शुक्रवार, 15 जून 2012

मेहदी हसन: आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ

मेहदी हसन साहब का भारत से ऐसा रिश्ता है कि जिसे कहते हैं कि उनकी तो यहाँ नाल गड़ी है. राजस्थान में जहाँ वह पैदा हुए थे उनके लूणा गाँव के पुराने लोग प्यार से उन्हें महेदिया कहकर बुलाते थे. मेहदी हसन अपनी जन्मस्थली से गहरे जुड़े हुए थे. वह विभाजन के बाद तीन बार गाँव आये. वहां अपने दादा की मजार बनवाई. गौर करने की बात यह है कि वह जब भी गाँव आते थे तो गांववालों से शेखावटी बोली में ही बात करते थे. गाँव वालों ने एक एजेंसी को बताया कि मेहदी हसन को गाने के साथ-साथ पहलवानी का भी शौक था और जब पिछली बार वह गाँव आये थे तो उनके बचपन के एक दोस्त अर्जुन जांगिड़ ने मज़ाक-मज़ाक में कुश्ती लड़ने की चुनौती देकर पुरानी यादों को ताज़ा कर दिया था. अब अर्जुन जांगिड़ भी इस दुनिया में नहीं रहे.
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पता नहीं क्यों किसी बड़े फ़नकार के गुज़र जाने के बाद उसे हर माध्यम में ढूंढ और पा लेने की बेचैनी दम नहीं लेने देती. यूं तो मेरे मोबाइल के मेमोरी कार्ड में हसन साहब की कई गज़लें हैं जिन्हें मैं अक्सर सुना करता हूं, लेकिन परसों (13 जून 2012) जब उनके निधन की ख़बर सुनी तो सन्न रह गया और उन्हें बहुत करीब से पा लेने के लिए छटपटाने लगा. इंटरनेट पर विविध सामग्री उनके बारे में पढ़ डाली. यू ट्यूब पर उनकी गायी अमर गज़लें आँख मूंदे सुनता रहा और न जाने किस किस दुनिया की सैर करता रहा.

जिन लोगों ने मेहदी हसन साहब को गाते सुना और देखा है उन्हें मैं भाग्यशाली समझता हूं. टीवी पर स्वरकोकिला लता मंगेशकर, खैय्याम साहब, आबिदा परवीन, हरिहरन, पंकज उधास, तलत अज़ीज़ और अन्य संगीत नगीनों की राय मेहदी साहब के बारे में देखता-सुनता रहा. लता जी ने तो उनके बारे में एक बार कुछ इस तरह कहा था कि मेहदी हसन साहब के गले से ख़ुदा बोलता है.

मैंने इलेक्ट्रौनिक उपकरणों के जरिये ही मेहदी साहब को सुना है लेकिन उनकी आवाज़ मशीन को भी इंसानी गला दे देती है. उनकी आवाज़ में मुलायमियत होने के साथ-साथ वह वज़न भी है जो शायर के शब्दों और भावनाओं को श्रोता की रगों में उतार देता है. यही वजह है कि उनकी गायिकी सरहदों की दूरियां पाट देती है. हवाओं और पानियों में घुलकर एक से दूसरे देस निकल जाती है. बेख़याली के आलम में मैं सुनता रहा- 'रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ, आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ', 'ज़िंदगी में तो सभी प्यार किया करते हैं, मैं तो मर कर भी मेरी जान तुझे चाहूंगा', 'अबके हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें, जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें,' 'मोहब्बत करने वाले कम न होंगे, तेरी महफ़िल में लेकिन हम न होंगे', 'पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है, जाने न जाने गुल ही न जाने, बाग़ तो सारा जाने है,' 'गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौबहार चले, चले भी आओ के गुलशन का कारोबार चले', 'दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के, वो कौन जा रहा है शब-ए-ग़म गुज़ार के,' 'आये कुछ अब्र कुछ शराब आये, उसके बाद आये जो अज़ाब आये', 'रफ्ता रफ्ता वो मेरी हस्ती का सामाँ हो गए.....लिस्ट बहुत लम्बी है. लेकिन जब भी मैं उनका गाया 'प्यार भरे दो शर्मीले नैन' सुनता हूँ तो मेरी वाणी मूक हो जाती है. जिस तरह से उन्होंने 'प्यार भरे' की शुरुआत की है वह भला कोई क्या खाकर कर सकेगा.

मेहदी हसन को सुनते हुए कभी अभिजातपन का एहसास नहीं होता. लगता है जैसे अपने ही परिवेश का कोई देसी आदमी पक्का गाना गा रहा हो. उनकी आवाज़ में राजस्थान की गमक को साफ़ महसूस किया जा सकता है (मेहदी हसन का जन्म 18 जुलाई 1927, राजस्थान, जिला-झुंझनू, गाँव-लूणा, अविभाजित भारत में हुआ था). उनकी ग़ज़ल गायिकी शास्त्रीय होते हुए भी मिट्टी की खुशबू से सराबोर है. वह जहां पूरी महफ़िल के लिए गाते प्रतीत होते हैं वहीं एक एक श्रोता के लिए भी और सबसे बढ़कर वह स्वयं में खोकर स्वयं के लिए गाते प्रतीत होते हैं. ग़ज़ल सम्राट जगजीत सिंह जी ने मुझसे एक बार मेरे प्लस चैनल के दिनों में कहा था- "नई पीढ़ी के ग़ज़ल गायकों को अगर लम्बी रेस का घोड़ा बनना है तो उन्हें अपना शास्त्रीय आधार पुख्ता करना होगा और यह बात उन्होंने मेहदी हसन साहब से सीखी है."

मेहदी हसन साहब ने बड़ी सादगी से राग यमन और ध्रुपद को ग़जलों में ढाला और ग़ज़ल गायिकी को उस दौर में परवान चढ़ाया जब ग़ज़ल गायिकी का मतलब उस्ताद बरकत अली खान, बेगम अख्तर और मुबारक बेगम हुआ करता था. हालांकि हसन साहब कोई ग़ज़ल गायक बनने का उद्देश्य लेकर नहीं चले थे. आठ साल की उम्र में उन्होंने फाजिल्का बंगला (अविभाजित पंजाब) में अपना जो पहला परफौरमेंस दिया था वह ध्रुपद-ख़याल आधारित था...और उन्हें जब पहला बड़ा मौका मिला 1957 में पाकिस्तान रेडियो पर, तो वह ठुमरी गायन के लिए था. ध्रुपद शास्त्रीय संगीत के कुछ सबसे पुराने रूपों में से एक माना जाता है. खान साहब की ट्रेनिंग ही ध्रुपद गायिकी में हुई थी. उनके पिता उस्ताद अज़ीम खान और चाचा उस्ताद इस्माइल खान साहब बचपन से ही रोजाना उन्हें ध्रुपद का रियाज़ कराते थे. दरअसल मेहदी हसन साहब का पूरा खानदान ही गायिकी परंपरा से जुड़ा चला आ रहा था. वह अक्सर ज़िक्र करते थे कि उनकी पीढ़ी 'कलावंत घराना' की 16वीं पीढ़ी है.

