गुरुवार, 31 जनवरी 2008

जंगली पशु बना देती है प्रतियोगिता

बुर्जुआ समाज और संस्कृति-९

(अब तक आपने पढ़ा कि भारत में बचपन से ही हिंसा का पाठ पढ़ाने के क्या-क्या तरीके अपनाए जाते रहे हैं. अब आगे...)

पूंजीवाद की नींव है प्रतियोगिता जो कि एक असामाजिक प्रवृत्ति है. जंगल के जानवरों को जैसे शत्रु के आक्रमण के सम्मुख होकर अपना अस्तित्व बनाए रखना होता है, उसी तरह पूंजीवाद में हर नागरिक किसी न किसी प्रतियोगिता से गुज़र कर ही अपने को टिकाए रखता है. व्यक्तिगत सोच के ऐसे लोग भी हैं जो श्रमिकों की अवस्था से व्यथित हैं लेकिन वे एक ऐसी अवस्था में हैं कि अगर उनकी मांगें मान भी लें तो प्रतियोगिता में पराजित होंगे.

पूंजीवाद में हर उद्योग का दूसरे से, एक जाति से दूसरी जाति का युद्ध है. हरेक दूसरे को पराजित कर ज्यादा से ज्यादा मुनाफ़ा अर्जित करना चाहता है. इस युद्ध में- ''कोई क घर म बाप मर, कोई क घर म माँ मर, आपणा घरा तो ढोल बाजणों चाये' के सिवाय कोई नीति हो ही नहीं सकती.

जीविका के लिए भी एक दूसरे को धकिया कर आगे बढ़ने में युद्ध की ही मानसिकता होती है. विजेता हैं तो ठीक है अन्यथा मृतप्राय ही जीवित रहेंगे. पूंजीवाद किसी को भी काम देने की जिम्मेदारी नहीं लेता है. व्यक्ति की जिम्मेदारी ही मानी जाती है. अब हर आदमी की शारीरिक और मानसिक योग्यता एक जैसी नहीं होती. जो कमज़ोर हैं, कमतर हैं, जिनके मामा-चाचा नहीं हैं, उनके अस्तित्व का संकट बना ही रहता है.

प्रदर्शन-कक्ष में अचानक आग लगने पर, भयभीत चकित जनता, शिशु, वृद्ध और स्त्रियों को रौंदते हुए जैसे भागती है, ठीक उसी तरह पूंजीवाद में हर एक का आचरण होता जाता है. सारा बुर्जुआ समाज ही जैसे कोई 'दग्ध थियेटर' है. मृत्युभय से भीति-ग्रस्त, पराजय की आशंका से प्रतियोगी के प्रति निर्मम, दूसरों के दुःख से निर्विकार, विजेता होने की उम्मीद में सारी जनता एक दूसरे को धकियाते हुए आगे जाना चाहती है. वह जानती है- पराजय का अर्थ ही मृत्यु है.

पूंजीवाद इस भावना का उत्पादक ही नहीं, उत्साहदाता भी है, क्योंकि उसकी उत्पादन व्यवस्था की जीवनी-शक्ति यह भावना ही है. कितने कम से कम व्यय में ज्यादा से ज्यादा उत्पादन हो सके, यह उसका बुनियादी सोच होता है. जनता भी ताल मिलाने लगती है. वह सोचती है, सरमायेदारों की अभिलाषा (अर्थनीति की भाषा में इन्सेन्टिव) पूरी नहीं होगी तो उत्पादन की प्रक्रिया ही ठप हो जायेगी.

उत्पादन का नशा ऐसा है कि बुद्धिजीवीगण भी सरमायेदारों की कुटिलता छिपाने के लिए इन्सेन्टिव की ज़रूरत को और भी प्रचारित करते हैं. उन्हें ऐसा नहीं लगता कि वे लगातार परस्पर विरोधी विचार प्रकट करते हुए प्रहसन के पात्र बनते जा रहे हैं. नहीं लगता, क्योंकि वे 'विशेषज्ञ' होते हैं, एक ही विषय में पारंगत.

प्रतियोगिता की सीमित सार्थकता हो सकती है, लेकिन इसे प्रोत्साहित करना ख़तरनाक होता है. समाज की एकता का सूत्र सहयोगिता में ढूँढा जा सकता है. प्रतियोगिता समाज-विरोधी प्रवृत्ति है. प्रतिद्वंद्वी को हराने की प्रवृत्ति मनुष्य में सहजात और दुर्दमनीय होती है, इसलिए बगैर रेफ़री के फुटबाल भी नहीं खेली जा सकती. पराजय की संभावना देखते ही खिलाड़ी आक्रामक होने लगते हैं. जहाँ सत्ता और संपत्ति की प्रतियोगिता होगी, उत्तेजना उतनी ही चरम पर होगी. पूंजीवाद इस उत्तेजना की आग में घी डालता है. मान-मर्यादा और इज्ज़त पाने के लिए व्यक्ति के उद्यम और प्रतियोगिता के संकल्प का वह हार्दिक स्वागत करता है.

'पहल' से साभार

(अगली पोस्ट में ज़ारी)

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