शनिवार, 31 मई 2008

तुझे सोमरस कहूं या शराब? (भाग-२)


पिछली कड़ी में आपने सवाल उठते देखा कि आर्य इसे सोमरस ही क्यों कहते थे? अब आगे...
ईसा पूर्व ८००० ईस्वी तक भिन्न-भिन्न आकारों के भांड (बर्त्तन) बनने शुरू हो गए थे. निकट पूर्व में उत्तरी जाग्रोस पर्वत के हाजी फिरूज़ (तेपे, आज का ईरान) नामक स्थान पर मेरी ए. वोइट ने जब खुदाई की तो वहाँ से उन्होंने दुनिया में पहली बार एक बड़ा जार बरामद किया. इसमें तकरीबन ९ लीटर यानी २.५ गैलन द्रव आ सकता था. मिट्टी का एक मकान था. उसमें ऐसे ५ जार और फराहम हुए जो फर्श पर एक दीवार से सटे रखे थे. यह कमरा किसी रसोईघर जैसा लगता था. इन जारों को तकरीबन ५४००-५००० ईसा पूर्व का आँका गया. इन जारों में पीले रंग की सामग्री चिपकी हुई मिली जिसे प्रयोगशालाओं में गहन परीक्षणों के बाद वाइन करार दिया गया.


सम्भव है इसके सेवन से ऐसे बल का संचार होता रहा हो कि पीने वाला महायोद्धा यहाँ तक कि युद्ध का देवता तक बन सकता था. आश्चर्य नहीं है कि ऋगवेद में इन्द्र को नगरों का नाश करने वाला कहा गया है और सोमरस इन्द्र जैसे देवताओं को प्रस्तुत किया जाता था. तब कहीं इन्द्र येहोवा की परम्परा का वाहक तो नहीं था जो कालांतर में स्वयं एक पीठ बन गया था!

अब हम ज़रा पश्चिम में नशे के आम जरिये वाइन की जड़ें तलाशने की कोशिश करेंगे. आज भी पश्चिमी देशों में व्हिस्की, रम या जिन से कहीं ज्यादा वाइन का सेवन अधिक प्रतिष्ठित माना जाता है. ध्यान देने की बात यह है कि प्राचीन काल में लोग वाइन और बीयर में फ़र्क करते थे. वाइन काफी पहले ईजाद कर ली गयी थी. प्राचीन ईरान तथा मिस्र से प्राप्त चित्रों में दर्शाया गया है कि वाइन पीने के लिए प्यालों का प्रयोग होता था जबकि बीयर सीधे बैरलों से पतली सटक के जरिये पी जाती थी. मदिरापान अक्सर सामूहिक होता था.

मिस्र में एक परम्परा थी कि वर्ष के प्रथम माह में एक स्थान पर सैकड़ों स्त्रियाँ इतनी शराब पीती थीं कि सुबह तक उनमें से कोई अपनी टांगों पर खड़ी नहीं हो पाती थी. यह विराट शराब आयोजन एक अंधविश्वास के तहत किया जाता था. इस पर यहाँ विस्तृत बात करने से विषयांतर हो जाने का खतरा है.
नियोलिथिक युग(ईसा पूर्व ८५००-४००० वर्ष) तक निकट पूर्व तथा मिस्र की आबादियां स्थायी हो गयी थीं. इसके चलते पेड़-पौधों और घरेलू पशुओं से लोगों का सम्बन्ध करीबी होने लगा. घुमंतू जातियों के मुकाबले स्थायी खाद्य-श्रृंखला और व्यंजन अस्तित्व में आ गए. खाद्य संरक्षण में किण्वन, सोकिंग, पकाना, तिक्त करना आदि विधियां प्रचालन में आयीं. नियोलिथिक लोगों को ब्रेड, बीयर और अनाजों के उत्पादन का आदि मानव-समूह माना जाता है.

प्राचीनकालीन मिस्र में अंगूर की खेती नहीं होती थी. लेकिन फिलिस्तीन से व्यापार के कारण नील डेल्टा में शाही शराब का उत्पादन होता था. वे कांस्ययुग के शुरुआती दिन थे. इसे 'पुराने राज्य' का शुरुआती दौर भी कहा जाता है. बात २७०० ईसा पूर्व की है. तब के फिलिस्तीन में आज का इजरायल, पश्चिमी तट, गाज़ा और जोर्डन शामिल थे. नील डेल्टा में अंगूर की खेती बहुत बाद में शुरू हुई. यहाँ शराब के जार तीसरे वंश के फिराओनों की क़ब्रों में दफ़न किए जाने के प्रमाण मिले हैं. एब्रीडोस की क़ब्रों में ऐसे कई जार मिले हैं.

