शुक्रवार, 15 मई 2009

बाबा की यह कविता आज होने वाले फैसले की जान है

सच कहूं तो मैं लीडरों के के प्रति इतनी बे-नाकामी से घिरा था कि यह अद्भुत कविता याद ही नहीं आयी. कल एक चैनल तो सीधे हमारी ब्लॉग कम्युनिटी से बाबा की 'मंत्र' कविता के कुछ अच्छे लोगों द्वारा (मैं इरफ़ान के ब्लॉग से वहां गया था) गाए गए अंश सुना रहा था और बेशर्मी से उस गाने वाली टीम का क्रेडिट भी नहीं दिया गया. अब यहाँ पेश है बाबा की वो कविता जो दरअसल टिकेट पा लेने का सिनेरियो है. अब इस बहुत बड़े कवि की खासियत ये है कि यह कविता आज होने वाले फैसले की जान है. अब बाबा-

'स्वेत-स्याम-रतनार' अँखियाँ निहार के
सिंडकेटी प्रभुओं की पग धूर झार के
लौटे हैं दिल्ली से कल टिकेट मार के
खिले हैं दांत ज्यों दाने अनार के
आये दिन बहार के!

बन गया निजी काम-
दिलाएंगे और अन्न दान के, उधार के
टल गए संकट यूपी-बिहार के
लौटे टिकट मार के
आये दिन बहार के!

सपने दिखे कार के
गगन-बिहार के
सीखेंगे नखरे, समुन्दर पार के
लौटे टिकट मार के
आए दिन बहार के!

मैं समझता हूँ बाबा की इस कविता को चुनाव बाद के आरंभिक परिदृश्य तक ले जाया जा सकता है जो उनका प्रमुख ध्येय था. बकिया आप लोग समझदार हैं.

2 टिप्‍पणियां:

  1. सही कह रहे हैं..बाबा की इस कविता को चुनाव बाद के आरंभिक परिदृश्य तक ले जाया जा सकता है.

    आभार इस प्रस्तुति का.

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  2. बाबा की यह कविता बहुत बड़ा सच है। जनतंत्र की पोल है।

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