राहुल गांधी की इस समय प्रेस कांफ्रेंस सीरीज दरअसल कांग्रेस के चंद चापलूस नेताओं की वेवकूफी है. सरकार के पांच सालों के बीच इस तरह की कान्फ्रेंसें चला करती हैं. यह आगे हो सकती थी. उन्होंने चंद्रबाबू नायडू की तारीफ़ की, नितीश की शान में कसीदे काढ़े, जयललिता को महान बताया. ये सभी कांग्रेस के विरोधी लोग हैं और एनडीए का हिस्सा रहे हैं; अथवा हैं. चुनाव बाद गठबंधन की मजबूरी समझ में आती है लेकिन चुनाव के बीच इस तरह की बातों से यूपीए के सहयोगी माने जाने वाले लालू, पासवान, करूणानिधि, ममता बनर्जी और मुलायम सिंह छिटक नहीं जायेंगे?
जैसे मैंने भाजपा के 'भय हो' का शव परीक्षण डंके की चोट पर किया उसके बाद वह विज्ञापन बंद हो गया. उसी तरह राहुल गांधी और उनके अशुभचिंतकों को यह बात समझ में आ जानी चाहिए कि बड़े से बड़े और बहुत भावनात्मक लगनेवाले मुद्दे पर वह चुनाव पूरा होने तक इस तरह की वकवास नहीं करेंगे. हालांकि अब बहुत देर हो चुकी है.
७ मई के मतदान में फंसी ८५ सीटों पर यूपीए ने अगर अच्छा प्रदर्शन नहीं किया तो चुनाव बाद कांग्रेस को पता नहीं किसका-किसका दरवाज़ा खटखटाना पड़ेगा. राहुल गांधी ने यह काम चुनाव से पहले करके बहुत गलत संकेत दे दिया है.
देखने की बात यह भी है कि राहुल की इस असमय हुई महान प्रेस कांफ्रेंस के बाद अब यूपीए कितना बचेगा! राहुल ने कुल्हाड़ी पर पाँव दे मारा है. राहुल तुम सचमुच 'राहुल बाबा' ही हो.
बुधवार, ६ मई २००९
'राहुल बाबा' की प्रेस कांफ्रेंस
Posted by
विजयशंकर चतुर्वेदी
at
11:30 AM
Labels: प्रेस कांफ्रेंस, राहुल गांधी
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4 comments:
अच्छा लिख लेते हैं आप
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चाँद, बादल और शाम
राहुल गांधी की तमाम प्रेस कांफ्रेंस क्या कांग्रेस के नेताओं ने करवाई है? मुझे तो लग रहा था कि 'परिपक्व' राहुल जी ने ये प्रेस कांफ्रेंस खुद ही की है.
आप बेफ़िकर रहें, "साम्प्रदायिकता को रोकने के नाम पर" सारे कौए-सियार-गीदड़-बन्दर सब इकठ्ठा हो जायेंगे… "कुर्सी" के लालच के आगे राहुल बाबा की बातों पर कोई ध्यान देने वाला नहीं है… कांग्रेस की नहीं बनेगी, तो कांग्रेस से समर्थन ले लिया जायेगा, लेकिन "साम्प्रदायिकता" को रोकने के लिये (?) कोई किसी के साथ भी सो सकता है… :) :) इसलिये चिन्ता काहे करते हैं… भाजपा सत्ता में नहीं आने वाली
सब की तरीफ, सिवाय मोदी के क्योकि मोदी के :)
आ गया कांग्रेसी ऊँट पहाड के नीचे, सब पर डोरे डाल रहा है, चाहे माया हो या ललिता :)
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