मेसोपोटामिया में दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से पहले का शराब-इतिहास दस्तावेज़ के तौर पर लगभग न के बराबर मिलता है. लेकिन जारों के अन्दर पाये गए द्रव्य के परीक्षण ने यह साबित कर दिया कि ३५००-३१०० ईसा पूर्व के दरम्यान यहाँ का उच्च वर्ग शराब का छककर सेवन करता था. यह सिलसिला उरुक काल के बाद के दौर तक चला. शराब के सिलेंडरों पर मिली शाही सीलों से पता चलता है कि बीयर ट्यूबों में स्ट्राओं के जरिये तथा शराब (वाइन) प्यालों में पी जाती थी, जैसा कि मैंने पहले ही अर्ज़ किया है. यह आज के इराक़ का दक्षिणी इलाका था. पांचवी शताब्दी ईसा पूर्व के 'father of history' कहे जाने वाले ग्रीक इतिहासकार हेरोडेटस ने लिखा है कि यूफ्रेतस या टिगरिस से लेकर आर्मीनिया के इलाकों में शराबनोशी काफी बाद तक होती थी.

आज के जोर्जिया में भी ६००० वर्ष ईसा पूर्व के जार मिले हैं. यह सुलावेरी का इलाका था. पैट्रिक एडवर्ड मैकगवर्न ने अपनी किताब एनसियेंट वाइन: द सर्च फॉर द ओरीजिंस ऑफ़ विनी कल्चर में लिखा है कि यूरेशियाई वाइन (अंगूर की खेती और शराब का उत्पादन) आज के जोर्जिया में शुरू होकर वहाँ से दक्षिण की तरफ़ पहुँची होगी. यह किताब प्रिंसटन यूनिवर्सिटी प्रेस से साल २००३ में छपी थी.

दूसरा भाग यहीं समाप्त होता है.. इतिश्री रेवाखंडे द्वितीयोध्याय समाप्तः...

अगली पोस्ट में ज़ारी...

4 टिप्‍पणियां:

  1. मदिरा तो हमारे लिये "बन्दर और अदरक का स्वाद" जैसी है।
    आपने लिखा बहुत मेहनत से और स्तर का है।
    बस यही डर है कि इससे मोटीवेट हो कुछ लोग पीने न लग जायें! :)

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  2. हमारे एम ए के कोर्स में लॉर्ड बायरन की एक कविता लगा करती थी 'द डिफ़ॉर्म्ड ट्रान्स्फ़ॉर्म्ड' जिसमें एक पंक्ति थी: "What's drinking?
    A mere pause from thinking!"

    मुझे लगता है मुनि सनके दिक और बायरन के कुलगुरु एक ही थे. कृपया सन्देह का निराकरण करें ऋषिश्रेष्ठ!

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  3. दोनों पांडेवरों को प्रणाम! संदीपन मुनि आश्रम के तत्कालीन रीडर सनके दिक् मुनि ने लोर्ड बायरन को ज्ञान दिया था- "Alchohol can help to forget everyting except secrets!"
    आगे को बायरन ने इसका लाभ इस काव्य-रचना में उठाया.
    ...और वरिष्ठ पांडेश्री, सोमरस के भांड में वैधानिक चेतावनी नहीं होती थी! कृपया लोग अपने विवेक से काम लें!

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  4. विजय जी अपने निजि जरूरि काम जैसे ड्युटी ,कैरम खेलना ,टी.वी. देखना इत्यादि से निवृत्त होने के बाद का समय ही हम ब्लाग पढने मे अर्पण कर पाते है इसिलिये आप के दर पर जरा देर से पहुचे है पर जब पहुचे है तो क्या खुब पहुचे है मयखाना सजा है !! वैसे अब आना होता ही होगा

    रहा सवाल सोमरस का तो अनुभवगत तथ्य यह् है कि सोमरस पान करने वाले अस्सी प्रतिशत व्यक्ती दील से साफ़ होते है क्योकि अंदर कुछ छुपाने को रहता ही नही और छुपता ही नही ॥किसी ने खुब कहा है ना
    मंदिर मस्जीद भेद कराते
    मेल कराती मधुशाला

    देखिये अपना मेल हो गया ना........

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