लेकिन रेडियो पाकिस्तान के दो अधिकारियों जेडए बुखारी और रफीक अनवर साहब ने मेहदी हसन की उर्दू शायरी में प्रगाढ़ अभिरुचि को देखते हुए उनका प्रोत्साहन किया और गज़लें गाने का मौका दिया. मेहदी हसन इन दोनों सख्शियतों का सार्वजनिक तौर पर ज़िन्दगी भर आभार मानते रहे. आज दुनिया भर के ग़ज़ल प्रेमी भी उनका आभार मानते हैं कि उन्होंने हमें 'शहंशाह-ए-ग़ज़ल' दिया और ग़ज़ल गायिकी को उसका नया रहनुमा.

मेहदी हसन साहब की ज़िंदगी किसी समतल मैदान की तरह कभी नहीं रही. वह वक़्त के थपेड़ों से दो-चार होते रहे. उनका कलाकारों से भरा-पूरा परिवार आर्थिक संकटों से घिरा ही रहता था. बचपन में मेहदी हसन साहब को अविभाजित पंजाब सूबे के चिचावतनी कस्बे की एक साइकल सुधारने वाली दूकान में काम करना पड़ा. थोडा बड़ा होने पर वह कार और डीजल ट्रैक्टर मैकेनिक का काम सीख गए और परिवार की मदद करते रहे. जव वह २० साल के हुए तो भारत-पाक बंटवारा हो गया और वह परिवार के साथ पाकिस्तान चले गए जहाँ आर्थिक मुश्किलों का नया दौर शुरू हुआ. इस सबके बावजूद उन्होंने संगीत के प्रति अपनी लगन में कमी नहीं आने दी. वहां छोटे-मोटे प्रोग्राम करते रहे. और तभी उनको मिला पहला ब्रेक पाकिस्तान रेडियो पर, जिसका ज़िक्र हम पहले कर चुके हैं.

ग़ज़ल गायिकी में स्थापित होने के साथ ही उन्हें पाकिस्तान फिल्म इंडस्ट्री ने हाथोंहाथ लिया. उनके गाये फ़िल्मी नगमें, दोगाने, गज़लें पाकिस्तानी फिल्म संगीत की विरासत बन गए हैं. मलिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ के साथ उनका गाया 'आपको भूल जाएँ हम, इतने तो बेवफा नहीं' (फिल्म-तुम मिले प्यार मिला, 1969), नाहीद अख्तर के साथ 'ये दुनिया रहे न रहे मेरे हमदम' (मेरा नाम है मोहब्बत, 1975), 'आज तक याद है वो प्यार का मंजर मुझको' (सेहरे के फूल), 'जब कोई प्यार से बुलाएगा' (ज़िंदगी कितनी हसीं है, 1967), 'दुनिया किसी के प्यार में जन्नत से कम नहीं' जैसे सैकड़ों सुपरहिट फ़िल्मी नगमें उनके नाम दर्ज़ हैं.

एक गायक के तौर पर मेहदी हसन कई बार भारत आये. भारत के संगीत रसिकों ने हमेशा उन्हें सर-आँखों पर बिठाया. उनके क्रेज़ का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब खान साहब पहली बार भारत आये तब 'टाइम्स ऑफ़ इण्डिया' ने पहले पेज पर किसी राष्ट्राध्यक्ष के आगमन की तरह बड़ी-सी तस्वीर छापी थी और कैप्शन दिया था- 'मेहदी हसन एराइव्स'. सच है, इस कायनात में ग़ज़लों का अगर कोई राष्ट्र होता हो तो वह उसके आजीवन राष्ट्राध्यक्ष ही थे. आख़िरी बार जब वह सन 2000 में भारत आये थे तो जल्द ही फिर आने का वादा करके गए थे लेकिन उनकी फेफड़ों की बीमारी ने ऐसा घेरा कि साँस साथ छोड़ने लगी. खुदा की आवाज़ का एहसास कराने वाले फ़नकार की धीरे-धीरे आवाज़ भी जाती रही और अंततः फ़नकार भी हमसे रुखसत लेकर सदा के लिए दुनिया से चला गया.

मुझे अब भी यह खबर झूठी लग रही है. मगर मृत्यु एक कड़वी सच्चाई है. मेंहदी साहब को श्रद्धांजलि देने के लिए उन्हीं के गाये शब्द उधार लेकर इतना ही कहता हूँ- ‘आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ.....’

शुक्रवार, 18 मई 2012

कवि तुषार धवल के चित्र: शिव, प्रकृति-पुरुष और वेलेंटाइन्स

एक कवि यदि चित्र बनाये तो कैसा होगा? वह जो शब्दों से एक संसार रचता है, वही अब लकीरों और रंगों से संसार रचे तो कैसा होगा? क्या शब्द लकीर ओढ़ लेते होंगे या फिर वहां सिर्फ शब्दातीत ही होता होगा? क्या कवि अपने भीतर के किसी अलग तहखाने से चित्र लाता है और किसी अन्य से कविता? या फिर उसकी कविता का वही संसार एक अलग रूप-रंग में चित्र के रूप में उद्भासित होता है ? इसकी पड़ताल के लिए अलग अलग समय पर अलग अलग कवि-चित्रकारों की कृतियों को परखा गया है और अब तक इस बारे में कोई स्थाई राय नहीं बन पाई है. वजह ये कि हर रचनाकार का अपना सृजन धर्म अलहदा होता है, और यही वह कुंजी है जो विपुल सृजन के विश्व का ताला खोलती और उसे समृद्ध करती है.

देश और दुनिया में ऐसे कवियों की कमी नहीं है जो चित्रकार भी हैं, या थे. उन्हीं तमाम लोगों की कतार में एक और नाम है तुषार धवल का. यूँ तो तुषार धवल को हिंदी के लोग एक कवि के तौर पर जानते हैं, पर चित्रकार के रूप में भी वे सक्रिय हैं, और इसे हममें से कम लोग ही जानते होंगे.

