गुरुवार, 15 अक्तूबर 2009

एक नदी जो बना दी गयी अछूत

पिछले दिनों मैं हिन्दी समाचार एजेंसियों की एक रपट पढ़ रहा था. उसे पढ़कर झटका लगा. मनुष्यों का मनुष्यों को ही अछूत बना देना तो हम देखते-सुनते-पढ़ते आ रहे हैं लेकिन नदियों को अछूत बना देना! वह भी भारत जैसे देश में जहां पेड़-पौधों, नदी-पहाड़ों यहाँ तक कि कण-कण में ईश्वर का वास होना बताया और माना जाता रहा है, माना जाता है! यह रपट उत्तराखंड से सम्बंधित थी

यों तो उत्तराखंड को देवभूमि माना जाता है और यह भी मान्यता है कि यहाँ के पर्वत, वन, नदियों, टीलों तक में देवता वास करते हैं. गंगा, यमुना जैसी सतत प्रवाहिनी नदियों का उद्गम भी इसी के ग्लेशियर क्षेत्र से हुआ है. इस क्षेत्र की अन्य नदियों को भी पवित्र माना गया है और यहाँ की लगभग सभी नदियों के साथ गंगा प्रत्यय जोड़ने की परम्परा रही है. लेकिन इसी देवभूमि में एक नदी ऐसी भी है जिसे अछूत माना गया है, और उसका पानी पीना तो दूर, पानी को छूना तक निषेध है!
यह नदी है टौंस. टौंस के बारे में मान्यता यह है कि पौराणिक काल में एक राक्षस का वध किये जाने पर उसका रक्त इस नदी में गिर गया था, जिससे यह दूषित हो गयी. यही वजह है कि इसे तमसा भी कहा जाता है.

उत्तरकाशी जनपद में दो नदियाँ रुपीन और सुपीन देवाक्यारा के भराड़सर नामक स्थान से निकलती हुई अलग-अलग दिशाओं में प्रवाहित होती हैं. रुपीन फते पट्टी के १४ गाँवों से गुजरती है जबकि पंचगाई, अडोर व भडासू पट्टियों के २८ गाँवों से जाती है. लेकिन इन गाँवों के लोग न तो इन नदियों का पानी पीते हैं और न ही इनसे सिंचाई की जाती है. नैटवाड़ में इन नदियों का संगम होता है और यहीं से इसे टौंस पुकारा जाता है.

लोकमान्यताओं के अनुसार रुपीन, सुपीन और टौंस नदियों का पानी छूना तक प्रतिबंधित किया गया है. वजह धार्मिक मान्यताएं भी हैं. कहते हैं कि त्रेता युग में दरथ हनोल के पास किरमिरी नामक राक्षस एक ताल में रहता था. उसके आतंक से स्थानीय जन बेहद परेशान थे. लोगों के आवाहन पर कश्मीर से महासू देवता यहाँ आये और किरमिरी को युद्ध के लिए ललकारा. भयंकर युद्ध के बाद महासू देव ने आराकोट के समीप सनेल नामक स्थान पर किरमिरी का वध कर दिया. उसका सर नैटवाड़ के पास स्थानीय न्यायदेवता शिव के गण पोखू महाराज के मंदिर के बगल में गिरा जबकि धड़ नदी के किनारे. इससे टौंस नदी के पानी में राक्षस का रक्त घुल गया. तभी से इस नदी को अपवित्र तथा तामसी गुण वाला माना गया है.

