सोमवार, 6 अप्रैल 2009

चुनाव प्रचार में साहित्य की रेड़ लगाई!

संसद में शेर-ओ-शायरी जगह पाती थी तो अख़बार वाले (अब टीवी चैनल वाले भी) उसका बड़ा शोर करते थे कि फलां मंत्री ने अपने भाषण के दौरान यह शेर पढ़ा, ढिकां कविता की लाइनें पढ़ीं वगैरह-वगैरह. लेकिन अब साहित्य चुनाव प्रचार में भी जगह पा रहा है. यह हम जैसे पढ़ने-लिखने से थोड़ा-बहुत वास्ता रखने वालों के लिए सुकून की बात है. 'आज तक' में प्रभु चावला और उनके एक एंकर अजय कुमार के साथ अमर सिंह कुछ फिल्मी और कुछ इल्मी शेर कहते-सुनते देखे गए. लेकिन मैंने यह पोस्ट एक अन्य कार्यक्रम की वजह से लिखी है

विदेश में जमा काला धन को लेकर एनडीटीवी इंडिया में ५ अप्रैल की शाम एंकर अभिज्ञान और सिकता के साथ एक बहस चल रही थी. बाबा रामदेव, कपिल सिब्बल, रविशंकर प्रसाद, शिवानन्द तिवारी भाग ले रहे थे. उस बहस में मैं फिलहाल जाना नहीं चाहूंगा. लेकिन जिस एक बात ने मेरा ध्यान खींचा वह थी जेडीयू के वरिष्ठ नेता शिवानन्द तिवारी के मुखारविंद से मुंशी प्रेमचंद की कहानी का उल्लेख किया जाना.

जेडीयू के तिवारी जी यूपीए सरकार एवं गठबंधन पर हमला करते हुए कह रहे थे कि भ्रष्टाचार आज से नहीं है, समाज में इसकी जड़ें गहरी हैं और प्रेमचंद ने 'नमक का दारोगा' कहानी में इसी भ्रष्टाचार का जिक्र किया था. वह कहानी उनके अनुसार सन् १९३६ में लिखी गयी थी. एक दूसरा हवाला उन्होंने महात्मा फुले के लेखन का दिया. लेकिन वह महात्मा फुले के भ्रष्टाचार संबन्धी किसी लेख का कोई उद्धरण नहीं दे सके. हालाँकि उन्होंने यह अवश्य कहा कि फुले १८वीं शताब्दी में हुए थे.

मैं तिवारी जी का शुक्रिया अदा करना चाहता हूँ. जेपी आन्दोलन में लालू यादव के वरिष्ठ नेता रहे डॉक्टर शिवानन्द के मुंह से प्रेमचंद का नाम सुनकर अमर सिंह जैसा हल्कापन नहीं लगता. लेकिन मैं विनम्रता से कहना चाहता हूँ कि महात्मा ज्योतिबा फुले १८वीं नहीं १९वीं शताब्दी में पैदा हुए थे. उनका जन्म महाराष्ट्र के सातारा जिले में ११ अप्रैल १८२७ को हुआ था. सन् १८२७ का अर्थ १८वीं शताब्दी नहीं होता जैसा कि सन् २००९ का अर्थ किसी भी गणित से २०वीं शताब्दी नहीं हो सकता.

दूसरी बात यह है कि प्रेमचंद की कहानी 'नमक का दारोगा' सन् १९३६ में लिखी गयी कहानी नहीं है. उर्दू की 'प्रेम पचीसी' नामक पत्रिका में यह सन् १९१४ के पूर्व ही छप चुकी थी. इससे साबित होता है कि डॉक्टर शिवानन्द तिवारी ने मुंशी प्रेमचंद और महात्मा फुले का भी अपनी पार्टी के लिए किस तरह इस्तेमाल कर लिया!

जय हो! और हो सके तो इस तरह के तथ्यों से भय भी हो!! सच्चे पत्रकार और नेता अपनी बात कहने से पहले यों ही नहीं ख़ाक छाना करते!

फिर भी आज के दौर में साहित्य को किसी बहाने हमारे देश के 'आम आदमी' के सामने लाने का धन्यवाद!

3 टिप्‍पणियां:

  1. जेपी आन्दोलन में लालू यादव के वरिष्ठ नेता रहे ....इसका कोई अर्थ नहीं समझ में आया। लेख अच्छा है विजय भाई।

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  2. 'के' की जगह 'से' पढ़ा जाए आभा जी. ध्यान दिलाने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद!

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