गुरुवार, 29 नवंबर 2007

आभास


उठा नहीं हूँ उठ-सा गया हूँ
गिरा नहीं हूँ गिर-सा गया हूँ
भरा नहीं हूँ भर-सा गया हूँ
डरा नहीं हूँ डर-सा गया हूँ
जिया नहीं हूँ जी-सा गया हूँ
मरा नहीं हूँ मर-सा गया हूँ।

3 टिप्‍पणियां:

  1. हमारा जीना बस जीना-सा बन कर रह जाता है,
    हम मरे-मरे से ही पूरी जिन्दगी गुजार देते हैं.
    बहुत बढिया विजय. देर से ही सही ब्लौग की दुनिया मे आने का फैसला बहुत अच्छा है. हार्दिक स्वागत. आपकी कुछ अच्छी चीज़ें अब अपेक्षाकृत आसानी से दिखेंगी, ऐसी उम्मीद है.

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  2. हौसला अफ़जाई का शुक्रिया प्रणव! एक नीतिश्लोक है- 'प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचेः' और मैं इस श्रेणी में नहीं बना रहना चाहता था. देखें कहाँ तक गाड़ी खिंचती है.

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