गुरुवार, 6 दिसंबर 2007

तलछट-२: मैं तेलिया लिबास में पुरज़े सुधारता हूँ

'मैं तुम लोगों से इतना दूर हूँ
कि तुम्हारे लिए जो विष है
मेरे लिए अन्न है
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मैं शेवरले डॉज के नीचे लेटा
तेलिया लिबास में पुरज़े सुधारता हूँ
तुम्हारी आज्ञायें ढोता हूँ।'


गजानन माधव मुक्तिबोध की ये पंक्तियाँ धीरेन पर तेलिया लिबास की ही तरह फिट होती हैं. २ सालों तक वह वडाला के एक गैरेज में शेवरले डॉज के नीचे तो नहीं, ऑटो रिक्शा, टैक्सी, ट्रक और इसी तरह के अन्य वाहनों के नीचे लेटकर उनके कल-पुरज़े दुरुस्त करता था. आजकल उसे वहाँ से चलता कर दिया गया है क्योंकि उसने एक होंडा सिरिक गाड़ी की मालकिन की आज्ञायें नहीं ढोयीं.
दरअसल हुआ यों था कि २ दिन से पड़े एक ऑटो की मरम्मत छोड़कर धीरेन होंडा सिरिक की विंड स्क्रीन तत्काल ठीक करने दौड़ा नहीं आया और मालिक ने बोरिया-बिस्तर बांधने को कह दिया। स्वाभिमान धीरेन की कमजोरी है. उसने अकड़कर जवाब दे दिया कि वह काम करने के पैसे लेता है किसी की गाड़ी देखकर नहीं.
धीरेन को इस बात का गुरूर था कि हाथ में हुनर है तो काम हज़ार हैं, लेकिन मुम्बई में अब जाकर उसे पता चला कि यह उसका दीवानापन था. दो सालों तक मारा-मारा फिरना पड़ा. इस बीच उसने मंत्रालय के पास आरजे ट्रेवेल्स कम गैरेज में जरूर कुछ दिन लगा रहा. लेकिन मामूली दिहाड़ी पर काम करते-करते आजिज आ गया और घर बैठ गया.

यह भी खूब कही! घर बैठ जाना तो एक मुहावरा है. जिसके पास रहने को घर ही न हो वह घर कैसे बैठ सकता है भला? कह सकते हैं कि धीरेन फुटपाथ पर बैठ गया. कुछ दिन बाद फिर उसने हिम्मत जुटाई और मराठा मन्दिर सिनेमा के पास फुटपाथ पर रिक्शों की मरम्मत करनेवाली एक गैरेज में लग गया.
यहाँ दिक्कत यह थी कि गैरेज का मालिक महीने भर काम करके १५ दिनों की मजदूरी अपने पास रखता था ताकि कोई भागने न पाये. काम पर रखने से पहले कई लोग उससे पूछ चुके थे कि कोई पहचान वाला हो तो गारंटी के लिए ले आये. अब पश्चिम बंगाल के आसनसोल से आया धीरेन यहाँ कोई पहचान वाला कहाँ से ले आता? तब वह जुहू स्कीम के पास स्थित कूपर अस्पताल के पास की जीजामाता नगर झोपड़पट्टी में रहा करता था. वहाँ से कौन उसकी गारंटी लेने आता? मुम्बई सेन्ट्रल तक का किराया-भाड़ा कहाँ से आता? यहाँ तो खाने के लाले पड़े थे. मजदूरी को लेकर मालिक के साथ हुई खटपट के चलते आखिरकार कुछ दिनों बाद उसे यहाँ से भी चलता कर दिया गया.
धीरेन बताता है, साल १९८८ में एक दिन वह अंधेरी लोखंडवाला की एक गैरेज में पहुंचा. मालिक एक सरदार जी थे. तब यह इलाका इतना विकसित नहीं था. ढाबे थे, खाड़ी थी, बदहाल सड़कें थीं. गैरेजों में काम करनेवाले ज्यादातर पंजाबी थे. धीरेन बांग्ला के सहारे हिन्दी बोलता था. सरदार जी उसकी बात समझ ही नहीं पाये. चाय पिलाई और हाथ जोड़ लिये।

