मंगलवार, 20 जनवरी 2009

अश्वेत शरीर में श्वेतात्मा है ओबामा!

समारोह के पहले जिस तरह वहाँ के ताकतवर लोगों को प्रस्तुत किया गया वह पूरी दुनिया को धमकाने की अमेरिकी अदा है. जान लेना होगा कि ओबामा के आ जाने से पूंजीवाद और पश्चिमी तथा अमेरिकी साम्राज्यवाद का आधुनिक मुखौटा 'बाज़ारवाद' का चेहरा नहीं बदल जाएगा. ओबामा अश्वेत शरीर में श्वेतात्मा है. भाषण देने और लिखवाने में वह रिपब्लिकन जॉन मकैन से अव्वल रहे. जीत-हार की यही असलियत और अन्तर है. शपथग्रहण के वक्त भी ओबामा का भाषण शानदार रहा. वह अमेरिकी जनता को धोखा दे सकते हैं दुनिया को नहीं. लोगों को मुगालता हो हमें नहीं है


दुनिया और भारत की मजलूम जनता को बधाई हो! अश्वेत अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा का शपथग्रहण समारोह संपन्न हो गया है. टीवी चैनलों के माइकों के जरिए ऊह-कू और ऊह-पू की समवेत ध्वनियाँ सारी दुनिया में नाद कर रही हैं. करीब ७५० करोड़ डॉलर इस समारोह में ख़र्च किए गए है; आख़िर किसलिए? क्या यह दिखाने के लिए कि हमारे यहाँ मंदी है लेकिन हम अब भी पैसा पानी की तरह बहा सकते हैं! आख़िर यह जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा नहीं तो क्या अमेरिकी माफिया का धन है? मैं अर्थशास्त्री तो नहीं लेकिन मुझे मंदी की इस चाल में भी अमेरिका की कोई गहरी राजनीति लगती है. अमेरिकी जनता का एक हिस्सा तो इसी पर लट्टू है कि एक अश्वेत व्यक्ति अमेरिका का राष्ट्रपति बन गया. हमें भी इस ख़बर से ख़ास नुकसान नहीं है लेकिन आप तक वे खबरें कभी नहीं आने दी जाएँगी कि प्रतिरोध की अमेरिकी आवाजें ओबामा के बारे में क्या सोचती-समझती और कहती रही हैं! माफ़ कीजिएगा, वहाँ भारतीय मीडिया की तरह भूसा-खाता नहीं है!


'चेंज' के आवाहन पर जीत कर आने वाले ओबामा ने कभी यह नहीं कहा कि वह मेहनतकशों का जीवन सुधारेंगे अथवा अमेरिका के सदियों से दबे-कुचले अश्वेत लोगों को नौकरियों में प्राथमिकता देंगे या दुनिया के मजलूमों के लिए कोई वैश्विक अर्थनीति प्रस्तुत करेंगे. अलबत्ता उन्होंने एक असंतुष्ट अमेरिकी वर्ग को यह समझाकर कि बेरोजगारी दूर करने के लिए आउटसोर्सिंग बंद कर देंगे, एक झांसा दिया है. पाक के ख़िलाफ़ एक सांकेतिक बयान देकर भारतीय मूल के मतदाताओं की भावनाओं से खिलवाड़ किया. यह भी समझ लेना चाहिए कि माइकल या जेनेट जैक्सन तथा हॉलीवुड में चंद अश्वेतों की सफलताओं से अमेरिका के अश्वेतों के बारे में कोई राय बना लेना भ्रामक होगा.

बहरहाल, जिस तरह शपथग्रहण से पहले जिन जीवित पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपतियों जिमी कार्टर, सीनियर बुश तथा बिल क्लिंटन और अब जूनियर बुश को भी मिला लें तो, अमेरिकी जनता और टीवी-इन्टरनेट के जरिए पूरी दुनिया के सामने पेश किया गया उनके काले कारनामे सिर्फ़ एशिया महाद्वीप में ही नहीं बल्कि दुनिया के हर द्वीप में दर्ज़ हैं. अखबारों में छपने के बाद सीएनएन और बीबीसी तथा चंद भारतीय न्यूज चैनलों के एंकर यह इतिहास बताना नहीं भूले कि कैपिटल हिल तथा व्हाइट हाउस अश्वेत दासों की मेहनत से बने थे और आज कैसा महान क्षण आया है कि एक अश्वेत उसी कैपिटल हिल में शपथ लेगा तथा उसी व्हाइट हाउस में निवास करते हुए दुनिया का भाग्य विधाता बनेगा


