गुरुवार, 31 जनवरी 2008

जंगली पशु बना देती है प्रतियोगिता

बुर्जुआ समाज और संस्कृति-९

(अब तक आपने पढ़ा कि भारत में बचपन से ही हिंसा का पाठ पढ़ाने के क्या-क्या तरीके अपनाए जाते रहे हैं. अब आगे...)

पूंजीवाद की नींव है प्रतियोगिता जो कि एक असामाजिक प्रवृत्ति है. जंगल के जानवरों को जैसे शत्रु के आक्रमण के सम्मुख होकर अपना अस्तित्व बनाए रखना होता है, उसी तरह पूंजीवाद में हर नागरिक किसी न किसी प्रतियोगिता से गुज़र कर ही अपने को टिकाए रखता है. व्यक्तिगत सोच के ऐसे लोग भी हैं जो श्रमिकों की अवस्था से व्यथित हैं लेकिन वे एक ऐसी अवस्था में हैं कि अगर उनकी मांगें मान भी लें तो प्रतियोगिता में पराजित होंगे.

पूंजीवाद में हर उद्योग का दूसरे से, एक जाति से दूसरी जाति का युद्ध है. हरेक दूसरे को पराजित कर ज्यादा से ज्यादा मुनाफ़ा अर्जित करना चाहता है. इस युद्ध में- ''कोई क घर म बाप मर, कोई क घर म माँ मर, आपणा घरा तो ढोल बाजणों चाये' के सिवाय कोई नीति हो ही नहीं सकती.

जीविका के लिए भी एक दूसरे को धकिया कर आगे बढ़ने में युद्ध की ही मानसिकता होती है. विजेता हैं तो ठीक है अन्यथा मृतप्राय ही जीवित रहेंगे. पूंजीवाद किसी को भी काम देने की जिम्मेदारी नहीं लेता है. व्यक्ति की जिम्मेदारी ही मानी जाती है. अब हर आदमी की शारीरिक और मानसिक योग्यता एक जैसी नहीं होती. जो कमज़ोर हैं, कमतर हैं, जिनके मामा-चाचा नहीं हैं, उनके अस्तित्व का संकट बना ही रहता है.

प्रदर्शन-कक्ष में अचानक आग लगने पर, भयभीत चकित जनता, शिशु, वृद्ध और स्त्रियों को रौंदते हुए जैसे भागती है, ठीक उसी तरह पूंजीवाद में हर एक का आचरण होता जाता है. सारा बुर्जुआ समाज ही जैसे कोई 'दग्ध थियेटर' है. मृत्युभय से भीति-ग्रस्त, पराजय की आशंका से प्रतियोगी के प्रति निर्मम, दूसरों के दुःख से निर्विकार, विजेता होने की उम्मीद में सारी जनता एक दूसरे को धकियाते हुए आगे जाना चाहती है. वह जानती है- पराजय का अर्थ ही मृत्यु है.

पूंजीवाद इस भावना का उत्पादक ही नहीं, उत्साहदाता भी है, क्योंकि उसकी उत्पादन व्यवस्था की जीवनी-शक्ति यह भावना ही है. कितने कम से कम व्यय में ज्यादा से ज्यादा उत्पादन हो सके, यह उसका बुनियादी सोच होता है. जनता भी ताल मिलाने लगती है. वह सोचती है, सरमायेदारों की अभिलाषा (अर्थनीति की भाषा में इन्सेन्टिव) पूरी नहीं होगी तो उत्पादन की प्रक्रिया ही ठप हो जायेगी.

उत्पादन का नशा ऐसा है कि बुद्धिजीवीगण भी सरमायेदारों की कुटिलता छिपाने के लिए इन्सेन्टिव की ज़रूरत को और भी प्रचारित करते हैं. उन्हें ऐसा नहीं लगता कि वे लगातार परस्पर विरोधी विचार प्रकट करते हुए प्रहसन के पात्र बनते जा रहे हैं. नहीं लगता, क्योंकि वे 'विशेषज्ञ' होते हैं, एक ही विषय में पारंगत.

प्रतियोगिता की सीमित सार्थकता हो सकती है, लेकिन इसे प्रोत्साहित करना ख़तरनाक होता है. समाज की एकता का सूत्र सहयोगिता में ढूँढा जा सकता है. प्रतियोगिता समाज-विरोधी प्रवृत्ति है. प्रतिद्वंद्वी को हराने की प्रवृत्ति मनुष्य में सहजात और दुर्दमनीय होती है, इसलिए बगैर रेफ़री के फुटबाल भी नहीं खेली जा सकती. पराजय की संभावना देखते ही खिलाड़ी आक्रामक होने लगते हैं. जहाँ सत्ता और संपत्ति की प्रतियोगिता होगी, उत्तेजना उतनी ही चरम पर होगी. पूंजीवाद इस उत्तेजना की आग में घी डालता है. मान-मर्यादा और इज्ज़त पाने के लिए व्यक्ति के उद्यम और प्रतियोगिता के संकल्प का वह हार्दिक स्वागत करता है.

'पहल' से साभार

(अगली पोस्ट में ज़ारी)

बुधवार, 30 जनवरी 2008

नाचूं चामुंडा रूप में इस समर में

बुर्जुआ समाज और संस्कृति-८

(अब तक अपने पढ़ा कि भारतीयों के हृदय में भी हिंसा की वैसी ही हवस है जैसी कि अन्य कुल के नागरिकों में. अब आगे पढ़िये--)

प्राचीन भारत में बुद्धिजीवियों ने हिंसा के विरोध की जगह उसके प्रचार में जिस नैपुण्य का परिचय दिया है, वह अमेरिकी लोगों के लिए डाह का विषय हो सकता है. बचपन से ही हिंसा का पाठ पढ़ाने के लिए पंडितों ने ऐसी पौराणिक कथाएं रचीं, ऐसे पूजा-अनुष्ठानों की स्थापना की कि वे मां की गोद में बैठे-बैठे, कहानियां सुनते हुए, हंसते हुए, बाल्यकाल से हिंसा से परिचित होते जाएं. महिषासुर मर्दिनी, दुर्गा-पूजा, नरमुंड कपालिनी काली पूजा की तरह हिंसा के प्रचार के ऐसे सार्थक उपाय अन्य किसी देश के पंडित शायद ही खोज सके हों.

दुर्गा काली की प्रेरणा से सिर्फ़ लड़कों का ही नहीं, लड़कियों का भी-
'मन करता है इसी भयंकर दंड को धारण कर
नाचूं चामुंडा रूप में इस समर में.'

युद्धरत देवी-देवताओं की जीवंतप्राय प्रतिमूर्ति, ढाक का रणवाद्य, शत्रु के प्रतीक छिन्नमुंड बकरे का ताज़ा रक्त, फ़िर पुरोहित का चंडीपाठ -

दृष्टावराल वदने शिरोमाला विभूषणे.
चामुंडे मुण्ड मथने नारायणी नमोस्तुते.

कुल मिलाकर नितांत भीरु के खूँ में भी उबाल पैदा कर सकता है.

भारतीय परम्परा ने हमें हिंसा-विमुख किया है, यह नितांत झूठ है. हिंसा से हमें कोई परहेज नहीं है. बुर्जुआ रीति में परहेज सिर्फ 'हिंसा' शब्द से है. कहिये शक्तिपूजा, बलवीर्य की साधना, वीरत्व, आत्मरक्षा, देश की सुरक्षा--- कुल मिलाकर इस भयंकर शब्द हिंसा को शब्दकोश से निकाल दें.

कोई कहे उसे लड़ना नहीं आता तो हमें गुस्सा आयेगा. प्रतिद्वंद्वी की चुनौती स्वीकार करने की योग्यता बगैर कोई मर्द हुआ भला! अंग्रेजों के राज में बंगालियों को असामाजिक जाति कहे जाने पर उनमें अपमान की तीव्र प्रतिक्रिया हुई थी. कायर है, यह कोई भी जाति कहलाना पसंद नहीं करती. मार्क्स ने कहा है कि समाज को व्याधिमुक्त करने का सहज उपाय है कि भाषा से सारे श्रुतिकटु शब्द निकाल दें. इस अभिधान (शब्दकोश) के नए संसकरण के लिए विद्वानों से अनुरोध करना ही काफी होगा. (कार्ल मार्क्स, पावर्टी ऑफ़ फिलोसफी दृष्टव्य).

दरअसल बुर्जुआ समाज में अहिंसा और शांति के नाम पर हिंसा के सिवाय कोई विकल्प भी तो नहीं है. स्वैराचार कर्णकटु है, इसलिए लोकतंत्र में हत्यारे न कहकर सैनिकों को वीर कहना इस धोखे को चलाये जाने का सबसे श्रेष्ठ उपाय है.

मनुष्य की रग-रग में हिंसा की धारा और परम्परा में हिंसा का प्रशस्तिगान- ये बुर्जुआ संस्कृति के उदय में सहायक होते हैं. हिंसा की ऐसी व्यापकता पूर्ववर्ती किसी युग में नहीं थी. यह व्याप्ति संचार-साधनों के अभूतपूर्व विकास, पूंजीवाद के प्रसार और लगातार उन्नत मारक अस्त्र से सम्भव हुई है. इसको नैतिक समर्थन बुर्जुआ संस्कृति से मिलता ही है. विभिन्न समाज-विरोधी प्रवृत्तियों के लगातार फलने-फूलने पर ही पूंजीवाद का अस्तित्व निर्भर करता है और पूंजीवाद की यह जरूरत पूरी करती है बुर्जुआ संस्कृति.

'पहल' से साभार

(अगली किस्त में जारी...)

सोमवार, 28 जनवरी 2008

मंगलेश डबराल पर क्यों पिल पड़े?

पहले तो जी में आया कि एक टिप्पणी ही पोस्ट कर दूँ, फ़िर सोचा कि मामला गंभीर है।

एक सज्जन ने मंगलेश जी के लेख पर लगभग वही बातें दोहराईं, जो मैंने 'मंगलेश डबराल की ब्लॉगघुट्टी' शीर्षक से लिखी थीं। शब्द तक लगभग वही उठा लिये. मेरी पोस्ट कई लोगों ने पढ़ी, लेकिन टिप्पणी सिर्फ़ अजित भाई की आयी. यह न समझियेगा कि मैं टिप्पणियों की संख्या का मुद्दा उठा रहा हूँ. पैगाम-ए-ज़बानी कुछ और ही है।

इन सज्जन के यहाँ बीसियों लोग पहुँच गए और पिल पड़े मंगलेश जी पर। क्या यह उचित है? मंगलेश जी ने अपनी बात रखी थी, लेकिन ये टिप्पणीकार उनकी खाट खड़ी करने में लग गए. कुछ इस तरह के तर्क देने लगे कि पहले अंडा देकर दिखाओ तब ऑमलेट की बात करो!