एक अन्य मान्यता के अनुसार द्वापर युग में नैटवाड़ के समीप देवरा गाँव में कौरवों व पांडवों के बीच हुए युद्ध के दौरान कौरवों ने भीम के पुत्र घटोत्कच का सिर काट कर इस नदी में फेंक दिया था. इसके चलते भी इस नदी को अछूत माना गया है. मान्यता है कि इस नदी का पानी तामसी होने के कारण शरीर में कई विकार उत्पन्न कर देता है यहाँ तक कि अगर कोई लगातार दस साल तक टौंस का पानी पी ले तो उसे कुष्ठ रोग हो जाएगा!
सामाजिक कार्यकर्त्ता मोहन रावत, सीवी बिजल्वाण, टीकाराम उनियाल और सूरत राणा कहते हैं कि नदी के बारे में उक्त मान्यता सदियों पुरानी है और पौराणिक आख्यानों पर आधारित है. वे कहते हैं कि हालांकि इस नदी के पानी के सम्बन्ध में किसी तरह का वैज्ञानिक शोध नहीं है लेकिन स्थानीय जनता की लोक परम्पराओं में यह मान्यता इस कदर रची बसी हुई है कि कोई भूलकर भी इसका उल्लंघन नहीं करता.

नोट: यह पूरी रपट एजेंसियों की है. इसे यहाँ प्रस्तुत करने के अलावा इसमें मेरा कोई योगदान नहीं है.

गुरुवार, 8 अक्तूबर 2009

रमन सिंह के साथ चित्र ही दिखा दें- कमला प्रसाद

हिन्दी आलोचना के क्षेत्र में प्रोफेसर कमला प्रसाद ने महत्वपूर्ण कार्य किया है. पिछले कई वर्षों से वह प्रगतिशील 'वसुधा' का सम्पादन कर रहे हैं और वर्त्तमान में प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय महासचिव हैं. उन्होंने जाने कितने ही कवियों-लेखकों को पुष्पित-पल्लवित किया है. कमला प्रसाद जी की राष्ट्रीय स्तर पर सक्रियता देखते ही बनती है. खराब स्वास्थ्य के बावजूद संगठन के कार्यों के लिए उनका एक पैर घर में तो दूसरा ट्रेन में होता है. लेकिन पिछले दिनों 'वसुधा' और प्रलेस के दामन पर आरोपों के कुछ छीटें पड़े तो उनका दुखी होना स्वाभाविक था. उन्होंने बेहद संयत ढंग से फोन पर अपनी बात कुछ इस अंदाज़ में रखी-


पहली बात तो यह है कि जो राशि 'वसुधा' को पुरस्कारस्वरूप मिली थी वह फोर्ड फ़ाउंडेशन की नहीं थी. चूंकि 'वसुधा' प्रगतिशील लेखक संघ की पत्रिका है इसलिए उसे इस तरह के आरोपों एवं विवादों से बचाने के लिए हमने एक पत्र के साथ समूची राशि चेक के जरिये वापस कर दी है. यह फैसला भी मेरा निजी फैसला नहीं, सम्पादक मंडल की बैठक में लिया गया फैसला था. दूसरे जो आरोप हैं वे कमला प्रसाद पर व्यक्तिगत रूप से नहीं हैं, प्रगतिशील लेखक संघ पर हैं. उन आरोपों पर संगठन चर्चा करेगा और जो भी फैसला होगा वह प्रेस को बता दिया जाएगा.

रही ज्ञानरंजन जी की बात, तो अगर वह कहते हैं कि मैंने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह के साथ मंच साझा कर लिया है तो वह इसका सबूत प्रस्तुत करें. वह सुनी-सुनाई बातों पर आरोप लगाया करते हैं. वह मेरा रमन सिंह के साथ एक चित्र ही दिखा दें.

मेरा कहना है कि सामूहिक जीवन जनतंत्र की सबसे बड़ी ताकत होती है. समूह या सामूहिक जीवन को खंडित करना उचित बात नहीं है. जिसे कोई बात कहानी है उसे एक कार्यकर्ता की तरह बात करना चाहिए..विचारक की तरह नहीं..संगठन के बाहर के आदमी की तरह आरोप नहीं लगाना चाहिए. कमला प्रसाद अकेले प्रलेस नहीं चला रहे हैं, पूरा संगठन है. इसीलिये न तो कोई फैसला व्यक्तिगत कहा जा सकता और न ही आरोप व्यक्तिगत हो सकता है. इसीलिये मैं फिर कह रहा हूँ कि जो भी बातें प्रगतिशील लेखक संघ के बारे में पिछले दिनों सामने आयी हैं उन पर संगठन के अन्दर विचार किया जाएगा. इस सम्बन्ध में जल्द ही कार्यकारिणी की बैठक होने जा रही है. प्रमोद वर्मा स्मृति समारोह और फोर्ड फाउंडेशन वाले विवाद पर मैं पहले ही विस्तृत प्रतिक्रिया दे चुका हूँ जो ब्लागों और समाचार पत्रों में छप चुकी है इसलिए उसे यहाँ दोहराने का अधिक अर्थ नहीं है. पिछले कुछ दशकों से मैं प्रलेस का कार्यकर्त्ता रहा हूँ और अब भी हूँ. जो जिम्मेदारियों दी जाती हैं उन्हें शक्ति भर निभाने का प्रयास करता हूँ. फिलहाल इतना ही...

ऊपर चित्र प्रमोद वर्मा स्मृति समारोह का है जिसमें कमला प्रसाद (बाएँ), आलोचक भगवान सिंह (पुरस्कार लेते हुए) और अशोक वाजपेयी (दायें) नजर आ रहे हैं. यह चित्र 'हिंद युग्म' से साभार लिया गया है.

सोमवार, 5 अक्तूबर 2009

मैंने म.प्र. प्रलेस इसलिए छोड़ा- ज्ञानरंजन

ज्ञानरंजन का नाम साहित्य जगत में बड़े आदर के साथ लिया जाता है. उनके सम्पादन में हाल-फिलहाल तक निकलनेवाली प्रतिष्ठित लघु-पत्रिका 'पहल' का महत्त्व किसी से छिपा नहीं है. एक कथाकार के रूप में ज्ञान जी ने हिन्दी साहित्य को कई अनमोल कहानियां दी हैं. वह मध्यप्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ के वरिष्ठ और सम्मानित सदस्यों में शुमार रहे हैं. लेकिन पिछले दिनों जब उन्होंने अचानक इस लेखक संघ से नाता तोड़ने का निर्णय लिया तो हिन्दी जगत के लिखने-पढ़ने वालों को एक झटका लगा. सबके मन में एक ही प्रश्न था कि आखिर इतने बड़े निर्णय के पीछे क्या वजह रही होगी? यही प्रश्न मेरे मन में भी था, सो मैंने ज्ञान जी से बातचीत करने की सोची. इस पर ज्ञान जी ने जो कहा वह आपके सामने ज्यों का त्यों प्रस्तुत कर रहा हूँ-


"ये स्थितियां पिछले पांच-दस वर्षों से लगातार बनती चली आ रही थीं. प्रगतिशील लेखक संघ का सांस्कृतिक विघटन जारी है. मुझे तो यह लगता है कि सोवियत संघ के विघटन के बाद जिस तरह की लूट-खसोट हर क्षेत्र में मची थी, उसी तरह का माहौल पिछले दिनों से प्रलेस में चल रहा है. लोगों को ऐसा लगता है कि अब हमारे सामने कोइ मॉडल बचा नहीं है इसलिए जहां से जितना मिले लूट-खसोट लो. कम्युनिस्ट पार्टियों के भारतीय राजनीति में हाशिये पर आने के बाद हमारे सांस्कृतिक मोर्चे के जो नेता हैं उनमें ये कैफियत पैदा हो गयी दिखती है.

