई 2008

(शहीदगाथा-३): अमर शहीद यतींद्र नाथ मुखर्जी की बलिदान गाथा

1857, the first war of Indian Independence. साथियो, आज १८५७ में हुई आज़ादी की पहली लड़ाई की १५०वीं वर्षगाँठ का साल भर चला जलसा पूरा हुआ. इस लड़ाई से भारतवासियों ने यह सीखा था कि अंग्रेज अजेय नहीं हैं और न ही इतने सभ्य, जैसा कि वे दावा करते आए थे. देशवासियों को अहसास हो चुका था कि अंग्रेजों से जूझा जा सकता है और उन्हें भारत से बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है. इसी भावना के चलते आगे चलकर क्रांतिकारियों ने योजनाबद्ध अभियान छेड़ा और देश के अलग-अलग कोनों में आज़ादी का बिगुल फूक दिया. आज हम अमर शहीद यतींद्र नाथ मुखर्जी का बलिदान स्मरण कर रहे हैं.


यतींद्र नाथ मुखर्जी का जन्म जैसोर जिले में सन् १८८० ईसवी में हुआ था। पाँच वर्ष की अल्पायु में ही उनके पिता का देहावसान हो गया. माँ ने बड़ी कठिनाई से उनका लालन-पालन किया. १८ वर्ष की आयु में उन्होंने मैट्रिक पास कर ली और परिवार के जीविकोपार्जन हेतु स्टेनोग्राफी सीखकर कलकत्ता विश्वविद्यालय से जुड़ गए.


वह बचपन से हई बड़े बलिष्ठ थे। सत्यकथा है कि २७ वर्ष की आयु में एक बार जंगल से गुजरते हुए उनकी मुठभेड़ एक चीते से हो गयी. उन्होंने चीते को अपने हंसिये से मार गिराया था. इस घटना के बाद यतीन नाम से वह विख्यात हो गए थे.


उन्हीं दिनों अंग्रेजों ने बंग-भंग की योजना बनायी। बंगालियों ने इसका विरोध खुल कर किया. यतींद्र नाथ मुखर्जी का नया खून उबलने लगा. उन्होंने साम्राज्यशाही की नौकरी को लात मार कर आन्दोलन की राह पकड़ी. सन् १९१० में एक क्रांतिकारी संगठन में काम करते वक्त यतींद्र नाथ 'हावड़ा षडयंत्र केस' में गिरफ्तार कर लिए गए और उन्हें साल भर की जेल काटनी पड़ी. जेल से मुक्त होने पर वह 'अनुशीलन समिति' के सक्रिय सदस्य बन गए और 'युगान्तर' का कार्य संभालने लगे. उन्होंने अपने एक लेख में उन्हीं दिनों लिखा था-' पूंजीवाद समाप्त कर श्रेणीहीन समाज की स्थापना क्रांतिकारियों का लक्ष्य है. देसी-विदेशी शोषण से मुक्त कराना और आत्मनिर्णय द्वारा जीवनयापन का अवसर देना हमारी मांग है.'


क्रांतिकारियों के पास आन्दोलन के लिए धन जुटाने का प्रमुख साधन डकैती था। दुलरिया नामक स्थान पर भीषण डकैती के दौरान अपने ही दल के एक सहयोगी की गोली से क्रांतिकारी अमृत सरकार घायल हो गए. विकट समस्या यह खड़ी हो गयी कि धन लेकर भागें या साथी के प्राणों की रक्षा करें! अमृत सरकार ने यतींद्र नाथ से कहा कि धन लेकर भागो. यतींद्र नाथ इसके लिए तैयार न हुए तो अमृत सरकार ने आदेश दिया- 'मेरा सिर काट कर ले जाओ ताकि अंग्रेज पहचान न सकें.'


इन डकैतियों में 'गार्डन रीच' की डकैती बड़ी मशहूर मानी जाती है। इसके नेता यतींद्र नाथ मुखर्जी थे. विश्व युद्ध प्रारंभ हो चुका था. कलकत्ता में उन दिनों राडा कम्पनी बंदूक-कारतूस का व्यापार करती थी. इस कम्पनी की एक गाडी रास्ते से गायब कर दी गयी थी जिसमें क्रांतिकारियों को ५२ मौजर पिस्तौलें और ५० हजार गोलियाँ प्राप्त हुई थीं. ब्रिटिश सरकार हो ज्ञात हो चुका था कि 'बलिया घाट' तथा 'गार्डन रीच' की डकैतियों में यतींद्र नाथ का हाथ था.