जो लोग पोस्ट तक मौलिक नहीं कर सकते, या जहाँ से विचार उडाये हैं, उसे श्रेय देने तक की दयानतदारी नहीं दिखा सकते उन्हें क्या हक़ है इस तरह चौपाल बनाकर एक अच्छे और संवेदनशील कवि पर हल्ला बोलने का? मंगलेश जी ने उसमें ऐसी क्या बात कह दी थी, जो इन्हें नागवार गुज़री?

मैंने अपने लेख में मंगलेश जी से विनम्रतापूर्वक असहमति जाहिर की थी और कहा था कि यह 'डिमांड' है। बस हो गया. लेकिन ये लोग तो उसी आँख मूँद कर प्रलाप कर रहे हैं जिस तरह कुत्ता रात में भोंकते समय आँखें बंद कर लेता है और इसी का फ़ायदा उठाकर लकड़बग्घा उसे उठा ले जाता है.

एक कामकाजी नामक सज्जन तो मंगलेश जी को जलील करने पर ही उतारू हो गए। पहले तो इन्होने लिखा कि कौन हैं मंगलेश डबराल? दावा ये कि ये उन्हें हरगिज नहीं जानते. आगे उन्होंने लिखा- 'डबराल जी अपने चारण भाटों द्वारा लिखे गये को अपने नाम से छ्पवाते हैं.'
जब इन्होने मंगलेश जी का नाम ही नहीं सुना तब इतनी बड़ी खोजी पत्रकारिता करके इस नतीजे पर कैसे पहुँच गए कि मंगलेश जी दूसरो से लिखवाकर अपने नाम से छपवाते हैं! अति है। व्यक्तिगत राग-द्वेष को इस स्तर तक ले जाना किस संस्कार के तहत आता है, मुझे नहीं मालूम.

साहित्य जगत के अपने मठ होंगे, महंत होंगे, गुट होंगे। लेकिन क्या यहाँ भी हम ऐसा ही नहीं कर रहे हैं। अगर हमें कोई ब्लॉग की ताकत का अंदाज़ा दिलाने की कोशिश कर रहा है तो क्या अनर्थ कर रहा है? यह दीगर बात है कि हम समय की कमी, संसाधनों की कमी, या घर जार कर लुकाठी लेकर निकल पड़ने की भावना की कमी के चलते शायद 'table stories' कर के रह जाते हैं। मेरा तो दिल करता है कि वीडियो कैमरा लेकर निकल पडूं सड़कों पर और जो भी असंगत दिखे उसे ही ब्लॉग पर चढ़ा दूँ. लेकिन न तो मेरे पास कैमरा है, न नौकरी से फुरसत. झल्ला कर लाठी भांजने के बजाये अगर आप यह कर सकें तो कीजिये और तब देखिये ब्लॉग की असली ताक़त.

कुछ करना धरना तो दूर की बात है, लोगों के पास concept तक नहीं है। वे जो कर रहे हैं अगर कोई उससे आगे ले जाना चाहता है तो उसी पर पिल पड़ते हैं. वही हाल है कि आदिवासी बच्चों को शुरू-शुरू में जब स्कूल भेजने को कहा जाता था तो उनके माता-पिता कहते थे कि पहले पैसे दो तब स्कूल आयेंगे. (यहाँ यह स्पष्ट कर दूँ कि यह मनोविज्ञान मैं समझता हूँ इसलिए मुझे आदिवासी विरोधी न मानने लग जाएं जिस तरह कि मैं आपका विरोध नहीं कर रहा हूँ).

मंगलेश डबराल का मैं कोई भक्त नहीं हूँ। मैंने अपनी पहले की पोस्ट में कहा था कि मैं उनकी कवितायें बहुत पसंद करता हूँ. और यहाँ मेरा इरादा मंगलेश जी को विष्णु का अवतार बनाने का भी नहीं हैं. उनकी भी अपनी कमियाँ-अच्छाइयां होंगी, जैसी कि मेरी आपकी हैं.

अब आगे क्या लिखा जाए, समझ में नहीं आता. वैसे भी जिन मानवों को अपनी अज्ञानता पर गर्व हो उनके आगे तो यही कहना पड़ता है- 'दर्दुरा यत्र वक्तारः तत्र मौनं हि शोभनम्!'

रविवार, 27 जनवरी 2008

मंगलेश डबराल की हिन्दी ब्लॉगघुट्टी



नभाटा
में अग्रज कवि एवं वरिष्ठ पत्रकार मंगलेश डबराल का हिन्दी ब्लॉग की दुनिया पर लिखा मुख्य आलेख पढा. मैं मंगलेश जी की कविताओं का मुरीद हूँ. उनकी चिंताएं वाजिब हैं. इस आलेख में उन्होंने आगे का एजेंडा तय करने की कोशिश की है, जो उन जैसे प्रबुद्ध एवं चिंतनशील कवि से उम्मीद की जा सकती है. आलेख से यह भी जाहिर होता है कि हिन्दी ब्लॉग जगत पर वह बराबर नज़र बनाए हुए हैं.
इस तथ्य से उन ब्लॉगवीरों को सतर्क हो जाना चाहिए जो जंगल में मोर की तरह नाचने के भरम में हैं और ढीले-ढाले तौर पर बकवाद किया करते हैं। बड़े-बड़े लोग उनका नृत्य देख रहे हैं.

हिन्दी ब्लोगों को हिन्दी समाज की सांस्कृतिक शक्ति बनते देखना मंगलेश जी का सपना है। लेकिन इसमें अनेक अड़चनें हैं. पहली तो यही कि हिन्दी समाज को पढ़ने-लिखने से सत्व ग्रहण करने की आदत नहीं रही. जिन थोड़े लोगों को है वे साधनहीन हैं. उनकी क्रयशक्ति अनुमति नहीं देती कि वे पीसी, लैपटॉप खरीदने तथा इंटरनेट के खर्चे का भार उठा सकें. अधिकांश लोगों को यही नहीं पता कि यह ब्लोगिंग है क्या बला! अभी यह चंद शहरियों का खेल है, जिनमें मैं भी शामिल हूँ.

दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि शहरों में भी अभी हिन्दी ब्लोगों के वैसे पाठक नहीं बने हैं जिनसे मंजर बदलने में मदद मिल सके। अभी स्थिति लघु-पत्रिकाओं वाली ही है. जो छपता है वही पढ़ता है. फिलहाल हिन्दी ब्लोगरों का हाल कुछ-कुछ ऐसा ही है कि- 'तू मेरा हाज़ी बिगोयम, मैं तेरा काज़ी बिगो'. लोग पोस्ट बाद में लिखते हैं, पहले गणित लगाते हैं कि कितने लोग पढ़ेंगे और कौन-कौन टिप्पणी कर सकता है. यह भी कि फ़लां से टिप्पणी करवाने के लिए फ़लां पर टिप्पणी करो, वगैरह-वगैरह.

अमेरिका की बात और है। वहाँ तो लगभग सारा समाज पेपरलेस बन चुका है. भारत में लोग अखबार तक ठीक से नहीं पढ़ते, ऐसे में जनता से ब्लॉग पढ़ने की कल्पना बेमानी है. और जो लोग संसद तथा विधानसभाएं चलाते हैं उनके हिन्दी ब्लॉग पढ़ने की संकल्पना 'साइंस फिक्शन' ही कही जायेगी.

ऐसे में मंगलेश जी की यह सलाह काम की लगती है कि हिन्दी ब्लॉग जगत को शनैः शनैः मुख्य मीडिया के निरंतर एवं स्थायी रूप में ख़ुद को ढालने की कोशिश करनी चाहिए। उससे भी महत्त्व की बात यह है कि ब्लोगों को सांस्कृतिक विस्मरण के विरुद्ध काम करना चाहिए. लेकिन दुःख की बात है कि जिनसे कुछ गंभीर की उम्मीद है वही 'चिरका' करने में मुब्तिला हो गए.

मंगलेश जी की एक बात से मैं असहमत होना चाहता हूँ। हिन्दी ब्लोगों पर बाबरी मस्जिद शाहदत की पंद्रहवीं बरसी पर कविता नहीं है या लेख नहीं हैं या ओर्तीज की कवितायें नहीं हैं, इसलिए ब्लॉग कहाँ कमतर हो जाते हैं? यह डिमांड है. 'टूटी हुई बिखरी हुई' पर वह चले जाएं तो उन्हें वहाँ अर्जेंटीना के कवि रोबर्तो हुआरोज मिलेंगे, वाल्ट ह्विटमैन मिलेंगे, यूगोस्लाविया के अद्भुत कवि वास्को पोपा मिलेंगे, 'कबाड़खाना' अगर वह और कबाड़ते तो वहाँ उन्हें एना गेब्रियल से लेकर ख़ुद नेरूदा तथा उनके बाद चिली के सबसे प्रभावशाली कवि निकानोर पार्रा मिल जाते. संगीत सुनाने के लिए छन्नूलाल मिश्रा से लेकर ट्रेसी चैपमैन और कुमार गन्धर्व सब उपस्थित हैं.

'मोहल्ला' में अविनाश भाई ने ऐसे-ऐसे लोकगीत सुनवाये हैं कि मंगलेश जी को अपने बचपन के मेले-ठेलों की याद ताज़ा हो जायेगी। 'झुलनी का रंग साँचा', 'पनिया के जहाज से पलटनिया बनि आइहा पिया॥; 'हमारा बलमवा किसान'.. क्या-क्या गिनाऊँ!

निर्मल-आनंद वाले अभय तिवारी के पास रूमी की शायरी का अनमोल खज़ाना है और कमाल की बात ये है कि यह उनका ख़ुद का अनुवाद किया हुआ है।दिलीप मंडल लगातार सार्थक और उत्तेजक ब्लॉग लेखन कर रहे हैं. अखबार से आगे समाचार को लाने की उनकी कोशिश रही है. यहाँ ब्लोगरों के नाम गिनाना उद्देश्य नहीं है. सभी तकनीकी चिट्ठे हिन्दी ब्लॉग चलाने वालों के लिए जैसे सांचे गढ़ने का काम करते आए हैं. सामग्री की फेहरिस्त लम्बी है। यहाँ मैं मंगलेश जी की मूल चिंताओं में पानी मिलाने की कोशिश नहीं कर रहा हूँ. हिन्दी ब्लॉग के जरिये जो परिवर्त्तन वह सम्भव देखते हैं, काबिल-ए-गौर है और अमल करने लायक़ भी.