लेकिन इनसे काफी पहले के अमेरिकी राष्ट्रपतियों की करतूतों पर नजर डालने वाला यह आलेख मैने काफी अहले 'आज़ाद लब' में प्रस्तुत किया था. आज फिर दे रहा हूँ. लेकिन उससे पहले एक बात- अगर ओबामा का भाषण-लेखक आधुनिक हिन्दी कविता पढ़ लेता तो उसे अधिक मेहनत नहीं करनी पड़ती. उनमें कहीं ज़्यादा उथली, करिश्माई और हवाई बातें होती हैं. एक बात और, जब वो बुजुर्ग पादरी ओबामा के लिए ईशप्रार्थना करते हुए कैपिटल हिल पर लगभग रो रहा था तब मुझे कामू के उपन्यास 'ला स्ट्रेंजर' के उस पादरी की याद आ गयी जो नायक को मृत्यु की सज़ा पा जाने के बाद जेल की कोठरी में ईश्वर पर भरोसा दिलाने के लिए आया करता था.) अब कृपया वह लेख पढ़िए जिसका सम्बन्ध पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपतियों से है. लिंक ये रहा-

'आज़ाद लब'

धन्यवाद!

शनिवार, 17 जनवरी 2009

देख के दिल कै जाँ से उठ रहेला है?

कई बातें कह दूँगा! अव्वल तो कबाड़खाना में शिरीष जी की प्रस्तुत पोस्ट का ये शेर-

कहते हो न देंगे हम दिल अगर पड़ा पाया
दिल कहां कि गुम कीजे, हमने मुद्दआ पाया

खालिस रोमांटिक शेर है. लेकिन दिक्कत यह है कि गालिब इतना चतुर था कि एक तीर से हज़ार शिकार किया करता था. ग़ालिब उपर्युक्त शेर में भी मोहब्बत की इन्तेहाँ पर है. जैसे कि तब, जब वह यह कहता है-

जहाँ तेरा नक्श-ए-क़दम देखते हैं,
खयाबाँ-खयाबाँ इरम देखते है.

अब रामनाथ सुमन जी के बयान की बात. मैं उनके बखान से इत्तेफ़ाक़ नहीं रखता. क्योंकि ग़ालिब का इस शेर में कहने का मतलब वह नहीं है जो सुमन जी तजवीज करते हैं. ग़ालिब महबूबा के लिए अपना दिल खोल कर दिखाने से सम्बंधित दसियों अश'आर में अलग-अलग तरीकों से कहता आया है.

बहरहाल, शिरीष के 'कबाड़खाना' में ऊपर दिए गए शेर में दरअसल ग़ालिब कह रहा है कि दिल अब मेरे पास है ही कहाँ कि उसके गुल होने का ग़म किया जा सके. यानी वह तो महबूबा के पास पहले से है. लेकिन ऐसे अधिकांश मामलों में ग़ालिब के अश'आर से यह जाहिर होता है कि वह अपनी तरफ़ से यह मान कर चलता है कि महबूबा बेवफ़ा है. यह ग़ालिब की सबसे बड़ी कमजोरी लगती है! आप दीवान-ए-ग़ालिब तलाश लीजिए. इन मामलों में वह महबूबा का उजला पक्ष सामने नहीं रखता. कोई दानिश्वर अगर मेरी इस कमअकली को दुरुस्त कर दे तो मैं सुकून पाऊँ.

'हमने मुद्द'आ पाया' कहकर वह तंज़ कर रहा है कि महबूबा को मालूम है कि दिल उसके ही पास है लेकिन संगदिल कितनी सरकश है कि गोया मेरी मोहब्बत के उस उरूज को, जिसमें मैंने यहाँ तक कह दिया कि 'जाहिर हुआ के दाग़ का सरमाया दूद था' , यह बात उड़ाकर कि महबूबा ने यकीनन दिल पड़ा पाया है, वैसी ही हरकत की है जैसी पत्थरदिल सनम किया करते हैं. हालांकि ग़ालिब के मन में कहीं हिकारत का भाव नहीं है. यह कमाल है! लेकिन ग़ालिब ऐसा क्यों करता था यह पहले इतिहासकारों और मनोवैज्ञानिकों को अध्ययन करना चाहिए.

Please note- (यह संपादित पोस्ट है. पिछली पोस्ट में कई चीज़ें गड्डमड्ड हो गयी थीं).

गुरुवार, 15 जनवरी 2009

महिलाओं की सच्ची की जय हो!

