शुक्रवार, 15 अप्रैल 2016

यहूदी शाहकारों के बगैर मुंबई का नक्शा पूरा नहीं होता


दक्षिण मुंबई के कोलाबा की चौथी पास्ता लेन के पीछे होरमस जी स्ट्रीट में स्थित चबाड हाउस उर्फ नरीमन हाउस की सड़क पर अब भी जिंदगी का कारोबार चला करता है. नहीं है तो वर्ष 2003 से यह यहूदी केंद्र चलाने वाला युवा दम्पति रब्बी गाव्रियल और उनकी पांच माह की गर्भवती पत्नी रिवका होल्त्जबर्ग, जो बुधवार, 26 नवंबर, 2008 को 9 बजकर 45 मिनट पर हुए आतंकवादी हमले में दुनिया से असमय उठा दिए गए थे.
चबाड हाउस कभी यहूदी समुदाय की गतिविधियों का प्रमुख केंद्र हुआ करता था. यहां सिनॉगॉग (यहूदी उपासना-गृह और प्रार्थना-मंदिर) था, तोरा सिखाने वाली कक्षाएं चलती थीं, स्थानीय यहूदियों की शादियां तथा नशे की रोकथाम जैसे कई हितकारी क्रियाकलाप सम्पन्न होते थे. यहूदी पर्यटकों और व्यापारियों की तो जैसे यह मुंबई में एकमात्र शरणस्थली थी. ईश्वर से नजदीकी महसूस करने, कोशेर भोजन का जायका चखने या यहूदी छुट्टियां मनाने वालों के लिए चबाड हाउस के दरवाजे हमेशा खुले रहते थे. लेकिन आतंकवादियों की गोलीबारी और धमाकों से जब यह दुनिया उजड़ी थी तो दिन-रात जागने-भागने वाली कोलाहल भरी मुंबई ने जोर से जाना कि इस महानगर में यहूदी भी बसते हैं. यह बात और है कि आतंकवादी हमले के छह साल बाद 26 अगस्त, 2014 को एक और रब्बी इज्रोइल कोज़्लोवस्की और उनकी पत्नी चाया ने उसी नेस्तनाबूद चबाड हाउस को फिर आबाद कर दिया था. राख के ढेर से फीनिक्स पक्षी की तरह फिर जीवित हो उठना दुनिया भर के यहूदियों की बड़ी विशेषता रही है.
सन 1940 का जमाना था जब मुंबई में यहूदी खूब फल-फूल रहे थे और उनकी संख्या 30 हजार के पार हो गई थी. आज वे उंगलियों पर गिनने लायक बचे हैं, जिनमें से ज्यादातर मुंबई और इसके आसपास बसते हैं. लेकिन संख्या पर मत जाइए, मुंबई के इतिहास पर छोड़े गए उनके पूर्वजों के निशान मुंबई के परिदृश्य और भूदृश्य पर आज भी अमिट और स्थायी हैं. बहुत कम लोगों को पता होगा कि भारत का एक लैंडमार्क माने जाने वाला गेटवे ऑफ इंडिया के निर्माण में सबसे बड़ा दानकर्ता एक यहूदी ही था- सर जैकब ससून.
माना जाता है कि मुंबई में यहूदियों के सामूहिक आगमन का श्रीगणेश 18वीं सदी में हुआ. इस संगम में दो बिलकुल अलग धाराएं थीं- बेन इजरायली (इजरायल के लाल) और बगदादी. बेन इजरायली समुदाय कोंकण के गांवों से आया था जिसके बारे में कहा जाता है कि वे उन इजरायली यहूदियों के वंशज हैं जिनका जलपोत 175 ईसा पूर्व में कोंकण तट पर नष्ट हो गया था. जूडिया से आए उस जलपोत में 7 यहूदी परिवार थे. वे यूनानी सम्राट एंटियोकस चतुर्थ एपीफानेस के समय वतन से निकले थे. बगदादी यहूदी वे हैं जो मामलूक वंश के आखिरी शासक दाउद पाशा द्वारा 19वीं सदी की शुरुआत में मचाई गई तबाही और भीषण नरसंहार के बाद इराक से भागे थे.
मुंबई में बसने वाला पहला बगदादी यहूदी जोसफ सेमाह बताया जाता है, जो सन 1730 में सूरत छोड़कर आया था. बेन इजरायली समुदाय के पहले सदस्य सन 1749 में कोंकण के गांवों से यहां पहुंचे. उन दिनों अंग्रेजों द्वारा मुंबई में विकसित किए जा रहे व्यापारिक ढांचागत विकास ने इन्हें बेहद आकर्षित किया था. मुंबई में बसने के बाद इन्हें अपने पूजागृहों की जरूरत भी महसूस हुई. सो कोंकण से आए सैम्युएल इजेकील दिवेकर (मूल नाम सामाजी हसाजी दिवेकर) नामक यहूदी ने मुंबई