पिछले माह दिनांक 9 अप्रैल से 14 अप्रैल के मध्य मुंबई की प्रतिष्ठित 'सिमरोज़ा आर्ट गैलेरी' में तुषार धवल के चित्रों की प्रदर्शनी आयोजित की गयी जिसका नाम unconscious calling रखा गया. दरअसल यह नाम भी चित्रकार के मन की परतें खोलता प्रतीत होता है! तुषार दरअसल सृजन धर्मिता को अचेतन मन से उठता हुआ पाते हैं. यहाँ उन पर फ्रायड के मनोवैज्ञानिक चिंतन का प्रभाव देखा जा सकता है. प्रदर्शित चित्रों में तुषार धवल के चित्रों की तीन श्रृंखलाओं ने विशेष तौर पर ध्यान आकर्षित किया. ये चित्र श्रृंखलाएं थीं :- शिव, प्रकृति-पुरुष, और वेलेंटाइन्स. इन सभी चित्रों में जहाँ क्रमशः उनकी चित्र यात्रा को देखा जा सकता है वहीँ उनके अचेतन मन पर उठती छवियों को भी समझा जा सकता है. ये सभी चित्र एक ओर स्त्री-पुरुष संबंधों की बौद्धिक, मनोवैज्ञानिक, भावनात्मक और सामाजिक पड़ताल करते हैं तो दूसरी ओर उनमें फंतासी का भी विपुल प्रयोग दीखता है. यहाँ स्त्री-पुरुष अपने शारीरिक आयामों को तोड़ते हुए नज़र आते है, जैसे एक भीतरी तत्त्व इनकी देह रचना को तोड़ बाहर निकल कर खुद को व्यक्त करना चाह रहा है. यहाँ तुषार की ही ये काव्य पंक्तियाँ बरबस याद आ जाती हैं--

"आओ तन बदल लें
गहरे अंतर में
दरक गए हैं सीमान्त
काल की शिखा से तोड़ लाया यह पल
परिधि को तोड़ निकला
अनंत यात्रा यह भी इस कथा की ...”

अपनी कविताओं की ही तरह अपने चित्रों में भी तुषार भौतिक से पार-भौतिक तक की यात्रा करते हैं. फिर चाहे वह शिव का सूक्ष्म निरूपण हो या फिर ‘शेष 1’, जिसमें उन्हें पहली बार एक नया फॉर्म प्राप्त हुआ, या फिर प्रकृति-पुरुष और वेलेंटाइन्स. सबमें चित्रकार इस भौतिक विश्व के पीछे की उर्जा को तलाश रहा है. अपने नए मुहावरों में तुषार के चित्रित चरित्र 'मुंडा हुआ सर, लम्बी खिंची हुई गर्दन और गोल उठे हुए कंधे' वाले हैं और प्रायः इनकी नाक या आँख नहीं होती है. तुषार का मानना है कि प्राणिमात्र की भाव भंगिमाओं का यदि अध्ययन किया जाये तो उनकी गर्दन के खिंचाव से ही उनके भीतर के भावों को समझा जा सकता है. साथ ही वे मछली, कमल और अर्धचन्द्र को बिम्बों के रूप में लाते हैं. गौरतलब है कि ये बिम्ब तुषार की कविताओं में भी आते हैं. इसी तलाश में अभिव्यक्ति के नए नए फॉर्मों पर वे अभी काम कर रहे हैं. उनकी रेखाओं में एक आंतरिक लय, जो उनकी कविताओं में भी पाई जाती है, स्पष्ट दीखती है. इसके साथ कोमल रंगों के चटख सम्मिलन से वे एक सूक्ष्म विश्व की रचना करते हैं जो प्रायः दृश्यमान नहीं है. एक और बात, अपनी "काला राक्षस" जैसी लम्बी कविता में जिस तरह तुषार ने फंतासी का इस्तेमाल किया है, लगभग वही रूप इन चित्रों में भी नज़र आता है.

इस प्रदर्शनी का उद्घाटन श्रीमती संगीता जिंदल, जो 'आर्ट इंडिया' नामक प्रतिष्ठित कला पत्रिका की संपादक हैं, ने किया. उद्घाटन समारोह में मुंबई और पुणे कला जगत के कई परिचित चेहरों के साथ साथ फिल्म जगत से जुड़े लोग, साहित्य सेवी तथा नौकरशाही से जुड़े लोग शरीक हुए.

यह कहा जा सकता है कि तुषार की कविता और चित्रकारी एक दूसरे की स्पर्धी नहीं बल्कि सहधर्मिणी एवं सहगामिनी हैं तथा कहीं-कहीं एक दूसरे की पूरक भी. जिस तरह एक कलाकार के भीतर अनेक रचनात्मक जगत एक साथ सक्रिय रहते हैं उसी तरह उसके अंतरतम में कई विधाएं एकसाथ प्रस्फुटित होने के इंतज़ार में रहती हैं. कोई कथ्य या विषयवस्तु धरातल पर किस रूप में खिले, यह कह पाना या तय कर पाना हमेशा कठिन होता है. इन अर्थों में तुषार जी की चित्रकारी और कविता एक दूसरे का संबल तथा विस्तार भी है. तुषार एक कवि के रूप में अधिक मुखर होंगे या एक चित्रकार के रूप में, या फिर दोनों ही में उनकी गति सम-इन्द्रधनुषी सिद्ध होगी, यह समय ही सिद्ध करेगा. उनकी इस उज्जवल रचनाधर्मी यात्रा के लिए हमारी शुभकामनायें!

रविवार, 22 अप्रैल 2012

प्रायवेट स्कूलों में 25% आरक्षण और आदम के बच्चे

ज़रा सोचिये कि जब धारावी की झोपड़पट्टी का कोई बच्चा किसी इंटरनेशनल स्कूल में शान से क्लास अटेंड करेगा तो कितना अद्भुत नज़ारा होगा! धर्म, जाति, भाषा, वर्ग के कितने बंधन चकनाचूर होंगे. कई फ़िल्मी कहानियां हकीक़त बन सकती हैं. कई हाथ आसमान छू सकते हैं. कई सपने साकार हो सकते हैं. समाज में समरसता का एक नया दौर शुरू हो सकता है. कई किताबी बातें अमली जामा पहन सकती हैं.
यह कल्पना करके ही रोमांच हो आता है कि मुंबई के जुहू कोलीवाड़ा में रहनेवाले गरीब मच्छीमारों के बच्चे 2 फर्लांग दूर जुहू तारा रोड पर स्थित उस जमनाबाई नरसी स्कूल में दाखिला ले सकेंगे जहां फ़िल्मी सितारों और उद्योगपतियों के बच्चे पढ़ते हैं! वे करीब से देख सकेंगे कि किस फिल्म सितारे का बेटा अपने टिफिन में क्या लेकर आया है,किस उद्योगपति के बेटे ने किस विलायती कंपनी के जूते पहन रखे हैं या यूनीफॉर्म की दुनिया में नया फैशन क्या चल रहा है. वे यह भी जान सकेंगे कि पॉकेट मनी क्या बला होती है और उनके माता-पिता की महीने भर की कमाई से ज्यादा पैसे इस मद में अमीर बच्चे किस मासूमियत से उड़ा देते हैं.


ज़रा सोचिये कि जब धारावी की झोपड़पट्टी का कोई बच्चा किसी इंटरनेशनल स्कूल में शान से क्लास अटेंड करेगा तो कितना अद्भुत नज़ारा होगा! धर्म, जाति, भाषा, वर्ग के कितने बंधन चकनाचूर होंगे. कई फ़िल्मी कहानियां हकीक़त बन सकती हैं. कई हाथ आसमान छू सकते हैं. कई सपने साकार हो सकते हैं. समाज में समरसता का एक नया दौर शुरू हो सकता है. कई किताबी बातें अमली जामा पहन सकती हैं.