पिछले वर्षों में जिस तरह वामपंथी गढ़ ढहे, दूसरी तरफ नव-पूंजीवाद, अमेरिकी दादागिरी और उपभोक्तावाद का शिकंजा जिस तरह से कसता गया है, उसके दबाव और आकर्षण में हमारा प्रगतिशील नेतृत्त्व प्रेमचंद की परम्परा कायम नहीं रख सका और एक विचारहीनता का परिदृश्य तैयार करता रहा.
आप देखिये कि प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष नामवर सिंह जसवंत सिंह से लेकर सुमित्रा महाजन जैसे फासिस्ट और दक्षिणपंथी विचारधारा वाले लोगों के साथ मंच साझा कर रहे हैं और इस बात पर ज़ोर देते हैं कि विचारधारा की अब कोई जरूरत नहीं बची. इस घालमेल से नए रचनाकारों को घातक संकेत और प्रेरणा मिलती रही है. संयोग देखिये कि प्रलेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने जो किया उसी के नक्श-ए-क़दम पर चलते हुए राष्ट्रीय महासचिव ने भी छत्तीसगढ़ के भाजपाई मुख्यमंत्री डॉक्टर रमन सिंह के साथ मंच साझा कर लिया. इस आचरण और प्रवृत्ति का विस्तार होता जा रहा है...और संगठन के पदाधिकारी अपने आचरण को तर्कसंगत बताने का प्रयास कर रहे हैं.

भारतवर्ष में इन दिनों अनेक विदेशी एजेंसियां वित्तीय सहायता देकर अनेक संगठनों, पत्रिकाओं और व्यक्तियों की प्रतिबद्धता तथा सृजनात्मक शक्ति को, उनकी विचारशीलता को कुंद करने का प्रयास कर रही हैं. इस सन्दर्भ में फोर्ड फ़ाउंडेशन द्वारा संचालित एक पुरस्कार, जो 'कबीर चेतना' के नाम से पिछले दिनों सुर्खियों में आया है, मध्य प्रदेश प्रलेस की पत्रिका 'वसुधा' ने भी हस्तगत कर लिया. यह बात फोर्ड फ़ाउंडेशन की रपट में खुले आम छपी है. मेरे पास वह रपट है.
विदित हो कि प्रलेस ने दस वर्षों तक म.प्र. में फोर्ड फ़ाउंडेशन के कारनामों के खिलाफ लंबा संघर्ष किया था, प्रस्ताव पारित किये थे और समय-समय पर सुप्रसिद्ध 'कला का घर' भारत-भवन का बहिष्कार भी किया था. विचार कीजिये कि प्रेमचंद का प्रलेस अब कहाँ पहुंचा दिया गया है.

प्रलेस में लेखकों की रचनाओं पर गोष्ठियां होती थीं, नवोदित लेखकों को प्रोत्साहित किया जाता था, अब वह सब बंद है. जैसे कोई ज़मीन या मकान पर कब्ज़ा कर लेता है उसी तरह चंद लोगों ने म.प्र. प्रलेस पर कब्ज़ा कर लिया है, वह भी अपने हित साधने के लिए. जिस मिशन और संविधान के साथ प्रलेस शुरू हुआ था वे सारी चीज़ें धूमिल हो गयी हैं और सत्ता तथा धन के साथ जुड़ाव प्रबल हो गया है. म.प्र. प्रलेस में आतंरिक लोकतत्र के लिए कोई स्थान नहीं बचा है.

मैंने व्यक्तिगत स्तर पर कई बार प्रलेस की संगठन बैठकों में प्रयास किया कि चीज़ें पटरी पर आयें, अगर कोई गलत बात हो रही हो तो उसे चर्चा करके ठीक कर लिया जाए, लेकिन ऐसा भी संभव नहीं रह गया. यही वजह है कि मैं पिछले पांच वर्षों से उदासीन हो गया था और अंततः मुझे त्यागपत्र देने का अप्रिय निर्णय लेना पड़ा.

यह चिंता सिर्फ प्रलेस से जुड़े साहित्यकारों की ही नहीं बल्कि पूरे लेखक समुदाय की होनी चाहिए... क्योंकि आज सांस्कृतिक संगठनों में पतनोन्मुखता का बोलबाला होता जा रहा है."

ज्ञान जी ने यह खुलासा भी किया कि स्वास्थ्य कारणों से 'पहल' को इंटरनेट पर ले जाने का विचार उन्होंने त्याग दिया है.