गुरुवार, 21 जनवरी 2010

साल २०१०: भविष्य को लेकर साहित्यकारों की राय

साल २०१० और आने वाले समय की पड़ताल को लेकर साहित्यकारों से हुई बातचीत की लम्बी श्रृंखला ब्लॉग 'कबाड़खाना' में चलाई गयी. अब वह पूरी बातचीत पाठक एक ही जगह इस लिंक पर देख सकते हैं. साहित्यकारों का क्रम पहले हुई बातचीत के आधार पर बनता चला गया. हम कई और महत्वपूर्ण रचनाकारों को इसमें शामिल करना चाहते थे लेकिन कुछ हमारी तकनीकी सीमाएं, अड़चनें और कुछ उनकी व्यस्तताएं रोड़ा बन गयीं. बहरहाल उम्मीद ही नहीं बल्कि पूर्ण विश्वास है कि आगे भी श्रद्धेय साहित्यकर्मी एवं सहृदय पाठकगण स्नेह बनाए रखेंगे.


आबिद सुरती (पेंटर, कार्टूनिस्ट, कहानीकार, उपन्यासकार, नाटककार):
नए साल में मैं देखना चाहूंगा कि अपनी संस्कृति को कैसे सुरक्षित रखा जाए. यह जो वैश्वीकरण आगे बढ़ रहा है वह सब कुछ तहस-नहस किये डाल रहा है. यह अमेरिकी संस्कृति है जो पूरी दुनिया पर छाती जा रही है और सब कुछ खाती जा रही है. यह हर हाल में रुकना चाहिए.

मैं मानता और कहता हूँ कि भारतीय संस्कृति दुनिया में सर्वश्रेष्ठ है और अमेरिकी संस्कृति दुनिया में सबसे घटिया है. आज के बच्चे टिफिन में नूडल्स लेकर स्कूल जाते हैं, जिनमें कोई पौष्टिकता नहीं होती कोई विटामिन नहीं होता. हमारी संस्कृति में माँ बाजरे की रोटी पर घी चुपड़ कर देती थी. अमेरिकी संस्कृति जहां भी जाती है, वायरस की तरह वहां की लोक-संस्कृति को चट कर जाती है.

चित्रकारिता जगत में नया साल खुशियाँ लेकर आयेगा. आज हुसैन, रज़ा, सुजा, गायतोंडे आदि की पेंटिंग्स लाखों-करोड़ों में बिकती हैं. इस दुनिया का विस्तार हो रहा है. आज एनीमेशन आ गया है, कार्टून चैनल्स हैं, कार्टून फ़िल्में बनती हैं...इससे सैकड़ों नए-नए कलाकारों को खपने की जगह मिलती है. पहले स्थान बहुत सीमित था. आज के दौर को आप कार्टूनिस्टों का स्वर्णयुग कह सकते हैं. साल २०१० में पेंटर भी अच्छा काम और दाम पायेंगे.'

प्रोफेसर कमला प्रसाद (आलोचक, सम्पादक 'वसुधा'):

मैं इस व्यवस्था में लगातार ह्रास देखता हूँ और इसीके बढ़ते जाने की आशंका है क्योंकि इसमें जैसे-जैसे गरीबी और अमीरी की खाई बढ़ेगी, देश में पैसे का कब्ज़ा बढ़ेगा. चुनाव में, राजनीति में पैसे का कब्ज़ा बढ़ेगा. अमरीकी दोस्ती सघन होगी तो आतंकवाद, नस्लवाद, क्षेत्रवाद बढ़ेगा. हर समस्या का निदान क़ानून-व्यवस्था की समस्या माना जाएगा. नक्सलवाद की समस्या के लिए सेना की तरफ देखा जाएगा...तब हम क्या उम्मीद कर सकते हैं...साल २०१० में...२०११ में और उसके आगे के वर्षों में भी...

जबसे यह भूमंडलीकरण का राज आया है तबसे विकास की थोथी चर्चा होती है. समता की बात नहीं होती...तो ऐसे में कैसा जनतंत्र? रूसो ने कहा है कि ऐसे किसी जनतंत्र की कल्पना नहीं की जा सकती जिसमें समता न हो...आज हमारे देश के हर आदमी के अवचेतन में अज्ञात भय और अमूर्त गुस्सा व्याप्त है. यह जनतंत्र के चरित्र का सबसे घातक पहलू है.

ऐसी परिस्थितियों में उम्मीद की किरण हमारी जागरूक युवा पीढ़ी है और जो जागरूक मीडिया वाले लगातार विपरीत परिस्थितियों में सकारात्मक बातें जनता के सामने रखते चलते हैं, उनसे भी आने वाले समय में उम्मीद बंधती है. यह मीडिया बड़ी-बड़ी साजिशों को विफल करके नई उम्मीदों को जन्म देता है. अगले साल उन्हीं उम्मीदों के विस्तार की आशा करता हूँ. जनता में सामूहिक भाव-बोध आने वाले समय में सामाजिक परिवर्त्तन का कारक बनेगा. मैं अब भी मानता हूँ कि कला और संस्कृति का क्षेत्र तथा माध्यम अग्रगामी है और यही परिवर्त्तन की राह दिखाएगा.


निदा फाज़ली (वरिष्ठ शायर): मुझे कोई उम्मीद नहीं है. पिछला साल अपने दुखों के साथ चला जाता है और नया साल अपने ग़मों के साथ आता है. मेरा एक शेर है-

'रात के बाद नए दिन की सहर आयेगी

दिन नहीं बदलेगा, तारीख़ बदल जायेगी.'


...सो कैलेण्डर बदलता है, कैलेण्डर के बाहर का माहौल नहीं बदलता. वह २००९ हो, २०१० हो या कोई और साल हो... बाहर की फिजायें, हवाएं, सदायें जस की तस रहती हैं.

बहुत बड़ी बात यह है कि भाजपा ने इंडिया शाइनिंग का नारा दिया था, कांग्रेस इंडिया इज शाइनिंग कह रही है...लेकिन जिस देश में नंदीग्राम हो, सिंगूर हो, भिंड हो, मुरैना हो, मोतिहारी हो... और ऐसे ही अनेक अंधेरों के क्षेत्र फैले हुए हों जो देश की आबादी के तीन चौथाई से ज्यादा हैं...वहां बहुत उम्मीद क्या करना...बस इन्हीं लोगों के लिए भूख है... मंहगाई है...महामारियां हैं...२००९ में भी थीं और क्या आप कह सकते हैं कि २०१० में नहीं रहेंगी?

आज़ादी से अब तक... और ब्रिटिश राज में तथा उसके पहले से भी आम आदमी का शोषण हमारी तहजीब की पहचान रहा है...पुराने युग में भी था...२०१० में भी रहेगा. नए साल के लिए मेरा कोई सुझाव नहीं है... बस इतना कहता हूँ कि भगवान ने इंसान को बनाया तो शैतान को भी नहीं मारा...रामकथा में दिलचस्पी रावण के कारनामों के चलते कायम रहती है...यही २०१० में होगा...इक़बाल का एक शेर है-

'गर तुझे फ़ुरसत मयस्सर हो तो पूछ अल्लाह से

क़िस्सा-ए-आदम को रंगीं कर गया किसका लहू.'


फ़िल्मी गीत-संगीत एक व्यापार है और व्यापार चलता रहता है. एक बात गौर करने लायक है और वो यह कि पहले फिल्मों की दुनिया में प्रवेश पाने के लिए जो पासपोर्ट मिलता था वह इस आधार पर मिलता था कि आपने कितनी बढ़िया शायरी की है, आप कितने जहीन हैं, आपकी कितनी किताबें छप चुकी हैं. शैलेन्द्र, साहिर, राजा मेंहदी अली खाँ, भारत व्यास आदि गीतकार यही पासपोर्ट लेकर दाखिल हुए थे. आज हालत यह है कि अगर आपमें ये विशेषताएं हैं तो आपको बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा. वजह यह है कि जैसा लिखवाने वाला वैसा ही लिखने वाला.

नए साल के लिए मैं अपना एक दोहा पाठकों को भेंट करना चाहता हूँ-

'किरकिट, नेता, एक्टर, हर महफ़िल की शान

स्कूलों में क़ैद है, ग़ालिब का दीवान.'


नई नस्ल के लिए मेरा यही सन्देश होगा कि वे स्कूलों में क़ैद ऐसे कई गालिबों को आज़ाद कराएं और उनका नेताओं, एक्टरों और क्रिकेटरों से ज्यादा सम्मान करें. शुक्रिया...धन्यवाद!"

लीलाधर जगूड़ी (वरिष्ठ कवि):
एक उम्मीद तो यही है कि साल २००९ में जो काम नहीं कर सका वे २०१० में जरूर कर सकूंगा. दूसरी उम्मीद यह करता हूँ कि साल २०१० साल २००९ की पुनरावृत्ति न हो. मैं चाहता हूँ की खेती-बाड़ी और बागवानी संबंधी उत्पादनों के बारे में भारत में एक नयी शुरुआत हो. राष्ट्रीयता के बारे में विचारों को लेकर बदलाव आना चाहिए. अब अपनी-अपनी अंतरराष्ट्रीयता न हो बल्कि सबकी एक जैसी अंतरराष्ट्रीयता हो तो अच्छा होगा. हम राष्ट्रों के नागरिक होते हुए भी विश्व नागरिकता की और बढ़ सकें तो संयुक्त राष्ट्र संघ को वीजा जारी करने का अधिकार मिल जाएगा...वरना काहे का संयुक्त राष्ट्र संघ?

साहित्य जगत में इस समय मुझे दो ख़तरे स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं जो २००९ ने पैदा नहीं किये लेकिन २००९ में वे पुख्ता अवश्य हुए हैं. एक तो कविता के प्रति लगावाहीनता की बात जाहिर की गयी है जो एक अभिशाप से कम नहीं है. कवियों को कविता की ताकत और उसकी लोकप्रियता के बारे में फिर से सोचना चाहिए. दूसरा खतरा यह है कि गद्य को कविता की शक्ति से वंचित किया जा रहा है. यह गद्य के लिए शुभ लक्षण नहीं है. साहित्य अपनी तमाम विधाओं में आगे बढ़ता हुआ नहीं दिख रहा है. उम्मीद है कि २०१० में निबंधों और नाटकों की एक नयी शुरुआत होगी ताकि गद्य में काव्य-गुण बचा रह सके.


चंद्रकांत देवताले (वरिष्ठ कवि): जो उम्मीदें १९५० में थीं वे निरंतर कम होती जा रही हैं. भले ही लोग मुझे निराशावादी होने के कटघरे में खड़ा कर दें, इस देश की वास्तविक जनता के लिए मुझे २०१० में कोई उम्मीद नज़र नहीं आती. यह सारा तमाशा अर्थशास्त्र का हो रहा है और ज़िंदगी की बुनियादी समस्याएं नेपथ्य में ढंकी हुई हैं.

भविष्य में मैं चाहूंगा कि शिक्षा के सामान अवसर हों. जो शिक्षा अमीर आदमी के बेटे-बेटियों को मिलती है वही इस देश के गरीब आदमी के बच्चों को मिलना चाहिए. स्वास्थ्य सुविधाएं, स्वच्छता की सुविधाएं गाँवों, दलित बस्तियों और झुग्गी-झोपड़ियों में...सब जगह एक जैसी होना चाहिए. जनता के प्रतिनिधि, वे चाहे संसद में हों या विधानसभाओं में...यदि वे सदन का बहिष्कार करते हैं तो राष्ट्रीय संवैधानिक शपथ की अवमानना के आरोप में उन पर मुक़दमा चलाया जाए और उनकी सदस्यता समाप्त की जाए. न्याय-प्रणाली का जो अन्याय गरीब, कमज़ोर और असमर्थ लोग भुगत रहे हैं, वह तुरंत समाप्त होना चाहिए. यह सपना पूरा होना बहुत कठिन है, इसलिए मुझे अधिक उम्मीद नज़र नहीं आती.

साहित्य बिरादरी से मैं यही अपेक्षा करूंगा कि वे शब्दों के गढ़ों और मठों से बाहर आयें तथा जितना संभव हो, अपना प्रतिरोध सड़क पर दर्ज़ कराएं.