जीजामाता नगर में धीरेन एक देह व्यापार करने वाली युवती के साथ रहा करता था. युवती क्या थी हड्डियों का ढांचा थी. तरह-तरह की बीमारियों ने उसे घेर रखा था. यों ही एक दिन वह धीरेन को जुहू चौपाटी पर मिल गयी थी.
वह ग्राहक की तलाश में थी और धीरेन काम की तलाश में। दोनों में संयोगवश बातचीत हुई और उस यौनकर्मी ने धीरेन पर तरस खाकर उसे अपने पास रख लिया. धीरेन बताता है कि उस बदबूदार झोपड़ी में उसका दम घुटता था. उस पर वह लड़की दिन भर गुटखा खाकर थूकती रहती थी और ऑर्डर देती रहती थी. दोनों में एक चीज फेवीकोल का काम करती थी, वह था दोनों का बांग्ला में बात करना.

अचानक एक दिन झोपड़ी का मालिक परिवार के साथ आ गया और तत्काल झोपड़ी खाली करा ली. दरअसल उसका कांदिवली (पूर्व) वाला झोपड़ा मुंशीपाल्टी (म्यूनिसिपल्टी) ने उजाड़ दिया था. नतीजतन वह यहाँ आ धमका. धीरेन उस यौनकर्मी के साथ झोपड़पट्टी के बगल में ही स्थित कूपर अस्पताल के पीछे बने मुर्दाघर के पास रहने लगा. लेकिन बारिश आते ही दोनों बिछड़ गए. कोई यहाँ गिरा, कोई वहाँ गिरा. उसके बाद दोनों आज तक नहीं मिले.
धीरेन ने १९८८ की गर्मियों में आसनसोल से हावड़ा की ट्रेन पकड़ी थी. उसके परिवार में दो बड़े भाई रामाजी लाहिड़ी तथा दादेनजी होनहार विरवान थे. पिता की लाख कोशिशों के बावजूद धीरेन नवमी कक्षा से आगे नहीं बढ़ सका. जबकि दोनों भाई पढ़ाई में अव्वल थे. पिताजी ने माथा ठोक कर उसे वहीं के एक गैरेज कम स्पेयर पार्ट्स की दूकान में हेल्परी पर रखवा दिया.
पिता की बड़ी इच्छा थी कि उनके तीनों बेटे इन्जीनियर बनकर उनका नाम रोशन करें, लेकिन सबसे बड़े भाई दादेनजी ने प्रेम-विवाह कर लिया और रामाजी शादी के बाद परिवार से अलग होकर कोलकाता रहने चला गया. पिता के लिए यह दोहरा आघात था. घर में गरीबी अपने पैर पसार रही थी. धीरेन इसके निशाँ मां की आंखों और पिता की साँसों में पहचानने लगा था।

