शुक्रवार, 4 अक्टूबर 2019

जरा-सी भी बाढ़ क्यों बर्दाश्त नहीं कर पाते हमारे शहर?


मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, हैदराबाद, अहमदाबाद, सूरत, दिल्ली... कोई महानगर नहीं बचा है, जिसने पिछले एक दशक के दौरान जलप्रलय न भोगा हो! हाल की कुछ तबाहियों को याद करें तो साल 2000 में हैदराबाद के हुसैन सागर के पास बनी कई झोपड़पट्टियां बाढ़ में बह गई थीं. पेड़ उखड़ कर बीच सड़क पर पड़े थे और शहर की रफ्तार ठप पड़ गई थी. सूरत में 2006 की बाढ़ ने 200 से ज्यादा लोगों और सैकड़ों पशुओं की जान ले ली थी. राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान 2010 में दिल्ली तिब्बती बाजार से लेकर खेल गांव तक पानी-पानी हो गई थी. लेकिन 26 जुलाई 2005 को मुंबई में आई बाढ़ सबसे विकराल थी. इसमें यह विराट महानगर लगभग आधा डूब गया था, सभी बुनियादी सेवाएं गायब थीं और जान-माल के नुकसान की तो कोई इंतहा नहीं थी. अधिक वर्षा, समुद्री किनारा और बाबा आदम के जमाने का ड्रेनेज सिस्टम मुंबई और चेन्नई का लगभग हर दूसरे साल गला घोंट देता है. इन दिनों बिहार की राजधानी पटना में जलप्रलय का मंजर है.


कोई ऐसा मानसून नहीं गुजरता जो देश के किसी न किसी नगर अथवा महानगर में तबाही न मचाता हो. हर कोई जानता है कि अगले मानसून में क्या होने जा रहा है. लेकिन जैसे ही जिंदगी पटरी पर लौटती है, शहर के लोग और स्थानीय प्रशासन उस तबाही को ऐसे भूल जाते हैं, जैसे कि वह प्राचीन ग्रंथों में वर्णित कोई किस्सा हो! हर बार ड्रेनेज, नालियों की साफ-सफाई और बाढ़ से निबटने के लिए आपदा-प्रबंधन का पहले से ज्यादा बजट बनता है और स्वाहा हो जाता है. हर बार मानसून से ठीक पहले नालियों और ड्रेनेज का कचरा निकालकर उसी के बगल में छोड़ दिया जाता है और बरसात होने पर उसी में समा जाता है. हर बार मंत्री-संत्री इंद्रदेव का अचानक कोप हो जाने का रोना रोते हैं, जो उस शहर के बाशिंदों और देश की आंखों में धूल झोंकने से ज्यादा कुछ नहीं है.


भारतीय मायथालॉजी में कहा गया है कि जब किसी नगर की रचना दोषपूर्ण हो जाती थी तो भगवान इंद्र अपना पुरंदर रूप धारण करके उस नगर को नष्ट कर देते थे. अधिकारियों को इस कथा से सबक हासिल करना चाहिए क्योंकि नगर की संरचना को दोषमुक्त बनाए रखना और बेहतर जल-निकासी की योजनाएं बनाना उनके हाथ में ही होता है. अल्पावधि में अत्यधिक वर्षा को शहर डुबाने का जिम्मेदार ठहराने का सीधा मतलब भू-माफिया, राजनीतिज्ञों, बिल्डरों, पूंजीपतियों के गठजोड़ को पाप की भागीदारी से मुक्त करना है, जो आधुनिक नगर-संरचनाओं को विकृत करने में वर्षों से जुटे हुए हैं. यह गठजोड़ शहरों के बीच की खुली जगहों को नगर-प्रशासन के नियंत्रण से मुक्त करवाता है, उन पर अवैध कब्जा होने देता है, समुद्र और बड़ी नदियों के किनारे की दलदली भूमि और मैंग्रोव्स कटवाता-पटवाता है, व्यावसायिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए वहां गगनचुम्बी इमारतें, मल्टीप्लेक्स और शॉपिंग कॉम्प्लेक्स वगैरह खड़े करवा देता है.