पंकज बिष्ट (कथाकार-उपन्यासकार): मैं उम्मीद करता हूँ कि हमारे शासक वर्ग में बेहतर समझ जाग्रत होगी. दूसरी ओर मैं देश की आम जनता से भी उम्मीद करता हूँ कि अगले वर्षों में वह अपने अधिकारों के प्रति अधिक सचेत होगी और अपने साथी नागरिकों के प्रति एक न्यायिक दृष्टिकोण अपनाएगी.देश की आर्थिक नीतियों से जो वर्ग सबसे ज्यादा लाभान्वित है, उसे यह समझना चाहिए कि यह सब किसकी कीमत पर हो रहा है. लोग विस्थापित हो रहे हैं, उनकी ज़मीनें छीनी जा रही हैं. अगर विकास इस कीमत पर हो रहा है तो चेत जाना चाहिए. अगर लोगों को जीने के अधिकार नहीं मिलेंगे तो जो तथाकथित आर्थिक सफलताएं इस राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था में नज़र आ रही हैं, वे ज्यादा दिन नहीं टिकेंगी.

हिन्दी साहित्य के सम्बन्ध में मैं यह चाहता हूँ कि इसकी सरकारों पर निर्भरता घटे. सबसे बड़ी बात मैं यह देखना चाहूंगा कि सरकार द्वारा हो रही पुस्तकों की थोक खरीद बंद हो. इस प्रवृत्ति ने पूरे हिन्दी साहित्य को ख़त्म कर दिया है. अगर हमें अपने साहित्य को बचाना है तो हमारी पुस्तकों का वास्तविक ख़रीदार पाठक-वर्ग तैयार करना होगा.


डॉक्टर विजय बहादुर सिंह (आलोचक, सम्पादक 'वागर्थ'): साल २०१० में लगता है कि लोगों का क्षोभ और ग़ुस्सा बढ़ेगा. न्याय की आकांक्षा ज्यादा प्रबल होगी. जनतांत्रिक संस्थाएं और उसकी जो प्रक्रिया है, उनकी नैतिक उपस्थिति पर लोग संदेह से भरते चले जायेंगे.

सोच रहा हूँ कि आज़ादी के बाद से समाज का लोप हुआ है और सत्ता समाजभक्षी ताक़त के रूप में सामने आयी है. मजबूर होकर लोगों को इस समाज को ज़िन्दा करना होगा ताकि सरकारें समाज के गर्भ से ही पैदा हो सकें. अगर ऐसा होगा तभी कुछ उम्मीद की जा सकती है.

साहित्य से मैं हमेशा यह कामना करता हूँ कि वह लोगों के संघर्ष की क्षमता को और अधिक उद्दीप्त करे. वह लोकचित्त के अधिक करीब आये. ऐसा तभी संभव है जब रचनाकार अपने ज़मीनी यथार्थ को अपनी स्वाधीन आँखों से देखने का सामर्थ्य प्रदर्शित करेगा.


राजेश जोशी (वरिष्ठ कवि): इच्छा तो होती है कि देश में बहुत सारी जो चीज़ें बरसों से अनसुलझी पड़ी हैं उन्हें सुलझाया जाए. उम्मीद है कि आतंकवाद के खिलाफ़ जो लम्बी लड़ाई चल रही है, उसका सकारात्मक हल २०१० में निकलेगा और दुनिया से इस तरह की हिंसा समाप्त होगी. हम कामना करते हैं कि विकास के रास्ते पर देश इस ढंग से चले कि बेकारी, गरीबी और हर तरह की असमानता दूर हो. रोज़गार के नए-नए अवसर पैदा हों.

एक बात गौर करने लायक है कि सांस्कृतिक स्तर पर साल २००९ बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण गुज़रा है. पूरे साल व्यर्थ की उठापटक चलती रही है, संगठनों एवं साहित्यकारों को लेकर विवाद हुए हैं. ज्यादा सृजनात्मक कार्य नहीं हुआ. अकादमियां भी निरर्थक ढंग के विवादों में घिर गयी हैं. इस पर सरकारों को गंभीरता से सोचना चाहिए और इसे सुधारना भी चाहिए. अकादमियां सृजन और कला से जुड़ी होती है इसलिए उन्हें संचालित करने की जिम्मेदारी इसी क्षेत्र से जुड़े लोगों को सौपना चाहिए. मेरा यह भी कहना है कि जिस तरह दिल्ली साहित्य अकादमी का अध्यक्ष अशोक चक्रधर को बनाया गया वह ठीक नहीं हुआ. दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित एक समझदार राजनीतिज्ञ हैं लेकिन इस मामले में उनकी हठधर्मिता गैरवाजिब थी. चक्रधर मेरे मित्र हैं, पढ़े-लिखे व्यक्ति हैं लेकिन वह हिन्दी काव्य-मंचों के लोकप्रिय कवि हैं. हिन्दी साहित्य अकादमी एक गंभीर साहित्यिक संस्थान है. उसमें किसी गंभीर साहित्यकर्मी को लाना चाहिए था.

आग्नेय (वरिष्ठ कवि): मैंने तो आँखें बंद कर रखी हैं और कान भी. निजी ज़िंदगी में जो चीज़ें हो रही हैं वही व्यक्ति के लिए महत्वपूर्ण होती हैं. जैसे कोई किसी से बहुत प्यार करता हो और वह दुनिया से चला जाए, या परिवार का कोई सदस्य विक्षिप्त हो जाए तो उसकी ज़िंदगी में भूचाल आ सकता है. अब सरकारें किसकी बनती हैं, राहुल गांधी पीएम बनेंगे या नहीं या अमेरिकी संस्कृति हमला कर रही है आदि सवाल मेरी ज़िंदगी में बहुत मायने नहीं रखते. देखना यह चाहिए कि एक व्यक्ति; एक नागरिक की ज़िंदगी में क्या हो रहा है. मनुष्य की यात्रा को विचारधारा के चश्मे से देखना संभव नहीं है...ठीक भी नहीं है.

टीएस इलियट ने कहा था कि आप किसी चीज़ की उम्मीद न करें क्योंकि वह उम्मीद किसी ग़लत चीज़ के लिए होगी. जैसे मैं कहूं कि दालों के भाव कम हो जाएँ या साग-सब्जी-फल वगैरह सस्ते हो जाएँ… तो यह उम्मीद करना भी ग़लत ही साबित होता है. अब जैसे जलवायु का संकट है… तो वह किसी ख़ास तरह के राष्ट्रों की साजिश नहीं है, बल्कि यह पूरी मानव सभ्यता का संकट है. ओबामा और मनमोहन सिंह मनुष्य ही हैं. ग्लोबल वार्मिंग को हम अमेरिका का संकट नहीं कह सकते.

अपनी पृथ्वी का भविष्य भी चमकीला नहीं है. मनुष्य जबसे इस पृथ्वी पर है उसने चींटियों, मधुमक्खियों, पशुओं यहाँ तक कि मछलियों की जगह भी छीन ली है. कोई इन जीव-जंतुओं से पूछे कि मनुष्य ने उनके साथ शुरू से ही क्या सुलूक किया है? वैसे भी माना जा रहा है कि चीजें अंत की तरफ बढ़ रही हैं. मेरा पूरा विश्वास है कि पृथ्वी पर जीवन का अंत होने वाला है और इसे कोई रोक नहीं सकता.
साहित्य में मुझे लग रहा है कि यह बड़े लेखन का दौर नहीं है. संगीत में भी बीथोवन और मोजार्ट अब कहाँ पैदा हो रहे हैं?


मंगलेश डबराल (वरिष्ठ कवि):
साल २००९ के अंत में पीएम डॉक्टर मनमोहन सिंह ने कांग्रेस के इंदिरा भवन का शिलान्यास करते हुए दिल्ली में कहा कि देश में आतंकवाद, साम्प्रदायिकता, नक्सलवाद और क्षेत्रवाद- ये चार बड़ी चुनौतियां हैं. पीएम खुद यह भूल गए कि गरीबी एक बहुत बड़ी समस्या है. बाज़ारवाद के समर्थक पीएम को बढ़ती हुई गरीबी नहीं दिखाई देती. जब तक भारत अमेरिकापरस्ती नहीं छोड़ता है और बाज़ारवाद का साथ नहीं छोड़ता है...अगर भारत यह मान कर चल रहा है कि सारी समस्याओं का हल दमन के जरिये किया जा सकता है तो वह भ्रम है. पीएम द्वारा गिनाई गयी चार चुनौतियों से भी बड़ी चुनौती नव-उदारीकरण और भूमंडलीकरण है.

मेरा मानना है कि नए साल में लगभग यूरोपीय यूनियन की तर्ज़ पर एशियाई देशों की यूनियन बनाने की पहल होना चाहिए. इससे बहुत सारी समस्याएं हल हो जायेंगी.

साल २०१० में मुझे आशंका है कि साहित्य में निजीकरण और निगमीकरण का दौर चलेगा. संस्कृति के दूसरों हिस्सों में कार्पोरेटाईजेशन हो ही रहा है. चित्रकला में भी वे लोग घुस गए हैं. देखिये कि केन्द्रीय साहित्य अकादमी का जो 'रवीन्द्रनाथ ठाकुर पुरस्कार' है, इसकी धनराशि कोरिया की बहुराष्ट्रीय कंपनी सैमसंग देने जा रही है. यह पुरस्कार ८ भाषाओं में है. सोचिये कि कितने साहित्यकार इस धनराशि के लपेटे में आ जायेंगे. यह ख़तरे की घंटी है. लेखकों को सचेत हो जाना चाहिए. साहित्य में निजी पूंजी का प्रवेश बड़ा नुकसान पहुंचाएगा. इस बात की क्या गारंटी है कि कल को साहित्य अकादमी के मुख्य पुरस्कारों को कोई निजी कंपनी प्रायोजित नहीं करने लगेगी.

दूसरी बात यह है कि एक तरफ हम गांधी जी द्वारा उपयोग में लाई गयी कई चीज़ों को दुनिया भर में जगह-जगह से इकट्ठा करने की मुहिम छेड़े हुए हैं और दूसरी तरफ हम रवीन्द्रनाथ ठाकुर के नाम का पुरस्कार बहुराष्ट्रीय निगम को सौंप रहे हैं.

साहित्य में वैचारिक और नैतिक गिरावट आती जा रही है. इसके बढ़ते जाने की आशंका है. साहित्य देश के साधारण जन से दूर जा रहा है. इसकी दिशा खाते-पीते मध्य-वर्ग की तरफ है. मुझे लगता है कि साहित्य को साधारण जन के निकट ही रहना चाहिए. एक उम्मीद यह भी है कि साल २०१० में महिला और दलित लेखन से कोई महत्वपूर्ण कृति आयेगी.


सुधा अरोड़ा (वरिष्ठ कथाकार):
आज जैसी स्थितियां हैं उसमें बदलाव की गुंजाइश बहुत कम दिखाई दे रही है. आम जनता महंगाई की चक्की में पिस रही है...पूरा परिदृश्य ही काफी निराशाजनक है. राजनेताओं में जिस तरह भ्रष्टाचार पनपा हुआ है उसका कोई तोड़ नज़र नहीं आता. देश की बागडोर जिनके हाथ में है अगर वही भ्रष्ट हों तो आम जनता कितना भी बड़ा आन्दोलन क्यों न खड़ा कर ले, उससे क्या होगा...और आन्दोलन जनता खड़ा कैसे करेगी जबकि उसके ही जीने के लाले पड़े हुए हैं. न्याय-व्यवस्था का ढांचा चकनाचूर हो चुका है. अभी रुचिका का मामला ही देख लीजिये...

साहित्य जगत में भी मुझे निराशाजनक परिदृश्य दीखता है. जब लेखकों के अपने कोई नैतिक मूल्य नहीं हैं, जब उनमें ग़लत को ग़लत कहने का माद्दा नहीं है, सच सुनने-सुनाने का साहस नहीं है, सच्चाई के पक्ष में खड़े होने का दम नहीं है तो ऐसे लेखकों द्वारा रचे गए साहित्य से हम क्या उम्मीद करेंगे? लेखन में मैं कई बार मोहभंग की स्थिति से गुजर चुकी हूँ और आज भी समझ लीजिये कि वही दौर चल रहा है.