माना कि यह हिन्दी ब्लॉग जगत का शैशवकाल है। यह भी मान लिया कि तमाम क्षेत्रों के महारथी रंगमंच पर अभी उतरे नहीं हैं. लेकिन उनके इंतज़ार में हम अपने शिशु को पोलियोग्रस्त या कुपोषण का शिकार होते तो नहीं देख सकते. वे जब आयेंगे तब आयेंगे, अभी तो इसे स्वस्थ ढंग से पालने-पोसने की जिम्मेदारी हम सबकी ही बनती है.

मंगलेश जी की नेकनीयती से राब्ता रखते हुए अगर हिन्दी ब्लोगिंग को एक सशक्त वैकल्पिक माध्यम बनाना है तो सबसे पहला प्रश्न हिन्दी ब्लॉगवीरों को अपने आप से ही करना होगा कि उनका ब्लॉग कोई क्यों देखे? हमारा ब्लॉग किस तरह पाठकों की सुरुचिपूर्ण आवश्यकता बन सकता है? प्रश्न करके तो देखिये, सवाल अपने आप मिलने लग जायेंगे.

शनिवार, 26 जनवरी 2008

चिट्ठियाँ (पिछले दिनों लिखी एक कविता)

चिट्ठियाँ


आती थीं ऐसी चिट्ठियाँ
जिनमें बाद समाचार होते थे सुखद
अपनी कुशलता की कामना करते हुए
होती थीं हमारी कुशलता की कामनाएं।


गाँव-घर, टोला-पडोसी
सब चले आते थे बतियाते चिट्ठियों में
आटा गूंधती पडोसिनों के साथ आती थी माँ
बहन की छाया मेरी मेज़ पर बैठ जाती थी निःशब्द।


कलश धरे माथ ट्रैक्टर की पूजा करती आती थीं किसानिनें
हल और बैलों के टूटते रिश्ते चले आते थे।


चिट्ठियाँ बताती थीं
कि कैसे किराने की दूकान में घुस आया है मुम्बई
नशे के लिए अब कहीं जाना नहीं पड़ता अलबत्ता,
अस्पताल इतनी दूर है जैसे दिल्ली-कलकत्ता।


मुफ़्त मोतियाबिंदु शिविर नहीं पहुँच पायी बूढ़ी काकी
यही कोफ्त है, वरना क्या लिखने में अब धरा है बाकी।


पता चल जाता था कि
किसके खलिहान में आग लगा दी किसने
किसने किसका घर बना दिया खँडहर
किसी बहन निकल गयी किसके साथ
अबकी किसकी बेटी के पीले हुए हाथ


किसने बेच दिया पुरखों का खेत जुए के चक्कर में
कौन फौज़ से तीन माह की छुट्टी ले बैठा है घर में।


चिट्ठियाँ खोल देती थीं पोल सरपंची के चुनाव की
फर्जी डॉक्टर की दवा से मरी विधवा ठकुराइन की.
बरसों से अधूरी पड़ी सड़क परियोजना की
बहू को जला मारने की पारिवारिक योजना की।


लेकिन कुछ चिट्ठियाँ आती थीं हाथोंहाथ
लाती थीं गाँव से उखड़े पाँव
उनमें थोड़ा लिखा समझना होता था बहुत.

इधर एक अरसे से नहीं आयी कोई चिट्ठी
मेरे पते पर मेरे नाम.
क्या पता लोग लिखते हों और फाड़ देते हों
क्योंकि मैं आज तक किसी को नहीं दिलवा पाया
एक वाचमैन तक का काम।


-विजयशंकर चतुर्वेदी.

शुक्रवार, 25 जनवरी 2008

जब ब्लॉग करते हैं तो मक्कारी नहीं करते

कुछ दिनों से ब्लॉग एग्रीगेटरों पर चंद असमान्यताएं देखकर मन में उबाल आ रहा है. एक मुहावरा भी याद आ रहा है जो शायद दिलीप मंडल ने इस्तेमाल किया है- भकोस-भकोस कर खाना.

दोस्तो, लिखने का सदा ही एक मकसद रहा है, कुछ नया या दुर्लभ पुराना पढ़वाना। यह अपने द्वारा हो सकता है, या फिर दूसरों का अच्छा लिखा हुआ. अच्छा शब्द भी सापेक्ष है. न सिर्फ़ समय सापेक्ष बल्कि बहुत हद तक व्यक्ति सापेक्ष भी. आपका लिखा कोई किस तरीके से लेगा, वह इसके लिए आज़ाद है. फैज़ का शेर है- 'उनका जो काम है वो अहले सियासत जाने, मेरा पैगाम मोहब्बत है जहाँ तक पहुंचे.'

लेकिन मैं देख यह रहा हूँ कि कुछ लोगों में कूड़ा करने की इतनी हवस है कि वे एग्रीगेटर पर एक ही घंटे में कई बार अलग-अलग ब्लोगों के जरिये एक ही चीज पेश करते रहते हैं. मैं यहाँ यह नहीं कह रहा हूँ कि अगर कोई चाट-पकौडा बनाने की विधि समझा रहा है तो वह बुरा हो गया, बल्कि वह भी किसी की रूचि का क्षेत्र मानूंगा. कोई अगर वामपंथी है तो जाहिर है वह अपनी रूचि के अनुसार लिखेगा. अर्थशास्त्र, क़ानून, चिकित्सा, मीडिया या तकनीक के जानकार लोग अपनी बात कहेंगे. यहाँ तक कि कई लोग एक साथ कई ब्लॉग चलाते हैं, इसमें भी मुझे फ़िलहाल कोई बुराई नज़र नहीं आती.

यह सब बहुत बढ़िया कवायद है. इसी स्वतंत्रता के लिए ही तो लोग तरस रहे थे. लेकिन क्या जो कुछ परोसा जा रहा है उसके लिए ब्लॉग की जरूरत थी? कहीं ऐसा तो नहीं कि जिन लोगों को संपादकगण उठा कर कूड़े में फेंक देते थे वे अपनी कुंठा निकालने ब्लॉग पर पहुँच गए? अगर ऐसा है तो यह चिंता की बात है.

मेरी नज़र में लिखने का कोई भे क्षेत्र कमतर या बरतर नहीं कहा या माना जा सकता. बात होती है नजरिये की. सम्भव है कि कोई व्यक्ति मालपुए बनाने की विधि समझाये और उसमें इसका इतिहास-भूगोल भी कहता चले. या यह भी बताये कि उसमें प्रयुक्त तत्वों पर क्या बीतती है. वगैरह-वगैरह.

हो यह रहा है कि एक ही सामग्री कई ब्लोगों पर पेलने से कई अच्छी पोस्टें कुछ ही मिनटों में नीचे चली जाती हैं. (माफ़ कीजियेगा मुझे अपनी पोस्ट अच्छी होने का कोई मुगालता नहीं है. यहाँ यह भी जाहिर कर देना समीचीन होगा कि मैने नाना प्रकार के कम से कम ५ हजार लेख-आलेख संपादित करके हिन्दी के एक सर्वमान्य श्रेष्ठ अखबार में छापे होंगे.) समयाभाव के कारण मैं कोई पोस्ट एक चंद घंटों बाद एग्रीगेटर पर ढूँढने निकलता हूँ तो वह रसातल में या पिछले पन्नों पर जा चुकी होती है.

इस समस्या पर एग्रीगेटरों को ध्यान देना चाहिए. अगर एक ही व्यक्ति की वही पोस्ट है तो उसे एक ही बार दिखाना चाहिए, फिर वह चाहे कितने ब्लोगों पर ही क्यों न चढाई गयी हो. इसका प्रबंध करना एग्रीगेटरों की जिम्मेदारी बनती है, मेरा यह आग्रह भी है. फिर कविता या कहानी या ऐसी ही किसी विधा के अंतर्गत आने वाली पोस्टें एक अलग फोल्डर में दिखानी चाहिए, चाहे वह ताजा हों या बासी.

बातें तो बहुत हैं लेकिन फिलवक्त इतना ही कि-

ये हमने कब कहा कि हम अदाकारी नहीं करते
लेकिन जब ब्लॉग करते हैं तो मक्कारी नहीं करते.

-विजयशंकर चतुर्वेदी.

गुरुवार, 24 जनवरी 2008

हम भारतीय कब अहिंसक रहे हैं?

बुर्जुआ संस्कृति और समाज-७

(पिछली कड़ी में आपने पढ़ा कि किस तरह मनुष्य जाति युद्ध के बिना नहीं रह सकती। अब आगे...)

योरोप की तुलना में (युद्ध के मामले में) बाकी देश भी पीछे नहीं हैं। लोगों का भ्रम है कि पश्चिम के देश योरोप की तुलना में युद्धकातर नहीं हैं. इतिहास पर गौर करें तो यह सोच झूठ ही साबित होगा. योरोप की तरह ही चीन और भारत में भी हुआ है. कभी ज्यादा, कभी कम, कभी-कभी अंतराल. विदेशी आक्रमण के प्रतिरोध में युद्ध, साम्राज्य-स्थापना के लिए दो राज्यों में युद्ध, सत्ता के लालच में सेनापति का राजा के विरुद्ध, पिता के विरुद्ध पुत्र और भाई के ख़िलाफ़ भाई के युद्धों से इतिहास के पन्ने भरे पड़े हैं.

जब जनता लड़ाई करते-करते क्लांत हो जाती है तब शांतिवादी हो जाती है, फिर से बल संचय होते ही युद्ध में कूद पड़ती है। लहरें उठती हैं, गिरती हैं, उसी तरह युद्ध का उत्साह है, लेकिन युद्धलिप्सा का अवसान नहीं होता है.

