सोमवार, 28 जनवरी 2008

मंगलेश डबराल पर क्यों पिल पड़े?

पहले तो जी में आया कि एक टिप्पणी ही पोस्ट कर दूँ, फ़िर सोचा कि मामला गंभीर है।

एक सज्जन ने मंगलेश जी के लेख पर लगभग वही बातें दोहराईं, जो मैंने 'मंगलेश डबराल की ब्लॉगघुट्टी' शीर्षक से लिखी थीं। शब्द तक लगभग वही उठा लिये. मेरी पोस्ट कई लोगों ने पढ़ी, लेकिन टिप्पणी सिर्फ़ अजित भाई की आयी. यह न समझियेगा कि मैं टिप्पणियों की संख्या का मुद्दा उठा रहा हूँ. पैगाम-ए-ज़बानी कुछ और ही है।

इन सज्जन के यहाँ बीसियों लोग पहुँच गए और पिल पड़े मंगलेश जी पर। क्या यह उचित है? मंगलेश जी ने अपनी बात रखी थी, लेकिन ये टिप्पणीकार उनकी खाट खड़ी करने में लग गए. कुछ इस तरह के तर्क देने लगे कि पहले अंडा देकर दिखाओ तब ऑमलेट की बात करो!

जो लोग पोस्ट तक मौलिक नहीं कर सकते, या जहाँ से विचार उडाये हैं, उसे श्रेय देने तक की दयानतदारी नहीं दिखा सकते उन्हें क्या हक़ है इस तरह चौपाल बनाकर एक अच्छे और संवेदनशील कवि पर हल्ला बोलने का? मंगलेश जी ने उसमें ऐसी क्या बात कह दी थी, जो इन्हें नागवार गुज़री?

मैंने अपने लेख में मंगलेश जी से विनम्रतापूर्वक असहमति जाहिर की थी और कहा था कि यह 'डिमांड' है। बस हो गया. लेकिन ये लोग तो उसी आँख मूँद कर प्रलाप कर रहे हैं जिस तरह कुत्ता रात में भोंकते समय आँखें बंद कर लेता है और इसी का फ़ायदा उठाकर लकड़बग्घा उसे उठा ले जाता है.

एक कामकाजी नामक सज्जन तो मंगलेश जी को जलील करने पर ही उतारू हो गए। पहले तो इन्होने लिखा कि कौन हैं मंगलेश डबराल? दावा ये कि ये उन्हें हरगिज नहीं जानते. आगे उन्होंने लिखा- 'डबराल जी अपने चारण भाटों द्वारा लिखे गये को अपने नाम से छ्पवाते हैं.'
जब इन्होने मंगलेश जी का नाम ही नहीं सुना तब इतनी बड़ी खोजी पत्रकारिता करके इस नतीजे पर कैसे पहुँच गए कि मंगलेश जी दूसरो से लिखवाकर अपने नाम से छपवाते हैं! अति है। व्यक्तिगत राग-द्वेष को इस स्तर तक ले जाना किस संस्कार के तहत आता है, मुझे नहीं मालूम.

साहित्य जगत के अपने मठ होंगे, महंत होंगे, गुट होंगे। लेकिन क्या यहाँ भी हम ऐसा ही नहीं कर रहे हैं। अगर हमें कोई ब्लॉग की ताकत का अंदाज़ा दिलाने की कोशिश कर रहा है तो क्या अनर्थ कर रहा है? यह दीगर बात है कि हम समय की कमी, संसाधनों की कमी, या घर जार कर लुकाठी लेकर निकल पड़ने की भावना की कमी के चलते शायद 'table stories' कर के रह जाते हैं। मेरा तो दिल करता है कि वीडियो कैमरा लेकर निकल पडूं सड़कों पर और जो भी असंगत दिखे उसे ही ब्लॉग पर चढ़ा दूँ. लेकिन न तो मेरे पास कैमरा है, न नौकरी से फुरसत. झल्ला कर लाठी भांजने के बजाये अगर आप यह कर सकें तो कीजिये और तब देखिये ब्लॉग की असली ताक़त.

कुछ करना धरना तो दूर की बात है, लोगों के पास concept तक नहीं है। वे जो कर रहे हैं अगर कोई उससे आगे ले जाना चाहता है तो उसी पर पिल पड़ते हैं. वही हाल है कि आदिवासी बच्चों को शुरू-शुरू में जब स्कूल भेजने को कहा जाता था तो उनके माता-पिता कहते थे कि पहले पैसे दो तब स्कूल आयेंगे. (यहाँ यह स्पष्ट कर दूँ कि यह मनोविज्ञान मैं समझता हूँ इसलिए मुझे आदिवासी विरोधी न मानने लग जाएं जिस तरह कि मैं आपका विरोध नहीं कर रहा हूँ).

मंगलेश डबराल का मैं कोई भक्त नहीं हूँ। मैंने अपनी पहले की पोस्ट में कहा था कि मैं उनकी कवितायें बहुत पसंद करता हूँ. और यहाँ मेरा इरादा मंगलेश जी को विष्णु का अवतार बनाने का भी नहीं हैं. उनकी भी अपनी कमियाँ-अच्छाइयां होंगी, जैसी कि मेरी आपकी हैं.

अब आगे क्या लिखा जाए, समझ में नहीं आता. वैसे भी जिन मानवों को अपनी अज्ञानता पर गर्व हो उनके आगे तो यही कहना पड़ता है- 'दर्दुरा यत्र वक्तारः तत्र मौनं हि शोभनम्!'

3 टिप्‍पणियां:

  1. संजय तिवारी28 जनवरी 2008 को 7:34 am

    बगल में रोमन में बोएं और हिन्दी में कांटे. भाषा का प्रयोग बहुत अच्छा लगा.

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  2. संजय भाई, धन्यवाद! भले पधारे जू!

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  3. मैं भी भौचक था ..
    कुछ ओवर रिअक्शन हो गया लगता है !
    मगर आप ने भी कुछ कसर नही छोडी है इस लेख में.
    सौरभ

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