कुमार अम्बुज (कवि, हालिया कविता-संग्रह 'अतिक्रमण’):
पेड़ों और फसलों के लिए धरती पर लगातार कम होती जगह. पानी की मुश्किल. साम्राज्यवादी, पूंजीवादी समाज का रचाव और फैलाव. विकास के जनविरोधी प्रस्ताव. प्रतिरोध और आन्दोलनों की अनुपस्थिति. ये कुछ चिंताएं हैं जिनसे अक्सर मैं इधर घिरा रहता हूँ. जैसे इन सब बातों के बीच एक तार जुड़ा है जो इन्हें एक साथ रखता है. इन पर अलग-अलग विचार किया जाना शायद संभव नहीं. इन पर एक साथ ही गौर करना जरूरी होगा. यह एक कुल चरित्र है और आफत है जो इस समय हमारे सामने रोज-रोज एक बड़े रूप में सामने आती जा रही है.

ऐसे में गुजरते वर्ष की एक रात बीतने भर से, किसी नयी सुबह में एक फैसलाकुन उम्मीद संभव नहीं. लेकिन प्रयास हों कि मध्यवर्ग में कुछ उपभोग वृत्ति कम हो, उसकी बाज़ार केन्द्रित आक्रामकता में कमी आये और वह मनुष्यता को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रही चीज़ों के प्रति अपना प्रतिरोधात्मक विवेक दिखा असके तो यह नए साल की उपलब्धि होगी. वह सूचना और ज्ञान से संचालित होने के साथ-साथ संवेदना और करुणा से भी चालित हो. फासिज्म के जितने लक्षण इटली और ख़ास तौर पर हिटलर की जर्मनी में दिखने लगे थे, वे सब आज हमारे देश में उपस्थित हैं. यही हमारे समय का प्रधान सांस्कृतिक लक्षण है. राजनीति से इसका सीधा गठजोड़ है और सामाजिक संबंधों को संस्कृति के नाम पर इसमें शामिल कर दिया गया है. राजनीति अप्रत्याशित भ्रष्टाचार के पराक्रमों का उदाहरण बन कर रह गयी है. नए साल में इन सब में अचानक कोई कमी आ सकेगी, ऐसी कोई आशा व्यर्थ है.

लेकिन मैं साहित्य से उम्मीद करता हूँ. यह ठीक है कि साहित्य अपनी भूमिका उतनी प्रखरता से नहीं निभा पा रहा है कि इस पतनशील और फासिस्ट समाज से लड़ने के लिए समुचित मार्गदर्शन और प्रेरणा दे सके. लेकिन साहित्य ही वह जगह होगी जहां से ऐसी प्रवृत्तियों की पहचान संभव हो सकेगी और प्रतिरोध के कुछ उपाय भी दिखेंगे. साहित्य में, ख़ास तौर पर कहानी में, बीच-बीच में कलावाद का ज़ोर भी उठता दिखाई देता है, उसकी जगह जीवन के उत्स, संताप और स्वप्नशीलता के जीवंत तत्वों को देखने की आशा की जानी चाहिए. हिन्दी कहानी, कविता और उपन्यास जहां तक आ गए हैं, वहां से एक नए प्रस्थान एवं अग्रगामिता की शुभकामना भी है.
लेकिन सारी आशाएं अंततः सकर्मक क्रियाओं से ही फलीभूत हो सकती हैं इसलिए हम सबके नागरिक प्रयास भी जरूरी होंगे.

एकांत श्रीवास्तव (कवि, हालिया कविता-संग्रह 'बीज से फूल तक'):
मैं कामना करता हूँ कि यह जो असमान छूती मंहगाई है वह नीचे उतरे ताकि एक बहुत साधारण व्यक्ति अपनी जेब की हैसियत के अनुसार अपना ठीक-ठीक जीवनयापन कर सके. मगर उत्तर-पूंजीवाद में यह संभावना कम बनती दिखाई दे रही है.

मैं यह मानता हूँ कि वर्त्तमान साहित्य से ही भविष्य की भूमिका बनती है. मैं चाहूंगा कि भविष्य का साहित्य पाठकों के अधिक करीब हो और उसका रास्ता दिमाग के साथ-साथ दिल से होकर भी गुज़रे. जैसा कि डॉक्टर रामविलास शर्मा ने कहा है कि सिर्फ विचारबोध से साहित्य पैदा नहीं होता, उसके लिए भाव-बोध ज़रूरी है.

डॉक्टर सूर्यबाला (वरिष्ठ कथाकार-व्यंग्यकार):

मुझे ध्यान में आता है कि कोलंबिया विश्वविद्यालय (न्यूयॉर्क) में एक छात्र ने मुझसे पूछा था कि जिस तरह की दुनिया की आप कल्पना करती हैं, जो सम्बन्ध आपके पात्र जीते हैं, जिस विश्व की आकांक्षा वे करते हैं, क्या आप सोचती हैं कि यथार्थ के धरातल पर वैसा कभी हो पायेगा?...तो इतने आदर्शों में जीने का अर्थ? इसके जवाब में मैंने कहा था कि मुझे मालूम है कि ऐसा कभी संभव नहीं हो पायेगा लेकिन इसका अर्थ यह तो नहीं कि हम सपने देखना छोड़ दें. एक अहम् बात यह भी है कि जब हम बहुत अच्छा सोचेंगे, दूसरों से उन विचारों को बांटेंगे, तो कम से कम हम अपने आस-पास एक छोटी ही सही, ख़ूबसूरत दुनिया बनाने में कामयाब होंगे.

साहित्य जगत में मेरे चाहने या न चाहने से एक साल के अन्दर कुछ नहीं होने वाला. फिर भी अच्छे साहित्य-सृजन की इच्छा बनी रहेगी. मेरी कामना है कि हम रचनाकार अपनी आत्ममुग्धता और स्वकेन्द्रीयता से मुक्त होकर ईमानदारी और पारदर्शिता से समाज की तरफ भी देखें. ज्ञान और शिक्षा ने हमें विनम्र और समझदार नहीं बनाया है. हम बातें ऊंची-ऊंची करते हैं लेकिन जीवन में उस सहजता और पारदर्शिता का निर्वाह नहीं कर पाते. लेकिन यही तो इस यांत्रिक जीवन की थोड़ी सी लाचारियाँ भी हैं.

राजेन्द्र दानी (वरिष्ठ कथाकार):

मैं एक अच्छा आदमी बनने के प्रयास में हमेशा सकारात्मक सोचता हूँ लेकिन आस-पास का माहौल निराश करता है. साल २०१० में सब कुछ चमत्कारिक रूप से बदल जाएगा, ऐसी मुझे उम्मीद नहीं है. अभी मैं निरंजन श्रोत्रिय की एक कहानी पढ़ रहा था, उसका शीर्षक है- 'जानवर'. इस कहानी में होता यह है कि पति-पत्नी सो रहे हैं और रात के वक्त कोई उनका दरवाज़ा खटखटाता है. वे इस डर से दरवाज़ा नहीं खोलते कि कोई जानवर होगा. सुबह पति उठता है तो देखता है कि भीड़ लगी हुई है और वहां एक शव पड़ा हुआ है. पति के मन में कौंधता है कि हो न हो यह वही शख्स है जो रात में मदद के लिए दरवाज़ा खटखटा रहा था.
बहरहाल, पति घर लौटता है तो पत्नी पूछती है कि इतनी देर क्यों लगा दी, क्या हुआ था. तो पति कहता है कि कुछ नहीं, कोई जानवर मर गया है.

हमारे आस-पास भी यही माहौल है. आज खुशियों का इजहार भी ज्यादा दूर तक नहीं पहुंचता. वैसे मुझे उम्मीदें तो बहुत हैं नए साल से. अभी हमने आमिर खान की 'थ्री ईडियट्स' देखी जबलपुर में. मैं था, ज्ञान जी थे, पंकज स्वामी थे, अरुण यादव थे. तो उस फिल्म ने हमें खुश कर दिया. फिल्म में बड़े ही ह्यूमरस तरीके से पूरी विट के साथ यह दिखाया गया है कि अकादमिक अथवा यांत्रिक शिक्षा से कोई सचमुच का शिक्षित नहीं हो जाता.

साहित्य के अलावा फिल्मों से समाज में बड़ा बदलाव आ सकता है. अब फिल्मों की परम्परागत भाषा और उसका मुहावरा बदल रहा है. अब वह घिसी-पिटी बात नहीं है कि 'अ ब्वाय मीट्स अ गर्ल.' एक और बात जो मैं २०१० में घटित होते देखना चाहूंगा कि साहित्यकारों की पुरानी पीढ़ी का नयी पीढ़ी से आत्मीय और गहरा संवाद स्थापित होना चाहिए. नई पीढ़ी के लोग अपने कैरियर को लेकर अति महत्वाकांक्षी हैं और उनमें वैचारिक आग्रह कम हो गया है.

सुधीर रंजन सिंह (कवि-आलोचक): अब तो लगता है कि दुनिया अपनी समझ से बाहर होती जा रही है और इसके कसूरवार भी हमीं लोग हैं. जाहिर है एक समय हम दुनिया को बदलने की बात करते थे, व्याख्या की नहीं. लेकिन दुनिया हमारे न चाहते हुए भी इतनी दूर तक बदल गयी है कि व्याख्याकार पीछे छूट गए. अब भी हमें लगता है कि व्याख्या में ही बदलने का काम संभव है.

जनता का जीवन सुकून से गुज़रे इस बात की गारंटी कोई नहीं दे सकता. होता यह है कि जो संस्कृति कर्म है, उसको जनता एक भिन्न वस्तु मान लेती है. संस्कृति कर्म के प्रति जनता में एक दायित्वहीनता है और संस्कृतिकर्मियों के यहाँ जनता को लेकर एक क़िस्म की बेफ्रिकी है. एक कलाकार अपने आत्मविश्वास में महत्वाकांक्षा से इस प्रकार ग्रस्त हो जाता है कि वह किसी तरह से जीवन को उत्तर देने के लिए बाध्य नहीं रहता. दूसरी तरफ जनता यह सोचती है कि यह तो कला है और पहुँच से बाहर है. आखिर हमारे पास जीवन निर्वाह के लिए नीरस गद्यात्मक संसार है. कला और जीवन एक नहीं है लेकिन उनको मुझमें (जनता + कलाकार में) एक होना होगा. मेरे उत्तरदायित्व की एकता में एक होना होगा. यही सूत्र हो सकता है.

साल २०१० में मैं चाहूंगा कि हमारा लेखन, हमारी कलात्मक अभिव्यक्तियाँ ज्यादा से ज्यादा हों और हमें वर्त्तमान सत्ता-संरचना पर एक दबाव समूह की तरह काम करना होगा. यह तभी संभव है जब साहित्य में मात्रात्मक एवं गुणात्मक परिवर्त्तन होंगे.

बोधिसत्व (कवि, हालिया कविता संग्रह 'दुःख तंत्र’):
मुझे उम्मीद यह है कि कविता में कथा तत्व की वापसी होगी क्योंकि बिना कहानी के न कविता जीवित रही है न रहेगी. अगर हम संसार भर के काव्य को ध्यान में रखें तो वही कवितायें जीवित नजर आती हैं जिनमें कहीं न कहीं कथा और चरित्र हैं. आप भारतीय मध्यकालीन साहित्य को ही ले लें, सूर, तुलसी, जायसी या आधुनिक काल के निराला, प्रसाद, टैगोर या अन्य बड़े कवि....तो इनकी सारी बड़ी रचनाएँ एक कथा कहती हैं और चरित्र प्रस्तुत करती हैं. आज की कविता में भी जो चरित्र प्रधान कवितायें हैं, वे ज्यादा पढ़ी जाती हैं, ज्यादा चर्चा में रहती हैं और ज्यादा लोगों को जोड़ती हैं और उनके स्मरण में रहती हैं. मेरी ही कवितायें 'माँ का नाच', 'पागलदास' और 'शांता' लोगों के जहन में मेरी ही दूसरी कविताओं की बनिस्बत ज्यादा गहरे बैठी हुई हैं क्योंकि इनमें कथा है, चरित्र हैं.