आधुनिक युग में स्वदेशी सरमायेदारों के 'सेवकों' द्वारा एक अद्भुत नारा दिया गया है कि साम्यवाद की हिंसा भारतीय परम्पराविरोधी है। भारत शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक रास्ते पर चलना चाहता है। यह विमर्श उत्तम राजनीतिक प्रचार होते हुए भी विकृत इतिहास का उत्पादन है।

भारतीय परम्परा में कभी हिंसा का विरोध नहीं है. भारतीय परम्परा कितनी हिंसा विरोधी रही, यह महात्मा गांधी के दीनबंधु एन्ड्रूज को लिखे (६ जुलाई १९१८) के इस पत्र से जाहिर होती है:-

'आपने कहा है कि अतीत में भारत ने सचेतन रूप से हिंसा के विरोध में मानवता का पक्ष लिया है। क्या यह ऐतिहासिक तथ्य है? यहाँ तक कि रामायण और महाभारत में भी इसका कोई प्रमाण नहीं मिलता. मेरे प्रिय तुलसीदास की रामायण में भी नहीं, हालांकि तुलसीदास में बाल्मीकि से ज्यादा आध्यात्मिक दृष्टिकोण उल्लेखनीय है. यहाँ मैं इन ग्रंथों की तत्वों की व्याख्या में नहीं जाना चाहता.

रामायण और महाभारत में वर्णित ईश्वर के अवतार भी घोर रक्त-पिपासु प्रतिहिंसा-परायण और निर्मम हैं।उनके चरित्र से यह साफ है कि शत्रु को पराजित करने में उन्होंने छल-कपट का आश्रय भी लिया है। जितने भी मरणास्त्रों की कल्पना की जा सकती है, वे सभी उनकी सेना के पास हैं. आधुनिक लेखकों की तरह तत्कालीन रचनाकारों का उत्साह, युद्ध वर्णन के लिए देखते बनता है. राम की प्रार्थना में जो कविता तुलसीदास ने लिखी है, उसमें भी सर्वप्रथम राम के शत्रु-निधन का कृतित्व ही वर्णित है.

फिर मुसलमानों के राज में देखें। युद्ध के लिए मुसलमानों में हिन्दुओं से कम उत्साह नहीं रहा है, हाँ हिन्दुओं की सांगठनिक शक्ति कम रही, क्षणजीवी तथा आत्मकलह से जर्जर होने का प्रभेद दोनों में रहा. आज जैसा सोचते हैं, मनु संहिता में वैराग्य का विधान वैसा नहीं है, बुद्ध का अहिंसा और मैत्री का प्रचार भी व्यर्थ ही साबित हुआ. किंवदंती है कि शंकराचार्य ने बौद्ध धर्म के विरोध में अवर्णनीय निष्ठुरता के उपाय अपनाए थे और इस तरह भारतवर्ष से बौद्ध धर्म को उजाड़ने में सफल हुए थे.

अंग्रेजों के समय भारतीयों का अस्त्र रखना गैरकानूनी था, लेकिन जिज्ञासा तो बनी ही रही। जैनियों में भी अहिंसा की नीति शोचनीय रूप से परास्त हुई है. रक्तपात के लिए उनमें कुसंस्कार जनित आतंक है. शत्रुवध के लिए उनका भी उत्साह योरोपियन लोगों से कम नहीं है. मैं सिर्फ़ इतना कहना चाहता हूँ कि शत्रु की पराजय से वे भी और लोगों की तरह ही आह्लादित होते हैं.

भारत के सन्दर्भ में सिर्फ़ इतना ही कहा जा सकता है कि कभी-कभी ख़ास व्यक्ति द्वारा अहिंसा के प्रचार की आतंरिक चेष्टाएं हुई हैं, एवं वह कोशिश और राष्ट्रों की तुलना में कुछ ज्यादा सार्थक हुई है। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि भारतीयों के हृदय में अहिंसा की नीति दृढ़मूल स्थापित हो चुकी है।'

(इस पत्र में भारतीय परम्परा में हिंसा का स्थान साफ समझ में आ जाता है)।

'पहल' से साभार

(अगली कड़ी में जारी...)

मंगलवार, 22 जनवरी 2008

युद्ध के बिना नहीं रह सकती मनुष्य जाति!

बुर्जुआ समाज और संस्कृति-6
(...गतांक से आगे)


संस्कृति परम्परा की ही सम्प्रसारण होती है। परम्परा से प्राप्त विचारधारा और दृष्टिकोण ही, आधुनिक प्रभाव के फलस्वरूप संस्कृति में रूपांतरित होते हैं. परम्परा, यानी अतीत के अनुभव, इतिहास तथा पूर्वजों द्वारा प्राप्त जीवन-दर्शन. ऐसी ही परम्परा से प्राप्त उपादान 'हिंसा', बुर्जुआ संस्कृति की नियामक शक्ति है. प्राचीन विचारकों का युद्ध के लिए असीम आग्रह और उत्साह था. उन्होंने युद्ध की प्रेरणा जगाकर यथार्थवादी दृष्टिकोण का परिचय दिया.

आक्रमण से आशंकामुक्त अवस्था मनुष्य की कभी नहीं रही। आत्मरक्षा के युद्ध में पराजित होने का अर्थ ही गुलामी का जीवन है. इसलिए हर जाति, सम्प्रदाय को युद्ध की दैहिक और मानसिक तैयारी का प्रयास करना होता है. हर देश, हर काल में तत्कालीन विजयी योद्धा श्रद्धाभाजन रहे. उन्हें ईश्वर के रूप में पूजा गया, कवितायें लिखी गयीं. गीता में भी वीरगति को प्राप्त होने पर स्वर्गलाभ का आश्वासन है.

महाज्ञानी प्लेटो ने कहा था कि यद्यपि स्वर्ग कल्पना ही है लेकिन उसे अति सुखद स्थान के रूप में प्रचारित करना है, वरना युद्ध में सैनिकों का उत्साह नहीं रह पाएगा। कुरान में भी धर्मयुद्ध में मौत का पुरस्कार स्वर्गवास है.

मनुष्य को उसके रूप में स्वीकृत होने से पहले ही आत्मरक्षा के लिए युद्ध होते रहे एवं जहाँ तक इतिहास हमारे कब्जे में है, वह युद्ध का ही है। युद्ध की निरंतरता ही मानव-जीवन की स्वाभाविक अवस्था है, शांति उसका व्यतिक्रम है.

सरोकिन ने, ईसा पूर्व ६२० से १९२५ शताब्दी तक हुए युद्धों का लेखा-जोखा किया है। इससे स्पष्ट है कि किसी भी जाति के लिए एक अंतराल पर, युद्ध एक सामान्य नियम है। किसी जाति ने, पच्चीस वर्ष शांति से गुजारे हों, यह विरल है. प्राचीन ग्रीक के ३७५ वर्षों के इतिहास में २३५ वर्षों तक युद्ध होते रहे. इसमें साल भर चलने वाले युद्ध लगभग २१० थे. रोम के ८७६ वर्षों के इतिहास में ४१६ वर्षों तक युद्ध हुए. ३६२ वर्ष युद्धव्यापी रहे.
आलोच्य काल में ग्रीक, रोम और योरोप तथा दूसरे नौ देशों में जो युद्ध हुए, उनका आनुपातिक निष्कर्ष इस प्रकार है:-

ग्रीक ५७%, रोम ४१%, ऑस्ट्रिया ४०%, जर्मनी २८%, हॉलैंड ४४%, स्पेन ५७%, इटली ३६%, फ्रांस ५०%, इंग्लैंड ५६%, रूस ४६% तथा पोलैंड और लिथ्युबिया ५८%।

सरोकिन का कहना है कि युद्धों की संख्या में ह्रास का भी कोई प्रमाण नहीं है। जो विवरण मिलते आए हैं उनसे जाहिर है कि जनसंख्या वृद्धि के साथ-साथ सैनिकों की बढ़ती संख्या, युद्ध में मृत्यु तथा साधारण म्रत्यु-दर बढ़ी है. फ्रांस, इंग्लैंड, ऑस्ट्रिया, हंगरी तथा रूस के हताहतों के विवरण में बारहवीं से उन्नीसवीं सदी का पार्थक्य उल्लेखनीय है-

बारहवीं शताब्दी ( उपर्युक्त पाँच देशों की कुल जनसंख्या) १,१६१००, युद्ध में मृत २९९४०, सेना में मृत्यु-दर 2.5%, उन्नीसवीं शताब्दी ( उपर्युक्त पाँच देशों की कुल जनसंख्या) १७८६९८००, युद्ध में मृत २९१२७७१, सेना में मृत्यु-दर ३८.९%, सन १९०० से १९२५ ( उपर्युक्त पाँच देशों की कुल जनसंख्या) ४१४५६०००, युद्ध में मृत १६१४७५५०, सेना में मृत्यु-दर (अप्राप्य).

सरोकिन के अनुसार सर्वाधिक भयंकर और खूनी युद्ध का अभिशाप और 'गौरव' बीसवीं शताब्दी का ही है। इस शताब्दी के प्रथम पच्चीस वर्षों में जितनी मृत्यु हुई है, अतीत में किसी एक सदी में नहीं हुई. स्वैरतंत्र से गणतंत्र में युद्धलिप्सा कम है, यह धारणा तथ्यों द्वारा एकदम ही झूठ साबित हुई है.

'पहल' से साभार

(जारी...)

शनिवार, 19 जनवरी 2008

भूल सुधार (कल लिखी एक कविता)

मैं बहुत पुराना एक जवाब सुधारना चाहता था
जो बिगड़ गया था मुझसे स्कूल के दिनों में
और मेरे सपनों में आता था.
गज़ब ये कि उसकी जांच-कॉपी मिल गयी थी मुझे
अरसा बाद एक दिन परचून की दूकान में
चाय की पत्ती में लपटी हुई.

मुझे सजाना था हॉस्टल का वह कमरा
जिसे अस्त-व्यस्त छोड़ मैं निकला था कभी न लौटने के लिए.

मुझे कटाना था अपना नाम उस खोमचे वाले की उधारी से
जो बैठता था गोलगप्पे लेकर स्कूल के गेट पर.

विदा करते वक्त हाथ यों नहीं हिलाना था
कि दोस्त लौट ही न सकें मेरी उम्र रहते.

माँ की वह आलमारी करीने से लगानी थी
जिसमें बेतरतीब पड़ी रहती थीं साडियाँ
जो मुझे माँ जैसी ही लगती थीं.

रुई जैसी जलती यादों को
वक्त की ओखली में कूट-कूट कर चूरन बना देना था.
लौटा देना था वह फूल
जो मेरी पसलियों में पाथर बनकर कसकता रहता है दिन-रात.

काग़ज़ की कश्ती यों नहीं बहाना थी
कि वह अटक जाए तुम तक पहुँचने के पहले ही.

मुझे संभालकर रखना था वह स्वेटर
जो किसी ने बुना था मेरे लिए गुनगुनी धूप में बैठकर
मेरा नाम काढ़ते हुए.

मुझे खोज निकालना था वह इरेज़र
जो उछल-कूद में बस्ते से गिर गया था
छुटपन में.

