मंगलवार, 22 जनवरी 2008

युद्ध के बिना नहीं रह सकती मनुष्य जाति!

बुर्जुआ समाज और संस्कृति-6
(...गतांक से आगे)


संस्कृति परम्परा की ही सम्प्रसारण होती है। परम्परा से प्राप्त विचारधारा और दृष्टिकोण ही, आधुनिक प्रभाव के फलस्वरूप संस्कृति में रूपांतरित होते हैं. परम्परा, यानी अतीत के अनुभव, इतिहास तथा पूर्वजों द्वारा प्राप्त जीवन-दर्शन. ऐसी ही परम्परा से प्राप्त उपादान 'हिंसा', बुर्जुआ संस्कृति की नियामक शक्ति है. प्राचीन विचारकों का युद्ध के लिए असीम आग्रह और उत्साह था. उन्होंने युद्ध की प्रेरणा जगाकर यथार्थवादी दृष्टिकोण का परिचय दिया.

आक्रमण से आशंकामुक्त अवस्था मनुष्य की कभी नहीं रही। आत्मरक्षा के युद्ध में पराजित होने का अर्थ ही गुलामी का जीवन है. इसलिए हर जाति, सम्प्रदाय को युद्ध की दैहिक और मानसिक तैयारी का प्रयास करना होता है. हर देश, हर काल में तत्कालीन विजयी योद्धा श्रद्धाभाजन रहे. उन्हें ईश्वर के रूप में पूजा गया, कवितायें लिखी गयीं. गीता में भी वीरगति को प्राप्त होने पर स्वर्गलाभ का आश्वासन है.

महाज्ञानी प्लेटो ने कहा था कि यद्यपि स्वर्ग कल्पना ही है लेकिन उसे अति सुखद स्थान के रूप में प्रचारित करना है, वरना युद्ध में सैनिकों का उत्साह नहीं रह पाएगा। कुरान में भी धर्मयुद्ध में मौत का पुरस्कार स्वर्गवास है.

मनुष्य को उसके रूप में स्वीकृत होने से पहले ही आत्मरक्षा के लिए युद्ध होते रहे एवं जहाँ तक इतिहास हमारे कब्जे में है, वह युद्ध का ही है। युद्ध की निरंतरता ही मानव-जीवन की स्वाभाविक अवस्था है, शांति उसका व्यतिक्रम है.

सरोकिन ने, ईसा पूर्व ६२० से १९२५ शताब्दी तक हुए युद्धों का लेखा-जोखा किया है। इससे स्पष्ट है कि किसी भी जाति के लिए एक अंतराल पर, युद्ध एक सामान्य नियम है। किसी जाति ने, पच्चीस वर्ष शांति से गुजारे हों, यह विरल है. प्राचीन ग्रीक के ३७५ वर्षों के इतिहास में २३५ वर्षों तक युद्ध होते रहे. इसमें साल भर चलने वाले युद्ध लगभग २१० थे. रोम के ८७६ वर्षों के इतिहास में ४१६ वर्षों तक युद्ध हुए. ३६२ वर्ष युद्धव्यापी रहे.
आलोच्य काल में ग्रीक, रोम और योरोप तथा दूसरे नौ देशों में जो युद्ध हुए, उनका आनुपातिक निष्कर्ष इस प्रकार है:-

ग्रीक ५७%, रोम ४१%, ऑस्ट्रिया ४०%, जर्मनी २८%, हॉलैंड ४४%, स्पेन ५७%, इटली ३६%, फ्रांस ५०%, इंग्लैंड ५६%, रूस ४६% तथा पोलैंड और लिथ्युबिया ५८%।

सरोकिन का कहना है कि युद्धों की संख्या में ह्रास का भी कोई प्रमाण नहीं है। जो विवरण मिलते आए हैं उनसे जाहिर है कि जनसंख्या वृद्धि के साथ-साथ सैनिकों की बढ़ती संख्या, युद्ध में मृत्यु तथा साधारण म्रत्यु-दर बढ़ी है. फ्रांस, इंग्लैंड, ऑस्ट्रिया, हंगरी तथा रूस के हताहतों के विवरण में बारहवीं से उन्नीसवीं सदी का पार्थक्य उल्लेखनीय है-

बारहवीं शताब्दी ( उपर्युक्त पाँच देशों की कुल जनसंख्या) १,१६१००, युद्ध में मृत २९९४०, सेना में मृत्यु-दर 2.5%, उन्नीसवीं शताब्दी ( उपर्युक्त पाँच देशों की कुल जनसंख्या) १७८६९८००, युद्ध में मृत २९१२७७१, सेना में मृत्यु-दर ३८.९%, सन १९०० से १९२५ ( उपर्युक्त पाँच देशों की कुल जनसंख्या) ४१४५६०००, युद्ध में मृत १६१४७५५०, सेना में मृत्यु-दर (अप्राप्य).

सरोकिन के अनुसार सर्वाधिक भयंकर और खूनी युद्ध का अभिशाप और 'गौरव' बीसवीं शताब्दी का ही है। इस शताब्दी के प्रथम पच्चीस वर्षों में जितनी मृत्यु हुई है, अतीत में किसी एक सदी में नहीं हुई. स्वैरतंत्र से गणतंत्र में युद्धलिप्सा कम है, यह धारणा तथ्यों द्वारा एकदम ही झूठ साबित हुई है.

'पहल' से साभार

(जारी...)

2 टिप्‍पणियां:

  1. अरे महराज आप तो बहुतै गंभीर गंभीर देते हैं। दिमाग से भन्न-भन्न बाउंस कर रहा है।

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  2. प्यारे सत्तू, क्या करें तबीयत ही कुछ ऐसी है. एक काम करो, संजय झा की आवाज़ में निरालाजी का गीत सुनो कहीं से ढूंढकर .. 'गहन है यह अन्धकारा!'

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