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शुक्रवार, 16 मई 2008

यह ब्लॉग भाड़े पर देना है (जहाँ है, जैसा है के आधार पर)

'तमिल टाइम्स' में दो दिन पहले एक विज्ञापन छपा था। नहीं-नहीं मुझे तमिल पढ़ना नहीं आता, वह तो बगल में बैठे मेरे मित्र और तमिल के युवा कवि मदिअलगन सुब्बैयाह यह अखबार पढ़ते-पढ़ते अचानक जोर-जोर से हंसने लगे। मैंने पूछा कि अभी तक तो सकुशल थे अचानक यह क्या हो गया? क्या आलोक पुराणिक जी की कोई अगड़म-बगड़म पढ़ ली? वह बोले- 'यह बात नहीं है, एक विज्ञापन छपा है।'

उन्होंने विज्ञापन पढ़ कर सुनाया- 'ओरली पगुदियिल दिनमुम २५० किलोग्राम मावू विरापनैयागुम लेन विरापनैक्कू उल्ल्दु! नोडरबु कोलग: ०९८०.......'

मेरा पूरा शरीर सवाल बन गया, पूछा- 'अर्थात्?????????"

मदि ने बताया कि मुम्बई के वरली इलाके में कोई गली है जिसमें २५० किलोग्राम आटा की इडली रोजाना खप जाती है यानी एक दिन में बिकती है। यह आदमी गाँव जा रहा है और यह लेन यानी गली भाड़े पर देने के लिए इसने यह विज्ञापन दिया है.

हम दोनों यह सोचकर हैरान रह गए कि महानगर में कैसे-कैसे 'व्यौपार' चलते हैं।

इस प्रसंग से मुझे याद आया मुम्बई के ही मालाड इलाके का एक किस्सा। तब मैं मुम्बई नया-नया आया था. गर्मियों के दिन थे. एक सुबह हमारा अखबारवाला सूचित करने लगा कि वह तीन महीने के लिए गाँव जा रहा है इसलिए अब अखबार दूसरा आदमी देगा. कोई शिकायत हो तो उसी से कीजियेगा. हमने इसका कारण पूछा तो उसने बताया कि तीन माह के लिए उसने अपना धंधा उस आदमी को भाड़े पर दे दिया है.

पहली बार ज्ञान हुआ कि मुम्बई में लोग दूकान और मकान ही नहीं; धंधे भी किराए पर उठा कर चले जाते हैं... और वापस आने पर फिर से उसी धंधे में जुट जाते हैं।

गुरु, इन प्रसंगों से एक आइडिया आया है। हिन्दी ब्लॉग जगत में काफी गड़बड़ी कर चुका हूँ। क्यों न कुछ दिनों के लिए दण्डक अरण्य चला जाऊं और किसी ऋषि से गुफा भाड़े पर लेकर माह भर तपस्या करूँ? तब तक लोगों का गुस्सा भी ठंडा हो जायेगा.

तो ठीक है. मैं अपना ब्लॉग जहाँ है, जैसा है के आधार पर महीने भर के लिए भाड़े पर देना चाहता हूँ- 'नॉन येनदु 'ब्लॉग' उल्लदु उल्लपडीये माठ्ररंगल येदुमिललादु ओरु मादनिरकु वाडहैकु विड विरुम्बुगिरेन! नोडरबु कोलग: ०९८०.......मोबाइल नंबर।'

इच्छुक व्यक्ति शीघ्र सम्पर्क करें!

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