बहुत-सी भूलें सुधारना थीं मुझे
पृथ्वी को उल्टा घुमाते हुए ले जाना था
रहट के पहिये की तरह
पृथ्वी के घूमने के एकदम आरंभ में.

- विजयशंकर चतुर्वेदी.

गुरुवार, 17 जनवरी 2008

आदमखोरों से भी बर्बर हैं हम!

बुर्जुआ समाज और संस्कृति-5

... गतांक से आगे

रूढिवादी सामाजिक परम्पराओं द्वारा ही असभ्य और बर्बर लोगों में आत्महत्या की प्रवृत्ति का सूत्रपात हुआ था. सामाजिक स्वार्थ व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊंचा है और इसके पालन के बगैर किसी का अस्तित्व सम्भव नहीं था. इसीलिए सामाजिक स्वार्थ के लिए व्यक्ति का आत्मदान बाध्यतामूलक माना गया और उसी समर्थित वातावरण के प्रभाव से इसे प्राकृतिक नियम मानकर आत्महत्याएं हुईं. (एमिली डार्कहाइम/ जुईसाइड, अ स्टडी इन सोशियोलोजी, अंग्रेजी अनुवाद- ए. स्पोल्डिंग एवं जोर्ज सिम्पसन, रूटलेज एंड केगान पॉल लन्दन १९५२, पेज- २१२-२१३).

समाज और संस्कृति परिवर्त्तनशील है. संपत्ति के संबंधों में परिवर्त्तन, संस्कृति के विवर्त्तन को अनिवार्य रूप से प्रभावित करते हैं. उत्पादन की नयी पद्धति पुरानी का स्थानान्तरण करती है, स्वभावतः सामाजिक संबंधों का भी पुनर्विन्यास होता है. संपत्ति की व्यवस्थाएं तथा राष्ट्र नेतृत्व हस्तांतरित होते हैं तथा नए सरमायेदारों के नेतृत्व में नयी व्यवस्था की स्थापना होती है. नए सरमायेदारों की प्रमुख शक्ति उनके अस्त्र बल तो होते ही हैं, लेकिन नयी संस्कृति उन्हें स्थायित्व देती है।


इस तथाकथित नयी संस्कृति के प्रभाव से जनता के ह्रदय में प्राथमिक विरूपता मंद पड़ती जाती है एवं अंततः नयी व्यवस्था ही श्रेष्ठ, चिरंतन आदर्श समाज व्यवस्था के रूप में स्थापित होती है. इस संस्कृति के निर्माता बुद्धिजीवी होते हैं. अनजाने ही वे इस नयी व्यवस्था और शासक-श्रेणी का समर्थन करते जाते हैं. इसीलिए उस युग की संस्कृति उस युग के सरमायेदारों की स्वार्थपूर्ति में सहायक होती है.

युग में शासक श्रेणी (वर्ग) की धारणाओं को, शोषित श्रेणी यथार्थ मानकर स्वीकार कर लेती है; क्योंकि धन की लगाम जिस श्रेणी के हाथ हाथों में होगी, संस्कृति की लगाम भी वही संभालेंगे. जो लोग जनता की भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति करेंगे, मानसिक खुराक (पुस्तक, अखबार, शिक्षण, प्रचार आदि) का इंतज़ाम भी उन्हीं के हाथों होगा. स्वभावत जनता के मानसिक साम्राज्य पर भी उन्हीं का आधिपत्य होगा, क्योंकि संस्कृति के नियामक यही सरमायेदार ही होंगे. कार्ल मार्क्स की भाषा में-
‘The idea of the ruling class in every epoch the ruling ideas because the class which is the ruling material force in society is at the same time it's ruling intellectual force, the class which has the means of material production at it's disposal, has control at the same time over the means of mental production. so that thereby generally speaking the idea of those who lack the means of mental production are subject to it.’ (कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगल्स रचित द जर्मन आइडियोलोजी द्रष्टव्य)।


पूंजीवादी संस्कृति ही बुर्जुआ संस्कृति कहलाती है. यह संस्कृति पूंजीवादी विषम व्यवस्था का उत्पाद है तथा उसके लिए रक्षाकवच भी. इस संस्कृति के प्रभाव से पूंजीवाद द्वारा परिचालित नीति उत्कृष्ट सामाजिक नीति प्रतीत होती है, अतिजघन्य और न्रशंस अत्याचार भी सदाचार-सा लगता है, मूर्तिमान शैतान देवदूत-सी शांति देता है, अच्छे-बुरे का बोध लुप्तप्राय होता जाता है. कई आधुनिक विधि-विधान तो मनुस्मृति के विधानों से अधिक हिंसक हैं. बुर्जुआ समाज के कार्यकलाप आदिम युग के आदमखोर बर्बर लोगों को भी शर्मशार करते हैं. किंतु इस संस्कृति के नशे में हम अत्यन्त स्वाभाविक रूप से सब कुछ स्वीकार करते हैं।


बमवर्षण द्वारा लाखों शिशुओं, वृद्धों और स्त्रियों की हत्याएं क्या हमें गुरुतर अपराध का अहसास भी देती हैं? जबकि बुर्जुआ व्याख्या में इसे धर्मयुद्ध कहा जाता है. जातीय स्वार्थ में युद्ध करना अपराध होकर भी अपराध नहीं माना जाता. मध्ययुग में जो युद्ध धर्म के लिए होते थे, वे अब राष्ट्रीय स्वार्थ में होते हैं. इन युद्धों को हम स्वीकार कर अति उत्साह से समर्थन भी करते हैं।


युद्ध आरंभ होते ही देश के नागरिक खून की अन्तिम बूँद देकर शत्रु को पराजित करने का संकल्प लेते हैं. राष्ट्रीय स्वार्थ के लिए किसी देश के दो लाख शिशुओं का वध हो तो हमारा विवेक सोया रहता है. अपने देश के शिक्षित, स्वस्थ, चुने हुए युवकों को युद्धभूमि में बलि होते देख हमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं लगता. उनकी अकाल मृत्यु, लाखों संतानों से वंचित माँ-बापों का रुदन, माता-पिताहीन शिशुओं की दुर्गति, विधवाओं का विलाप; सभी राष्ट्रीय स्वार्थ के लिए कुरबान होते हैं।


उपाय भी क्या है? अगर चीन या पाकिस्तान हमले करे तो हम हाथ-पाँव समेट कर बैठे तो नहीं रहेंगे. इसलिए असहाय की भाँति नियति के समक्ष आत्मसमर्पण के सिवाय विकल्प ही क्या है. विश्व-पूँजीवाद की मृत्युफाँस में इस तरह जकड़े हुए हैं कि निकलने का रास्ता नहीं है. ऊपर से मोहग्रस्त बुद्धिजीवीगण इसके असली स्वरूप पर नाना मोहक परदे डालते रहते हैं।

'पहल' से साभार

(...अगली किस्त में ज़ारी)

मंगलवार, 15 जनवरी 2008

वे फूलों के मुकुट धारण कर आत्महत्या करते थे!

बुर्जुआ समाज और संस्कृति-4

(...गतांक से आगे)

पुरुषों के बहु-विवाह की ही तरह औरतों में भी यह रिवाज, कई देशों में स्वीकृत था। धार्मिक इतिहास के पन्नों के विवरण बताते हैं कि कुसंस्कार के प्रभाव से शायद ही कोई कुकृत्य बचा हो जो मनुष्य जाति से बचा रहा हो. ऐसी किसी भी प्रथा की कल्पना असम्भव है जो किसी समय किसी न किसी देश में प्रचलित न रही हो.

संसार में जीवित रहना हर कोई चाहता है। लेकिन सामाजिक वातावरण के प्रभाव से प्राणों को तुच्छ समझ, स्वेच्छा से मृत्युवरण भी मनुष्य ही चाहता है. आत्महत्या के इतिहास के लेखक एमिल डार्कहाइम ने लिखा है कि विभिन्न युगों में अलग-अलग सामाजिक अवस्थाओं में समाज के प्रति श्रद्धा-ज्ञापन हेतु मनुष्य ने आत्महत्या की है और इसे प्राणोत्सर्ग, आत्माहुति या आत्म-वलिदान इत्यादि विशेषणों से आभूषित किया गया है.

डेनिश योद्धाओं की धारणा थी कि उम्र के भार से जर्जर होकर बिछौने पर पड़े-पड़े मरना कायरता और मर्यादाहीनता है। इस लान्छना से बचने के लिए वे आत्महत्या करना ही पसंद करते थे. गोथ जाति के लोगों में यह धारणा थी कि जिनकी स्वाभाविक मृत्यु होती है, वे परलोक में विषाक्त कीड़े-मकौडों के बीच अंधेरे गह्वर में अनन्त काल तक यंत्रणा भोगते हैं.

किसी गोथ राज्य की सीमा पर 'पितृ पुरुषों की शिला (राक ऑफ़ फोरफादर्स)' नामक एक ऊंचा पर्वत था। जराग्रस्त होते ही इस पर से कूदकर लोग मुक्ति प्राप्त करते थे. थ्रेसियन, हेसली इत्यादि अनेक गोष्ठियों (समुदायों) में यह प्रथा प्रचलित थी. सिलवियास इतालिपकस ने लिखा है- 'स्पेन में 'kailtik' उपजाति के लोगों में रक्त और प्राणदान का अदम्य उत्साह था. बलवीर्य इत्यादि से परिपूर्ण होते ही वार्धक्य की सीमा तक इंतज़ार करना उन्हें अपमानजनक लगता था. उनका विश्वास था कि सबल अवस्था में जो लोग मृत्युवरण करते हैं, वे स्वर्गवासी होते हैं तथा जराग्रस्त हो वृद्धावस्था में प्राण त्यागने से नरक यंत्रणा भोगनी होती है.

भारत वर्ष में भी ऐसी आत्महत्याओं का प्रचलन था। वैदिक काल की नहीं भी हो, फिर भी काफी पुरानी प्रथा थी. प्लूटार्क और क्विन्ट्स कार्टीपास ने भारतीय संन्यासियों और ब्राह्मणों द्वारा अग्नि में प्राणाहुति का उल्लेख किया है. ब्राह्मणों के शास्त्र में ऐसा उल्लेख है कि निष्प्राण देह दग्ध होने से अग्नि अपवित्र होती है तथा व्याधिग्रस्त और निष्क्रिय होकर मृत्युवरण हीन माना जाता था.