एक दिन पुलिस ने यतींद्र नाथ का गुप्त अड्डा 'काली पोक्ष' ढूंढ़ निकाला। यतींद्र बाबू साथियों के साथ वह जगह छोड़ने ही वाले थे कि राज महन्ती नमक अफसर ने गाँव के लोगों की मदद से उन्हें पकड़ने की कोशश की. बढ़ती भीड़ को तितरबितर करने के लिए यतींद्र नाथ ने गोली चला दी. राज महन्ती वहीं ढेर हो गया. यह समाचार बालासोर के जिला मजिस्ट्रेट किल्वी तक पहुंचा दिया गया. किल्वी दल बल सहित वहाँ आ पहुंचा. यतीश नामक एक क्रांतिकारी बीमार था. यतींद्र उसे अकेला छोड़कर जाने को तैयार नहीं थे. चित्तप्रिय नामक क्रांतिकारी उनके साथ था.


दोनों तरफ़ से गोलियाँ चली। चित्तप्रिय वहीं शहीद हो गया. वीरेन्द्र तथा मनोरंजन नामक अन्य क्रांतिकारी मोर्चा संभाले हुए थे. इसी बीच यतींद्र नाथ का शरीर गोलियों से छलनी हो चुका था. वह जमीन पर गिर कर 'पानी, 'पानी' चिल्ला रहे थे. मनोरंजन उन्हें उठा कर नदी की और ले जाने लगा. तभी अंग्रेज अफसर किल्वी ने गोलीबारी बंद करने का आदेश दे दिया.


गिरफ्तारी देते वक्त यतींद्र नाथ ने किल्वी से कहा- 'गोली मैं और चित्तप्रिय ही चला रहे थे। बाकी के तीनों साथी बिल्कुल निर्दोष हैं.'


...और अगले दिन भारत की आज़ादी के इस महान सिपाही ने अस्पताल में सदा के लिए आँखें मूँद लीं। लेकिन आख़िरी सफ़र के वक्त भी उनके होठों पर ये बोल थे-


सूख न जाए कहीं पौधा ये आज़ादी का
खून से अपने इसे इसलिए तर करते हैं
दर-ओ-दीवार पर हसरत से नज़र करते हैं
खुश रहो अहल-ए-वतन, हम तो सफ़र करते हैं.

जय हिंद!

'मीरा-भायंदर दर्शन' द्वारा प्रकाशित 'शहीदगाथा' से साभार, प्रस्तुतकर्ता: सीपी सिंह 'अनिल'

गुरुवार, 8 मई 2008

ये मूढ़मति और अंधविश्वासी लोग!

We often talk about Incredible India but see what is still happening in this great country. कल रात हमारी सोसाइटी co-op-housing society में दुखद घटना घट गयी। ऊपर के फ्लैट में एक परिवार रहता है. इस बात का ज़िक्र ज़रूरी नहीं समझता कि वह परिवार कहाँ का है लेकिन यह ज़रूर कह सकता हूँ कि वे लोग ग्रामीण पृष्ठभूमि (rural background) के हैं. हालांकि अन्धविश्वासों superstitions के मामले में शहर या ग्रामीण पृष्ठभूमि से अधिक फ़र्क नहीं पड़ता. ख़ैर, घर की मालकिन अभी-अभी एक ख़ूबसूरत बच्ची की माँ बनी है.


हुआ ये कि कल पास-पड़ोस की कुछ महिलायें उस बच्ची new born को देखने गयीं। उनके जाने के बाद बच्ची की माँ को लगा कि उसे इन महिलाओं की नज़र लग गयी है. सो वह लगी उसकी नज़र उतारने. उसने अपनी परम्परा से जो सीखा होगा उसी विधि से नज़र उतारने लगी.


उस महिला ने तेल में कागज़ डुबोया और उसमें आग लगाकर बच्ची के चारों ओर घुमाने लगी। इसी बीच असावधानीवश जलते कागज़ का एक टुकड़ा बच्ची के पेट पर गिर गया. नवजात बच्ची की नाजुक त्वचा skin झुलस उठी. घबराकर उस महिला ने उस पर पानी डाल दिया. अब क्या था, बच्ची की त्वचा छिल कर बाहर आ गयी और पूरे पेट से रक्त-मांस दिखने लगा.


अब वह बच्ची अस्पताल hospital में जिंदगी और मौत के बीच झूल रही है। ईश्वर उसकी रक्षा करे!


इस प्रसंग से मुझे अपने बचपन की एक घटना याद आ गयी। हमारे गाँव के एक चौधरी साहब एजेंसी agency से नया-नया ट्रैक्टर tractor खरीद कर लाये. ट्रैक्टर के लिए उन्होंने जमानत deposit के तौर पर अपनी आधी ज़मीन एजेंसी के पास रख दी थी.बहरहाल ट्रैक्टर आया. गाँव भर के लोग उसे देखने जुटे. हम बच्चों के लिए वह अजूबा चीज थी. हम उसे छूना चाहते थे लेकिन बड़े-बुजुर्ग डांट कर भगा देते.


सब लोग बेहद खुश थे कि गाँव में पहला-पहला ट्रैक्टर आया है। और चौधरी साहब तो गर्व से फूले नहीं समा रहे थे कि गाँव का पहला ट्रैक्टर उन्होंने ख़रीदा है. मूंछों पर देते घूम रहे थे.


रात में पूजा हुई। रिवाज के अनुसार ट्रैक्टर के चारों पहियों के नीचे दीपक जला कर रख दिए गए. दीपक में घी इतना भरा गया कि सुबह तक वे जलते रहें. सब लोग खुशी-खुशी सोने चले गए.


सुबह उठ कर लोगों ने देखा कि चार में से तीन पहिये आग पकड़ चुके थे और उनके टायर tyre जलने की बू से मोहल्ला गंधा रहा था। चौधरी साहब ने सर पीट लिया. सर मुडाते ही ओले पड़ गए थे. लगे हाथ ५ हज़ार का खर्चा! रोते-पीटते उन्होंने नए टायर लगवाये.


देखा आपने, कई बार पुराने रीति-रिवाज और अंधविश्वास कितना भारी पड़ जाते है!

सोमवार, 5 मई 2008

क्या आर्यों का 'पणि' सिंधु सभ्यता से आया?

This article narrates things about Vedik and Indus civilisation. शास्त्री जेसी फिलिप ने एक पोस्ट में मैसूर से श्रीलंका तक प्रचलित फणम या पणम PANAM सिक्कों coins का ज़िक्र किया था। उनकी यह पोस्ट काफी जानकारियां देती है. उसमें मैं भी कुछ जोड़ना चाहूंगा.

ऋगवैदिक काल Rigvedic period में व्यापार trade पर जिस समूह group का एकाधिकार monopoly था उसे 'पणि' कहकर पुकारते थे। प्रारंभ में व्यापार विनिमय barter system द्वारा होता था लेकिन बाद में निष्क Nishk नामक आभूषण का प्रयोग एक सिक्के के रूप में होने लगा था. लेकिन तब भी गायों की संख्या से किसी वस्तु का मूल्य आँका जाता था, जैसा कि ऋगवेद के एक मन्त्र में इन्द्र Lord Indra द्वारा गायें देकर प्रतिमा लेने का उल्लेख आया है. लेकिन उस काल के आर्यों Aryans के विदेशों से व्यापारिक सम्बन्ध होने के प्रमाण नहीं मिलते हैं.

उत्तरवैदिक काल में बड़े व्यापारियों को श्रेष्ठिन कह कर बुलाया जाने लगा। निष्क के अलावा शतमान, कर्षमाण आदि सिक्के भी प्रचलन में आ गए थे.

यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि ऋगवैदिक काल में व्यापारियों को 'पणि' कहा जाता था। तब शास्त्री जी द्वारा सुझाया गया नाम फणम या पणम का मूल कहीं वही 'पणि' तो नहीं? द्रविड़ कुल की भाषाओं में अधिकांशतः संस्कृत की विभक्तियों का प्रयोग किया जाता है. अतः पणि से पणम या फणम हो जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं.

शास्त्री जी ने लिखा है कि तमिल Tamil और मलयालम Malyalam में पणम का मतलब होता है धन। ये दोनों द्रविड़ कुल की भाषाएं हैं. इससे एक कड़ी और जुड़ती है.

सिंधु घाटी की सभ्यता एक नगर सभ्यता थी। विद्वानों में अभी एकराय नहीं है लेकिन अधिकांश यही मानते हैं कि यह द्रविड़द्रविड़ सभ्यता थी। सिंधु घाटी से उत्खनन में मातृ देवी तथा शिव (पशुपतिनाथ) की मूर्तियाँ मिली हैं. इसे मातृसत्तात्मक समाज माना जाता है। यहाँ के निवासी काले रंग के थे। इनका व्यापार बहुत बढ़ा-चढ़ा हुआ था.

दक्षिण भारत में भी मातृसत्तात्मक समाज रहा है और मलयाली समाज में तो अब तक इसके अवशेष मिल जाते हैं. इन समाजों में शिव की पूजा होती है।

इसके विपरीत आर्यों के न तो विदेशो से व्यापारी सम्बन्ध थे न ही इनके पास कोई देवी थी, लगभग सारे देवता पुरूष थे। चूंकि सिंधु सभ्यता की लिपि आज तक पढ़ी नहीं जा सकी है इसलिए यह कहना कठिन है कि वे लोग व्यापारियों को क्या कह कर बुलाते थे. लेकिन यह स्थापित हो चुका है कि सिंधु सभ्यता के लोगों के व्यापारिक सम्बन्ध विदेशों से थे. इस काल के लोगों के व्यापारिक सम्बन्ध मिस्र, ईरान तथा बेबीलोनिया तक से थे. व्यापार जल और थल दोनों मार्गों से होता था.

सुमेरिया में ऐसी मोहरें प्राप्त हुई हैं जो हड़प्पा और मोहनजोदाडो में उत्खनन से प्राप्त मोहरों से समानता रखती हैं। मेसोपोटामिया में भी सिंधु सभ्यता के अनेक अवशेष तथा वस्तुओं का प्राप्त होना दोनों सभ्यताओं के सम्पर्क का प्रमाण है. इराक़ के एक स्थान पर वस्त्रों की गाँठें मिली हैं जिन पर सिंधु की मोहरों की छाप है. कहने का तात्पर्य यह कि सिंधु सभ्यता में एक बड़ा व्यापारी वर्ग मौजूद था.

अब बात आर्यों की करते हैं। यह भी लगभग सिद्ध हो चुका है कि आर्य मध्य एशिया से आए थे. जर्मन विद्वान मैक्समूलर के अनुसार ईरान के धार्मिक ग्रन्थ 'अवेस्ताँ' तथा आर्यों के धार्मिक ग्रन्थ 'वेद' में पर्याप्त समानता है अतः अधिक प्रतीत यह होता है कि दोनों जातियाँ पास-पास रहती होंगी. पशुपालन तथा कृषिकर्म आर्यों का प्रमुख व्यवसाय था जो विशाल मैदानों में ही सम्भव है. घास के ये विशाल मैदान मध्य एशिया में ही प्राप्त होते हैं. इसके अलावा आर्यों के देवता भी मध्य एशिया के देवी-देवताओं से काफी समानता रखते थे.

आर्यों के देवता इन्द्र को नगरों का नाश करने वाला कहा गया है। याद रखना चाहिए कि इन्द्र ऋगवैदिक काल में आर्यों का प्रधान देवता था. लेकिन ऋगवैदिक सभ्यता में नगर थे ही नहीं. ऋगवैदिक आर्य भवन निर्माण कला और नगर योजना भी नहीं जानते थे. ये लोग कच्चे या घास-फूस के मकान बनाते थे. यह एक पूरी तरह ग्रामीण सभ्यता थी. तब इन्द्र ने कौन से नगरों को नष्ट किया था? जाहिर है सिंधु सभ्यता के नगरों को. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि आगे चलकर यही इन्द्र एक पीठ बन गया था जैसे कि आज के शंकराचार्य.

गार्डन वाइल्ड तथा व्हीलर के मत में सिंधु सभ्यता के पतन का मुख्य कारण आर्यों का आक्रमण था। दोनों विद्वानों के अनुसार सिंधु सभ्यता के नगरों में सड़कों, गलियों तथा भवनों के आंगनों में मानव अस्थिपंजर मिले हैं जिससे सिद्ध होता है कि बाहरी आक्रमणों में अनेक लोग मारे गए थे.