यह मुमकिन होने जा रहा है राईट टू एजूकेशन एक्ट के प्रावधानों पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर लग जाने के चलते. प्रावधान यह है कि देश भर के प्रायवेट स्कूलों को गरीब तबके के बच्चों के लिए 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित करनी ही करनी हैं. बिना सरकारी मदद वाली अल्पसंख्यक प्रायवेट स्कूलों को इस दायरे से बाहर रखा गया है.


केंद्र सरकार ने सभी राज्यों से कहा है कि वे उपलब्ध सीटों तथा लाभान्वित होनेवाले छात्रों की सूची यथाशीघ्र भेजें. एक अनुमान के मुताबिक़ महाराष्ट्र में करीब 6000 प्रायवेट स्कूल हैं और इनमें 88000 से अधिक गरीब छात्रों को दाखिला दिया जा सकता है. ऐसे में पूरे देश की कल्पना कीजिये. एक करोड़ से ज्यादा गरीब छात्र पहले ही वर्ष लाभान्वित हो सकते हैं. लेकिन कहना जितना आसान है, करना उतना ही कठिन.

आर्थिक रूप से पिछड़े छात्रों को 25 प्रतिशत आरक्षण मिलना कम से कम इस साल तो संभव नहीं लगता. राज्य सरकारों ने अभी तक इस सम्बन्ध में स्कूलों को विशेष दिशा-निर्देश जारी नहीं किये हैं. दूसरी ओर प्रायवेट स्कूल दावा कर रहे हैं कि उनके यहाँ सीटें पहले ही फुल हो चुकी हैं क्योंकि अगले सत्र के एडमीशन की प्रक्रिया पूरी हो गयी है. उधर शिक्षा कार्यकर्ताओं का कहना है कि ये स्कूल जून के पहले एडमीशन प्रक्रिया बंद नहीं कर सकते. एनजीओ 'फोरम फॉर फेयरनेस इन एजूकेशन' के अध्यक्ष जयंत जैन ने धमकी दी है कि अगर इसी साल से सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर अमल नहीं हुआ तो हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की जायेगी. तर्क यह है कि प्रायवेट स्कूलों को एडमीशन लेने में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए थी. हाई कोर्ट की औरंगाबाद खंडपीठ ने पिछले साल ही यह रूलिंग दी थी कि स्कूलों को जून के आसपास एडमीशन लेना चाहिए.


जाहिर है कि बहुत कठिन है डगर पनघट की. समाज विज्ञान भले ही सिद्ध कर चुका है कि अगर समान अवसर मिले तो कामयाबी पाने के लिए गरीब-अमीर होना कोई मायने नहीं रखता. लेकिन सामाजिक समरसता की जिसे पड़ी हो वह अपना घर फूंके. प्रायवेट स्कूलों की हीला-हवाली से जाहिर है कि वे अपने माल कमाऊ बिजनेस मॉडल को आसानी से चौपट नहीं होने देंगे.

अब 'देवताओं' के बच्चों के साथ क्लासरूम में बैठने वाले 25 प्रतिशत 'आदम' के बच्चों से यह तो नहीं कहा जा सकता कि फलां ब्रांड के जूते पहन कर आओ, ज्ञानवर्द्धक पिकनिक के नाम पर लाखों का चेक डैडी से कटवा कर भेजो, एनुवल फंक्शन के नाम पर हजारों रुपये कंट्रीब्यूट करो. उनसे यह भी नहीं कह सकते कि सुप्रीम कोर्ट की कृपा से आये हो तो एसी क्लासरूम से बाहर जाकर बैठो. यह भी नहीं कह सकते कि तुम्हारे जैसे झोपड़ावासियों की संगत में ये महलवासी बच्चे बिगड़ रहे हैं इसलिए स्कूल आना ही बंद कर दो. इस सूरत-ए-हाल में प्रायवेट स्कूल वाले क्या करें! फिलहाल उन्हें यही सूझ रहा है कि सीटें न होने का बहाना बनाया जाए. क्या करें, देश की सबसे बड़ी अदालत का आदेश है, टाला भी नहीं जा सकता.


आशंकाओं कुशंकाओं के बावजूद इतना तो तय है कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश पूरी तरह इस सत्र से न सही अगले सत्र से लागू करना ही होगा. चाहे प्रायवेट स्कूल वाले अपने यहाँ सीटें बढाएं या नए स्कूल खोलें, गरीब बच्चों को 25 प्रतिशत सीटों पर बिठाकर पढ़ाना ही पड़ेगा. ऐसे में सरकारों को इस बात की कड़ी निगरानी करनी पड़ेगी कि प्रायवेट स्कूलों के अन्दर गरीब बच्चों के साथ शिक्षण अथवा व्यवहार में किसी तरह का भेदभाव न होने पाए. सबसे अहम बात यह है कि शिक्षा कार्यकर्ताओं को चौकस रहना पड़ेगा कि कहीं किसी गरीब की जगह अमीर बच्चे को झोपड़ावासी या नौकरानी-पुत्र बनाकर एडमीशन देने का खेल शुरू न हो जाए यानी बैक डोर इंट्री. और अगर यह सिलसिला चला तो आगे चलकर घृणा के नए प्रतिमान भी स्थापित हो सकते हैं!

सोमवार, 16 अप्रैल 2012

U-19: उन्मुक्त आकाश में चमका चंद


इन्डियन प्रीमियर लीग में इन दिनों दुनिया भर के क्रिकेट सितारे जगमगा रहे हैं. लेकिन इसी बीच ऑस्ट्रेलिया जाकर भारत का चाँद चमक उठा और सब लोग देखते ही रह गए. जी हाँ, भारत की अंडर-19 क्रिकेट टीम ने ऑस्ट्रेलिया में ऑस्ट्रेलिया अंडर-19 टीम को छठी का दूध याद दिला दिया और इसमें कप्तान उन्मुक्त चंद उन्मुक्त होकर चमके. मौका चार देशों की अंडर-19 क्रिकेट टीमों के फाइनल मुकाबले का था. कंगारुओं को धूल चटाने के लिए उन्मुक्त चंद ने 9 चौकों और 6 छक्कों की मदद से नाबाद 112 रनों की ज़ोरदार पारी खेली. इस शानदार जीत में मध्यम तेज़ गति के गेंदबाज़ संदीप शर्मा का योगदान भी अहम रहा जिन्होंने निर्धारित 10 ओवरों में 51 रन देकर विपक्षी टीम के 4 विकेट झटके. फाइनल में भारत ने ऑस्ट्रेलिया को 7 विकेट से रौंदा.
यह जीत इसलिए भी ख़ास हो जाती है कि ऑस्ट्रेलियाई टीम में सीनियर टीम के तेज़ गेंदबाज़ पैट कमिंस भी शामिल थे. कप्तान उन्मुक्त चंद ने इस पूरे टूर्नामेंट में कंगारुओं को धोते हुए कुल 281 रन जोड़े और सर्वाधिक छक्के जड़ने का रिकॉर्ड भी उन्हीं के नाम रहा. उन्होंने कुल 13 छक्के जड़े हैं. सेमी फाइनल में इंग्लैण्ड के खिलाफ उन्मुक्त ने अगर 94 रनों की आतिशी पारी न खेली होती तो भारत का बैरंग वापस होना तय था. यह मैच भारत ने 63 रनों के बड़े अंतर से जीता जिसमें उन्मुक्त को 'मैन ऑफ़ द मैच' चुना गया था. फाइनल मुकाबले में तो ख़ैर वह 'मैन ऑफ़ द मैच' रहे ही.

पिछले दिनों जिस तरह भारतीय टीम ऑस्ट्रेलिया से बुरी तरह नाकाम होकर लौटी थी उसकी निराशा कुछ हद कम हुई है. भारतीय टीम टेस्ट सीरीज में बुरी तरह पराजित होने के बाद त्रिकोणीय सीबी सीरीज के फाइनल तक में नहीं पहुँच पाई थी. लेकिन आईसीसी अंडर-19 वर्ल्ड कप ऑस्ट्रेलिया में ही होना है. इस टूर का फायदा उन्मुक्त एंड कंपनी-- जिसमें कमल पासी, विकास मिश्रा, बाबा अपराजित, अक्षदीप, हरमीत सिंह, अखिल हेरावाड़कर, मन वोहरा, विजय जोल, एस पटेल, ए नाथ जैसे प्रतिभावान युवा क्रिकेटर शामिल हैं, को उस दौरान भी मिलेगा क्योंकि उन्होंने ऑस्ट्रेलियाई परिस्थितियों में खेलने का स्वाद चख लिया है. वे आत्मविश्वास से लबालब रहेंगे. पूर्व भारतीय कप्तान दिलीप वेंगसरकर ने भारतीय अंडर-19 टीम को बधाई देते हुए कहा है कि यह किसी भी क्रिकेटर के कैरियर का महत्वपूर्ण दौर होता है और अब ये क्रिकेटर बड़े-बड़े सपने देख सकते हैं. यकीनन स्टार परफॉर्मर कप्तान उन्मुक्त चंद का भविष्य उज्जवल नज़र आ रहा है.

शुक्रवार, 13 अप्रैल 2012

स्वाइन फ़्लू का दैत्य फिर दे रहा है दस्तक

जहां मैं रहता हूँ वहां से भिवंडी ज्यादा दूर नहीं है. भिवंडी को यूं तो लोग वहां के पावरलूम कारख़ानों के लिए याद करते हैं (और किसी ज़माने में हुए भीषण दंगों के लिए भी) लेकिन भिवंडी के लोग आजकल भगवान को याद कर रहे हैं. यहाँ स्वाइन फ़्लू ने दस्तक दे दी है. भिवंडी के कोनगाँव इलाके के कोलीवाड़ा में रहने वाले 57 वर्षीय मधुकर नाईक को स्वाइन फ़्लू हो गया है और उन्हें इलाज के लिए मुंबई के कस्तूरबा गांधी हॉस्पिटल ले जाया गया है. लगभग डेढ़ वर्ष पहले कोनगाँव इलाके में ही स्वाइन फ़्लू से दो लोगों की मौत हो गई थी. इस इलाके में फिर से स्वाइन फ़्लू का मरीज पाए जाने से भय का वातावरण व्याप्त है. हालांकि नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ वायरोलॉजी के विशेषज्ञों का कहना है कि जिन लोगों का सामना इस बीमारी से पहले हो चुका है उन्हें डरने की ज़रुरत नहीं है तथा स्वाइन फ़्लू सिर्फ ग्रामीण व अर्द्ध-शहरी इलाकों में ही दबिश दे रहा है. जबकि हकीक़त यह है कि मुंबई में ही स्वाइन फ़्लू के अब तक 14 मामले दर्ज़ हो चुके हैं.
बीते दो महीनों के दौरान भारत में स्वाइन फ़्लू के 689 मामले सामने आये हैं जिनमें से 36 लोगों की दर्दनाक मौत दर्ज़ की गयी है. इनमें महाराष्ट्र सबसे ज्यादा प्रभावित लग रहा है. स्वाइन फ़्लू के 400 मामले अकेले इस राज्य में देखे गए और 18 लोगों की जान चली गयी. मरनेवालों में 13 पुणे, 3 नासिक, 1 औरंगाबाद और 1 धुले ज़िला का निवासी था. महाराष्ट्र के अलावा आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और राजस्थान में स्वाइन फ़्लू कहर ढा रहा है. तमिलनाडु के स्वास्थ्य मंत्री वीएस विजय अपने राज्य में अब तक 29 मामलों की पुष्टि कर चुके हैं.दिल्ली को ही लीजिये, नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल ने राजधानी में 6 स्वाइन फ़्लू मामलों की पुष्टि की है जिनमें से 2 मामले तो हाल ही के हैं. आखिर यह घातक स्वाइन फ़्लू है क्या बला?

यह है स्वाइन एन्फ़्लुएन्ज़ा. इसे स्वाइन फ्लू, हॉग फ्लू या पिग फ्लू भी कहा जाता है. सन 2009 से पिछला स्वाइन फ्लू सन् 1968 में दर्ज़ हुआ था जिसे बतौर हांगकांग फ्लू जाना जाता है. इस नए वायरस के भिन्न रूप अथवा अपर रूप का नाम है- ए (एच1एन1).

स्वाइन एन्फ़्लुएन्ज़ा वायरस आम तौर पर सुअरों में पनपने वाले एन्फ़्लुएन्ज़ा कुल के वायरसों का एक भिन्न रूप है. सन् 2009 तक ज्ञात स्वाइन एन्फ़्लुएन्ज़ा वायरसों के भिन्न रूप हैं एन्फ़्लुएन्ज़ा 'सी' वायरस और एन्फ़्लुएन्ज़ा 'ए' वायरस के उप प्रक्रार, जिन्हें हम ‘एच1एन1’, ‘एच1एन2’, ‘एच3एन1’, ‘एच3एन2’ तथा ‘एच2एन3’ के रूप में जानते हैं. स्वाइन एन्फ़्लुएन्ज़ा संयुक्त राज्य अमेरिका, टेक्सास, कैलीफोर्निया, मेक्सिको, कनाडा, दक्षिण अमेरिका, यूके, इटली, स्वीडन, कीनिया, चीन, ताइवान और जापान में पाए जाने सुअरों में एक आम और स्थानीय बीमारी है.