यह न समझिए कि महिलाओं की कोई जय-पराजय झूठ-मूठ हो सकती है. इससे ज्यादा अहंवादी पुरुषों के परनाले आज भी खुले हुए हैं. अनेक उदाहरण दिए जा सकते हैं. तथाकथित 'नारी आन्दोलन' एक अलग तरह की व्यवस्था है. लोग इसे माने या न माने लेकिन एक अद्भुत प्यार मोहल्‍ला में माताओं-बहनों का देखा गया है! मुगालता ये हो सकता है कि मैंने एक विषय उठाया. टिप्पणियाँ वहाँ पहले पहल कमाल की आयीं! लेकिन इससे ये भी जाहिर होता है कि ब्लॉग जगत की महत्वपूर्ण महिलाएँ सिर्फ़ और सिर्फ़ परीपैकर बनकर नहीं रहना चाहतीं. वे साफ-सुथरा विचार-विमर्श चाहती हैं.
उनकी इस पहल का शुक्रिया!

...और जी पहले पहल माताओं-बहनों की इतनी टिप्पणियाँ किसी मोहल्ले में हो जाएँ तो ये समझना चाइये कि वे कुछ सार्थक चाहती हैं. वरना तो जी झाड़ू आन्दोलन चलेगा!


चंद शुरुआती प्रतिक्रियाएँ देखिए-

Nirmla Kapila said...
aapane bilkul sahi aavaaj uthaai hai main aapse poori tarah sehmat hoon

January 15, 2009 4:14 PM


Mired Mirage said...
यदि लोग इनके समाचारों में साहित्य के बारे में सुनते सुनते साहित्य में रुचि लेने लग गए तो फिर टी वी से चिपके कैसे रह पाएँगे?

January 15, 2009 4:26 PM


Dipti said...
मुझे नहीं लगता कि ये हालत महज न्यूज़ चैनलों की हैं। कई ऐसे न्यूज़ पेपर भी इस लिस्ट में शामिल हैं जो पहले तो व्यंग या कहानी का कॉलम निकालते हैं, लेकिन कुछ दिनों में ही उसकी जगह भविष्य और व्यक्तिगत समस्याओं का कॉलम शुरु कर देते हैं। ये सब टीआरपी का खेल है और कुछ नहीं...

January 15, 2009 5:40 PM


sareetha said...
भारतीय संस्क्रति को तहस नहस करने की साज़िश है । देश का साहित्य कहीं ना कहीं देशी महक लिए होगा , जो संभव है उपभोक्तावाद के खिलाफ़ जाए । बाज़ार इसकी इजाज़त नहीं देता ।

शुक्रवार, 9 जनवरी 2009

हम ने यह माना, कि दिल्ली में रहें खाएंगे क्या

उर्दू में व्यंग्य का उद्गम तलाशने की सलाहियत मुझमें नहीं है. लेकिन शायरी में व्यंग्य की छटा मीर, ज़ौक, ग़ालिब, सौदा, मोमिन जैसे पुरानी पीढ़ी के शायरों ने जगह-जगह बिखेरी है. मुझे ग़ालिब की एक पूरी की पूरी ग़ज़ल ध्यान में आती है जिसका हर शेर करुणा, आत्मदया और व्यंग्य के उत्कृष्ट स्वरूप में मौजूद है. आप भी गौर फ़रमाइए-



दोस्त ग़मख्वारी में मेरी, स'इ फ़रमाएंगे क्या
ज़ख्म के भरने तलक, नाखुन न बढ़ जाएंगे क्या

बेनियाज़ी हद से गुज़री, बंद: परवर कब तलक
हम कहेंगे हाल-ए-दिल और आप फ़रमाएंगे क्या

हज़रत-ए-नासेह गर आएं, दीद:-ओ-दिल फ़र्श-ए-राह
कोई मुझको यह तो समझा दो, कि समझाएँगे क्या

आज वाँ तेग़-ओ-कफ़न बांधे हुए जाता हूँ मैं
'उज़्र मेरा क़त्ल करने में वह अब लाएंगे क्या

गर किया नासेह ने हमको क़ैद, अच्छा यूँ सही
ये जुनून-ए-इश्क़ के अंदाज़ छुट जायेंगे क्या

खान: ज़ाद-ए-ज़ुल्फ़ हैं, ज़ंजीर से भागेंगे क्यों
हैं गिरफ़्तार-ए-वफ़ा, ज़िन्दाँ से घबराएँगे क्या

है अब इस मा'मूरे में केह्त-ए-ग़म-ए-उल्फ़त, असद
हम ने यह माना, कि दिल्ली में रहें खाएंगे क्या