हालांकि मनु स्मृति में कई शर्तों की पूर्ति के बाद ही आत्महत्या का प्रावधान है। गृहस्थ जीवन में शास्त्रोचित कर्त्तव्य पूरे करने के बाद व्याधिग्रस्त होकर जीने से उत्तम देहत्याग ही माना गया है. (मनु ६/१-४).

न्यू देवीडीज तथा फिजी द्वीपों में भी यही प्रथा प्रचलित थी। सिएरा द्वीप में, एक निश्चित आयु पूर्ण होने पर, सभी वृद्ध, फूलों के मुकुट धारण कर, एक जगह समवेत हो, हैमलाक विषपान द्वारा आत्महत्या करते थे. सदाचार के लिएप्रसिद्ध टौगलोडाईट और सेरी लोगों में भी यही रिवाज था.

उपर्युक्त जातियों में स्त्रियों के लिए भी पति की चिता में जल जाने का विधान था। कई देशों में जैसे 'गल' के राजा और सेनापति की मृत्यु पर उनके अनुचरों के लिए भी मृत्यु की प्रथा थी. हेनरी वार्तिन ने लिखा है कि युद्ध में मृत मुख्य नायकों की मृत देह के साथ उनके अनुचर, दास-दासी, अस्त्र-शस्त्र, गहने और बर्तन इत्यादि सभी एक महोत्सव में अग्नि के सुपुर्द कर दिए जाते थे.

प्रभु की मृत्यु के पश्चात उनके अनुचर, पत्नी, दास- दासियों को जीवित रहने का कोई अधिकार नहीं था। अफ्रीका के 'असान्ति' कबीले में राजा की मृत्यु के बाद उसके मित्र, सहयोगियों को जीवित रहने का कोई अधिकार नहीं था. हवाई द्वीप में भी यही प्रथा थी. टाइटस लिवी सीजर, वेलीरियए एवं मैक्सीयस बर्बर गाल और जर्मन लोगों द्वारा धीर, स्थिर और शांति से मृत्युवरण की तारीफ की गयी है. पोलेनेशिया के लोग तुच्छ कारणों से आत्महत्या कर लेते हैं. उत्तर अमेरिका के रेड इंडियन कबीले का भी यही रिवाज है. जापान में हाराकिरी (पेट चीरकर आत्महत्या) कर अपराध के प्रायश्चित्त की परम्परा है.

'पहल' से साभार

(...शेष अगली किस्त में)

अमेरिकी राष्ट्रपति ने बेची थी अपनी ही बेटी!

बुर्जुआ समाज और संस्कृति-३

(...गतांक से आगे)

मनु की दंडविधि हिंसक है। सामाजिक विधान निष्ठुर और वैषम्यमूलक हैं. यहाँ तक कि मनु स्मृति के कई विधान (जैसे अपराधी का अंग-भंग या बहु-विवाह) आदि दंडनीय हैं. मनु और याज्ञवल्क्य क्या हमेशा ज्यादा हृदयहीन और मूर्ख थे? नहीं. आधुनिक संविधान निर्माताओं की योग्यता मनु के पासंग भी नहीं है. विदेशी विद्वानों ने मनु की उच्छ्वसित प्रशंसा की है. और यह मनु का प्राप्य भी है.

लेकिन मनु के विधान हमारे युगानुकूल नहीं हैं। एकदम नहीं हैं, मगर तत्कालीन युग में उसे कठोर या अमानवीय नहीं समझा गया था. प्लेटो या अरस्तू जैसे मनीषियों के मन में भी दास-प्रथा का नकारात्मक पक्ष नहीं आया था. अमेरिका के प्रथम राष्ट्रपति जोर्ज वाशिंगटन (१७८९-१७९६) ने अपनी वसीयत में १६० क्रीत दास छोड़े थे. (मार्टिन लूथर किंग/ केयोस ऑर कम्यूनिटी, होडार एंड स्टाफसन, लंदन, १९६८, पेज ७६).

बेंजामिन फ्रैकलिन और स्वाधीनता के घोषणापत्र के रचयिता टॉमस जेफ़रसन (१८००-१८०४) अपनी यौनेच्छा की पूर्ति के लिए छांट-छांट कर नीग्रो युवतियां खरीदते थे। फ्रैकलिन का तो दास उत्पादन का व्यापार ही था. (वह) भेड़-बकरियों की तरह नीग्रो दास-दासियों को इसलिए पालते थे कि उनकी संतानों को दास बनाकर बाज़ार में बेचा जा सके.

प्रेसीडेंट जेफ़रसन नीग्रो दासियों से उत्पन्न अपनी कन्याओं को रंडीखानों में बेचा करते थे। उनकी मृत्यु के बाद २ पुत्रियों को न्यू ओर्लिया के क्रीत दासों के बाज़ार में यौन-व्यापारियों को बेचा गया. उनकी ये दोनों ही पुत्रियाँ सुंदर, गोरी, शिक्षित और सुसंस्कृत तथा नीली आंखों वाली थीं, इसलिए उनके दाम १५०० डॉलर प्रति कन्या मिले. प्रेसीडेंट ताइलर ने भी ठीक इसी तरह अपनी कन्या को पतिता वृत्ति में झोंक दिया था. (जे. ए. रोजर्स/ सेक्स एंड रेस, द्वितीय खंड/ हैरी बेंजामिन तथा आ. ई. एल. मास्टर्स रचित प्रोस्टीच्यूशन एंड मोरालिटी के ७३वें पेज पर उद्धृत, सुवेनियर प्रेस, लंदन, १९६४).

वाशिंगटन, फ्रैंकलिन, जेफ़रसन और ताइलर आधुनिक भद्र लोगों से निकृष्ट नहीं थे। उनके कार्य उस युग की शिक्षा और संस्कृति के अनुकूल थे.

अभी कल की ही बात है, इंग्लैड के फौज़दारी विधान में केले या मूली जैसी दो सौ तुच्छ वस्तुओं की चोरी के लिए फांसी का फैसला दिया जाता था. अग्निपरिक्षा द्वारा सत्य-निर्णय का नियम था. जज साहब, वादी-प्रतिवादी, दोनों से ही खुलेआम घूस लेते थे. नौकरी के लिए भी यही प्रचलित था और कई को इसमें आपत्तिजनक कुछ नहीं लगता था. अंग्रेजों को दास-प्रथा इतनी लुभावनी लगी कि संसद में बिल लाकर भी इसे बंद करना सम्भव नहीं हो पाया। अंततः मालिकों को २०००००० पाउण्ड का जुर्माना अदा करने पर उनकी मुक्ति सम्भव हो पायी.

सामाजिक भावाकाश के प्रभाव से कोई सा भी काम जनता को स्वाभाविक प्रतीत होता है। हर क्रिया किसी समय अच्छी मानी गयी है और सारे महापाप काल की गति में सत्कर्म बनते गए. किसी समय युद्ध द्वारा ही न्याय-प्रतिष्ठा का नियम था. पिछड़े समाज के लोगों को क़ानून के फैसले से सख्त ऐतराज़ था. वे बाहुबल के पक्ष में थे.

कभी अनियमित यौन संबंधों के बदले विवाह जैसे विचार भी मनुष्य के व्यक्तिगत अधिकार में हस्तक्षेप माने जाते थे। मास्क, एस्किमो, केन्या की कई उपजातियों आदि अनेक समूहों में औरत उधार लेन-देन का चलन था. एस्किमो अपने अतिथि का सत्कार अपनी पत्नी को उसके साथ सोने की अनुमति देकर करते थे, लेकिन अगर वह फुसला कर भगा लेता तो उसकी हत्या तय थी. ज्यादातर नवजात शिशुओं को मार डालना कई जातियों का सामान्य नियम था.

'पहल' से साभार
(अगली किस्त में ज़ारी)

रविवार, 13 जनवरी 2008

हत्यारों का मनोविज्ञान


बुर्जुआ समाज और संस्कृति-२


...(गतांक से आगे)

मालिक की इच्छा का नकार मौत का बायस भी बन सकता है. अमेरिका के वैज्ञानिक ओपन हाइमर को हाइड्रोजन बम बनाने के विरुद्ध राय देने पर अपमानित होना पड़ा था. रूसी सरकार को बम बनाने का फार्मूला बताने के आरोप में रोजनबर्ग दम्पत्ति को झूठे मामले में फंसा कर मृत्युदंड दिया गया था. सरमायेदारों के स्वार्थ के विरुद्ध किसी काम को अंजाम देना इस युग में किसी भी वैज्ञानिक के लिए सम्भव नहीं है.

ध्वंस के लिए विज्ञान की प्रयुक्ति का यह तर्क सही होते हुए भी, बुद्धिजीवियों द्वारा अपनी आत्मा बंधक रखने के साथ इसका सम्बन्ध पर्याप्त नहीं है. सारे बुद्धिजीवी सचेत रूप से शोषण के पक्ष में नहीं होते. न्याय और सदाचार का पक्ष उपेक्षित होने से प्रायः सभी कुंठित होते हैं, कई बार विद्रोह भी करते हैं.

न्याय का पक्ष लेना मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है. लेकिन दुनिया में मत्स्य-न्याय चला आ रहा है क्योंकि न्याय-अन्याय की धारणाएं सभी की एक नहीं होती हैं. किसी को हत्यारे को फांसी होने पर खुशी होती है तो दूसरा सोचता है वह अकेला ही दोषी नहीं है. हत्यारे भी इसी व्यवस्था के अंग हैं सो किसी एक को फांसी देने से प्रतिहिंसा ही चरितार्थ होती है, न्याय नहीं. बम फेंकने वाले न्याय, धर्म, सत्य और मानवाधिकार की रक्षा का दावा करते हैं.

आदर्श की प्रेरणा ही मनुष्य के आचरण की नियामक शक्ति होती है- यह प्रेरणा किसी भी मनुष्य को अमेरिकी लोगों से ज्यादा हिंसक और निष्ठुर बना सकती है. मनुष्य सिर्फ़ पैसों के लिए ही निष्ठुर आचरण नहीं करता है. स्तालिन के आदेश पर दो करोड़ रूसी नागरिकों की हत्या हुई थी, जबकि उन्हें पैसे का लेशमात्र लोभ नहीं था. उनके कठोर समालोचक रॉबर्ट कान्क्वेस्ट ने लिखा है-

"क्रेमलिन के महल में नौकरों के अति-साधारण कमरे में, साधारण मनुष्य की तरह स्तालिन रहते थे. उनके जीवन में भोग-विलास या अर्थ-लिप्सा का लेशमात्र स्थान नहीं था. उनका मासिक वेतन एक हज़ार रूबल था जो कि चालीस डॉलर के बराबर होता था. उनके सचिव इसी रकम से उनके घर का भाड़ा, पार्टी का चन्दा, इत्यादि सारे खर्च चलाते थे।" (रॉबर्ट कान्क्वेस्ट, द ग्रेट टेरर, मैकमिलन एंड कम्पनी, तीसरा संस्करण १९५९, पेज संख्या ६१)

स्तालिन ने अपनी कन्या के लिए कोई भी संपत्ति नहीं छोड़ी. माओ त्से तुंग के इशारे पर काफी लोगों की हत्याएं हुईं. लेकिन वह भी हर लोभ से परे थे तथा निहायत सादा जीवन व्यतीत करते थे. हिटलर ने साठ लाख से ज्यादा यहूदियों की न्रशंस हत्याएं कीं; उसका भी यह काम किसी आर्थिक लोभ से प्रेरित नहीं था.