स्वाइन एन्फ़्लुएन्ज़ा वायरस का मानव में संक्रमण आम तौर पर नहीं होता है. और अगर होता है तो उसे जूनोटिक स्वाइन फ्लू कहा जाता है. जो लोग सुअरों के बाड़ों में बहुत नजदीक रहकर काम करते हैं उन्हें संक्रमण का खतरा अधिक रहता है. बीसवीं शताब्दी के मध्य में एन्फ़्लुएन्ज़ा वायरस के उप प्रकारों की पहचान संभव हो पायी थी. उसके बाद ही इस तरह के वायरसों के संक्रमण की तीव्रता का ठीक-ठीक अंदाजा लगाया जाने लगा. आज वैज्ञानिक यह पता लगा चुके हैं कि इस बार मनुष्यों में फैला स्वाइन फ्लू एन्फ़्लुएन्ज़ा 'ए' वायरस के उप प्रकार एच१एन१ का नया भिन्न रूप है. इस भिन्न रूप के जींस स्वाइन एन्फ़्लुएन्ज़ा वायरस के जींस से मिलते जुलते हैं.

सबसे पहले सन् 1918 में फैली फ्लू महामारी के दौरान स्वाइन एन्फ़्लुएन्ज़ा को मानव एन्फ़्लुएन्ज़ा से सम्बंधित बीमारी बताने की कोशिश हुई थी. इस महामारी के दौरान आदमी और सुअर एक ही समय फ्लू से पीड़ित हुए थे. हालांकि सुअरों में एन्फ़्लुएन्ज़ा फैलने के कारक वायरस की शिनाख्त इसके करीब 12 वर्ष बाद सन् 1930 में ही हो सकी थी. इसके अगले 60 वर्षों तक स्वाइन एन्फ़्लुएन्ज़ा का कारक विशेष तौर पर एच1एन1 वायरस के एक भिन्न रूप को बताया जाता रहा. यह सन् 1997 से 2002 के बीच का दौर था जब उत्तरी अमेरिका के सुअरों में फैले एन्फ़्लुएन्ज़ा का जिम्मेदार तीन अलग-अलग उप प्रकारों तथा पांच अलग-अलग जीनोंटाइपों के नए भिन्न रूपों को ठहराया गया.

सन् 1997-98 के दौरान इस वायरस का एच2एन3 भिन्न रूप सामने आया. इस भिन्न रूप में मानव, सुअर और पक्षियों के मिले-जुले जींस मौजूद थे. उत्तरी अमेरिका में स्वाइन फ्लू के लिए आज सबसे बड़ा जिम्मेदार यही वायरस है. एच1एन1 तथा एच3एन2 के जीनोम मिलने से एच1एन2 भिन्न रूप उत्पन्न हुआ है. कनाडा में सन् 1999 के दौरान एच4एन6 वायरस का एक भिन्न रूप प्रजातियों की सीमा पार करके पक्षियों से सुअरों में प्रवेश कर गया था. सौभाग्य से इस भिन्न रूप को एक ही सुअर बाड़े में सीमित करके नियंत्रित कर लिया गया था.

स्वाइन फ्लू का एच1एन1 रूप उसी वायरस से सम्बंधित है जिसके चलते सन् 1918 में फ्लू महामारी फैली थी. सुअरों में बने रहने के साथ-साथ 1918 महामारी का वायरस रूप बदल-बदल कर पूरी बीसवीं शताब्दी के दौरान मानवों में संक्रमण करता रहा है. इससे मानवों में सामान्य मौसमी एन्फ़्लुएन्ज़ा फैलता देखा गया है. यद्यपि सुअरों से मनुष्य में सीधा फ्लू संक्रमण न के बराबर होता है फिर भी सन् 2005 के बाद अमेरिका में 12 ऐसे मामले दर्ज़ हुए.

मनुष्यों में स्वाइन फ्लू अनगिनत बार फैलता देखा गया है जिसे जोनोसिस कहा जाता है. लेकिन हर बार इसका फैलाव सीमित रहता है. हाँ, सुअरों में यह आम और लगातार मौजूद रहने वाली बीमारी है जिससे कई देशों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है. एक आंकड़े के मुताबिक स्वाइन फ्लू के चलते अकेले ब्रिटेन के मांस उद्योग को 65 मिलियन पाउंड की चपत हर साल लगती है.

स्वाइन एन्फ़्लुएन्ज़ा का इतिहास सन 1918 की फ्लू महामारी से प्रारंभ होता है. हालांकि इसके वायरस का उद्गम कब, कहाँ और कैसे हुआ यह आज तक अज्ञात है. यह फ्लू मनुष्यों से सुअरों में फैला या सुअरों से मनुष्यों में; यह भी स्थापित नहीं किया जा सका है. इसका एक कारण यह भी है कि 1918 की फ्लू महामारी का पता पहले मनुष्यों में चला था उसके बाद सुअरों में. अगला मामला हमें 5 मई 1976 के दिन अमेरिका के फोर्ट डिक्स में देखने को मिलता है. एक सैनिक कमजोरी और थकान की शिकायत के बाद अगले ही दिन मर जाता है और उसके 4 साथी सैनिक अस्पताल में भर्ती कराये जाते हैं. दो हफ्तों बाद स्वास्थ्य अधिकारी ऐलान करते हैं कि सैनिक की मौत एच1एन1 वायरस के एक भिन्न रूप के संक्रमण से हुई है. इस भिन्न रूप को 'ए/न्यू जर्सी/1976 (एच1एन1) नाम दिया गया था.

सितम्बर 1988 में अमेरिका के विस्कोंसिन राज्य की वालवर्थ काउंटी में बारबरा एन वीनर्स नामक गर्भवती महिला की स्वाइन फ्लू से जान चली गयी थी. यह वायरस उन हाट-मेलों में पाया गया जहां सुअर बिक्री या प्रदर्शनी के लिए लाये जाते थे. बारबरा भी ऐसे ही एक मेले में अपने पति के साथ गयी थी. हालांकि यह वायरस सीमित ही रहा. इसके बाद 1998 के दौरान अमेरिका के चार राज्यों में स्वाइन फ्लू देखा गया, साल भर के अन्दर ही इसने पूरे अमेरिका के सुअरों को अपनी चपेट में ले लिया. वैज्ञानिकों ने पता लगाया कि इस बार का वायरस मानव तथा पक्षियों में पाए जाने वाले फ्लू वायरस के भिन्न रूपों का मिश्रण है. अगस्त 2007 में फिलिप्पीन्स के कृषि विभाग ने भी देश भर के सुअरों में फ्लू महामारी फैल जाने की बात कबूली थी.