अब प्रश्न यह उठता है कि ऋगवैदिक सभ्यता में व्यापारियों को पणि कहा गया तो यह शब्द आया कहाँ से?यहाँ एक बात उल्लेखनीय है की सिंधु सभ्यता के लोगों को लेखन का ज्ञान था लेकिन वैदिक आर्य लेखन से अपरिचित थे। सिंधु घाटी में उत्खनन से अब तक २४६७ लिखित वस्तुएं प्राप्त हो चुकी हैं. इनकी लिपि इडियोग्राफिक (भावचित्रक) है. कुछ विद्वानों के मुताबिक यह चित्र लिपि है. प्रोफेसर लैगडैन का मानना है कि यह मिस्र की चित्र लिपि से अधिक समानता रखती थी.

आर्यों ने आक्रमण करके सिंधु सभ्यता के नगरों को क्रमशः नष्ट किया होगा। यह कोई एक दिन में तो हो नहीं गया था. आर्य सिंधु सभ्यता के सम्पर्क में आए होंगे. ऋग्वेद में ऐसे लोगों का उल्लेख मिलता है जिनका रंग काला है और नाक चपटी. जाहिर है ये सिंधु सभ्यता के लोग थे. ऐसे में आर्यों को वहाँ से सुनकर अनेक शब्द मिले होंगे. जब सिंधु लिपि पढ़ ली जायेगी तब पता चलेगा कि आर्य कुल की भाषाओं में कितने शब्द सिंधु लिपि के समाये हुए हैं. अंदाजा लगाया जा सकता है कि सिंधु सभ्यता में व्यापारियों को पणि कहा जाता रहा होगा.

गौर करने की बात यह भी है कि सिंधु घाटी से जो लगभग ५५० मुद्राएं मिली हैं उनका आकार गोलाकार तथा वर्गाकार दोनों तरह का है। मुद्राओं पर एक ओर पशुओं के चित्र बने हैं तथा दूसरी ओर कुछ लिखा हुआ है. इन मुद्राओं को कहीं पणम तो नहीं कहा जाता रहा होगा? जैसा कि द्रविड़ कुल के तमिल और मलयालम समाज में धन! पणि यानी व्यापारी और पणम माने मुद्रा! यह संयोग मात्र नहीं हो सकता कि मैसूर से लेकर श्रीलंका तक फणम या पणम नामक सिक्के चलते थे.

द्रविड़ मानते हैं कि श्रीलंका में सिंहली लोगों से पहले उनकी ही बस्तियां थीं। हो सकता है कि आर्यों के आक्रमण के बाद सिंधु घाटी की बची-खुची जातियाँ जान बचाकर दक्षिण भारत से भी परे श्रीलंका में जा बसी हों. यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि सिंधु घाटी के निवासी समुद्र से परिचित थे लेकिन आर्य नदियों को ही समुद्र कहते थे. सिंधु घाटी का समाज मूलतः व्यापार आधारित समाज था और नदियों में नौकाओं तथा समुद्र में जहाजों के जरिये इनका व्यापार चलता था. हो सकता है यही द्रविड़ जातियाँ पणम जैसे अनेक शब्द समुद्र पार कर श्रीलंका तक अपने साथ ले गयी हों.

कुल मिलाकर यह दूर की कौड़ी लाने की कोशिश ही है.

शुक्रवार, 2 मई 2008

ब्लॉग लिखने की अनुमानित लागत उर्फ़ मेरा दुखड़ा!

This is a humourous article. भाई साहब, और बहनजियो! ब्लॉग blog लिखना अपन के लिए बवाल-ए-जान बन गया है। बल्कि सच कहूं तो बवाल-ए-जेब बन गया है. ब्लॉग लिखने की अनुमानित लागत (estimated cost) बढ़ती ही जा रही है. बीवी wife के डर से रोज़ प्लान बनाता हूँ कि आज जल्दी सो जाऊंगा लेकिन दीवानगी देखिये कि बीवी को गच्चा देकर बिस्तर से तीन बजे रात को निकल पड़ता हूँ और बैठ जाता हूँ कम्यूटर computer पर.


