शुक्रवार, 11 जनवरी 2008

उनकी टिप्पणी पर टिप्पणी!

बेनामी जी,

आपने सही कहा कि पूरी पूंजीवादी संरचना के केंद्र में अर्थसत्ता-शक्ति होती है। मेरा निवेदन बस इतना-सा है कि अभी यह लेख शुरू ही हुआ है इसलिए कसूरवार ठहराने या कोई तमगा देने के किसी फैसले पर पहुँच जाना शायद उचित नहीं होगा। बुद्धिजीवियों को नायक, खलनायक या मुख्य खलनायक बनाने का सुर भी नहीं लगाया गया है. यह तो हालात के पड़ताल की कोशिश है.

'आपने कहा कि दोनों ही पूंजी के गुलाम या चाकर होते हैं'- यही बात तो लेख के इस हिस्से में कही गयी है। इसमें मतभेद कैसे देख लिया आपने. बात जो हाईलाईट होना चाहिए थी वो यह कि फैराडे जैसे वैज्ञानिक ने पूंजी के हाथ में खेलने से इनकार कर दिया. फैराडे तो महज एक उदाहरण है. ऐसे जाने कितने ही कलाकार, वैज्ञानिक, अध्यापक, विचारक, दार्शनिक हुए हैं जिन्होंने पूंजी के हाथों में खेलने से इनकार किया और उसकी सजा भुगती. कहने का मतलब यह है कि चयन का अधिकार आपके पास है लेकिन आप उसका इस्तेमाल करने की जगह पूंजी का गुलाम बनने का विकल्प चुनते हैं.

हाँ, आपकी एक बात से मैं असहमत होना चाहता हूँ कि किसी समाज संरचना विशेष में यह भेद करना ग़लत होगा कि फलां अच्छा है या बुरा। अगर यही बात है तो हम मौजूदा समाज व्यवस्था में इतनी माथा-पच्ची करने क्यों बैठे हुए हैं? क्यों नहीं मान लेते कि शोषणकर्ता और शोषक एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं।

ख़ैर, आपको जानकारी की दृष्टि से ही सही; यह लेख अच्छा लगा, मेहरबानी! लेकिन अभी तो जानकारियों का पुलिंदा खुलना बाकी है.

बहरहाल, अगली किस्त पढ़कर बताइयेगा...

आपका ही
विजयशंकर

2 टिप्‍पणियां:

  1. केवल साम्यवाद (आदिम या आगत) को छोड़ कर सभी सामाजिक संरचनाओं के केन्द्र में अर्थसत्ता-शक्ति ही है। पूंजीवाद में वह पूंजी में परिवर्तित हो जाती है। और लालच को काबू कर सचाई के साथ चलने वाले भी हर सामाजिक संरचना में मिल जाऐंगे।

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  2. "हाँ, आपकी एक बात से मैं असहमत होना चाहता हूँ कि किसी समाज संरचना विशेष में यह भेद करना ग़लत होगा कि फलां अच्छा है या बुरा। अगर यही बात है तो हम मौजूदा समाज व्यवस्था में इतनी माथा-पच्ची करने क्यों बैठे हुए हैं? क्यों नहीं मान लेते कि शोषणकर्ता और शोषक एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं।"

    एक वाक्य में आप कितना कुछ कह गये. आभार. इस तरह के सशक्त लेखन कम से कम शब्दों में अधिक से अधिक बातें कह जाते हैं.

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