गुरुवार, 8 मई 2008

ये मूढ़मति और अंधविश्वासी लोग!

We often talk about Incredible India but see what is still happening in this great country. कल रात हमारी सोसाइटी co-op-housing society में दुखद घटना घट गयी। ऊपर के फ्लैट में एक परिवार रहता है. इस बात का ज़िक्र ज़रूरी नहीं समझता कि वह परिवार कहाँ का है लेकिन यह ज़रूर कह सकता हूँ कि वे लोग ग्रामीण पृष्ठभूमि (rural background) के हैं. हालांकि अन्धविश्वासों superstitions के मामले में शहर या ग्रामीण पृष्ठभूमि से अधिक फ़र्क नहीं पड़ता. ख़ैर, घर की मालकिन अभी-अभी एक ख़ूबसूरत बच्ची की माँ बनी है.


हुआ ये कि कल पास-पड़ोस की कुछ महिलायें उस बच्ची new born को देखने गयीं। उनके जाने के बाद बच्ची की माँ को लगा कि उसे इन महिलाओं की नज़र लग गयी है. सो वह लगी उसकी नज़र उतारने. उसने अपनी परम्परा से जो सीखा होगा उसी विधि से नज़र उतारने लगी.


उस महिला ने तेल में कागज़ डुबोया और उसमें आग लगाकर बच्ची के चारों ओर घुमाने लगी। इसी बीच असावधानीवश जलते कागज़ का एक टुकड़ा बच्ची के पेट पर गिर गया. नवजात बच्ची की नाजुक त्वचा skin झुलस उठी. घबराकर उस महिला ने उस पर पानी डाल दिया. अब क्या था, बच्ची की त्वचा छिल कर बाहर आ गयी और पूरे पेट से रक्त-मांस दिखने लगा.


अब वह बच्ची अस्पताल hospital में जिंदगी और मौत के बीच झूल रही है। ईश्वर उसकी रक्षा करे!


इस प्रसंग से मुझे अपने बचपन की एक घटना याद आ गयी। हमारे गाँव के एक चौधरी साहब एजेंसी agency से नया-नया ट्रैक्टर tractor खरीद कर लाये. ट्रैक्टर के लिए उन्होंने जमानत deposit के तौर पर अपनी आधी ज़मीन एजेंसी के पास रख दी थी.बहरहाल ट्रैक्टर आया. गाँव भर के लोग उसे देखने जुटे. हम बच्चों के लिए वह अजूबा चीज थी. हम उसे छूना चाहते थे लेकिन बड़े-बुजुर्ग डांट कर भगा देते.


सब लोग बेहद खुश थे कि गाँव में पहला-पहला ट्रैक्टर आया है। और चौधरी साहब तो गर्व से फूले नहीं समा रहे थे कि गाँव का पहला ट्रैक्टर उन्होंने ख़रीदा है. मूंछों पर देते घूम रहे थे.


रात में पूजा हुई। रिवाज के अनुसार ट्रैक्टर के चारों पहियों के नीचे दीपक जला कर रख दिए गए. दीपक में घी इतना भरा गया कि सुबह तक वे जलते रहें. सब लोग खुशी-खुशी सोने चले गए.


सुबह उठ कर लोगों ने देखा कि चार में से तीन पहिये आग पकड़ चुके थे और उनके टायर tyre जलने की बू से मोहल्ला गंधा रहा था। चौधरी साहब ने सर पीट लिया. सर मुडाते ही ओले पड़ गए थे. लगे हाथ ५ हज़ार का खर्चा! रोते-पीटते उन्होंने नए टायर लगवाये.


देखा आपने, कई बार पुराने रीति-रिवाज और अंधविश्वास कितना भारी पड़ जाते है!

7 टिप्‍पणियां:

  1. ऎसी छोटी-छोटी घटनाओं के जरिये जो आप लक्छित करना चाहते है, अच्छे से सम्प्रेषित हो रहा है. बढिया है.

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  2. दुखद है। पर अन्धविश्वास बहुत गहरा है समाज में।

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  3. बड़ी दुखद घटना है। ये प्रवृतियाँ धीरे धीरे ही समाज से जाएँगी .

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  4. Nice Post !
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  5. ज्ञान दत्त जी से सहमत हूँ, आशा करता हूँ मनीष जी की बात सच हो. धीरे-धीरे ही सही.

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  6. अँधविश्वास और असावधानी का मिलना ही ऐसी दुखद घटनाओँ के लिये जिम्मेदार हैँ -

    - लावण्या

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