...और साल 2009 का स्वाइन फ्लू. यह एच1एन1 उप प्रकार के एक ऐसे भिन्न रूप से फैला जो पहले सुअरों में नहीं पाया जाता था. महामारी फैलने के बाद 2 मई 2009 को यह वायरस एल्बर्टा (कनाडा) के एक सुअर बाड़े में पाया गया जिसके तार मेक्सिको में फैली फ्लू महामारी से जुड़ते थे. मेक्सिको में तो यह बीमारी फरवरी-मार्च 2009 में ही फैल जाने की शुरुआती रपटें मिलने लगी थीं. कहा जा रहा था कि स्मिथफूड्स फार्म के एक सुअर बाड़े में अपनाए जा रहे गलत तरीकों की वजह से स्वाइन फ्लू पैदा हुआ और मनुष्यों में फैल गया. हालांकि स्मिथफूड्स ने इसका तत्काल खंडन भी कर दिया था.

देखने वाली बात यह है कि अमेरिकी ‘बीमारी नियंत्रण एवं रोकथाम केंद्र’ ने स्पष्ट तौर पर कहा कि अमेरिका में पाए गए स्वाइन फ्लू के वायरस का नया भिन्न रूप मेक्सिको के वायरस से पूरी तरह मेल खाता था. बता दें कि अमेरिका की सीमा मेक्सिको से सटी हुई है. स्वाइन फ्लू से पहली मौत 13 अप्रैल 2009 को मेक्सिको की ओआक्साका काउंटी में दर्ज की गयी थी. कनाडा में भी स्वाइन फ्लू वायरस तब पाया गया जब एक मजदूर मेक्सिको से वहां के एक सुअर बाड़े में कुछ ही दिन पहले लौटा था. इससे साबित होता है कि इस बार का स्वाइन फ्लू दैत्य मेक्सिको में पैदा हुआ था.

स्वाइन एन्फ़्लुएन्ज़ा भारत समेत विश्व के हर सुअर पालन करने वाले देश में मौजूद है. सुअरों में यह पूरे साल फैलता रहता है. इसकी रोकथाम के लिए कई देश अक्सर सुअरों को टीका लगवाते हैं. भारत में अब तक इस बात के कोई संकेत नहीं मिले हैं कि मानवों में मिले स्वाइन फ़्लू का सम्बन्ध सुअरों में मौजूद वायरस से है. फिर भी एहतियात के तौर पर भारत सरकार के पर्यावरण, खाद्यान्न एवं ग्रामीण विभाग ( डीईएफआरए) ने सुअर पालकों को निर्देश जारी किए कि वे उच्चस्तर की साफ-सफाई रखें. यद्यपि एन्फ़्लुएन्ज़ा ए (एच1एन1) वायरस पूरे विश्व में मानव से मानव में फैल रहा है और कई देशों में मौत का तांडव भी खेल रहा है. इसीलिए 'विश्व स्वास्थ्य संगठन' की दुनिया भर में फैलते जा रहे स्वाइन फ़्लू पर पैनी नजर है. भारत सरकार भी इस बार पहले से ज्यादा तैयार दिख रही है क्योंकि 2009 का अनुभव उसे है और उससे लोगों ने भी सबक सीखा होगा. टीके अस्पतालों तक पहुंचाए जा रहे हैं और जहां ज़रूरी है वहां चिकत्सा अधिकारियों को अतिरिक्त एलर्ट भी किया जा रहा है. इसके बावजूद हाल ही में सक्रिय हुए इस वायरस को हलके में लेना महंगा पड़ सकता है क्योंकि लोगों की जान जाने का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है.



एन्फ़्लुएन्ज़ा लोगों में फैलता कैसे है?

समझा जाता है कि यह नया एन्फ़्लुएन्ज़ा वायरस आम मौसमी फ़्लू की तरह ही फैलता है. संक्रमित व्यक्ति के बात करते समय, खांसते समय या छींकते समय उसके मुंह या नाक से जो छोटी बूँदें निकलती हैं, उनको सांस द्वारा अन्दर ले लेने से संक्रमण हो सकता है. इस वायरस से संक्रमित कोई चीज जैसे टिश्यू पेपर या दरवाजे के हैंडिल के संपर्क में आने के बाद अपनी नाक या आँख छूने से भी संक्रमण हो जाता है.

संक्रमित सुअरों के लक्षण क्या हैं?

सुअरों में स्वाइन एन्फ़्लुएन्ज़ा होने पर वे बेहद सुस्त पड़ जाते हैं. बुखार एवं खांसी के अलावा उन्हें सांस लेने में भारी कष्ट होता है. किसी संक्रमित सुअर की सांस से निकली बूँदें सांस के जरिए अन्दर जाने से सुअरों में स्वाइन फ़्लू फैलता जाता है. वे संक्रमित सुअर के प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष संपर्क में आने पर भी संक्रमित होते जाते हैं.

मनुष्य में स्वाइन फ़्लू के क्या लक्षण हैं?

स्वाइन फ़्लू से ग्रस्त मनुष्य में ठीक वैसे ही लक्षण दिखाई देते हैं जैसे कि उसके सामान्य मौसमी फ़्लू से संक्रमित होने पर नजर आया करते हैं. मसलन बुखार, थकान, भूख की कमी, खांसी और गला दुखना. कुछ लोगों को उल्टी-दस्त की शिकायत भी हो सकती है. उदाहरण के लिए मेक्सिको में ए (एच1एन1) वायरस से पीड़ित लोगों को भयंकर पीड़ा झेलनी पड़ी और उनकी मृत्यु भी हो गयी. जबकि भारत सहित अन्य देशों में इस एन्फ़्लुएन्ज़ा के लक्षण नरम रहे हैं और लोग पूरी तरह ठीक भी हुए हैं.

एन्फ़्लुएन्ज़ा संक्रमित व्यक्ति क्या करे?

अगर आप किसी फ़्लू जैसा महसूस कर रहे हैं तो घर से बाहर हरगिज न निकलें और जितना हो सके कम से कम लोगों के संपर्क में रहें. टेलीफोन पर अपने पारिवारिक चिकित्सक से बात करें और उसकी सलाह पर पूरी तरह अमल करें. अपनी मर्जी से कोई भी दवा खरीदकर न खाएं. हालांकि कुछ दवाएं प्रचलन में हैं लेकिन फ़्लू की तीव्रता के अनुसार ही इन्हें लेने या न लेने की सलाह चिकित्सक देते हैं. अगर भारत में खतरा बढ़ता है तो भारतीय स्वास्थ्य सुरक्षा एजेंसी अगले दिशा-निर्देश जारी करेगी.

रोकथाम के उपाय

एन्फ़्लुएन्ज़ा ए (एच1एन1) से संक्रमित व्यक्ति जब खांसता या छींकता है तो वह अपने आसपास की सतह पर विषाणु फैला देता है. इतना ही नहीं उसके द्वारा इस्तेमाल किए गए टिश्यू पेपर या बिना धुले हाथों के छू जाने से भी विषाणु फैलते हैं. इसलिए सतह को साफ रखना जरूरी हो जाता है ताकि आसपास के लोगों में संक्रमण न हो सके. डिटर्जेंट और पानी से सतह साफ करना आसान है लेकिन जहां हाथ नहीं पहुंचता वहां ब्रशों और विषाणुनाशक उत्पादों का प्रयोग करना उचित रहता है. किचन प्लेटफोर्म, टायलेट फ्लश और दरवाजों के हैंडिल ऐसी ही कुछ जगहें हैं जहां विषाणुनाशकों का प्रयोग करना चाहिए. जिन चीजों को घर अथवा दफ्तर के लोग अक्सर छूते हैं उनका स्वच्छ रहना अत्यावश्यक है. इनमें कम्प्यूटर कीबोर्ड, टेलीफोन रिसीवर, हैंडिल, स्विच, नलों की टोंटी आदि शामिल हैं.

