सोमवार, 17 दिसंबर 2007

ज्योतिष और भारत-अरब विद्वान


दोस्तो, कल नेट ने हमारे यहाँ दिन भर ऐसा सताया कि यह लेख अधूरा ही जा सका। आज इसे पुनः टाइप करके पूरा दे रहा हूँ फोटो के साथ. फोटो में बाएँ आचार्य द्विवेदी, दायें महापंडित राहुल सांकृत्यायन.


गणित और फलित ज्योतिष के क्षेत्र में हिन्दू-मुस्लिम सम्पर्क कैसा गंभीर रहा है, यह बात शायद बहुत कम लोग ही जानते हैं। कुछ लोग इतना तो जानते हैं कि हिन्दू ज्योतिष के कई ग्रंथों का अरबी में अनुवाद हुआ था, पर अरबी ज्योतिष के अनेक पारिभाषिक शब्द और विचार-पद्धतियां भी संस्कृत ग्रंथों में गृहीत हुई हैं, यह बात लोग एकदम नहीं जानते। इस विषय की चर्चा प्रायः नहीं के बराबर ही हुई है। होना वांछनीय है।
सन् ७७१ ईस्वी में भारतीयों का एक जत्था बगदाद गया था। उसी के एक विद्वान सदस्य ने अरबों को 'ब्रम्हस्फुट सिद्धांत' से परिचित कराया। यह ग्रंथ ब्रम्हगुप्त नामक प्रसिद्ध भारतीय ज्योतिषी का लिखा हुआ है। अरब लोग इसे 'अस-सिन्द-हिंद' कहते हैं। इब्राहीम इब्न हबीब अल फजारी ने इसी ग्रंथ के आधार पर मुस्लिम चन्द्रवर्ष के लिए अपनी सारणी बनायी थी।
'ब्रम्हस्फुट सिद्धांत' तथा एक अन्य भारतीय ज्योतिषी की गणना के आधार पर याकूब इब्न तारिक ने अपना 'तरकीब-अल-अफ्लाक' (गोलाध्याय) लिखा। यह दूसरा ज्योतिषी सन् १६१ हिजरी में अरब की ओर गया था। इसका नाम अरबों ने क्-न्-म्-ह् लिखा है।
ब्रम्हगुप्त का एक अन्य ग्रन्थ 'खंडकखाद्य' भी 'अल्-अरकंड' नाम से अरबी में अनूदित हुआ था. अल् फजारी और याकूब इब्न तारिक के समसामयिक अबुल हसन अल् अहवाज़ी ने अरबों को भारतीय ग्रहगणित अल्-अर्ज्मंद (आर्यभट्ट का ग्रहगणित) का परिचय कराया. सन् ईसवी की ग्यारहवीं शताब्दी के अंत तक हिन्दू ग्रंथों के अनुकरण पर मुसलमान ग्रन्थ लिखते रहे. कुछ अरब ज्योतिषी (हब्श-अननैरीजी, इब्न अस्-सबाह आदि) भारतीय प्रणाली और अरब तथा ग्रीस की सामग्रियों का उपयोग करके नए ग्रन्थ लिखते रहे.
एक अन्य श्रेणी के ज्योतिषियों ने भारतीय युगमान के आदर्श पर लंबे-लंबे युग वर्षों की कल्पना पर ग्रन्थ लिखे. इनमें मोहम्मद-इब्न-इसहाक-अस् सरासी, अबुल वफ़ा, अल् बेरूनी तथा अल् हजीनी का नाम उल्लेखनीय है (एनसाइक्लोपीडिया ऑफ़ रिलीजन एंड एथिक्स, ११२वीन् जिल्द, प्रष्ठ ९५).
अरबों ने भारतीय ज्योतिष और गणित शास्त्र को स्वयं ही ग्रहण नहीं किया, सारे यूरोप में उसे फैला भी दिया. भारतीय ज्योतिषियों के साथ उनका दशगुणोत्तर अंकक्रम भी बगदाद पहुंचा था. नौवीं शताब्दी के प्रारम्भिक समय में अबू ज़फर मुहम्मद अल् खारिज्मी ने उक्त दशगुणोत्तर क्रम का विवेचन किया और तब से यह क्रम अरब में प्रतिष्ठा पाता ही गया.
यह पूरा अंक क्रम ईसवी सन् की बारहवीं शताब्दी में अरबों ने यूरोप को सिखाया. इस क्रम से बना हुआ सारा अंकगणित अल्गोरित्मस (अलैगोरिथ्म) नाम से प्रसिद्ध हुआ जो वस्तुतः अरबी गणितज्ञ 'अल् खारिज्मी' के नाम का ही यूरोपीय रूपांतर है.
अनुमान किया गया है की परवर्ती काल में दशगुणोत्तर अंकक्रम में गुणन-क्रिया को सरल बनाने के लिए जो 'लोगोरिथ्म' पद्धति प्रचलित हुई, वह इसी शब्द से सम्बद्ध है। कुछ लोग ग्रीक 'लोगस' शब्द से इसकी व्युत्पत्ति बताते हैं. परन्तु पूर्ववर्ती अनुमान यदि थीक है तो एक अत्यन्त मनोरंजक सम्बन्ध का स्मरण हो जाता है. लोगोरिथ्म को संस्कृत के आधुनिक गणित ग्रंथों में 'लघुरित्त्थ' नाम दिया गया है. यह नाम स्वर्गीय महामहोपाध्याय पंडित सुधाकर द्विवेदी का दिया हुआ है. जिस अरबी पंडित ने भारतीय अंकविद्या का प्रचार यूरोप में किया था उसका नाम नानाभाव से बदलता हुआ भारतीय अंकगणित की एक शाखा का नाम हो गया. अरबी में हिन्दुओं से गृहीत इस अंकक्रम को 'हिन्दसे' कहते हैं.


-आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी

5 टिप्‍पणियां:

  1. कवि रहीम ने भी भी एक ज्योतिष ग्रंथ लिखा था....वह भी कविता के रूप में...
    आते ही प तो मरीज-ए-ब्लॉग हो गए...
    अच्छा है..

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  2. Chaturvediji,

    You are doing a great job. Your column on 'Marginalsed Population of the Society' is very inspiring and would help many to change their views who thought in different manner. I was overwhelmed to see the rarerest pic of Acharya Hazariprasad Diwediji and Mahapandit Rahul Sankratyan. How you manage all this quality work, is really commendable. 'Keep Blogging' is the new mantra for your blog.

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  3. बहुत बढिया जानकारी
    दीपक भारतदीप

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  4. लोकोक्ति में लोकोक्ति की विशेषता यह है कि उसमें अगर शब्दों का हेरफेर तनिक भी कर किया जाये तो वह स्वीकार्य नहीं है लेकिन लोकोक्ति का उपयोग करने वाला जब लोकोक्ति का उपयोग करता है तो उसकी मानसिक शारीरिक और वातावरण की अवस्था क्या होती है वही नहीं रह जाती जब वह कालांतर में उस लोकोक्ति का उपयोग करता है abhishek tripathi from and for vijayshankar chaturvedi

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  5. बहुत उम्‍दा जानकारी....

    क्‍या यह पूरी जानकारी एनसाइक्लोपीडिया ऑफ़ रिलीजन एंड एथिक्स
    से उठाई गई है। अगर हां तो यह पुस्‍तक कहां मिल सकती है। अगर नहीं तो आपने सचमुच बहुत मेहनत की है। ज्‍योतिष के बारे में ऐसी ही और जानकारी हो तो कभी पोस्‍ट कीजिएगा।
    मुझे इंतजार रहेगा।

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