का प्रथम सिनॉगॉग मई 1796 में स्थापित किया, जिसका नाम था ‘शारे राहामीम’ जिसे गेट ऑफ मर्सी सिनॉगॉग भी कहा जाता है. यह उन्हीं के नाम की गई गली 254, सैम्युअल स्ट्रीट, मुंबई- 400 003 में स्थित है. इसके बाद तो जैसे दूसरे सिनॉगॉगों और प्रार्थना-गृहों की बाढ़ सी आ गई. टनटनपुरा स्ट्रीट में 4 जून 1843 को ‘शारे रेशन’ या नया सिनॉगॉग, सर जेजे मार्ग पर 1861 में ‘मेगन डेविड सिनॉगॉग’, जैकब सर्कल में 1886 में ‘टिफेरेथ इजरायल सिनॉगॉग’ जैसे कुल आठ सिनॉगॉग और प्रार्थना-गृह यहूदियों की बढ़ती आबादी के मद्देनजर सन 1946 तक मुंबई में बनाए जाते रहे.
लेकिन यह 1832 का साल था जब दाउद पाशा के अत्याचारों से तंग आकर डेविड ससून अपने कई यहूदी साथियों के साथ मुंबई आए और यहां के यहूदियों की महिमा एवं इतिहास को हमेशा-हमेशा के लिए बदल कर रख दिया था. उनकी डेविड ससून एंड कंपनी ने देखते ही देखते मुंबई में कपड़ा मिलें तथा अन्य उद्योग-धंधे व संस्थान खड़े कर दिए. लेकिन उनका सबसे बड़ा योगदान था परोपकार के कार्यों में अपार धन लगाने का. उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में डेविड ससून ने डेविड ससून मैकेनिक्स संस्थान, डेविड ससून लाइब्रेरी, विक्टोरिया गार्डेंस (आज का वीरमाता जीजाबाई उद्यान) में क्लॉक टॉवर और विक्टोरिया एंड एल्बर्ट म्यूजियम (आज का भाऊ दाजी लाड संग्रहालय) में ऐतिहासिक स्मारक बनवाने जैसे कई ऐतिहासिक कार्य किए.
सन 1875 में डेविड ससून के बेटे एल्बर्ट ने मुंबई की ऐसी पहली गोदी कोलाबा में बनवाई जिसमें जलपोत तैरने लायक पानी हर हाल में बरकरार रखा जाता है, उसे हम ससून डॉक के नाम से जानते हैं. सन 1884 में सर जैकब ससून ने फोर्ट में केनसेथ इलियाहू सिनॉगॉग बनवाया था, जहां चबाड हाउस शुरू होने के पहले तक ताजमहल और ओबेरॉय होटलों में ठहरने वाले यहूदी आसानी से पहुंचा करते थे. डेविड ससून की विरासत में जेजे हॉस्पिटल परिसर में खड़ा डेविड ससून औद्योगिक एवं सुधार संस्थान, मुंबई का कॉमेथ हाउस जो उनका मुख्यालय भी था, रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस, बाम्बे फ्लाइंग क्लब, निवारा ओल्ड एज होम, फ्लोरा फाउंटेन और मेसीना हॉस्पिटल जैसे न जाने कितने स्मारक शामिल हैं, जो आज भी हमें मुंबई का पता देते हैं.
डेविड ससून की मृत्यु तो सन 1864 में ही हो चुकी थी लेकिन सामुदायिक गतिविधियां आगे के दशकों तक हंसती-खिलखिलाती रहीं. फिर मातृभूमि के आकर्षण में 50 के दशक के दौरान मुंबई से यहूदियों का बहिर्गमन शुरू हुआ, जो आज तक जारी है. हालत यह है कि इजरायल में पैदा हुए यहूदी भारत के बारे में अधिक नहीं जानते और मुंबई में बचे अधिकांश यहूदी 70 से ऊपर की अवस्था के हैं. 73वर्षीय निसिम मोजेस नामक सज्जन ने भारत के यहूदियों की वंशावली, सामूहिक गान, मराठी-हिब्रू मिश्रित भाषा और खान-पान की एक फेहरिस्त तैयार करने की कोशिश की है और सन 1671 से लेकर आज तक के करीब 40000 यहूदियों का वंशवट खड़ा भी कर लिया है. लेकिन आज पूरे भारत में उनकी आबादी 5000 के आसपास ही बची है और वह भी तेज़ी से खत्म हो रही है. फिर भी इतना तो तय है कि मुंबई का नक्शा यहूदियों के बनाए शाहकारों के बगैर पूरा नहीं होता. गौर से सुनें तो आज भी सूने सिनॉगॉगों में गूंजने वाली उनकी सामूहिक प्रार्थनाएं सुनाई दे जाएंगी.

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें