शनिवार, 4 अप्रैल 2009

ख़ूब गुज़रेगी जो मिल बैठेंगे दीवाने दो

हाँ, तो पिछली पोस्ट में जो शेर मैंने आपको पढ़वाया था वह शेर कहा था जगतमोहन लाल रवां साहब ने.

मैं कह रहा था कि यह शेर दो दिन पहले सैयद रियाज़ रहीम साहब के साथ बातचीत के दौरान मेरे सामने आया. मैंने यह मिसरा तो बहुत सुन रखा है- 'ख़ूब गुज़रेगी जो मिल बैठेंगे दीवाने दो.' मक़बूलियत ऐसी कि यह लोगों की ज़बान पर है और इसका इस्तेमाल विज्ञापन तक में हुआ है. लेकिन 'क़ैस जंगल में अकेला है मुझे जाने दो' वाला मिसरा मैंने पहली बार सुना. (कई अच्छी बातें ज़िन्दगी में पहली बार ही होती हैं:))

बात आगे बढ़ी तो रियाज़ साहब ने इस शेर के ताल्लुक से जो कहा वह आपको भी सुनाता हूँ- 'इस शेर का नाम लिए बगैर उर्दू शायर की तारीख नामुकम्मल है क्योंकि यह शेर आमद (प्रवाह) का शेर है. शायरी के ताल्लुक से उर्दू में आमद और आवर्द- दो बातें कही जाती हैं. आवर्द की शायरी में फ़िक्र तो हो सकती है लेकिन ज़रूरी नहीं कि वह शायरी दिलों को छू जाए. जहां तक आमद की शायरी है तो वह दिलों को तो छूती ही है; इसके साथ-साथ सोचने के लिए नए रास्ते भी पैदा करती है.'

अब फ़ैसला आप कीजिए कि रवां साहब के इस शेर के ताल्लुक से रियाज़ साहब जो फ़रमा रहे थे वह दुरुस्त है या नहीं. मुझे तो एकदम दुरुस्त लगा जी!

रवां साहब के चंद और अश'आर पेश-ए-खिदमत हैं-

हिरास-ओ-हवस-ए-हयात-ए-फ़ानी न गयी
इस दिल से उम्मीद-ए-कामरानी न गयी

है संग-ए-मज़ार पर तेरा नाम रवां
मर कर भी उम्मीद-ए-ज़िंदगानी न गयी

पाबन्दि-ए-ज़ौक, अहल-ए-दिल क्या मा'नी
दिलचस्पि-ए-जिंस-ए-मुज़महल क्या मा'नी

ऐ नाज़िम-ए-कायनात कुछ तो बतला
आखिर ये तिलिस्म-ए-आब-ओ-गुल क्या मा'नी


धन्यवाद!

5 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत खूब गुजरेगी जब.... अंदाजे बयां खूबसूरत है . बधाई

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  2. खूबसूरत तो है ही। अंदाजे बयाँ भी खूब है।

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  3. हिरास-ओ-हवस-ए-हयात-ए-फ़ानी न गयी
    इस दिल से उम्मीद-ए-कामरानी न गयी

    है संग-ए-मज़ार पर तेरा नाम रवां
    मर कर भी उम्मीद-ए-ज़िंदगानी न गयी

    पाबन्दि-ए-ज़ौक, अहल-ए-दिल क्या मा'नी
    दिलचस्पि-ए-जिंस-ए-मुज़महल क्या मा'नी

    ऐ नाज़िम-ए-कायनात कुछ तो बतला
    आखिर ये तिलिस्म-ए-आब-ओ-गुल क्या मा'नी


    no words ..excellent

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