सोमवार, 21 अप्रैल 2008

कितने साल बाद मरोगे?

This is an article talking about a life insurance policy in a humerous way. मेरा कल एक जीवन बीमा एजेंट life insurance policy agent से साबका पड़ गया। मुझे उसने कुछ पोलिसियाँ बताईं. उनका नफ़ा-नुकसान बताने लगा. इनमें एक पॉलिसी ऐसी थी जिसमें किस्त का हिसाब मुझे उल्टा लगा.


आम तौर पर लम्बी अवधि की पॉलिसी लेने पर प्रीमियम premium कम आता है, फ़िर चाहे वह मनीबैक पॉलिसी moneyback policy हो या endoment policy. लेकिन एजेंट की बताई इस पॉलिसी का प्रीमियम अवधि लम्बी होने के साथ-साथ ही बढ़ता जाता है. यानी ज्यादा समय की पॉलिसी तो ज्यादा बड़ी किस्त. मैंने एजेंट से इसका कारण पूछा.


एजेंट मुझे समझाने लगा- 'देखिये यह पॉलिसी उन लोगों के लिए है जिनके ऊपर कुछ लाइबेलिटीज libilities हैं। मसलन, बड़ा क़र्ज़, बेटी की शादी, बच्चों की उच्च शिक्षा higher education आदि. मान लीजिये कि घर के मुखिया की असमय मृत्यु हो गयी, तो कौन भरेगा क़र्ज़? वह माफ़ तो नहीं हो जायेगा. कौन करेगा बेटी की शादी? वह घर पर तो नहीं बैठी रहेगी. ऐसे में यह पॉलिसी साथ देती है.'


मैं तसल्लीबख्श होते हुए कहने लगा- 'चलो अच्छा है, मेरा भी इसी पॉलिसी के तहत बीमा कर दीजिये। नहीं मरा तो पैसा कहाँ जायेगा?'


इस पर एजेंट ने मुझे चौंका दिया- 'अगर बीमा की अवधि समाप्त होने से पहले मृत्यु नहीं हुई तो पैसा वापस नहीं मिलेगा। अगर ऐसा होने लगे तो लोग पाँच-दस वर्षों के लिए करोड़ों का बीमा करवा कर क्लेम claim नहीं कर लेंगे?. यही इस पॉलिसी की खासियत है कि जितनी लम्बी अवधि, उतना ज्यादा प्रीमियम.'


मैंने इसके पहले कभी जिंदगी और मौत के बारे में इस तरह से नहीं सोचा था। हिसाब लगाने लगा कि कम से कम कितने साल की पॉलिसी कराऊँ ताकि प्रीमियम भी बरदाश्त कर सकूं और मरने के बाद ज़्यादा पैसा परिवार को मिले. अभी मेरी उम्र ३८ वर्ष है. अगर कम प्रीमियम के लालच में १० साल की पॉलिसी ले लूँ तो कैसा रहेगा? लेकिन क्या मैं अगले १० सालों के अन्दर महज ४८ साल की अवस्था में ही मर जाऊंगा? और अगर नहीं मरा तो दस सालों तक भरा पूरा प्रीमियम व्यर्थ जायेगा. फ़िर सोचा कि २० साल की ले लूँ, लेकिन फ़िर वही ख़याल कि क्या ५८ की उम्र में मर जाऊंगा? यानी मैं मौत की आशंका से घबराने लगा. जितने अगले सालों के बारे में सोचता जाता था, मौत अगले ही पल खड़ी दिखाई देती थी॥


इसी मानसिक अवस्था में कई विचार आए-गए। गालिब Mirza Ghalib का शेर भी याद आया-

'था ज़िंदगी में मर्ग का खटका लगा हुआ,

उड़ने से पेश्तर भी मेरा रंग ज़र्द था।'


इस शेर से थोड़ा तसल्ली हुई तो यक्ष का पांडवों Pandvas से पूछा प्रश्न 'किं आश्चर्यम? और युधिष्ठिर Dharmraj Yudhishthir द्वारा दिया गया उसका जवाब भी याद आ गया, जिसका भावानुवाद यहाँ दे रहा हूँ- 'दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि मानव यह जानते हुए भी कि एक दिन सबको मरना है, दुनिया भर के धतकरम ऐसे करता रहता है जैसे उसे कभी मरना ही नहीं है.' मेरी तो जान में जान आ गयी।


मैंने तुरत 'जीवेत शरदः शतम' वाला भारतीय आशीर्वाद गुना और एजेंट से अनुरोध किया- 'भाई, मेरा सौ साल के लिए इस पॉलिसी के तहत बीमा कर दो.'

4 टिप्‍पणियां:

  1. विजय जी, बहुत ही दिलचस्प पोस्ट। यही तो मज़ा है कि हम मरने-जीने को लेकर दार्शनिक और शायर बने जाते हैं और वो हैं कि इसमें भी धंधे का नया रूप निकाल लेते हैं।
    असल में वो ही जिंदगी जी रहे हैं, असंपृक्त भाव से। काश ऐसी जीवन-दृष्टि हमने भी पा ली होती!!

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  2. एजेंट सही है, यदि आप 38 साल के हैं तो 30 साल की पालिसी लें, बाकी तो ऊपर वाले के हाथ है :)

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  3. सब १०० साल का कराने लगे तो बीमा कंपनी का भट्ठा बैठ जाए.

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  4. विजय - मेरे ख़याल से आप टर्म पॉलिसी की बात कर रहे हैं - जो केवल जोखिम पर दांव हैं - इसको कवि की तरह नहीं जिम्मेदार की तरह सोचें - इसको ऐसे सोचिये की अगर आप जिंदा रहे तो पैसा आपने पानी में फेंक दिया - अगर नहीं तो परिवार का भला - [वीभत्स सी सोच है ] - मैंने पाँच साल पहले इसी पॉलिसी में दो साल का प्रीमिअम भरा फ़िर डॉलर कूटने के चक्कर में बरबाद कर दिया - एक बात और टर्म पॉलिसी का प्रीमिअम और बीमे से सस्ता होना चाहिए - मनीष

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