आज यह परिभाषित करना जरूरी है कि आम जनता क्या है? क्योंकि जो साहित्य आज लिखा जा रहा है वह किस टाइप की जनता के लिए है...जिसमें आप बदलाव लाना चाह रहे हैं. यह भ्रम भी दूर हो जाना चाहिए कि लिखने से जनता का कुछ भला होता है या समाज में परिवर्त्तन होता है या आर्थिक विसंगतियां दूर हो जाती हैं या साम्प्रदायिक दंगे रुक जाते हैं या किसानों की आत्महत्याएं रुक जाती हैं...तो यह समझना चाहिए कि कविता लिखने से बाल मजदूरी या दहेज़ प्रथा भी दूर नहीं होगी.

कविता आज कहने को तो 'उर्वर प्रदेश' में बतायी जा रही है लेकिन वह भयानक बंजर प्रदेश में भटक रही है... और २०१० में या २०२० तक में भी मुझे नहीं लगता कि वह सचमुच की काव्य-भूमि में लौटेगी. मैं चाहूंगा कि हम जितनी जल्दी चमत्कार पैदा करने वाली कवितायें लिखने से छुटकारा पा लें, उतना ही अच्छा होगा.

डॉक्टर सेवाराम त्रिपाठी (वरिष्ठ आलोचक, अध्यापक):
आनेवाले समय में हमारी आर्थिक-राजनीतिक स्थितियों में तेज़ी से बदलाव आयेगा. हम वैश्वीकरण, विदेशी पूंजी और काला-धन के दबाव का मुकाबला स्वदेशी पूंजी तथा अपने संसाधनों के माध्यम से कर सकेंगे. तय है हमें अपने पैरों पर खड़ा होना होगा... और हमारे लघु-कुटीर उद्योग धंधे, जिनको अभी तक हमने तिरष्कृत किया है और हाशिये पर रखा है, उन्हीं पर हमें ज्यादा ध्यान केन्द्रित करना होगा. विभिन्न रूपों में जो अर्थ की सत्ता है उसे आम आदमी तक बांटना पड़ेगा. तभी हम अपने देश का समग्र विकास कर सकते हैं. शिक्षा और स्वास्थ्य की सामान सुविधाएं देकर दलितों, वंचितों तथा आदिवासियों की स्थितियों में सुधार लाना होगा.

हमारे पुराने सामाजिक ढाँचे निरंतर टूट रहे हैं और सामाजिक रूपांतरण की प्रक्रिया बहुत तेज़ हो गयी है. शादी-विवाह के प्रसंगों में एक तरह का खुलापन आया है. इसी तरह छुआछूत आदि सन्दर्भों में भी व्यापक परिवर्त्तन परिलक्षित किये जा रहे हैं. जहां तक राजनीतिक स्थितियों का सवाल है तो जनता का मौजूदा राजनीति से मोहभंग हुआ है. संकीर्ण हितों के स्थान पर हिन्दुस्तान की जनता बहुत व्यापक परिवर्त्तन की आकांक्षी है इसलिए वह बड़े दलों के स्थान पर छोटे और क्षेत्रीय दलों को स्वीकार करने में गुरेज़ नहीं करती. हम देख सकते हैं कि साम्प्रदायिक ताकतें हताश होकर छद्म रूप से वामपंथी पैंतरे खोज रही हैं और उनका एकमात्र लक्ष्य सत्ता पर काबिज़ होना है. २०१० में इस प्रक्रिया में कोई बदलाव आता मुझे नहीं दीखता.

साहित्य जगत में अब केवल कल्पना की दुनिया से काम नहीं चलेगा. हमें यथार्थ को ठीक से पहचानना होगा. नारेबाजी के स्थान पर आम आदमी की दुनिया का चित्रण अपनी रचनाओं में करना होगा. हमारे साहित्य से गाँवों को लगभग देशनिकाला दे दिया गया है, जो थोड़ा-बहुत आते भी हैं तो वे स्मृतियों के गाँव हैं. साल २०१० में हमें इस पर ध्यान देना चाहिए.

तुषार धवल (कवि, कविता-संग्रह 'पहर यह बेपहर का'):
यह उपभोक्तावादी ताकतों से जोरदार युद्ध करने का समय है. बाज़ार इतनी तेजी से हमला कर रहा है कि सबको बस भागो और भोगो ही सूझ रहा है. मनुष्य के सोचने और विचार करने की शक्ति पर हमला करके उसे भोथरा बनाने का खेल जारी है. ऐसे में मैं चाहता हूँ कि कुछ ऐसा हो कि मानव के भीतर का मानव बचा रहे. वह मशीन न बन जाए. उपभोग की वस्तु न बन जाए. उसके भीतर की तरलता सुरक्षित रहे. आज आदमी का आदमी से जुड़ाव समाप्त होता जा रहा है ख़ास तौर पर मुंबई जैसे महानगरों में.

साहित्य जगत में एक तरह के विभ्रम की स्थिति है. यह तय नहीं हो पा रहा है कि हम किस दिशा में जाएँ. हमारी रचनाओं का कथ्य क्या हो, शिल्प क्या हो...खास कर कविता में. यह ऐसा समय है जब सारे वाद समाप्त हो गए हैं. दक्षिण या वाम का कोई सपना साकार नहीं होता दिख रहा है. सब ध्वस्त हैं. बाज़ार ने इसे बुरी तरह प्रभावित किया है. साहित्य में जो समर्पित गतिविधियाँ थीं वे अब तात्कालिक सफलता और झटपट यशप्राप्ति की कसरतों में तब्दील हो गयी हैं. तरह-तरह के गुट और रैकेट चल रहे हैं. यह भी उपभोक्तावाद का असर है.

लेकिन मेरे मन में एक बड़ी उम्मीद है. खास कर अपनी पीढ़ी के कवियों से यह उम्मीद है कि कोई रास्ता निकलेगा. अब भी साहित्य में समर्पित लोग बचे हुए हैं ...और २०१० में तो नहीं, पर लगता है कि अगले ५-१० वर्षों में साहित्य की दिशा तय हो जायेगी.

निलय उपाध्याय (कवि, हालिया कविता-संग्रह 'कटौती’): इन दिनों मैं बहुत निजी किस्म का जीवन जी रहा हूँ. मेरा कोई सामाजिक जीवन नहीं है. अभी जिन संकटों के दौर से गुज़र रहा हूँ उसमें सार्वजनिक जीवन के लिए कोई जगह नहीं है. पिछला साल जो बीता है उससे मेरी यही अपेक्षा थी कि मेरे परिवार को दो जून का भोजन मिलता रहे. मेरे बच्चों की पढ़ाई चलती रहे...और २००९ में यह पूरा हुआ. आने वाले साल में मैं यह चाहता हूँ कि इन जिम्मेदारियों से अलग होने का वक्त मिले, जिसमें मैं अपने मन के भीतर बसी दुनिया के बारे में लोगों को बता सकूं...कुछ कवितायें लिख सकूं... और जो विकास-क्रम अथवा परिवर्त्तन मेरे भीतर आया है, उसको बता सकूं.

साहित्यकारों से मेरा मोहभंग हो चुका है. अपने अपहरण काण्ड में फंसने की घटना की असलियत मैं अच्छी तरह से जान चुका हूँ. मैं अस्पताल में कंपाउंडर था और वेतन का आधा खर्च पत्र-पत्रिकाएं खरीदने...सदस्य बनने और साहित्यिक यात्राओं में ख़र्च करता था. किन्तु एक मुसीबत आने के बाद जिस तरह प्रेम कुमार मणि से लेकर राजेन्द्र यादव तक ने मुझे सवर्ण करार दे दिया, उससे मेरे दिल को बहुत गहरा धक्का पहुंचा. मुझे पहली बार ये अहसास हुआ कि ये लोग रचनाकार भले ही बहुत अच्छे हों, आदमी बुरे हैं. मैं कवि-लेखक बनकर न रहूँ तो कोई फ़र्क नहीं पड़ता लेकिन हिन्दी साहित्य के इन ढपोरशंखियों से अगले साल क्या, पूरी उम्र कोई सम्बन्ध नहीं रखना चाहता. ये लोग साहित्य के पाँव में मोजे की तरह महक रहे हैं और उनके बारे में सोचने पर इनकी ये गंध ज्यादा परेशान करती है. यही लोग हैं जो जनता और साहित्य के बीच बैठकर एक दूरी पैदा कर रहे हैं.

अगले साल मैं जो भी करना चाहता हूँ वह मेरी पारिवारिक परिस्थिति पर निर्भर करेगा. मैं बिहार सरकार की नौकरी से निकाल दिया गया था... और ४५ साल की उम्र में किसी नई जगह, किसी नई विधा में जड़ें जमाना आसान नहीं होता. पहले मैं बिहार के एक गाँव का निवासी था लेकिन मुझे अगर वक्त मिला तो अब मैं जिस जगह पर हूँ...पूरे देश के गाँवों से आए लोग यहाँ हैं...मैं उनकी पीड़ा, उनकी यातना और उनके जीवन में प्रवेश करने का प्रयास करूंगा...और अपनी कविताओं में यह बताऊंगा कि चाय पीते वक्त उनकी चीनी क्यों कम पड़ जाती है और दाल खाते वक्त नमक.


शिरीष कुमार मौर्य (कवि,अनुवादक, हालिया कविता-संग्रह 'पृथ्वी पर एक जगह'):

सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक स्तर पर तब्दीलियों को लेकर मैं किंचित हताश हूँ. देखना बहुत कुछ चाहता हूँ. एक कवि-नागरिक होने के नाते चाहता हूँ कि नए साल में चीज़ों में सुधार आये. समाज कुछ और मानवीय बने, राजनीति कुछ विचारपरक हो, बाज़ारवाद का छद्म कुछ और उजागर हो, दृष्टिकोण- ख़ास तौर पर स्त्रियों और दलितों के प्रति सामाजिक और राजनीतिक दृष्टिकोण में वांछित बदलाव आये. रही सुकून की बात तो आम आदमी को आज सुकून से ज़्यादा अपने जीवन में घट रही घटनाओं के प्रति जागरूकता और एक गहरी बेचैनी की ज़रुरत ज़्यादा है- सुकून की मंज़िल फ़िलहाल एक स्वप्न है.

साहित्य जगत से मैं महज एक ऐसी अर्थवान आलोचना की उम्मीद करूंगा जो तथाकथित बड़े आलोचकों के घिसे-पिटे पुराने मूल्यों से परे हो और किसी को कुछ बना देने या उसे मिटा देने के थोथे अहंकार से मुक्त भी. कविगण (ख़ासकर युवा कवि) भी हिंदी के इन चाँद-तारों की छाया से बाहर आकर रचनात्मक ऊर्जा के अपने भीतर के सूर्य को पहचानें. हिंदी पट्टी के पाठकों के प्रति उनका खोया विश्वास दुबारा जागे.

गीत चतुर्वेदी (कवि-कथाकार):


१. इंडिया और भारत का तथाकथित भेद मिट जाए/कम हो जाए.


२. कुछ अच्छी किताबें.


चंद्रभूषण (कवि, कविता-संग्रह 'इतनी रात गए'): इस साल मैं चाहूंगा कि बहुत सारे उद्योगों में जो छंटनी हो रही है और जो उद्योग मंदी का शिकार हैं, वहां दोबारा काम शुरू किया जाए. वहां लोगों के अधिकार सुरक्षित हों. मंहगाई से सबको राहत मिले.

साहित्य-संस्कृति के क्षेत्र में स्वाभाविक इच्छा है कि अच्छी रचनाएँ आयें. आम लोगों से, मेहनतकश लोगों से जो दूर जाने की प्रवृत्ति बढ़ी है वह घटे. कामना यह भी है कि दिल्ली में जो राष्ट्रकुल खेल होने जा रहे हैं वे अच्छी तरह से संपन्न हों और देश की साख को कोई बट्टा न लगे.






सुन्दर चंद ठाकुर (कवि, हालिया कविता-संग्रह 'एक दुनिया है असंख्य'): पहली बात तो यह है कि २००८ का अंतिम हिस्सा और लगभग पूरा २००९ मंदी की मार से आक्रान्त रहा. हज़ारों नौजवान सड़क पर आ गए, इनमें कई पत्रकार भी शामिल थे. नए लड़कों को नौकरियाँ नहीं मिलीं. उम्मीद है कि २०१० में ये स्थितियां पलट जायेंगी.

साल २०१० में मैं जिस तरह का बदलाव देखना चाहूंगा उसे यूटोपिया कह सकते हैं. लेकिन मन में बहुत बड़ा संशय है कि वह अगले साल तो क्या आनेवाले कई सालों में या इस देश में या पृथ्वी पर जीवन के रहते घटित हो पायेगा अथवा नहीं. दुर्योग से देश को चलाने के लिए जरूरी सारी ताक़त और धन राजनीति के हाथों में केन्द्रित हो गया है. ऐसे में अगर राजनीतिज्ञ समाज की जरूरतों को समझ पायें, नेतागण अपने नागरिक होने के कर्तव्यों को निभा पायें...तो संभवतः वे पिछड़े तबकों और जरूरतमंदों का लिहाज करेंगे और उन्हें सौंपी गयी ताक़त के जरिये नौकरशाहों को मजबूर करेंगे कि विकास का पैसा विकास के लिए ही इस्तेमाल हो.

हिन्दी साहित्य से मुझे सबसे बड़ी उम्मीद यह है कि वह हकीक़त को समझेगा और परम्पराओं में ढोई जाती रही नैतिकताओं और थोथे आदर्शों से बाहर निकलेगा. हिन्दी कविता में दुर्भाग्य से उन विषयों पर नहीं लिखा जा रहा जो हमारे रोज़मर्रा के जीवन और रिश्तों को प्रभावित करते हैं. आधुनिक जीवन की त्रासदियों को व्यक्त कर पाने वाले औजार वहां से नदारद दिखते हैं. आनेवाले वर्ष में अगर ऐसा हो पाए तो हिन्दी कविता विश्वमंच पर अपनी उपस्थिति जरूर दर्ज़ करेगी और कम से कम वह अपने ही समाज में अलोकप्रिय नहीं रहेगी.


सिद्धेश्वर सिंह (कवि, समीक्षक, अनुवादक): कैलेन्डर बदलने से उम्मीदें नहीं बदलतीं. बड़ी उम्मीदें बड़ी जगह, समय के बड़े हिस्से, बड़ी और लगातार कोशिशों तथा बड़े विचार से ही पूरी होती हैं. यह समय छोटी चीजों का है. हमारे गिर्द 'लघु-लघु लोल लहरें' उठती हैं और उनकी फेनिल आभा हमें समन्दर में गहरे उतरने से रोकती है, बहकाती है, बरजती है. फिर भी साहित्य की दुनिया में हाथ-पाँव मारते हुए यह यकीन कायम है कि शब्द में दम है और उम्मीद पर जहाँ कायम है.

हम सब जिस दुनिया और भूगोल के जिस हिस्से में रह रहे हैं वहाँ रोजमर्रा की परेशानियों का रोजनामचा नई-नई इंदराजों से भरता रहता है. इस समय खाने-पीने की चीजों के दाम जिस तरीके से बढ़ रहे हैं उससे हर स्तर के इंसान की रचनात्मकता/उत्पादकता या उसके आस्वादन/उपभोग का दायरा संकुचित, शिथिल व विकृत हुआ है. इसका असर कार्यक्षमता, कार्यप्रणाली और क्रियात्मकता पर भी पड़ा है.

छोटे-छोटे कस्बों में लगने वाले पुस्तक मेलों से उम्मीद बढ़ी है क्योंकि इनसे अच्छॆ साहित्य के वितरण का प्रक्षेत्र बढ़ा है फिर भी साहित्य सृजन, पुस्तक प्रकाशन और सही पाठक के बीच के पुल को सुगम, चौड़ा और सीधा बनाने की सख्त जरूरत है. नए रचनाकारों के समक्ष पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने का संकट अवश्य कम हुआ है क्योंकि खूब पत्रिकायें निकल रही हैं. हिन्दी ब्लॉग की भी एक बनती हुई दुनिया है जो साहित्य के लिए बहुत ही संभावनाशील माध्यम है. इसे साहित्यकारों को बहुत गंभीरता से लेने की जरूरत है.

गौर करने लायक बात यह है कि साहित्य की दुनिया में प्रलोभन और प्रपंच बढ़ा ही है. बड़े-बड़े नामों की कोई कमी नहीं है. उनके बड़े-बड़े कारनामे भी आत्मकथ्यों और संस्मरणों के माध्यम से खूब आ रहे हैं किन्तु हमारे पास बड़ी रचनाओं की कमी है. वैसे इस समय हिन्दी की नई पीढ़ी की रचनात्मकता उफान पर है. आइए दुआ करें कि उसे सही रहगुजर, सही रहबर और सही काफिला मिले.

बची हुई है उम्मीद की डोर. याद है न? हर रात के बाद भोर.

वीरेन डंगवाल (वरिष्ठ कवि):

हालिया वर्षों में हमारा महादेश कई सारे आशातीत परिवर्तनों से रूबरू हुआ है. कुछ तब्दीलियों को समाज ने अच्छे से आत्मसात कर पाने में सफलता प्राप्त की है. मिसाल के तौर पर सूचना क्रान्ति ने समाज, संस्कृति और अर्थव्यवस्था पर जो प्रभाव डाला है उसके सारे धनात्मक परिणामों ने अभी अपने आप को पूरी तरह प्रकट करना बाकी है. सभी धरातलों पर मूल्य बदल रहे हैं और मुझे लगता है कि आने वाले साल में यह क्रम और भी तेज़ी से चलता ही रहना है. मैं चाहता हूं कि सामाजिक और नैतिक मूल्यों में ह्रासोन्मुखता कम हो क्योंकि प्रत्यक्षतः सामाजिक और नैतिक मूल्य ही बाक़ी सारी चीज़ों को तय करते हैं.

साहित्य के क्षेत्र में; खासतौर पर हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में हमारे रचनाकारों को अधिक कर्मठ होने की ज़रूरत है. हमारे यहां 'बातें ज़्यादा और काम कम’ पर अधिक तवज्जो दी जाती रही है. फ़िज़ूल के सम्मेलन, पुरस्कार, विमोचन, गुटबाज़ी के चलते हिन्दी का जो नुकसान हुआ है, उसकी थोड़ी बहुत ही सही, भरपाई कर पाने के लिए कर्मठता सबसे ज़रूरी गुण है. जब रचना न हो पा रही तो अनुवाद किया जाना चाहिये. अनुवाद के मामले में हिन्दी अन्य तमाम भाषाओं से बेहद पिछड़ी हुई है. स्तरीय अनुवादों की भीषण कमी है. जब तक साहित्यकार स्वयं अनुवाद नहीं करते, स्थिति जस की तस बनी रहनी है. इसके अलावा हिन्दी के हर साहित्यकार को कम्प्यूटर का न्यूनतम ज्ञान प्राप्त करने का जतन करना चाहिये. समय के साथ बने रहने के लिये यह एक ज़रूरी औज़ार है. हिन्दी ब्लॉगिंग के क्षेत्र में जैसा क्रान्तिकारी कार्य हुआ है, उसे एक मिसाल के तौर पर देखे जाने की ज़रूरत है.


प्रत्यक्षा सिन्हा (कथाकार, कहानी-संग्रह 'जंगल का जादू तिल तिल'): मानवीय गुण अमानवीय गुणों पर भारी पड़ें, सँभावनायें हर क्षेत्र में बनी रहें, सपने देखने का भोलापन बरकरार रहे.

सामाजिक राजनीतिक स्तर में प्रतिबद्धता और उत्तरदायित्व बढ़े, सांस्कृतिक स्तर पर कुछ तोड़फोड़ की उम्मीद रखती हूँ, बने बनाये खाँचों के बाहर, अनदेखे रास्तों पर चलने का दीवानापन दिखे- ऐसी आकांक्षा है.

साहित्यजगत से बहुत भोली उम्मीदें हैं... मन की बेचैनियों का ईमानदार प्रतिवर्तन हो, कुछ अपनी अंतरतम दुनिया में मगन, एक्सर्टर्नल्स की परवाह किये बगैर अपनी रचनात्मकता में धूनी रमायें लोगों का कुनबा हो, अच्छा गंभीर सार्थक लेखन हो, कुछ बच्चे सा भोला उत्साह इन सब को स्फूर्ति देता रहे...बस इतना, इतना ही...


हरेप्रकाश उपाध्याय (कवि, प्रथम कविता संग्रह 'खिलाड़ी दोस्त और अन्य कवितायें'): मेरी वर्ष २०१० से पहली उम्मीद तो यही है कि लोग २००९ से सबक लेंगे.

कोई राठौर किसी रुचिका पर हाथ डालने से पहले कम से कम १० बार सोचेगा. कोई नारायण दत्त राजभवन की मर्यादा के बारे में ज्यादा संवेदनशील रहेगा. यानी सत्ता के जोश में लोग होश नहीं खोएंगे आदि, इत्यादि...

बाकी एकदम से तो यह नहीं लगता कि सचमुच का कोई बदलाव एकायक आ जाएगा नए साल में. अदालतें थोड़ी सुस्ती कम करें और बिजली गाँवों में चली जाए...लोग देश में निर्भय होकर कहीं भी आयें-जाएँ...यह सब हो तो कितना अच्छा, पर हो पायेगा क्या?

साहित्य जगत में यह हो कि सम्पादक लोगों का यह भरम टूटे कि साहित्य उनका हरम है...कोई सम्पादक किसी लेखक को अपमानित नहीं करे... नामवर लोग झूठ नहीं बोलें और लोगों का भरोसा बना रहने दें साहित्य पर. चौकी और चौके के जो अलग-अलग मानक हैं वे मिट जाएँ...सुधीशों की बकवास से मुक्ति मिले हिन्दी साहित्य को.

इस साल लेखकों को लिखने के लिए पुरस्कार थोड़ा कम मिलें...थोड़ी सजा मिले ताकि प्रसंग का धुंधलका साफ हो सके.

आलोक धन्वा (वरिष्ठ कवि): मैं यह चाहता हूँ कि राष्ट्र की जो धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक ताकतें हैं वे साम्राज्यवाद के विरुद्ध एकजुट हों. जितने भी वामपंथी संगठन हैं उनको भी इस मोर्चे में शामिल होना चाहिए. उन्हंं आपसी मतभेद स्थगित करके अपना एक व्यापक संयुक्त मोर्चा बनाना चाहिए क्योंकि राष्ट्र के सामने साम्प्रदायिक ताकतें आतंकवाद और दूसरी कई शक्लों में हमारी राष्ट्रीय एकता को तहस-नहस कर रही हैं. हमारी राष्ट्रीय संप्रभुता, हमारी धर्मंनिरपेक्ष साझा-संस्कृति और हमारी लोकतांत्रिक उपलब्धियां ; आज सब भयावह चुनौतियों और ख़तरों से घिरी हैं. भारत को फिर से साम्राज्यवाद का नया उपनिवेश बनाने की साजिश रची जा रही है.

राजनीति और संस्कृति, दोनों क्षेत्रों में बहुराष्ट्रीय कम्पनियां अपने नए बाज़ार तैयार कर रही हैं...अब भारत का पूंजीपति वर्ग भी उस राष्ट्रीय चरित्र से वंचित हो रहा है जो भारत के स्वाधीनता संग्राम में महात्मा गांधी के नेतृत्व में उसने हासिल किया था. हमारा भारतीय समाज बाहर के हमलों की अपेक्षा अन्दर के हमलों से बहुत ज्यादा टूट रहा है. अलगाववाद की सुनियोजित साजिशें हमारे संघीय स्वरूप के ताने-बाने को नष्ट कर रही हैं.

हमारा सांस्कृतिक परिदृश्य भी संतोषजनक नहीं है. इस क्षेत्र में भी रचना विरोधी घात-प्रतिघात का माहौल विभिन्न माध्यमों के जरिये बनाया जा रहा है. हमारी जो प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्थाएं हैं उनमें भी बहुराष्ट्रीय कंपनियों का हस्तक्षेप शुरू हो चुका है. इसका सबसे ताज़ा उदाहरण साहित्य अकादमी के भीतर घुसपैठ करके सैमसंग कंपनी के द्वारा 'रवीन्द्रनाथ ठाकुर पुरस्कार' दिए जाने की घोषणा है.

इस सबके बावजूद जनता के सुख-दुःख के लिए सार्थक लेखन करने वाले साहित्यकारों की भी हमारे देश में कमी नहीं है. यह देखना सुखद है कि भारत के बेहद संकटपूर्ण माहौल में बहुमत जनता अपनी स्वाभाविक मानवीय सृजन-शक्ति के साथ सक्रिय है. नए वर्ष के लिए मेरी शुभकामनाएं हैं, साथ ही मैं यह चाहता हूँ कि आधुनिक भारत का जो गौरवशाली और संघर्षमय अतीत रहा है, हम उससे हमेशा प्रेरित होते रहें.

बीसवीं सदी एक महान सदी थी. देश और विदेश दोनों जगहों पर आज़ादी की बड़ी लड़ाइयां लड़ी गयीं. कई देशों ने उपनिवेशवाद से मुक्ति हासिल की जिनमें भारत भी शामिल है. फ़ासीवादी विरोधी युद्ध में विश्व भर की शांतिप्रिय और लोकतांत्रिक ताकतों ने मानवीय उत्कर्ष के नए महाकाव्य रचे.

बीसवीं सदी में एक ऐसी घटना घटी जो मानव इतिहास में कभी नहीं घटी थी. रूस में पहली बार मजदूरों और किसानों ने अपनी सत्ता कायम की जिसका प्रभाव पूरी दुनिया के लोकतंत्र पर पड़ा. बीसवीं सदी वैज्ञानिक विचारधाराओं की सदी थी. यह वही सदी थी जिसमें एक ओर लेनिन काम कर रहे थे तो दूसरी ओर महात्मा गांधी भी सक्रिय थे...एक ओर वर्टरैंड रसेल जैसे बड़े मानवतावादी दार्शनिक थे वहीं मैक्जिम गोर्की जैसे मजदूरों के बीच से आनेवाले लेखक थे. यह सदी नाज़िम हिकमत, पाब्लो नेरूदा, बर्तोल्त ब्रेख्त की सदी थी...साथ ही वह हमारे स्वाधीन भारत के सबसे बड़े सांस्कृतिक नेता प्रेमचंद और महाकवि निराला की भी सदी थी. हमारे स्वाधीन भारत की जो ज्ञान-संपदा है उसे जितना भारतीय बुद्धिजीवियों ने समृद्ध किया उतना ही विश्व के दूसरे बुद्धिजीवियों ने भी समृद्ध किया.

ज्ञान एक विश्वजनीन प्रक्रिया है, उसमें देशी-विदेशी का विभाजन छद्म है. अल्बेयर कामू, फ्रेंज़ काफ़्का और ज्यां पॉल सार्त्र जैसे बड़े लेखकों ने पूंजीवादी चिंतन प्रणाली को और उसकी सत्ता के तमाम अदृश्य यातना-गृहों को न सिर्फ उजागर किया बल्कि पूंजीवादी सत्ता को कटघरे में खड़ा करके उससे लगातार जिरह की. इससे लोकतंत्र के नए पाठ सामने आये.

बीसवीं सदी में हमारे देश में जहां राहुल सांकृत्यायन, रामचंद्र शुक्ल, फैज़ अहमद फैज़, फ़िराक गोरखपुरी, मक़दूम, रामविलास शर्मा, हजारी प्रसाद द्विवेदी, अज्ञेय, नामवर सिंह जैसे बड़े साहित्य चिन्तक सक्रिय थे वहीं बांग्ला में रवीन्द्रनाथ ठाकुर, शरतचंद्र, काज़ी नज़रुल इस्लाम, विभूतिभूषण बन्दोपाध्याय, माणिक बंदोपाध्याय, जीवनानंद दास, सुभाष मुखोपाध्याय, सुकांत भट्टाचार्य जैसी विभूतियाँ सक्रिय थीं. इसी तरह पश्चिम और दक्षिण भारत में भी बड़े चिन्तक जनता के बीच काम कर रहे थे.

यहाँ नाम गिनाना मेरा उद्देश्य नहीं है बल्कि दरअसल मैं बीसवीं सदी के उस महान कारवां की मात्र कुछ झांकियां प्रस्तुत कर रहा हूँ क्योंकि आज हमारे बीच देश और विदेश दोनों जगहों पर ऐसे बुद्धिजीवी मंच पर सामने आ रहे हैं जो फिर से मध्ययुग के अर्द्धबर्बर समाज को कायम करना चाहते हैं. बाबरी मस्जिद के ध्वंस और गुजरात का भयावह नरसंहार, कश्मीर और पंजाब में हजारों निर्दोष लोकतांत्रिक नागरिकों का क़त्लेआम, ईराक़ और अफगानिस्तान पर निरंतर हमले...ये सारी घटनाएँ उसी मध्ययुगीन अर्द्धबर्बर सोच को सामने रखती हैं. यह एक ऐसा भयानक समय है जहां ज्ञान से पलायन की प्रवृत्ति बढ़ रही है.

ओसामा बिन लादेन और हमारे हिन्दू तालिबान लालकृष्ण आडवाणी, नरेंद्र मोदी, मुरली मनोहर जोशी, अशोक सिंघल, प्रवीण तोगड़िया, आरएसएस के मोहन भागवत, इनके बीच कोई बुनियादी फर्क़ नहीं है. ये न हिन्दू हैं न मुसलमान, बल्कि ये उसी मध्ययुगीन अर्द्धबर्बर सोच के कारिंदे हैं.

कोसी की बाढ़ से विस्थापित लोगों के पुनर्वास के लिए जब मेधा पाटकर पटना आयीं तो एक पत्रकार वार्ता में पिछले वर्ष मैंने कहा कि जिसको प्राकृतिक आपदा कहते हैं दरअसल वह मानव-निर्मित आपदा है और पर्यावरण का मुद्दा भी लोकतंत्र का ही मुद्दा है. जो ताकतें नैसर्गिक सुषमा और प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट कर रही हैं वही ताकतें प्रेमचंद के देश में हज़ारों किसानों को आत्महत्या के लिए मजबूर कर रही हैं.

आज शिक्षण संस्थाओं में भी एक ऐसी प्रतियोगिता जारी है जहां हमारे प्रतिभाशाली नौजवानों में लगातार भय, आत्महीनता और आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है. हमारी शिक्षा-प्रणाली का उद्देश्य एक ज्यादा मानवीय और संवेदनशील मानव समाज बनाना नहीं बल्कि नए बाज़ार के लिए ज्यादा से ज्यादा मुनाफ़ा मुहैया कराना हो गया है. तो क्या २१ वीं सदी की शुरुआत आत्महत्याओं की सदी की शुरुआत है?

मैंने मेधा पाटकर से यह बात भी कही थी कि पर्यावरण के मुद्दे को पूरे समाज के दूसरे मुद्दों से जोड़कर देखा जाना चाहिए जो कि वैज्ञानिक सोच का एक नैतिक आधार है. जो आज हमारे जंगलों को काट रहा है वही आदिवासियों को भी ख़त्म करना चाह रहा है. शत्रुता, भय और हिंसा से आक्रान्त ऐसा सामाजिक परिदृश्य आधुनिक मानव सभ्यता में जल्दी दिखाई नहीं देता जहां सत्य और न्याय के लिए प्रतिरोध करनेवाली ताक़तें भी विसर्जन का शिकार होती जा रही हैं.

चूंकि मैं एक कवि हूँ इसलिए मैं अपने कवि भाइयों से, साथियों से यह विनम्र आग्रह करना चाहता हूँ कि हमारे बीच जो विरासत भारतेंदु हरिश्चंद्र,आचार्य शिवपूजन सहाय, यशपाल,महादेवी वर्मा, जयशंकर प्रसाद, सुभद्राकुमारी चौहान,रामधारी सिंह दिनकर,पंडित बालकृष्ण शर्मा नवीन,रामवृक्ष बेनीपुरी, रांगेय राघव,हरिवंश राय बच्चन,हरिशंकर परसाई, भीष्म साहनी, निर्मल वर्मा,फणीश्वर नाथ रेणु, धूमिल, श्रीलाल शुक्ल,राजकमल चौधरी,विजयदान देथा, अमरकांत, मोहन राकेश, मुक्तिबोध, शमशेर, नागार्जुन, त्रिलोचन,कुंवर नारायण, रघुवीर सहाय, केदारनाथ सिंह,मलय, सोमदत्त, ज्ञानरंजन, विनोद कुमार शुक्ल, विष्णु खरे,अशोक वाजपेयी,मन्नू भंडारी, कृष्णा सोबती, उषा प्रियम्बदा, कात्यायनी,नासिरा शर्मा, प्रभा खेतान, मैत्रेयी पुष्पा, अनिता वर्मा, स्वयं प्रकाश, उदयप्रकाश, ऋतुराज, विजेंद्र, कुमार विकल,शानी, असगर वजाहत, अब्दुल बिस्मिल्लाह, नरेश सक्सेना, देवताले जैसे कई बड़े साहित्यकारों ने हमें सौंपी है, हम उसे कैसे आगे बढ़ायें...उसके प्रति अपना दायित्व-बोध कैसे निभाएं. (इनमें से कई नाम आलोक धन्वा जी ने बाद में फोन पर जुडवाए और कह रहे थे कि यह सूची अभी अधूरी है.- विजयशंकर)

हमारे साथ भी जो लोग लिख रहे हैं वे कम प्रतिभाशाली नहीं हैं. अब हमारे बाद दो पीढ़ियाँ आ चुकी है कवियों की...उनसे भी मैं बेहद प्रभावित हूँ.

इस नए वर्ष में मेरी अपेक्षा यह रहेगी कि हम न्याय के पक्ष में ज्यादा से ज्यादा काम करें...हर तरह की हिंसा के विरुद्ध सार्थक संवाद शुरू करें...लोकतंत्र और समाजवाद की बेहद जटिल चुनौतियों से जूझने की, सृजन करने की दिशा में सक्रिय हों.

मुझे याद आता है कि २००७ में जब हम लोगों ने पटना में शहीद-ए-आज़म भगत सिंह की जन्म शताब्दी के लिए समारोह समिति तैयार की उस मोर्चे में ४० से ज्यादा धर्मंनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक जन-संगठन शामिल थे. जब हमने शुरुआत की तो हमें यह पता नहीं था कि भगत सिंह जन्म शताब्दी के समारोहों में वर्ष भर तक जनता की इतनी व्यापक हिस्सेदारी होगी. भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, अशफाक उल्ला खान, रामप्रसाद बिस्मिल, जैसे हमारे महान शहीद देश भक्तों की लोकप्रियता निरंतर बढ़ती चली गयी. मेरे लिए यह एक ऐसा अनुभव था जिससे मैं बेहद अभिभूत हुआ. यह भारतीय समाज के जीवंत और कृतज्ञ होने का एक उज्जवल उदाहरण था.

इन समारोहों ने यह जाहिर किया कि स्वाधीनता की चेतना को ख़त्म नहीं किया जा सकता. मनुष्य स्वाधीनता के पथ पर अपने सतत संघर्ष से जितनी यात्रा कर चुका है वहां से वह पीछे नहीं जाएगा. वह आगे ही जाएगा.धन्यवाद!

