दोस्तों, अपने कविता संग्रह से बाहर की एक कविता चढ़ा रहा हूँ-
नफ़रत से नफ़रत
नफ़रत किधर से आती है
नफ़रत किधर को जाती है
क्या यह किसी से किसी को प्यार करना भी सिखाती है?
प्यार के लिए कितने लोगों ने जान गवांई होगी बूझो तो?
लेकिन नफ़रत से हुई मौतों के आंकड़े कोई पहेली नहीं हैं
दुनिया लहूलुहान है नफ़रत के पंजों से.
नफ़रत बिल्लियों की तरह कहीं भी आ-जा सकती है बेरोकटोक
तुम उस पर पहली नजर में शक नहीं कर सकते
रीढ़ की हड्डी में नागिन की तरह कुण्डली मारे बैठी रह सकती है बरसों बरस
वह कलम की स्याही बनकर झर सकती है मीठे-मीठे शब्दों की आड़ में
नफ़रत को झटक दो कि वह तुमको तुमसे ही बेदखल कर रही है
नफ़रत हर ख़ास-ओ-आम में मिल जाएगी
किसी पैमाने से उसे मापा नहीं जा सकता
खिड़की बंद करके उसे रोका नहीं जा सकता
नफ़रत हवाओं में उड़ती है विमानों के साथ-साथ
पानियों में घुलकर एक से दूसरे देश निकल जाती है
हर दरवाजे पर दस्तक देती फिरती है नफ़रत
कई बार वह आती है किताबों के पन्नों में दबी हुई
लच्छेदार बातों की शक्ल में तैरती हुई पहुँचती है तुम तक
गिरफ्त में ले लेती है विश्वामित्र की मेनका बनकर
नफ़रत एक नशा है जो आत्मा को फाड़ देती है दूध की तरह
नफ़रत कब तलब बन जाती है यह पता भी नहीं चलता
हम रोज सुबह पछताते हैं कि अब से नहीं करेंगे नफ़रत
लेकिन नफ़रत के माहौल में करते हैं सुबह से शाम तक नफ़रत
हम भुलाते जाते हैं सब कुछ नफ़रत की पिनक में
फिर वह ऐसा सब कुछ भुला देती है जो जरूरी है इंसान के हक़ में
वैसे सही जगह की जाए तो नफ़रत भी बुरी चीज़ नहीं
पर यह क्या कि दुनिया की हर चीज़ से नफ़रत की जाए!
नफ़रत करो तो ऐसी कि जैसे नेवला साँप से करता है
शिकार शिकारी से करता है
बकिया मिसालों के लिए अपने आस पास ख़ुद ढूँढ़ो
कि कौन किससे किस कदर और क्यों करता है नफ़रत
वैसे भी प्यार का रास्ता आम रास्ता नहीं है
इसलिए नफ़रत से जमकर नफ़रत करो
कि नफ़रत हमारे और तुम्हारे बीच नफ़रत बनकर खड़ी है.
-विजयशंकर चतुर्वेदी
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गुरुवार, 5 अप्रैल 2012
सोमवार, 28 अप्रैल 2008
जाति एक साजिश है और अछूत
This is what i wanted to say today.. 'मोहल्ला' और 'रिजेक्ट माल' हिन्दी ब्लोगों पर काफी दिनों तक जाति और दलित समस्या पर बहस चली. लोगों ने पक्ष और प्रतिपक्ष में अपने तर्क पेश किए. दिलीप मंडल अब भी इस पर तर्क तथा आंकड़े दे-देकर फिजाँ में सनसनी घोले हुए हैं.
जाति एवं अछूत विषय (subject) पर मुझे कुछ कवितायें हाथ लगी हैं. एक लघुपत्रिका 'वक्त बदलेगा' डब्ल्यू जी ४२ बी, इस्लामगंज, जालंधर से निकला करती थी. इसके संस्थापक अनिरुद्ध थे. वर्ष १९९२ में उनका १८ साल १० माह की अवस्था में निधन हो गया था. शहीद भगत सिंह की तरह ही वह भी इस महादेश की पददलित-दमित-शोषित जनता के हालात बदलने का सपना देखने वाले नवयुवक थे. क्रांतिकारी पंजाबी कवि अवतार सिंह 'पाश' की धरती से उनका ताल्लुक था. उनके निधन के बाद सम्पादन का दायित्व तरसेम गुजराल पर आ गया था. 'वक्त बदलेगा' के एक अंक में रामेन्द्र जाखू 'साहिल' की कुछ कवितायें छपी थीं. दो कवितायें प्रस्तुत कर रहा हूँ;-
जाति एक साजिश है JAATI EK SAJISH HAI
जाति.... एक दुर्घटना है
जिसमें शरीर से पहले जख्मी होती है सोच
फिर विवेक.
