शनिवार, 2 फ़रवरी 2008

झूठे प्रचार से लोगों को ठगने की कला

बुर्जुआ समाज और संस्कृति- १०

(अब तक आपने पढ़ा कि सारा बुर्जुआ समाज ही जैसे कोई 'दग्ध थियेटर' है. प्रतियोगिता की सीमित सार्थकता हो सकती है, लेकिन इसे प्रोत्साहित करना ख़तरनाक होता है. अब आगे...)

प्राचीन मनीषियों का कहना है कि आकांक्षाएं असीम हैं और कभी भी पूरी नहीं हो सकतीं. भोग-विलास की आकांक्षा प्रश्रय पाकर और बढ़ती है. आज अगर इस विचार को मान लिया जाए तो कारखानों से जो उत्पादनों की बाढ़ आ रही है, और जिससे करोड़ों लोगों की जीविका चलती है- सबका क्या होगा. जनता अगर सादा जीवन व्यतीत करे, विलासिता के साधन जीवन से लुप्त हो जाएं, तो सारी आवश्यक वस्तुओं के उद्योगों पर ताले लग जायेंगे, श्रमिक छंटाई होगी, राष्ट्रीय आय का स्तर नीचे आ जायेगा और मालिकों के मुनाफ़े में गज़ब का ह्रास आयेगा.

इसलिए, येन-केन-प्रकारेण माल की मांग बनाए रखनी होगी, जनता को इसके उत्पादन के लिए उत्साहित करना होगा, नए फैशन खोजने होंगे, नए माडल और अश्लील विज्ञापनों द्वारा जनता के मन में ऐसा प्रलोभन जगाना होगा कि वह क़र्ज़ लेकर, चोरी करके या बेईमानी से अपनी आकांक्षा की पूर्ति करे. ऐसे बुद्धिजीवीगण, जो उत्पादन की बढोत्तरी के लिए पुख्ता दलीलें देते हैं, उनके ऐसे ही विचार हैं. भोग की आकांक्षा मनुष्य के अधोपतन का कारण है- यह विचार उनके लिए असंभव है क्योंकि वे विशेषज्ञ हैं. हिरन की तरह सर ऊंचा किए वे एक ही दिशा का संगीत सुन पाते हैं.

विशेषज्ञ झूठे प्रचार से लोगों को ठगने का काम करते हैं. ज्यादातर आयकर वकील कम से कम आयकर देकर बड़ी कंपनियों को ज़्यादा से ज़्यादा मुनाफा जुगाड़ कराने की योग्यता रखते हैं. जनसम्पर्क अधिकारी का काम सरकार के कुकृत्य की सफाई देना है. श्रमिक अधिकारी का काम श्रमिक विवाद में मालिकों का पक्ष लेना है. कूटनीतिज्ञों का काम स्वदेश के स्वार्थ में विदेश जाकर झूठ बोलना है. पुलिस का काम है घूस लेकर अपराधियों को छोड़ना. सैनिकों का काम है नरहत्या. राजनीतिज्ञों का काम है जनता पर अत्याचार कर सरमायेदारों को मजबूत करना, अखबारों का काम है झूठी खबरें छापकर जनता को बरगलाना और युद्ध के दिनों में उन्माद का वातावरण बनाना. (यहाँ मैं जोड़ना चाहूंगा कि दंगों के समय भी- विजयशंकर).

इन सभी की प्राथमिक शिक्षाएं हमारे विश्वविद्यालयों में मिलती हैं. लेकिन यही काम शोषित जनता करती है तो चारों तरफ शोर होने लगता है. दोनों के कामों में बुनियादी अन्तर न होते हुए भी बुर्जुआ बुद्धिजीवीगण बुर्जुआ वर्ग के सारे कुकृत्यों को सत्कर्म मानकर सफाई देते रहते हैं. एक ही-सा कृत्य अगर पूंजीवाद-विरोधी होता है तो समाज-विरोधी भी कहलाने लगता है.

बगैर युद्ध के उन्माद के कोई भी कार्य बुर्जुआ-सम्मत नहीं है. वर्त्तमान राजनीति ही युद्ध की राजनीति है. सरकार बनाने के लिए विभिन्न राजनीतिक दल युद्ध करते हैं. छल-बल-कौशल से निर्वाचन का युद्ध जीतकर कुर्सी हासिल करते हैं. यह एक खुला रहस्य है कि निर्वाचन में विराट खर्च का जुगाड़ कैसे होता है. जीतने के लिए दुर्नीति, मिथ्या प्रचार तथा कैसे-कैसे कीचड़ उछाले जाते हैं. लेकिन बुर्जुआ व्यवस्था में सरकार बनाने की इससे बेहतर प्रक्रिया हो ही नहीं सकती है.

कामगार और सरमायेदारों में भी युद्ध होता है. कामगार अपनी मांग के लिए नोटिस देंगे, हड़ताल करेंगे, पिकेटिंग (धरना) करेंगे, मालिक ले-ऑफ़ की घोषणा करेंगे, पुलिस की गोलियों से कुछ कामगार और आम लोग मारे जायेंगे, यातायात और विद्युत के ठप पड़ जाने से जनता भुगतेगी. फ़िर त्रिपक्षीय बैठक होगी, मोलभाव होगा और कमज़ोर पक्ष पराजित होगा.

कामगार अगर कुछ मांगें मनवा भी लें तो सरमायेदारों की तरफ से मुद्रास्फीति का तीर छोड़ा जायेगा. फ़िर से वही हड़ताल, लाक ऑउट और बैठक. ऋतुचक्र की तरह यह क्रम चलता रहेगा.

(यह लेख १९८१ में लिखा गया था इसलिए पाठक कृपया समय का यह अन्तर पाट कर चलें- विजय.)

'पहल' से साभार

(अगली किस्त में जारी...)

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