त्रिनेत्र जोशी (वरिष्ठ कवि, अनुवादक):साल २०१० में जो राजनीति है वह एशिया और अफ्रीका केन्द्रित अधिक हो जायेगी. इसलिए कि एशिया तो अभी विकासशील राष्ट्रों की पांत में आगे है. ख़ास तौर पर भारत-चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया. अफ्रीका इस सदी के उत्तरार्द्ध में विकासशीलों की दौड़ में शामिल होगा. इससे एक क़िस्म का जो ग्लोबल बाज़ार बना है उसके चलते इन देशों में विकसित देशों का हस्तक्षेप और बढ़ेगा; यानी जिसे वित्तीय सामाज्यवाद कहते हैं. इसमें पूंजीवादी तौर-तरीकों से काम होता है, सेना भेजने की ज़रूरत नहीं पड़ती. शायद इसीलिये लेनिन ने कहा था-'साम्राज्यवाद पूंजीवाद का सर्वोत्तम मंच है.'

साल २०१० में बाज़ारों के लिए मारामारी अधिक बढ़ेगी, जिसका अर्थ यह है कि विकासमान और अल्प विकसित देशों में वित्तीय साम्राज्यवादी खून-ख़राबा बढ़ेगा और पूंजीवादी तौर-तरीके समाज पर हावी होंगे. इसमें कई विकासशील और अल्प विकसित देश साम्राज्यवादी लूट-खसोट का अड्डा बनेंगे और हो सकता है यह साम्राज्यवाद कई नए किस्म के इराक़ खड़े कर दे. लेकिन उम्मीद इस बात पर है कि एशिया और लैटिन अमेरिका के विकासमान देश इस अचानक आक्रमण से टक्कर लेंगे और इकतरफा विश्व में शक्ति संतुलन कायम कर पायेंगे. लेकिन इसमें भारत-चीन और ब्राज़ील जैसे देशों की रणनीतिक एकता, एक महत्वपूर्ण मुकाम होगी. जैसे कि आसार हैं आपसी प्रतिद्वंद्विता के बावजूद भारत और चीन एक दूसरे के निकट आने को मजबूर होंगे जिससे निश्चय ही रणनीतिक परिदृश्य बदलेगा.

जहां तक साहित्य का सवाल है, पश्चिमी हवाएं उसकी शैली पर यहाँ तक कि विषय-वस्तु पर भी अपना असर बढ़ाएंगी और साहित्य बाज़ारवाद में अपनी भूमिका निभाने को विवश सा लगेगा. इसका एकमात्र विकल्प यह है कि विकासशील देश और अल्प विकसित देशों के लेखक समाज के प्रति अपनी संवेदनात्मक प्रतिबद्धता बढ़ायें क्योंकि देश-काल के हिसाब से इस 'अग्रगामिता' के शिकार विकासशील और अल्प विकसित देशों या राष्ट्रों के समाज ही होंगे. हालांकि यह एक उम्मीद भर है. इसके बिना साहित्य अपनी बुनियादी भूमिका को सुरक्षित रख पाए, यह अनिश्चित है. लेकिन इस ओर साहित्य प्रवृत्त हो इसकी अपेक्षा करना शोषक और शोषित के बीच शोषित का पक्ष लेने की एक अनिवार्य ज़रुरत है.

यही वजह है कि साहित्यकारों के बीच संवादहीनता बढ़ रही है और मीडिया हर प्राकृतिक कोमल भाव को एक सनसनी में बदल रहा है जिसके भीतर अधिकाँश लोग सादिस्तिक आनंद पा रहे हैं. यह एक पतनशील समाज की पहली पहचान है. अगर साहित्यकार सचमुच साहित्यकार रहना चाहते हैं तो उन्हें इस संवेदनशील परिदृश्य से दो-दो हाथ करना होंगे अन्यथा जो निराशाजनक परिदृश्य है वह और भी गहन हो जाएगा.

इस सबके बावजूद कहना यह है कि न समय रुकता है, न दमन कम होता है- फिर भी यह उक्ति काफी मायने रखती है कि जहां दमन है वहां प्रतिरोध भी अवश्यम्भावी है. इसी उम्मीद के साथ हमें २०१० का आगाज़ करना चाहिए और समय रहते अपनी भूमिका तय कर लेना चाहिए.


विवेक रंजन श्रीवास्तव (कवि-व्यंग्यकार-नाटककार):
सैद्धांतिक और बौद्धिक स्तर पर हम किसी से कम नहीं हैं, वैश्विक मंदी के दौर में भी भारत ने स्वयं को बचाए रखा, २००९ में जो खोया जो पाया वह सब सामने है ही. मेरी कामना है कि वर्ष 2010 में हम कुछ ऐसा कर दिखाएं जिससे मंहगाई नियंत्रित हो जिससे मेरे प्रथम व्यंग्य संग्रह का किरदार 'रामभरोसे', जो महात्मा गाँधी का अंतिम व्यक्ति है, चैन की रोटी खा सके, उसे प्यास बुझाने को पानी खरीदना न पड़े. पड़ोसी देशो की कूटनीति पर हमें विजय मिले, कॉमनवेल्थ खेलों का आयोजन भर नहीं बल्कि कुछ ऐसी नीतिगत खेल व्यवस्था हो कि हम पदक तालिकाओ में भी नजर आयें.

यह तो था मेरा कवि-नाटककार वाला अवतार. अब व्यंग्यकार के चोले में प्रवेश करता हूँ. एक व्यंग्यकार होने के नाते मेरी नए वर्ष से कुछ मांगें इस प्रकार हैं-

1.वात्स्यायन (कामसूत्र वाले) पुरस्कारों की स्थापना हो

जब से हमारे एक प्रदेश के ८६ वर्षीय (अब पूर्व और अभूतपूर्व हो चुके) महामहिम जी पर केंद्रित शयन शैया पर निर्मित फिल्म (पता नहीं 'असल या नकल') का प्रसारण एक टी वी चैनल पर हुआ है, जरूरत हो चली है कि वात्स्यायन पुरस्कारों की स्थापना हो ही जाए. वानप्रस्थ की जर्जर परम्परा और जरावस्था को चुनौती देते कथित प्रकरण से कई बुजुर्गों को इन सद्प्रयासों से नई उर्जा मिलेगी और उनमें साहस का संचार होगा. प्राचीन समय से हमारे ॠषि-मुनि और आज के वैज्ञानिक चिर युवा बने रहने की जिस अनंत खोज में लगे रहे हैं, उस दिशा में यह एक सार्थक, रात्रि-स्मरणीय एवं अनुकरणीय उदाहरण होगा!

2.आतंकवाद के रचनात्मक पहलू पर ध्यान दिया जाए

कभी बेचारे आतंकवादियों के दृष्टिकोण से भी तो सोचिये. कितनी मुश्किलों में रहते हैं वे! गुमनामी के अंधेरों में, संपूर्ण डेडिकेशन के साथ अपने मकसद के लिये जान हथेली पर रखकर, घर-परिवार छोड़ जंगलों में प्रशिक्षण प्राप्त कर, भारी जुगाड़ करके श्रेष्ठतम अस्त्र-शस्त्र जुटाना खाने का काम नहीं है. पल दो पल के धमाके के लिये सारा जीवन होम कर देना कोई इन जांबांजों से सीखे! आत्मघात का जो उदाहरण हमारे आतंकवादी भाई प्रस्तुत कर रहे हैं, वह अन्यत्र दुर्लभ है. अपने मिशन के पक्के दृढ़प्रतिज्ञ हमारे आतंकी भाई जो हरकतें कर रहे हैं वे वीरता के उदाहरण बन सकती हैं. जरूरत बस इतनी है कि कोई आपके जैसा महान लेखक या ब्लॉगर उन पर अपनी सकारात्मक कलम चला दे.

3.भ्रष्टाचार को नैतिक समर्थन मिले

सरवाइवल आफ फिटेस्ट के सिद्धांत को ध्यान में रखें, तो हम सहज ही समझ सकते हैं कि तमाम कोशिशों के बावजूद जिस तरह से भ्रष्टाचार दिन दूनी रात चौगुनी गति से फल फूल रहा है, उसे देखते हुये मेरा मानना है कि अब समय आ गया है कि विश्वगुरु भारत को भ्रष्टाचार के पक्ष में खुलकर सामने आ जाना चाहिये. हमें दुनिया को भ्रष्टाचार के लाभ बताना चाहिये. पारदर्शिता का समय है, विज्ञापन बालायें और फिल्मी नायिकायें पूर्ण पारदर्शी होती जा रही हैं. पारदर्शिता के ऐसे युग में भ्रष्टाचार को स्वीकारने में ही भलाई है और हर नस्ल के भ्रष्टाचारियों की मलाई ही मलाई है.

अरुण आदित्य (कवि,उपन्यासकार):

आनन्दोत्थं नयनसलिलम्यत्र नान्यैर निमित्तैर
नान्यस तापं कुसुमशरजाद इष्टसंयोगसाध्यात
नाप्य अन्यस्मात प्रणयकलहाद विप्रयोगोपपत्तिर
वित्तेशानां न च खलु वयो यौवनाद अन्यद अस्ति॥


कालिदास ने मेघदूतम् की उपर्युक्त पंक्तियों में जिस तरह के लोक-काल की कल्पना की है, जहां आनंदाश्रुओं के सिवाय कोई आंसू न हो, वैसी कोई कल्पना नए वर्ष के संदर्भ में कर पाना आज मुश्किल लगता है. हम सब जानते हैं कि वर्ष बदल जाने से कुछ नहीं बदला है. दीवार वही है, जिस पर कैलेंडर नया टांग दिया गया है. पिछले साल ने दरकी हुई दीवार विरासत में दी है, अब हम यही उम्मीद कर सकते हैं कि अगली जनवरी में जब एक और नया कैलेंडर टांगने की बारी आए तो दीवार वैसी ही न रहे, जैसी अभी है. इस वर्ष भले ही नई दीवार न बना सकें, लेकिन कम से कम पुरानी दीवार की मरम्मत तो करा ही सकें.

अमेरिका बदल जाएगा या ओसामा सुधर जाएगा, इसकी उम्मीद नहीं कर सकते, पर इनके इरादों के सामने डटकर खड़े रहने का जज्बा जिंदा रहे, यह स्वप्न तो देखा ही जा सकता है. आसमान में दहकता हुआ नए वर्ष का नया सूरज पूरी दुनिया को अपनी रोशनी से लालम-लाल कर देगा, इसकी उम्मीद नहीं है फिर भी उससे इतनी उम्मीद तो कर ही सकते हैं कि वह अंधेरे से जंग का अपना हौसला तो बनाए ही रखेगा.

साहित्य में रचनाधर्मिता पर विवाद हावी नहीं होंगे, पुरस्कारों में जोड़-तोड़ नहीं होगी, यह उम्मीद तो नहीं कर सकते, लेकिन इन सब के बीच कभी-कभी सच्ची रचनाओं और रचनाकारों को भी पहचाना जाता रहेगा, यह उम्मीद तो कर ही सकते हैं. उम्मीद है कि गत वर्ष की तरह इस वर्ष भी पकी हुई पीढ़ी के थके हुए लोग सुविधाओं की सेज पर आराम फरमाते रहेंगे. उनसे मुझे कुछ नहीं कहना है. वैसे भी उस पीढ़ी के लोग सुनने से ज्यादा सुनाने में यकीन रखते हैं. हां, देश के बच्चों से मुझे अब भी उम्मीद है और उन्हें मैं कवि मंगलेश डबराल की इन काव्य-पंक्तियों को संदेश रूप में देना चाहता हूं:

‘प्यारे बच्चो जीवन एक उत्सव है जिसमें तुम हँसी की तरह फैले हो.
जीवन एक हरा पेड़ है जिस पर तुम चिडिय़ों की तरह फडफ़ड़ाते हो.
जैसा कि कुछ कवियों ने कहा है जीवन एक उछलती गेंद है और
तुम उसके चारो ओर एकत्र चंचल पैरों की तरह हो.
प्यारे बच्चो अगर ऐसा नहीं है तो होना चाहिए.’


जानता हूं कि 'ऐसा नहीं है तो होना चाहिए' एक कठिन कामना है. पर इस कठिन समय में कुछ कठिन कामनाएं भी तो करनी ही होंगी… और अगर यह उम्मीद भी ‘आनन्दोत्थं नयनसलिलम्यत्र नान्यैर निमित्तैर’ जैसी कुछ कठिन लग रही हो तो इतनी उम्मीद तो कर ही सकते हैं कि कि भले ही वैसी व्यवस्था न निर्मित हो सके, कम से कम इतना तो हो जाए कि हरि मृदुल जैसे किसी युवा कवि को फिर से यह न लिखना पड़े कि-

‘अव्वल तो काम मिलना कठिन
काम मिल गया तो टिकना कठिन
टिक गए तो काम कर पाना कठिन
किसी तरह काम कर पाए तो
वाजिब मेहनताना कठिन.’


नए साल से यह कोई बहुत बड़ी उम्मीद तो नहीं है न!

सूरज प्रकाश (वरिष्ठ कथाकार, अनुवादक): आज के वक्त की सबसे बड़ी तकलीफ यही है कि भाग-दौड़, आपा-धापी और तकनीकी उन्नयन के नाम पर अंधी दौड़ और तथाकथित टार्गेट के नाम पर जो कुछ भी हो रहा है दुनिया भर में...और ख़ास तौर पर भारत में, उसमें आम आदमी कहीं नहीं है. उसे कोई नहीं पूछ रहा जबकि सारे के सारे नाटक उसी के नाम पर, उसी के हित के नाम पर और उसी की जेब काट कर हो रहे हैं. सारे महानगर ऐसे लाखों लोगों से भरे पड़े हैं जिनके लिए दो जून की रोटी जुटाना, एक गिलास पानी जुटाना और एक कप चाय जुटाना तक मुहाल हो रहा है़. आम आदमी से सब कुछ छीन लिया गया है- पीने का पानी तक. कई बार चौराहों पर बेचारगी से घूमते गांववासियों को देखता हूं तो सोच में पड़ जाता हूं कि बेचारा गांव की तकलीफों, बेरोजगारी, भुखमरी और जहालत से भाग कर यहां आया है तो उसे एक गिलास पानी पीने के लिए और एक कप चाय पीने के लिए कितने लोगों के आगे हाथ फैलाना पड़ेगा! उस भले आदमी से उसका चेहरा ही छीन लिया गया है.

ये सब हुआ है जीवन के हर क्षेत्र में आये अवमूल्यन के कारण. जब तक इस देश में हत्यारे मुख्यमंत्री बनते रहेंगे और रिश्वतखोर केंद्रीय मंत्री, हम कैसे उम्मीद करें कि एक ही साल में कोई क्रांतिकारी सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक अथवा राजनीतिक स्तर पर कोई तब्दीलियाँ होंगी.

बीए में अर्थशास्त्र पढ़ते हुए एक सिद्धांत हमें पढ़ाया गया था कि बुरी मुद्रा अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है. मतलब ये कि अगर आपकी जेब में दस रुपये का पुराना नोट हो और कहीं से आपके हाथ में दस रुपये का नया नोट आये तो आप जेब में रखे पुराने नोट की जगह नया नोट रख लेंगे और जेब वाला पुराना नोट सर्कुलेशन में डाल देंगे. हर आदमी यही करता है और सारे नोट जेबों में चले जाते हैं और बेचारे पुराने नोट जस के तस सर्कुलेशन में बने रहते हैं, बल्कि इनमें लोगों की जेब से निकले पुराने नोट भी शामिल हो जाते हैं. आज जीवन के हर क्षेत्र में यही हो रहा है. सब कुछ जो अच्छा है, स्तरीय है, मननीय है, वह चलन से बाहर है. कभी स्वेच्छा से, कभी मजबूरी में और कभी हालात के चलते. आज हमारे आस-पास जो कुछ भी चलन में है, वह औसत है, बुरा है और कचरा है. हम उसे ढो रहे हैं क्योंकि बेहतर के विकल्प हमने खुद ही चलन से बाहर कर दिये हैं. साहित्य में ये सबसे ज्यादा हो रहा है. पाले-पोसे घटिया लेखक, उनकी किताबें और उनके रुतबे ही सर्कुलेशन में हैं. हम ही जानते हैं कि एक-एक घटिया किताब के छपने पर कितने पेड़ों को बलि देनी पड़ती है.

हम ही देखें कि ऐसा क्यों हो रहा है और कब तक हम ऐसा होने देंगे.

विभा रानी (कथाकार, नाटककार, रंगकर्मी, अनुवादक):

नए साल में मेरी आशाएं बहुत अधिक नहीं हैं. सबसे पहली आशा तो अपने साहित्यकार बन्धुओं से ही है कि वे आपस की मारामारी छोड़कर साहित्य और समाज के लिए कुछ सोचें. अपने ही लेखन को सर्वश्रेष्ठ और दूसरों के लेखन को निहायत घटिया न मानें. अपनी साहित्यिक गैर ज़िम्मेदारियों से बाज़ आएं. अगर वे ऐसा कर लेंगे तो निश्चय ही साहित्य और इसके माध्यम से समाज और साहित्य के पाठकों का बड़ा भला होगा. बस इतनी सी ही आशा है. धन्यवाद.

निरंजन श्रोत्रिय (कवि-कथाकार): साल २०१० हमारे लिए वह सब लेकर आये जिसके हम हकदार हैं. साहित्य, संस्कृति और राजनीति में लगातार हो रही गिरावट रुके.

भूमंडलीकरण की प्रक्रिया पर अंकुश लगे और वह सब न हो जो हो रहा है और जिसे नहीं होना चाहिए था.

दरअसल आज की सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि जो जिसके लायक है उसे वह नहीं मिल रहा है. हर जगह भृष्टाचार, चापलूसी और मक्कारी है. साहित्य, राजनीति, खेल, अर्थ सभी जगह. नया साल हमें इन सभी से मुक्ति दिलाए. कम से कम कोशिश तो शुरू हो.

एक समय था जब साहित्य, कला, संस्कृति कलाकार से पूर्णकालिक साधना की माँग करती थी. अब सब जगह नेटवर्किंग और मैनेजमेंट है. सब कुछ प्रायोजित. यदि नया साल संस्कृतिकर्मी की पहचान लौटा सके तो यह हमारे समय क़ी बड़ी उपलब्धि होगी.

विजय गौड़ (कवि, हालिया कविता संग्रह 'सबसे ठीक नदी का रास्ता'):

साल २०१० हो या निकट भविष्य का अगला समय, तय है कि दुनिया के बुनियादी चरित्र के बदलाव; जिसमें न कोई शोषित हो न शासित यानी सत्ताविहीन समाज का समय आने से पूर्व के कई जरूरी चरणों से गुजरना होगा. साल २०१० उस तरह के बदलावों को गति देने में एक अहम बिंदु हो यह उम्मीद करना चाहता हूं. लेकिन जानता हूं कि सिर्फ़ उम्मीदें पालने से कुछ हो नहीं सकता.
योगेन्द्र आहूजा (कथाकार):इतिहास की गति और प्रक्रिया को इतना अवश्य जानता-समझता हूं कि मानव जाति के बेहतर भविष्य में यकीन रख सकूं. लेकिन यदि केवल इस वर्ष की बात करनी हो तो मुझे कोई खास उम्मीदें नहीं- बेशक तमन्नायें और ख्वाहिशें, ऐसी कि उनमें से हर एक पर `दम निकले', तमाम हैं.

जानता हूं कि इस देश के अधिसंख्य के हिस्से में आयी गरीबी और अन्याय का सिलसिला इस बरस भी जारी रहेगा. सामान्यजन के जीवन में लज्जा और अपमान का ढेर लगता रहेगा. करोड़ों भूखे या आधे पेट सोते रहेंगे. विजातीय प्रेमियों में से कुछ शायद इस बरस भी पेड़ों पर लटकाये जायें, बाकायदा पंचायतों के द्वारा फैसला दिया जाकर. कुछ और टी वी बाबा प्रकट होंगे और उनके प्रवचनों में भीड़ पहले से ज्यादा होगी. मन्दिरों से सर्वदा की तरह चप्पलें चोरी होती रहेंगी. अत्याचारियों के धंधे जारी रहेंगे. किसानों की आत्महत्यायें थमेंगी या लोगों का अपने घरों और ज़मीनों से बेदखल किया जाना रुकेगा, इसके कोई संकेत नहीं. झूठ, पाशविकता, बेइंसाफी और उत्पीड़न में इस बरस भी इजाफा होगा. लेकिन इन सबके साथ निशंक रूप से यह भी जानता हूं कि उत्पीड़ित तबकों की लड़ाइयां जारी रहेंगी और हर दिन प्रखरतर होंगी.

आपने उम्मीदों के बारे में जानना चाहा है, इसलिये तमन्नाओं का जिक्र यहां असंगत होगा, फिर भी सिर्फ एक. . . चाहता हूं कि यह बरस इस देश के किसी भी हिस्से या कोने में सामान्यजन की कोई एक विजय, कोई छोटी सी जीत दिखा सके.

हमारी हिन्दी में अब बौद्धिक, वैचारिक, अवधारणापरक बहसें नहीं होतीं. उनकी जगह गासिप्स ने ले ली है. साहित्यिक अवधारणाओं और सौन्दर्य संबधी मूल्य दृष्टियों की लड़ाइयां थम गई हैं. सारे विचारों में लगता है एका हो चुका है, वे मंच पर गलबहियां डाले नज़र आते हैं. नतीजा यह हुआ है कि रचनाओं की परख और मूल्यांकन के मानदण्ड धुंधले पड़ गये हैं . हम देखते हैं एक छोर पर सस्ती, आसान, तर्करहित प्रशंसायें और दूसरे पर विरोधियों को नेस्तनाबूद कर देने, उनका वंशनाश कर डालने की मुद्रायें. अब बहसें नहीं होतीं, सीधे हमले होते हैं. आलोचना के नाम पर निशंक भाव से निर्णय देने और किन्हीं काल्पनिक सूचियों में नामों को ऊपर नीचे या दाख़िल ख़ारिज करने का जो एक सस्ता, निरर्थक, अश्लील खेल जारी है, मैं उसका नाश चाहता हूं.

एक सचेत कोशिश जारी है ऐसी रचनाओं को प्रतिष्ठापित करने की जिनमें कोई चिन्ता न हो, विचार न हो, कोई पक्ष न हो, किसी तरह की बौद्धिक मीमांसा न हो और वे महज लफ़्ज़ों का खेल हों. मैं ऐसी कोशिशों और साजिशों का भी नाश चाहता हूँ.
साफ पोजीशन लेने से बचना और केवल हवाई किस्म की गोल मोल, अमूर्त और बेमतलब मानवीयता से काम चलाना, यह दरअसल आततायियों के पक्ष में जाता है. वे यही तो चाहते हैं. स्पेन के महान फिल्मकार लुई बुनुअल की साफ उद्घोषणा थी कि उनके सारे कृतित्व का एकमात्र उद्देश्य रहा है 'शक्तिशालियों के आत्मविश्वास में छेद करना'.

चाहता हूं कि हमारे वक्त की रचनायें अपने वक्त का केवल बयान न करें, बल्कि स्पष्टतः अपना पक्ष बतायें. उनमें सवाल हों, सपने हों, क्रोध और विरोध हो. साफ पोजीशन लेने से बचना और केवल हवाई किस्म की गोल मोल, अमूर्त और बेमतलब मानवीयता से काम चलाना, यह दरअसल आततायियों के पक्ष में जाता है. वे यही तो चाहते हैं. स्पेन के महान फिल्मकार लुई बुनुअल की साफ उद्घोषणा थी कि उनके सारे कृतित्व का एकमात्र उद्देश्य रहा है 'शक्तिशालियों के आत्मविश्वास में छेद करना'. उसके बरक्स हिन्दी में नामचीनों की बाडी लैंग्वेज जरा देखें - पावर और सत्ता के सामने हमेशा विनत, नतमस्तक. हर साल की तरह इस बरस भी अच्छी बुरी रचनायें आयेंगी, लेकिन चाहता हूं कि इस साल में हमारे शीर्ष लेखक, आलोचक और विचारक कम से कम इरैक्ट चलना सीख सकें.

धन्यवाद!