बुधवार, 19 दिसंबर 2007

इस बार गाँव में मैंने सुनी महिला रामायण


'निराला की साहित्य साधना' में डॉक्टर रामविलास शर्मा ने लिखा है कि किशोरवय सूर्जकुमार तेवारी को उनसे भी उम्र में ३ साल छोटी उनकी पत्नी मनोहरा देवी के गले में साक्षात् सरस्वती नज़र आयी थीं। प्रसंग तब का है जब निरालाजी अपनी ससुराल डलमऊ मनोहरा देवी को लिवाने पहुंचे थे। सरस्वती नज़र आने की वजह थे बाबा तुलसीदास। मनोहरा देवी के मधुर कंठ से उन्होंने यह सुना-


'श्रीरामचन्द्र कृपालु भज मन हरण भय-भव दारुणम्.
नवकंज लोचन कंज कर पद कंज मुख कन्जारुणम.
कंदर्प अगणित अमित छवि नव नील नीरज सुन्दरम।
पट-पीत मानहुं तडित रूचि-सुचि नौमि जनकसुता वरम।'


तुलसी बाबा की ध्वन्यात्मक शब्द योजना ने निराला के किशोर मन पर कैसा असर डाला होगा, यह सहज ही समझा जा सकता है। यों ही नहीं है कि आधुनिक कविता में निराला से बड़ा ध्वन्यात्मक शब्दों का समर्थ उपयोग करनेवाला कवि दूसरा नहीं है। याद कीजिये-


'बांधो न नाव इस ठाँव बंधु, पूछेगा सारा गाँव बंधु'

ठाँव तथा गाँव का कोई और सानी है भला?


यह सब मुझे निराला की वजह से नहीं बल्कि तुलसीदास की वजह से याद आ गया. हुआ यों कि पिछले दिनों मैं मध्य प्रदेश स्थित अपने गाँव गया था. इच्छा जागी कि क्यों न रामायण करवाई जाए. हमारे यहाँ 'रामचरितमानस' के ढोल-ढमाका पूर्ण गायन को रामायण करवाना कहते हैं. ज्यादा खर्चा-पानी नहीं लगता. धार्मिक से अधिक यह भावना-प्रधान आयोजन होता है. संगीत की प्रमुखता होती है इसमें. भगवान के लिए दो-तीन नारियल और भक्तों के लिए पान-सुपाड़ी बस. पाठ भी ऐसा होता है कि कोई प्रसंग उठा लिया और जब तक पेट न भरे तब तक खूब झूम-झूम कर गाते रहो। आठ-दस आदमी इस तरफ़ और इतने ही दूसरी तरफ़.


आमने-सामने रामचरितमानस रखी जाती हैं रहलों पर। तुलसीबाबा ने श्रीगणेश करने के लिए मंगलाचरण पहले ही लिख रखा है. एक पक्ष शुरू करता है-

रामा, जेहि सुमिरत सिध होय, गन नायक करिवर बदन,

करहुं अनुग्रह सोय, बुद्धिरासि सुभ गुन सदन'।
'रामा, मूक होंय बाचाल, पंगु चढें गिरिबर गहन,

जासु कृपा सों दयाल, द्रवहूँ सकल कलिमल दहन।'


मंगलाचरण कई दोहों और सोरठों के बाद संपन्न होता है। अब तक कुछ लोगों को तमाखू की तलब लग आती है तो कुछ को बीड़ी पीनी होती है। पाँच मिनट का ब्रेक और उसके बाद हाथ-पाँव प्रच्छालित कर एक बार फिर सब आ जमते हैं दरी या जाजम पर.


अब तय होता है कि कौन-सा प्रसंग ठीक रहेगा उस दिन का माहौल देखते हुए। 'पुष्पवाटिका में रामजी' हमारे टोले का प्रिय प्रसंग है। इसके लिए पोथी देखने की भी जरूरत नही समझी जाती. ज्यादातर लोगों को मुखाग्र है यह प्रसंग. हाँ, नए लड़के ज़रूर चोरी-छिपे तुलसीबाबा की मदद ले लेते हैं. वरना पूरा दोहा पटरी से उतरने का भय रहता है. इसके साथ-साथ लोगों के बीच शर्मिन्दा होने की भी तो नौबत आ जाती है.


बहरहाल, पुष्पवाटिका प्रसंग शुरू होता है। एक पक्ष का प्रमुख गायक इस प्रसंग का पहला दोहा शुरू करता है-


'उठे लखन निस बिगत सुनि, अरुण सिखा धुन कान।

गुरु तें पहले जगतपति, जागे रामसुजान'

सियावर रामचंद्र की जय!


