आपको आज एक शेर सुनाता हूँ अब हर ज्ञानी की तरह मत कहिएगा कि आपको इस शेर के बारे में सब पता है. मूर्ख होने का अपना मज़ा है....और पता था तो भी मूर्खता में मुझसे आगे भला कौन निकल सकता है??
शेर अर्ज़ है-
क़ैस जंगल में अकेला है मुझे जाने दो
खूब गुज़रेगी जब मिल बैठेंगे दीवाने दो
दोस्तो, इस शेर के बारे में बातचीत अगले दौर में....
गुरुवार, २ अप्रैल २००९
क़ैस जंगल में अकेला है मुझे जाने दो
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2 comments:
हम तो अब भी मूर्खता की वेल्यू पर कायम हैं भाई.
तो फिर टिपण्णी भी अगले दौर तक मुल्तवी. आखिर मूर्खता भी इंतज़ार कर सकती है.
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