मध्ययुग में सांसारिक सुखों से निस्पृह लोगों ने धर्मप्रचार के 'महान' उद्देश्य से हत्या और ध्वंस का तांडव किया था. न्रशंसता के लिए जो नायक इतिहास में प्रसिद्ध हैं, उनमें कम लोगों का ही उद्देश्य आर्थिक था. आदर्श से प्रेरित होकर ही मनुष्य हँसते-हंसते मारता है और मरता भी है. ऐसा कर वह अपने कर्तव्य का पालन करता है. (इस प्रेरणा के नियामक कारणों की कुछ व्याख्या आगे है.)

आदमी का हृदय ईश्वर, धर्म, पाप-पुण्य, सुनीति और दुर्नीति विषयक धारणाएं, समाज के भावाकाश और सांस्कृतिक वातावरण से साँस की तरह ग्रहण करता है. जैसे स्पंज पानी सोखता है, उसी तरह यांत्रिक प्रक्रिया में यह होता जाता है. इसीलिए हर व्यक्ति अपने समय की संतान होता है- समय-धर्म के प्रभावाधीन. समाज में प्रचलित नीतियों के प्रयोग से वह भले बुरे का विचार करता है. श्रेष्ठ मनीषियों से भी इसमें अधिक उम्मीद करना व्यर्थ है. आज से हजारों साल बाद सामाजिक नीतियाँ क्या होंगी, इसकी धुंधली-सी धारणा भी मुश्किल है.

"पहल' से साभार
(शेष अगली किस्त में)...

शुक्रवार, 11 जनवरी 2008

उनकी टिप्पणी पर टिप्पणी!

बेनामी जी,

आपने सही कहा कि पूरी पूंजीवादी संरचना के केंद्र में अर्थसत्ता-शक्ति होती है। मेरा निवेदन बस इतना-सा है कि अभी यह लेख शुरू ही हुआ है इसलिए कसूरवार ठहराने या कोई तमगा देने के किसी फैसले पर पहुँच जाना शायद उचित नहीं होगा। बुद्धिजीवियों को नायक, खलनायक या मुख्य खलनायक बनाने का सुर भी नहीं लगाया गया है. यह तो हालात के पड़ताल की कोशिश है.

'आपने कहा कि दोनों ही पूंजी के गुलाम या चाकर होते हैं'- यही बात तो लेख के इस हिस्से में कही गयी है। इसमें मतभेद कैसे देख लिया आपने. बात जो हाईलाईट होना चाहिए थी वो यह कि फैराडे जैसे वैज्ञानिक ने पूंजी के हाथ में खेलने से इनकार कर दिया. फैराडे तो महज एक उदाहरण है. ऐसे जाने कितने ही कलाकार, वैज्ञानिक, अध्यापक, विचारक, दार्शनिक हुए हैं जिन्होंने पूंजी के हाथों में खेलने से इनकार किया और उसकी सजा भुगती. कहने का मतलब यह है कि चयन का अधिकार आपके पास है लेकिन आप उसका इस्तेमाल करने की जगह पूंजी का गुलाम बनने का विकल्प चुनते हैं.

हाँ, आपकी एक बात से मैं असहमत होना चाहता हूँ कि किसी समाज संरचना विशेष में यह भेद करना ग़लत होगा कि फलां अच्छा है या बुरा। अगर यही बात है तो हम मौजूदा समाज व्यवस्था में इतनी माथा-पच्ची करने क्यों बैठे हुए हैं? क्यों नहीं मान लेते कि शोषणकर्ता और शोषक एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं।

ख़ैर, आपको जानकारी की दृष्टि से ही सही; यह लेख अच्छा लगा, मेहरबानी! लेकिन अभी तो जानकारियों का पुलिंदा खुलना बाकी है.

बहरहाल, अगली किस्त पढ़कर बताइयेगा...

आपका ही
विजयशंकर

गुरुवार, 10 जनवरी 2008

आज वैसे सिरफिरे वैज्ञानिक कहाँ हैं?


बुर्जुआ समाज और संस्कृति-१


(बांग्ला में कभी छपने वाली 'aanrinya' पत्रिका में यह लेख जनवरी, १९८१ में छपा था. यह पत्रिका कुछ प्रगतिशील अध्यापक प्रकाशित किया करते थे. इस लेख के मूल लेखक हैं राधागोविंद चट्टोपाध्याय और अनुवाद प्रमोद बेडिया ने किया है. ज्ञानरंजन जी के सम्पादन में छपने वाली 'पहल' में यह लेख मैंने पढ़ा था और मैं इससे इतना मुतास्सिर हुआ कि आप सबको इसे पढ़वाने की इच्छा जागी. आदरणीय ज्ञान जी की अनुमति लेकर मैं इसे यहाँ कुछ किस्तों में प्रस्तुत कर रहा हूँ-- विजयशंकर)

जिन्हें सरमायेदार सर्वहारा के एकमात्र शत्रु प्रतीत होते हैं, उनके बारे में आलोचना के दौरान फ्रांसीसी विद्वान रेमंड ऑरेन ने कहा है कि पूंजीपतियों को जिस तरह बदजात और षड्यंत्रकारी के रूप में चित्रित किया जाता है, वास्तव में ऐसा है नहीं। ये लोगअपने कारोबार के नफे-नुकसान के अलावा कुछ नहीं समझते हैं. संपत्ति संबन्धी परिचालानाएं छोड़ दें, किस तरह यह विराट मामला परिचालित होगा, इसका कोई बोध इन्हें नहीं होता.


यह विचार आधारहीन नहीं है। क्योंकि मालिक सिर्फ कूपन काटते हैं. अनुपार्जित आय से भोग-विलास भरे जीवन के अलावा कदाचित ही ये किसी दूसरे मामले में सर खपाते हैं. इनके स्वार्थ से जुड़ी सारी चिंताएं और कार्य नौकरीपेशा बुद्धिजीवीगण करते हैं. बुर्जुआ समाज द्वारा अनाचार, अत्याचार और युद्धविग्रह के लिए ये लोग ही जिम्मेदार होते हैं.


बुद्धिजीवी इतने कुकर्म क्यों करते हैं? प्रत्यक्ष और परोक्ष दो कारण हैं। प्रत्यक्ष कारण तो बड़ा सीधा-सा है- ये अपने प्रभाव, सम्मान, अवस्थान और वित्त के लिए बुर्जुआओं पर निर्भर करते हैं. किसी भी व्यक्ति के लिए स्वतन्त्र रूप से शिक्षा का खर्च जुटा पाना सम्भव नहीं हैं. जितने भी निपुण वैज्ञानिक हैं, वे किसी प्रतिष्ठान या सरकार का पुछल्ला बनने को बाध्य हैं.


उद्योगों का अन्तिम उद्देश्य इसमें पैसा लगाने वाले लोग निर्धारित करते हैं। हर उद्योग की अपनी शोध-शाखा होती है. वहाँ ऐसे वैज्ञानिक उद्योगों के फलने-फूलने के लिए शोध करते हैं. मिलावट के उन्नत तरीके खोजते हैं. सरकारी शोध केन्द्रों, विश्वविद्यालयों और विभिन्न संस्थानों आदि में युद्ध में प्रयुक्त विषाक्त जीवाणु, वाष्प या फिर ज्यादा से ज्यादा घातक बम बनाने के लिए शोध होते हैं.


ऐसे लोग कुछ भी अच्छा नहीं करते होंगे, यह तो पता नहीं, लेकिन उन्हें अच्छा-बुरा जैसा भी निर्देश मिलता है, वे जरूर उसे पूरा करते हैं। सरमायेदारों की इच्छा से अलग उनके लिए कुछ भी करना सम्भव नहीं है। स्पष्टतः आधुनिक विज्ञान का उद्देश्य सरमायेदारों या उनकी सरकार द्वारा ही निर्धारित होता है. क्रीमिया युद्ध के दौरान अंग्रेज सरकार ने प्रसिद्ध वैज्ञानिक माइकल फैराडे को विषाक्त गैस बनाने को कहा था, जिसे उसने सीधे नकार दिया था. आधुनिक युग में फैराडे जैसे 'सिरफिरे' वैज्ञानिक भूखों ही मरेंगे....


(अगली किस्त अगली पोस्ट में)


रविवार, 6 जनवरी 2008

वंशावली (कविता)

वंशावली

परदादा

वेदव्यास
मालपुए
कर्मकांड
दुनियादार

दादा

तुलसीदास
दूध-भात
खेती-पाती
समझदार

पिता

कार्ल मार्क्स
चना-चबेना
यूनियनबाजी
कलाकार

मैं

बेकिताब
भुखमरी
बेरोज़गारी
कर्ज़दार

(मशहूर अमेरिकी कवयित्री हाना कान के असर में. २४ दिसम्बर, २००६)

-विजयशंकर चतुर्वेदी

शनिवार, 5 जनवरी 2008

तलछट ६: यहाँ से कहाँ जाओगे श्रीनाथ?

नहीं, यूँ ही नहीं दुनिया में आ गया था श्रीनाथ. और दूसरों की कृपा पर जीता भी नहीं है वह. कांदिवली रेलवे स्टेशन के पास एसवी रोड पर तमाम दूकानों में अलस्सुबह अखबार बांटता है. अलग-अलग अखबार दूकानों के शटर में फंसा देता है. दूकान खोलने के साथ-साथ दूकान मालिकों के सामने दुनिया की खबरें भी खुलती जाती हैं. इन्हीं दूकानों में से एक में दिन भर चाकरी भी करता है सत्तर बरस का श्रीनाथ.