जाति एक दुर्घटना है
जिसमें शरीर चला जाता है लाइलाज मुद्रा में
फिर कोई मसीहा दवा कम,
देता है कर्मों की दुवायें ज्यादा.
जाति एक हादसा है
जिसमें आदमी से पहले मर जाती है आदमीयत
और बाकी रहता है एक अहसास,
जो गाली की तरह पीछा करता है
बाद मरने के भी दलित का.
जाति एक साजिश है
जो रचते हैं शास्त्र ताकि दलित दलित रहें
न मांग सकें कभी भी-
अपना अधिकार,
अपनी पहचान
अपनी सोच.
अछूत ACHHOOT
वे अछूत हैं
न उन्हें हवा हिला सकती है
न आग जला सकती है
न जल बहा सकता है.
वे सब जगह मौजूद रहते हैं
घर में,
मोहल्ले में,
गाँव में,
शहर में,
देश में,
यहाँ तक कि सोच में भी.
हम उन्हें छू नहीं सकते
छूते हैं तो जल जाते हैं
हाथ उठाते हैं तो हाथ कट जाते हैं.
सब जानते हैं
वे कौन हैं
पर सब चुप हैं
न जाने क्यों?
जाति एवं अछूत विषय (subject) पर मुझे कुछ कवितायें हाथ लगी हैं. एक लघुपत्रिका 'वक्त बदलेगा' डब्ल्यू जी ४२ बी, इस्लामगंज, जालंधर से निकला करती थी. इसके संस्थापक अनिरुद्ध थे. वर्ष १९९२ में उनका १८ साल १० माह की अवस्था में निधन हो गया था. शहीद भगत सिंह की तरह ही वह भी इस महादेश की पददलित-दमित-शोषित जनता के हालात बदलने का सपना देखने वाले नवयुवक थे. क्रांतिकारी पंजाबी कवि अवतार सिंह 'पाश' की धरती से उनका ताल्लुक था. उनके निधन के बाद सम्पादन का दायित्व तरसेम गुजराल पर आ गया था. 'वक्त बदलेगा' के एक अंक में रामेन्द्र जाखू 'साहिल' की कुछ कवितायें छपी थीं. दो कवितायें प्रस्तुत कर रहा हूँ;-
जाति एक साजिश है JAATI EK SAJISH HAI
जाति.... एक दुर्घटना है
जिसमें शरीर से पहले जख्मी होती है सोच
फिर विवेक.
जाति एक दुर्घटना है
जिसमें शरीर चला जाता है लाइलाज मुद्रा में
फिर कोई मसीहा दवा कम,
देता है कर्मों की दुवायें ज्यादा.
जाति एक हादसा है
जिसमें आदमी से पहले मर जाती है आदमीयत
और बाकी रहता है एक अहसास,
जो गाली की तरह पीछा करता है
बाद मरने के भी दलित का.
जाति एक साजिश है
जो रचते हैं शास्त्र ताकि दलित दलित रहें
न मांग सकें कभी भी-
अपना अधिकार,
अपनी पहचान
अपनी सोच.
अछूत ACHHOOT
वे अछूत हैं
न उन्हें हवा हिला सकती है
न आग जला सकती है
न जल बहा सकता है.
वे सब जगह मौजूद रहते हैं
घर में,
मोहल्ले में,
गाँव में,
शहर में,
देश में,
यहाँ तक कि सोच में भी.
हम उन्हें छू नहीं सकते
छूते हैं तो जल जाते हैं
हाथ उठाते हैं तो हाथ कट जाते हैं.
सब जानते हैं
वे कौन हैं
पर सब चुप हैं
न जाने क्यों?
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