एक दिन उसने पिता को फूट-फूट कर रोते हुए देखा. तभी उसने तय कर लिया कि वह दादेनजी तथा रामाजी की कमी पूरी करेगा और पिता के आंसू पोंछेगा. आसनसोल में यह सम्भव नहीं था. वह हावड़ा जा पहुंचा. काम की तलाश की तो पाया कि यहाँ तो आसनसोल से भी ज़्यादा बेरोज़गारी है. उसे यहाँ काम तो नहीं मिला, अलबत्ता रेल्वे स्टेशन पर मुम्बई जाने वाला एक आदमी जरूर मिल गया.
इस आदमी ने काम दिलाने का भरोसा देकर धीरेन का जनरल टिकट कटाया और अपने साथ रिजर्वेशन वाले डिब्बे में बिठा लिया. रास्ता इतना लंबा था कि धीरेन इस अनजान आदमी से डर गया और जब वह आदमी गहरी नींद में था तो धीरेन एक स्टेशन पर चुपके से उतर गया. यह स्टेशन नागपुर से पहले का भंडारा स्टेशन था. बाहर निकला तो घुप अँधेरा! वह उल्टे पाँव भागा और प्लेटफोर्म लगभग छोड़ चुकी ट्रेन के एक डिब्बे में किसी तरह जा लटका. फिर उसने वह ट्रेन नहीं छोड़ी. पकड़े जाने का डर इतना था कि अब उस आदमी को कहाँ ढूँढता?
आखिरकार कल्याण स्टेशन आ गया. यहाँ उसका स्वागत एक टीसी ने किया. टिकट छीन कर उसे बेटिकट बताया गया और गरदनियाँ देकर पुलिसवालों ने जामातलाशी ली. जब माल नहीं मिला तो रेल्वे पुलिसवाले उसे तीन-चार थप्पड़ जड़कर रेल्वे स्टेशन के बाहर तक छोड़ने आये. मुम्बई में यह उसका पहला सबक था.
फुटपाथ पर लोग उसे अपने पास सोने तक नहीं देते थे. धीरे-धीरे जब उन्हें यकीन हो गया कि धीरेन भी उनकी ही बिरादरी में शामिल हो चुका है तब कहीं जाकर उसे सोने की अनुमति मिली. जो कपड़े पहनकर घर से चला था, वे धीरे-धीरे मुंह बाने लगे. उन्हीं दिनों उसे एक फुटपाथिये की सिफारिश पर भान्डुप की एक गैरेज में हेल्परी मिल गयी थी।

सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था कि उन्हीं दिनों मैकेनिकों ने वेतन बढ़ाने को लेकर हड़ताल कर दी. धीरेन ने उनका जमकर साथ दिया. वे यूनियन के लोग थे. हड़ताल ख़त्म हुई तो बाकी मैकेनिक बढ़ी हुई तनख्वाहों के साथ काम पर लौट आए लेकिन नाराज़ प्रबन्धन ने धीरेन को बाहर का रास्ता दिखा दिया और उसे ताज्जुब हुआ कि किसी ने उसके लिए आवाज़ नहीं उठायी.
यहीं से चप्पलें चटकाता हुआ वह वडाला की एक गैरेज के सामने पहुंचा था जहाँ ऑटोरिक्शा, कारों, ट्रकों की मरम्मत का काम हाथ लग गया था. यहीं से मैंने उसे बातचीत के लिए पकड़ा था.
पिछले दिनों मैंने उसे नरीमन पॉइंट पर मूंगफली चबाते देखा. बता रहा था कि फिर से सड़क पर है. वह कह रहा था कि जल्द ही घर जायेगा और पिताजी को चौंका देगा. फिर सोच में डूबकर कहता है कि यह बात तो उसने बीते १० सालों में कई बार सोची है, लेकिन जाने की हिम्मत कब जुटा पाया? उसे कोफ्त है कि इतने सालों तक तेलिया लिबास धारण किए रहने के बावजूद पिता के आंसू पोंछने लायक नहीं बन सका. सौ-सौ रुपयों में वह अब भी रोज़ सबकी आज्ञायें ढोता फिरता है.
धीरेन मुझसे कहता है- 'किया मालूम, बाबा आभी जिंदा है की मार गिया, नेही बोलने सकता!'
... और उसकी आंखों के आंसू मुझसे छिप नहीं पाते.

3 टिप्‍पणियां:

  1. कहानी पढ़ी।आपने छापने के पहले नहीं पढ़ी।एक अनुच्छेद तीन बार आया।

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  2. धन्यवाद अफलातून जी! नेट की समस्या खड़ी हो गयी थी इसलिए चेक नहीं कर सका. क्षमा कीजियेगा. अब ठीक दिख रहा है.

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  3. पता नहीं कहाँ कहाँ घूम कर आप तक पहूँचा, अभी तेलिया लिबास...२ ही पढ़ी और दिल को छू गई। कई बार इस तरह लगा मानों मेरी आँखों के सामने यह हारा दृश्य चल रहा हो।
    अंतिम पंक्तियाँ.. क्या कहूं शब्द ही नही बचे।
    बहुत सुन्दर लेखनी है आपकी, कल फुर्सत में सारे लेख पढ़ूंगा।
    ॥दस्तक॥
    गीतों की महफिल

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