दाढी बढ़ गयी है। ब्लॉग के चक्कर में नहाया कई दिनों से नहीं है. फोटो photo इस भय से नहीं लगा रहा हूँ कि उसे देखकर आपके बाल-बच्चे डर जायेंगे. पत्नी ने अल्टीमेटम ultimatum दे दिया है कि मैं ब्लोगिंग blogging बंद करूं वरना वह मायके चली जायेगी. मुझे रह-रह कर 'बाबी' फिलिम film का गीत याद आ रहा है- 'मैं मैके चली जाऊंगी तू ब्लोगिंग blogging करते रहियो."


अभी-अभी एक शेर बनाया है-


'राधा की सौत थी गर किसना की बांसुरी,
बीवी की मेरी सौतन, मेरा ब्लॉग है।'


यह तो अच्छा है कि पत्नी ब्लॉग नहीं पढ़ती वरना मुझ पर और मुश्किलें पड़तीं। अपन के ब्लॉग पर न तो कोई टिप्पणी comment करता, न ही यह ब्लॉगवाणी के 'ज़्यादा बार देखा गया' की लिस्ट list में आ पाता। पसंद की सूची में तो यह आज तक नहीं आ पाया। खामखाँ पत्नी के आगे भद्द पिट जाती. छोड़िये भी, ग़मों की लिस्ट लम्बी होती जा रही है। जिन दोस्तों ने ब्लॉग शुरू करवाया था वे भूमिगत हो गए हैं वरना उन्हें ही बीवी के सामने खड़ा कर देता।


मैं उन जाँबाजों से ईर्ष्या करता हूँ जो एक दिन में कई-कई पोस्ट posts ठेलते हैं। पोस्ट में कुछ हो न हो दर्ज़नों टिप्पणियाँ मार ले जाते हैं. शीर्षक कुछ यों होते हैं- 'लुच्चा कहीं का' या 'मेरा ब्लॉग पढ़ा तो गोली मार दूंगा' टाइप type. टिप्पणियाँ करनेवालों का भी सिंडीकेट sindicate है. पसंद की लिस्ट में इन्हें ७-८ पसंद आसानी से मिल जाती हैं. चाहे पोस्ट में किसी ने माँ-बहन की गालियाँ ठेली हों या फूल-पत्ती-चिड़िया पर कोई कविता पेली हो.


मेरे रोने-धोने का अंत नहीं है। आंसुओं की धार तब और तेज हो जाती है जब मैं ब्लॉग लिखने की अनुमानित लागत कूतना शुरू करता हूँ। ब्लॉग लिखने से पहले मूड mood बनाना होता है. एक ब्लॉग लिखते-लिखते कई पॉकेट सिगरेट sigarette , कुछ मदिरा की बोतलों और इंटरनेट internet का बिल इतना बन जाता है कि एनजीओ NGO खोलने का मन करने लगता है.


लेकिन क्या करें! रहा भी न जाए, कहा भी न जाए और सहा भी न जाए की स्थिति हो चुकी है।
अपनी तो यह हालत है कि- 'हेरी मैं तो ब्लॉग दीवाणी, मेरो दरद न जाने कोय।"

गुरुवार, 1 मई 2008

'शहीदगाथा-२' अमर शहीद सोहनलाल पाठक

This article is about an unknown martyr. अमर शहीद सोहनलाल पाठक Sohanlal Pathak का जन्म सन् १८८३ में पट्टी गाँव जिला अमृतसर में पंडित जिंदा राम के घर में हुआ था। गाँव में मिडिल पास कर वह शिक्षक बन गए. इसी बीच उनका सम्पर्क लाला हरदयाल और लाला लाजपत राय से हुआ, जिनकी प्रेरणा से वह निष्ठावान क्रांतिकारी बने. उनके एक मित्र ज्ञान सिंह स्याम देश में रहकर क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़े थे. उन्हीं के आग्रह पर सोहनलाल पाठक भी यहाँ पहुंचे, परन्तु कार्यक्षेत्र सीमित जानकर वहाँ से उन्होंने अमेरिका जाने का निश्चय किया.