जिसे मुम्बई में बेसहारा बुढापा काटना पड़ता है उसे जीना होता है कुछ-कुछ श्रीनाथ की तरह. वहीं पास के फुटपाथ पर एकांत खड़ी झोपड़ी में रोती-झींकती लगभग पागल हो चुकी विकलांग पत्नी और पोलियो से लाचार हो चुकी बड़ी बेटी के साथ जिंदगी काट रहा है वह. गनीमत है कि म्युनिसीपलटी वालों की कुदृष्टि पिछले चार सालों ने नहीं पड़ीं है उसकी झोपड़ी पर.


श्रीनाथ किसी कामचोरी की सज़ा नहीं काट रहा है. रेलवे में अस्थायी ही सही; नौकरी थी उसकी. माता-पिता थे. बड़ा भाई था. मध्य रेलवे के भायखला रेलवे स्टेशन के पास सरकार की तरफ़ से क्वार्टर मिला हुआ था. क्वार्टर क्या था, दडबा था लेकिन सर छिपाने के लिए भगवान की नेमत थी. जीवन की पूरी चाहत के साथ श्रीनाथ बचपन में वहाँ रहकर कुछ पढ़ाई- लिखाई भी करता था.


पिताजी रिटायर हुए तो समझो पूरा घर रिटायर हो गया था. रेलवे में खलासी थे. तनख्वाह भी उस जमाने में 32 रुपया महीना थी. बड़े भाई ने पिताजी के लतियाने पर भी रेलवे स्कूल का मुंह नहीं देखा. स्कूल के नाम पर घर से निकलता था और लोअर परेल की तरफ जाकर बड़े पुल के नीचे गरद पीने वालों के साथ बैठता था.


श्रीनाथ अभी गुणा-बाकी भी न सीख पाया था कि पिताजी रिटायर हो गए और रेलवे क्वार्टर से कूच करने का हुक्म जारी हो गया. पिता को श्रीनाथ अब तक दुनिया सबसे ताकतवर आदमी मानता था क्योंकि लोहे के बड़े-बड़े गर्डर भी वह अपनी भुजाओं के बल से खिसका ले जाते थे, लेकिन सिर छिपाने के लिए एक झोपड़ी का इंतजाम करना भी उनके लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा था. आखिरकार पूरे परिवार को बंबई वीटी (अब मुम्बई सीएसटी) रेलवे स्टेशन के पिछवाडे एक टपरा बनाकर शरण लेनी पड़ी.


वहाँ से भायखला के रेलवे स्कूल जाना अब मुमकिन न था. वैसे भी श्रीनाथ पिछली २ कक्षाओं में चार बार फेल हो चुका था. घर में पिता अपनी जवानी के दिनों के किस्से सुना कर उसे प्रेरित करने की कोशिश करते थे. वह बताते थे कि कैसे वह तमिलनाडु के नागरकोइल से मुम्बई आए थे और कैसे उन्हें एक अंग्रेज साहब ने तरस खाकर रेलवे में खलासी की नौकरी पर रख लिया था.


किस्से सुन-सुन कर श्रीनाथ के दिमाग में भी रेलवे की नौकरी करने का विचार ज़ोर मारने लगा. लेकिन उसकी शिक्षा अंगूठा छाप के ही बराबर थी. फ़िर भी पिता ने उसे अपने पुराने दिनों की सेवा का वास्ता देकर एक मुसलमान साहब से कह-सुन कर श्रीनाथ के लिए खलासी का काम पक्का करवा लिया. अब पुराने दिन तो थे नहीं कि नौकरी मुस्तकिल होती, वह एक दिहाड़ी मजदूर जैसा काम था. लेकिन काम तो काम था. श्रीनाथ ओवरटाइम करके परिवार का पेट पालने लायक मजदूरी हर माह कमा ही लेता था. खैर, वे जवानी के दिन थे जब श्रीनाथ की बाहों की मछलियों पर आकर थकान दम तोड़ देती थी.


इसके बाद का किस्सा श्रीनाथ को याद नहीं आता. वह कडियाँ जोड़ने की कोशिश करता है लेकिन...


हाँ, इसके बाद इतनी याद है कि पिता एक बार सबको अपने मूल गाँव ले गए थे. बड़ा भाई यहीं रह गया था क्योंकि काफी तलाशने के बाद भी वह नहीं मिला था. बाद में पता चला था कि गरद पीने वालों के साथ उसे भी पुलिस उठा ले गयी थी. फ़िर गाँव में ही श्रीनाथ की शादी कर दी गयी थी.


श्रीनाथ को रेलवे में दिहाड़ी करते ५ साल पूरे हो गए थे. उन्हीं दिनों रेलवे ने नौकरों के कुछ क्वार्टर सायन में बनाए थे. एक कमरा उसे भी अलोट कर दिया गया. सब लोग वीटी वाले टपरे से यहाँ रहने आ गए. बीच-बीच में बड़ा भाई भी आ जाता था. माँ से खूब झगड़ा करता और श्रीनाथ की अनुपस्थिति में खाना बनाने के बर्तन तक उठा ले जाता. चरस की लत उसे अपनी गिरफ्त में पूरी तरह ले चुकी थी. उसकी यह हालत देख-देख कर माता-पिता खून के आंसू बहाते थे. और एक दिन वह भी आया जब एक एक कर दोनों इस दुनिया से रोते बिलखते विदा हो गए. पीछे छोड़ गए श्रीनाथ का परिवार छाती पीट-पीट कर कलपने के लिए.


एक दिन वह मध्य रेलवे के कान्जुर मार्ग रेलवे स्टेशन के पास रेल पटरियों पर हथौड़ा चला ही रहा था कि उसे प्लेटफोर्म पर खड़े यात्रियों के अचानक चिल्ला उठाने की आवाज सुनाई दी. कोई लोकल ट्रेन से कट गया था. श्रीनाथ भी मजमें में पहुंचा. एक यात्री ने कहा- 'गर्दुल्ला था, ऑफ़ हो गया साल्ला!' श्रीनाथ के पैरों तले से ज़मीन खिसक गयी. यह उसका बड़ा भाई था शेखर. इतने टुकड़े हुए थे उसके कि किसी तरह से पहचान में नहीं आता था. खैर, श्रीनाथ ने रेलवे अधिकारियों की मदद से उसका कफ़न-दफ़न किया.


इस घटना के बाद काम से उसका मन ऐसा उचटा कि साहब लोग उससे खफ़ा रहने लगे. भाई के इस तरह मरने के शोक ने उसका यह हाल कर दिया था कि वह ड्यूटी से दांडी मारने लगा. आखिरकार उससे कह दिया कि कल से काम पर न आया करे. अब पिताजी तो जीवित थे नहीं कि अपने खून-पसीने का वास्ता देकर उसे बहाल करवा देते. नतीजा यह हुआ कि अधेडावस्था में श्रीनाथ की बेरोजगारी प्रारंभ हो गयी.


रेलवे में काम करते-करते उसे लोहा-लंगड़ से प्यार-सा हो गया था. एक दिन वह दक्षिण मुम्बई के नल बाजार की ओर गया तो उसने एक दूकान में मजदूरी के लिए पूछ लिया. सेठ कच्छी था. उसने श्रीनाथ का अनुभव देखकर उसे काम पर रख लिया. काम हाड़तोड़ था! लोहे के गर्डर, छड़ों के पुलिंदे, लोहे की कटिंग के बोरे एक विशाल तराजू में रखने पड़ते थे. उसके हाथ छिल जाते और दवा-दारू की कोई सुविधा न होने के कारण अगले ही दिन उन घावों में मवाद भर जाता. मामला सीधे हाथ और पेट से जुड़ा था. सो, श्रीनाथ के पास और और कोई चारा नहीं था.


हाथ-पाँव छिलवाकर रोज़ शाम को सायन कोलीवाड़ा वाली झोपड़ी में पहुँच जाता था जो उसने रेलवे का क्वार्टर छूटने के बाद खड़ी की थी. वहाँ पत्नी हल्दी का लेप लगाती थी. उसके प्यार में पता नहीं कहाँ का जादू था कि श्रीनाथ इतने दर्द के बाद भी बिस्तर पर लुढ़कते ही नींद की गोद में पहुँच जाता था.


मुझे मुनव्वर राणा का एक शेर याद आता है-

सो जाते हैं फुटपाथ पर अखबार बिछाकर

मज़दूर कभी नींद की गोली नहीं खाते.


श्रीनाथ इस दौरान चार बच्चों का पिता बना. तीन बेटियाँ और एक लड़का. झोपड़ी में गुजर करते श्रीनाथ के परिवार को पन्द्रह साल होने को आए थे. इकलौता लड़का वेल्ली मनपा के सायन स्कूल में पढ़ने जाता था. एक दिन स्कूल से लौटा तो ऐसा बीमार पड़ा कि कोई दवा काम न आयी. वैसे भी बड़े अस्पताल में इलाज कराने की कूवत भी कहाँ थी उसके पास. श्रीनाथ ने झाड़-फूंक का सहारा लिया. लेकिन उसी बेहोशी की हालत में एक दिन वेल्ली के प्राण-पखेरू उड़ गए.

'किसी ने वेल्ली के ऊपर तंत्र किया था साहब', कहते हुए होंठ भींच लेता है श्रीनाथ. बेटे की मौत के दिन ही श्रीनाथ इतना बूढ़ा हो गया जैसे अगले चालीस साल उसने उसी दिन तय कर लिए हों. उसका मन तेजी से मौत की ओर बढ़ने लगा. वह जगह उसे एक भी पल ठहरने लायक नहीं लगी. हफ्ते भर बाद झोपड़ी त्यागकर वह अपनी पत्नी और बेटियों के साथ कान्दीवली की तरफ़ चला आया. तब से बस चलता ही चला जा रहा है.

इधर झोपड़ी में पोलियो की शिकार एक बेटी है, दो बेटियाँ लोगों के घरों में झाड़ू-पोंछा लगाती हैं. चार साल पहले बारिश के दौरान एक गटर में गिर जाने के चलते पत्नी कमर तुडाकर झोपड़ी में ही पड़ी रहती है,


'हमारा क्या है साहब. जब तक इधर झोपड़ी है पड़े हुए हैं. लेकिन सुना है कि यह रोड चौड़ी होनेवाली है. देखते हैं कब तक बचे रहते हैं'- चिंता जाहिर करता है श्रीनाथ.


मुझे पता है, श्रीनाथ के लिए दिल से चाहकर भी मैं यह रोड चौड़ी होने से नहीं रोक सकता. आख़िर महानगर की तरक्की का मामला जो ठहरा!