इसका सीधा असर यह हुआ है कि वर्षा का जो जल खुली जगहों की जमीन से होता हुआ भू-गर्भ में संचित हो जाता था, या बाढ़ का जो अतिरिक्त पानी नदी-नालों से होता हुआ सागरों तक पहुंच जाता था, उसके रास्ते अवरुद्ध हो गए हैं. हम देख रहे हैं कि प्राचीन नगर-संरचनाओं की बुनियाद पर खड़े कोलकाता और पटना जैसे कई आधुनिक शहर भी चोक हो चुके हैं. शहरों के भीतर मौजूद छोटी-मोटी जलधाराएं, नदियां, कुदरती नाले, कुएं, तालाब, जोहड़, बावड़ियों जैसी संरचनाएं भी जल-संचयन, बाढ़ को नियंत्रित करने अथवा अतिरिक्त जल की प्राकृतिक-निवृत्ति में बड़ी सहायक होती थीं. लेकिन अब इन समतल की जा चुकी जगहों को राजनेता और बिल्डर प्राइम लोकेशन बताकर ऊंचे दामों पर बेचते हैं और पीने का पानी गंगा (दिल्ली में), कृष्णा (हैदराबाद में), कावेरी (बैंगलुरु में) जैसी दूर-दराज की नदियों से लाया जाता है!


मुंबई के अंदर मीठी और ओशिवरा समेत 7 नदियां थीं जो नेशनल पार्क से निकलकर विभिन्न खाड़ियों में जा गिरती थीं. वर्षा जल का दबाव कम करने में इनकी बड़ी भूमिका थी. लेकिन रासायनिक और औद्योगिक कचरे, इमारतों के मलबे, प्लास्टिक और तरह-तरह के भंगार से पटी ये नदियां बाढ़ का पानी सड़कों पर उड़ेल कर बीच में ही लुप्त हो जाती हैं. मुंबई का ड्रेनेज सिस्टम 21 सदी की शुरुआत में तब की विरल बसाहट के हिसाब से यह सोच कर डिजाइन किया गया था कि अगर प्रतिघंटे अधिकतम 25 मिलीमीटर वर्षा हुई तो आधा पानी मिट्टी में जज्ब हो जाएगा. लेकिन आज वर्षा का अवरुद्ध पानी रेल की पटरियों को नदियां बना देता है.


दिल्ली की बात करें तो आज जहां व्यस्ततम आईटीओ रोड है वहां से एक नाला बहा करता था और बाढ़ का पानी यमुना में ले जाता था. लेकिन आज पहली बारिश में ही यह इलाका जलमग्न होता है. रिंग रोड बनाते समय दिल्ली के स्लोप को ध्यान में नहीं रखा गया, न ही इस बात का इंतजाम किया गया कि वर्षा का अतिरिक्त जल किधर से कहां जाएगा. राजधानी के जितने भी बस स्टैंड हैं, लगभग सबके सब जल-एकत्रित होने की जगहों को पाट कर बनाए गए हैं. कभी दिल्ली में नजफगढ़ झील, डाबर इलाके और यमुना पार समेत लगभग 800 जगहों पर स्थायी तौर पर पानी संग्रहीत रहता था, आज इनमें से अधिकांश जल-स्रोत गायब हैं और वहां कब्जा या निर्माण हो चुका है.


स्वभावतः पानी अपना रास्ता स्वयं खोज और बना लेता है. कोसी नदी का हर साल मानवनिर्मित तटबंध तोड़ कर रास्ते बदल लेना इसका जीवंत उदाहरण है. लेकिन पटना के बीच नागरिकों द्वारा की गई अवैध घेराबंदी को तोड़ कर वर्षा का जल आखिर कहां जाए, क्या करे! मजबूर होकर वह हहराता हुआ आपके-हमारे ड्राइंग रूम में घुसता चला आता है. इस स्थिति से बचने के लिए, शहर में जब कोई निजी मकान या बहुमंजिला इमारत बनाता है तो उसे उस प्लॉट और प्रभावित क्षेत्र द्वारा जज्ब किए जाने वाले वर्षा जल का विकल्प तैयार करना चाहिए, वरना वह आस-पास के इलाके में संचित होकर बाढ़ ला देगा. इमारत के आस-पास पार्किंग और फुटपाथ पर कंक्रीट व अस्फाल्ट के बजाए पत्थर बिछाना, वृक्षारोपण और प्राकृतिक ड्रेनेज के अनुसार ही सड़कें बनाना समझदारी का काम है. इसके लिए हम पाटिलपुत्र की नगर-रचना की ओर देख सकते हैं. कहते हैं कि जब महाराजा अजातशत्रु वैशाली के वज्जि गणसंघ को जीतने के लिए पाटलिपुत्र किले के निर्माण हेतु गंगा की तटबंदी करा रहे थे, तब गौतम बुद्ध वहां का पधारे थे और शहर को आशीर्वाद देते हुए आगाह किया था कि किसी नगर के ह्रास के कारण होते हैं- आग, पानी, और शहरवासियों में कलह. अजातशत्रु और बाद के मगध-शासकों ने इस बात का ध्यान रखा था लेकिन आज का शासक-वर्ग उस शिक्षा को भूल चुका है. कलिकाता गांव आज विशाल कोलकाता में तब्दील हो चुका है लेकिन जलनिकासी हुगली नदी के रहमोकरम पर ही है.