सोहनलाल पाठक को जहाँ विनायक दामोदर सावरकर (Vinayak Damodar Savarkar) से क्रांतिकारी बनने की प्रेरणा मिली वहीं नलिनी घोष भी उनके प्रेरणास्रोत रहे। नलिनी घोष नज़रबंद थे. अंग्रेजों की आँख में धूल झोंक कर वह चंदन नगर पहुँच गए और वेश बदलकर सन् १९१९ में बिहार पहुँच कर संगठन कार्य का संचालन करने लगे. पुलिस के पीछा करने पर वह गौहाटी चले गए और वहाँ सक्रिय हो गए. लेकिन पुलिस ने उनका पीछा यहाँ भी नहीं छोड़ा और तंग आकर घोष को दूसरा अड्डा तलाशना पड़ा.

दिनांक १५ जून १९१८ को ढाका में तारिणी मजूमदार के मकान को पुलिस ने घेर लिया। पुलिस को गुप्तचरों द्वारा सूचना मिली थी की नलिनी घोष उस अड्डे पर सक्रिय हैं. दोनों तरफ़ से गोलियाँ चलीं. मजूमदार शहीद हो गए. पुलिस घायल नलिनी घोष के निकट पहुँची और नाम पूछा तो घोष ने निर्भीक होकर अपना नाम बताया और कहा कि उन्हें भारतमाता के चरणों में अपने प्राणों की आहुति देने दी जाए.

पाठक जी के मित्र ज्ञान सिंह ने पत्र लिखा - 'हम लोगों ने जंगलों में जाकर मातृभूमि की आज़ादी के लिए फांसी चढ़कर मरने की शपथ ली थी। अब वह समय आ गया है.'

उन दिनों सोहनलाल पाठक अमेरिका में सक्रिय थे। उन्हें आदेश मिला कि वह बर्मा पहुँचकर सैनिकों में काम करें. पाठकजी ने आदेशानुसार बैंकाक मार्ग से बर्मा में प्रवेश किया और अपना काम बड़ी चतुराई तथा मनोयोग से प्रारंभ कर दिया. वह फौज़ में विद्रोह कराने में सफल रहे.

एक दिन पाठक जी गुप्तरूप से जब फौज़ के जवानों को देशभक्ति और अंग्रेजों के विरुद्ध मरने-मारने का पाठ पढ़ा रहे थे, अचानक एक भारतीय जमादार ने उनका दांयाँ हाथ पकड़ लिया और अपने अफ़सर के सम्मुख प्रस्तुत करने के लिए ले जाने का बलात् प्रयास करने लगा। पाठकजी को यह आशंका न थी. उन्होंने जमादार को काफी समझाया पर वह नहीं माना.

यद्यपि पाठकजी उस समय सशस्त्र थे, जमादार का काम तमाम कर सकते थे। लेकिन एक भारतीय भाई का खून अपने हाथों से बहाना उन्होंने उचित नहीं समझा. उन्हें लगा कि इस कृत्य से उनका क्रांतिकारी संगठन कलंकित हो जायेगा. वे स्वयं गिरफ़्तार हो गए. मुक़दमा चला और उन्हें फांसी की सज़ा सुनाई गयी.

जेल में उन्होंने कभी जेल के नियमों का पालन नहीं किया। उनका तर्क था कि जब अंग्रेज़ नियमों को नहीं मानते तो उनके नियमों का बन्धन कैसा? बर्मा के गवर्नर जनरल Governer General ने जेल में उनसे कहा- 'अगर तुम क्षमा मांग लो तो फांसी रद्द की जा सकती है.' पाठकजी ने जवाब दिया- 'अपराधी अंग्रेज हैं, क्षमा उन्हें मांगनी चाहिए. देश हमारा है. हम उसे आज़ाद कराना चाहते हैं. इसमें अपराध क्या है?'

बर्मा जेल के रिकॉर्ड Record बताते हैं कि फांसी के समय पाठकजी ने जल्लाद के हाथों से फांसी का फंदा छीन कर स्वयं अपने गले में डाल लिया था।

किसी कवि ने ऐसे ही जाँबाजों के लिए कहा है कि-

गर्दन अब हाथ से अपने ही कटानी है हमें,
मादर-ए-हिंद पे यह भेंट चढ़ानी है हमें,
किस तरह मरते हैं अहरार-ए-वतन भारत पर,
सारे आलम को यही बात दिखानी है हमें।


'मीरा-भायंदर दर्शन' द्वारा प्रकाशित 'शहीदगाथा' से साभार