चलिए श्रीगणेश तो विधिवत हो गया। अब बारी है संपुट लगाने के लिए किसी गाने की, गीत की या फिर किसी भी ऐसी चीज की कि मज़ा आ जाए आज की रामायण का. ढोलक वाले ने यों ही नहीं ललकारा था- 'बोलो आज के आनंद की जय!'


तभी कोई छेड़ता है तान- 'कन्हैया अपनी बंसी को बजा दो, फिर चले जाना',

इसीके के साथ दोनों पक्ष इस पंक्ति को संभालते-संभालते यहाँ तक ले आते हैं कि 'बजा दो फिर चले जाना' ही बचता है। और शुरू हो जाता है आज का आनंद-


'रामा, तात जनकतनया यह सोई ,बजा दो फिर चले जाना

रामा, धनुषजज्ञ जेहि कारण होई ,बजा दो फिर चले जाना।"


लेकिन इस बार रंग में भंग पड़ने के सौ प्रतिशत अवसर पैदा हो गए॥ ढोलक वाले ने कहलवा भेजा कि अगर मैं उसे रामायण के बाद गांजा पीने के पैसे दूँ तो ही वह आयेगा वरना जय राम जी की। अब बगैर ढोलक के रामायण कैसे हो! बुलौवा भी गाँव में लग चुका था. लोग जुटना शुरू हो गए थे. पेटी मास्टर, करताल वाला और झांझ-मजीरे वाले पहुँच गए थे. पान-सुपारी का एक दौर भी हो चुका था.

किसी ने सुझाया कि आजकल गाँव की महिलाओं ने भी एक मानस-मंडली बना रखी है। यह मेरे लिए चौंका देनेवाली बात थी. अपने ३७ साल के जीवन में मैंने अपने ही गाँव में इस तरह की कोई बात कभी नहीं सुनी थी. बातों-बातों में पता चला कि इस महिला मंडली में सभी नयी बहुएँ हैं. वह भी गाँव में मौजूद सभी जातियों की. पेटी-ढोलक ऐसा बजाती हैं कि वह गंजेड़ी इनके सामने पानी भरेगा.


आनन-फानन में तय हुआ कि आज महिला मानस-मंडली की रामायण ही हो जाए। लोग दौड़े और आधे घंटे में पन्ना वाली, सुंदरा वाली, दमोह वाली, छतरपुर वाली बहुएँ आन पहुँचीं। इनमें से ज्यादातर बुन्देलखंड की थीं। फिर कुछ और जमा हो गयीं। रामायण शुरू हुई। विधिवत मंगलाचरण हुआ और प्रसंग चुना गया 'सीता का गौरी से वर माँगना।'


महिलाओं का समवेत स्वर गूंजा-


जय-जय-जय गिरिराज किशोरी, जय महेश मुख चंद चकोरी।


जय गजबदन षडानन माता, सत्य शपथ दामिनि दुखदाता.'

सनाका छा गया। सब मंत्रमुग्ध-से बैठे थे. मेरी तो दशा ही मत पूछिए. बुन्देलखंड की नारियों के गले में भी सरस्वती मैया ही विराजती हैं. बुन्देली लोकगीतों में जैसी मिठास, लचक और लोच है, वैसी और कहीं ढूँढे नहीं मिलेगी। फिर इन नारियों का गायन और यह प्रसंग. रोएँ खड़े हो गए. मैं अंदाजा ही लगा सकता हूँ कि मनोहरा देवी के कंठ से तुलसी बाबा का वह संस्कृत-पद सुनकर निरालाजी पर कैसा असर पड़ा होगा.


गाँव की महिलाओं के इस नए रूप को देखकर मैं अभिभूत तो था ही, उनके प्रति कृतज्ञ भी कम नहीं लौटा.

4 टिप्‍पणियां:

  1. विजयशंकर जी, सचमुच अद्भुत वर्णन है। रामायण बैठाने का रत्ती-रत्ती ब्यौरा पढ़कर अपने गांव के ऐसे वाकयों की याद आ गई। ऊपर से महिला मंडली। फिर सारे प्रसंग को निराला से जोड़ना। पढ़कर मन खुश हो गया।

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  2. बहुत अच्छा वर्णन लगा । आपकी शैली की वजह से लगा कि हम साक्षात रसास्वादन कर रहें हैं।

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  3. बेहद भावपूर्ण आलेख पढ़कर प्रसन्नता हुई - आप इसी तरह लिखते रहें --

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  4. बहुत अच्छा वर्णन आप इसी तरह लिखते रहें

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