अपने आसपास बढ़िया साफ-सफाई रख कर एन्फ़्लुएन्ज़ा समेत हर किस्म के वायरस के संक्रमण से बचा जा सकता है.

स्वास्थ्य सुरक्षा एजेंसी ने लोगों से कहा है कि वे हर समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखें:-

अ) साबुन और पानी से अपने हाथ दिन में कई बार धोएं.
ब) छींकते अथवा खांसते समय अपना मुंह और नाक टिश्यू पेपर से ढँक लें.
स) इस्तेमाल किए गए टिश्यू पेपर को सावधानी और जिम्मेदारी से कचरे की टोकरी में डालें.
द) दरवाजे के हैंडिल जैसी कड़ी सतहों को हमेशा साफ रखें.
इ) सुनिश्चित करें कि बच्चे भी इन बातों का ख़याल रखें.

गुरुवार, 5 अप्रैल 2012

नफ़रत से नफ़रत

दोस्तों, अपने कविता संग्रह से बाहर की एक कविता चढ़ा रहा हूँ-

नफ़रत से नफ़रत

नफ़रत किधर से आती है

नफ़रत किधर को जाती है

क्या यह किसी से किसी को प्यार करना भी सिखाती है?



प्यार के लिए कितने लोगों ने जान गवांई होगी बूझो तो?

लेकिन नफ़रत से हुई मौतों के आंकड़े कोई पहेली नहीं हैं

दुनिया लहूलुहान है नफ़रत के पंजों से.



नफ़रत बिल्लियों की तरह कहीं भी आ-जा सकती है बेरोकटोक

तुम उस पर पहली नजर में शक नहीं कर सकते

रीढ़ की हड्डी में नागिन की तरह कुण्डली मारे बैठी रह सकती है बरसों बरस

वह कलम की स्याही बनकर झर सकती है मीठे-मीठे शब्दों की आड़ में

नफ़रत को झटक दो कि वह तुमको तुमसे ही बेदखल कर रही है



नफ़रत हर ख़ास-ओ-आम में मिल जाएगी

किसी पैमाने से उसे मापा नहीं जा सकता

खिड़की बंद करके उसे रोका नहीं जा सकता

नफ़रत हवाओं में उड़ती है विमानों के साथ-साथ

पानियों में घुलकर एक से दूसरे देश निकल जाती है



हर दरवाजे पर दस्तक देती फिरती है नफ़रत

कई बार वह आती है किताबों के पन्नों में दबी हुई

लच्छेदार बातों की शक्ल में तैरती हुई पहुँचती है तुम तक

गिरफ्त में ले लेती है विश्वामित्र की मेनका बनकर

नफ़रत एक नशा है जो आत्मा को फाड़ देती है दूध की तरह



नफ़रत कब तलब बन जाती है यह पता भी नहीं चलता

हम रोज सुबह पछताते हैं कि अब से नहीं करेंगे नफ़रत

लेकिन नफ़रत के माहौल में करते हैं सुबह से शाम तक नफ़रत

हम भुलाते जाते हैं सब कुछ नफ़रत की पिनक में

फिर वह ऐसा सब कुछ भुला देती है जो जरूरी है इंसान के हक़ में



वैसे सही जगह की जाए तो नफ़रत भी बुरी चीज़ नहीं

पर यह क्या कि दुनिया की हर चीज़ से नफ़रत की जाए!

नफ़रत करो तो ऐसी कि जैसे नेवला साँप से करता है

शिकार शिकारी से करता है

बकिया मिसालों के लिए अपने आस पास ख़ुद ढूँढ़ो

कि कौन किससे किस कदर और क्यों करता है नफ़रत



वैसे भी प्यार का रास्ता आम रास्ता नहीं है

इसलिए नफ़रत से जमकर नफ़रत करो

कि नफ़रत हमारे और तुम्हारे बीच नफ़रत बनकर खड़ी है.

-विजयशंकर चतुर्वेदी

बुधवार, 22 फ़रवरी 2012

हरदिलअज़ीज़ शायर शहरयार साहब गुज़र गए. वह कहा करते थे कि कोई दौर वापस आता है और न ही आना चाहिए, कोई भी अच्छी चीज़ ख़त्म नहीं होने वाली, नई चीज़ें आती रहेंगी और दुनिया फैलती रहेगी. हम उनकी इन बातों को मंत्र की तरह लेते हैं. संयोग की बात यह है कि महाराष्ट्र के ज़िला ठाणे से प्रकाशित होने वाली हिंदी मासिक पत्रिका 'मीरा-भायंदर दर्शन' के संपादक वेद प्रकाश श्रीवास्तव ने वर्ष 2011 के जनवरी महीने में जब एक ट्रेन यात्रा के दौरान मुझसे अपने यहाँ कविताओं का सिलसिला शुरू करने को कहा तो पहली ही प्रस्तुति यानी मार्च 2011 के अंक में शहरयार साहब की ग़ज़लें शामिल हुईं थीं. निदा फ़ाज़ली साहब की चंद उम्दा ग़ज़लें भी इसमें थीं.इस प्रस्तुति का लक्ष्य क्षेत्र के पाठकों को कुछ अच्छी शायरी और कविताओं से रूबरू कराना था. अप्रकाशित कवितायेँ छापना न उद्देश्य था और न ही आग्रह. फिर इस पत्रिका का वितरण भी पिछले १५ वर्षों से एक सीमित दायरे में होता आया है इसलिए पाठकों की रूचि का भी ध्यान रखना था. बहरहाल सिलसिला सचमुच चल निकला और अब एक साल पूरा हो गया है. इस प्रयास में देश के बड़े कवियों ने अपनी कवितायेँ छापने की स्वीकृति देकर मुझे उपकृत किया है.स्थानीय मित्रों के आग्रह पर अब पाठक वर्ग का दायरा बढ़ाने जा रहा हूँ. हर माह इस पत्रिका के दोनों कविता पृष्ठों की पीडीऍफ़ 'फेसबुक' और अपने ब्लॉग 'आजाद लब' में प्रकाशित किया करूंगा. फ़ाइल पर चटका लगाकर उस अंक के कवियों/शायरों का परिचय और कवितायेँ/ग़ज़लें पढ़ी जा सकती हैं. प्रस्तुत हैं ज्ञानपीठ विजेता शहरयार और उस्ताद शायर निदा फ़ाज़ली साहब-