बाढ़ में फंसे असहाय लोगों और निरीह पशु-पक्षियों की तस्वीरें और कहानियां हम सबने देखी-सुनी हैं. सदी के महानायक अमिताभ बच्चन का जुहू (मुंबई) स्थित घर जल-प्लावित होते देखा है. पटनावासी बिहार के उप-मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी को परिवार सहित सड़क पर खड़ा देख चुके हैं. लेकिन हम लोग अब भी यह नहीं समझ रहे हैं कि बादल जितना भी पानी बरसाते हैं, वह भू-जल बनने के लिए होता है, बाढ़ लाने के लिए नहीं. उसे बाढ़ के रूप में हम और आप बदलते हैं, क्योंकि बेकार में बही एक-एक बूंद बाढ़ लाने में योगदान करती है. हमारे शहर वर्षा के अतिरिक्त जल को क्यों बर्दाश्त नहीं कर पाते, इसे समझना कोई रॉकेट साइंस नहीं है. पर्याप्त जल-संचयन, उचित जल-संरक्षण और सटीक जल-प्रबंधन करने की प्राचीन-कला सीख कर आज भी हम बाढ़ की विभीषिका से निबट सकते हैं. लेकिन जनता के पैसे से बनी हर योजना में से अपना हिस्सा निकाल लेने और आग लगने पर ही कुआं खोदने की हमारी आदत जाती नहीं है!


-विजयशंकर चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार
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शुक्रवार, 29 अप्रैल 2016

प्रतियोगी परीक्षाओं का मौसम आया, अभिभावकों के लिए टेंशन लाया

कल जे ई ई मेंस के रिजल्ट आ गए-
जिन सुधी अभिभावकों ने अपने पुत्र-पुत्रियों को उच्च चिकित्सा एवं तकनीकी शिक्षा दिलाने का सपना देख रखा है उनके लिए एक पांव पर खड़े होने का उष्ण मौसम आ गया है. मई और जून 2016 में कई प्रतियोगी परीक्षाएं होने जा रही हैं, जिनमें से प्रमुख हैं- एआईपीएमटी जो 1 मई को होनी है, क्लैट 8 मई को होगी, जेईई एडवांस्ड 22 मई को और सीईटी परीक्षा 2 जून को आयोजित होगी, 4 जून से द इंस्टीट्यूट ऑफ कंपनी सेक्रेटरीज ऑफ़ इंडिया की परीक्षाएं शुरू हो रही हैं, 10 जून से भारतीय बीमा संस्थान की परीक्षाएं होंगी.

इन दिनों धुनी छात्र-छात्राएं कोचिंग क्लासों, स्टडी रूमों, पुस्तकालयों, गार्डनों, छतों, गलियारों आदि को अपना रीडिंग रूम बनाए हुए हैं और इस तपती-चुभती गर्मी में भी मेडिकल, इंजीनियरिंग, कानून और अन्य पाठ्यक्रमों में दाख़िले के लिए दिन-रात पसीना बहा रहे हैं.

माता-पिता उनके टेबल पर सर रख कर सो जाने की आदत पर पैनी नज़र रखे हुए हैं और चाय-पानी की सप्लाई में जरा भी कोताही नहीं बरत रहे. कुछ छात्रों के अभिभावक इस बात को लेकर भी माथा पकड़ कर बैठे हुए हैं कि कैसे उनके बच्चे ऊंची से ऊंची रैंक एवं अंक प्राप्त करें ताकि प्रतिष्ठित और मनचाहे शिक्षा संस्थानों में उन्हें आसानी से दाख़िला मिल जाए. किसी ठंडे पहाड़ी स्थल पर ग्रीष्म ऋतु का लुत्फ़ उठाने का ख़याल फ़िलहाल उनके दिमाग़ से कोसों दूर है.

मेरे एक पीडब्ल्यूडी इंजीनियर मित्र की बेटी को डीएवीवी इंदौर के अंडरग्रेजुएट कोर्स में दाख़िला लेना है. वह इतने बेताब हैं कि बेटी की जगह सीईटी का पूरा कार्यक्रम ख़ुद उन्होंने रट लिया है जबकि परीक्षा को अभी महीना भर से ज़्यादा समय बाक़ी है. वह एक सांस में बताते हैं- ‘कॉमन इंट्रेंस टेस्ट 2 जून को और पहली काउंसलिंग 23 को होनी है. कुल मिलाकर 35 कोर्सेस हैं, जिनके लिए इग्जाम्स 9 शहरों में होने हैं. इनके लिए एप्लीकेशन ऑनलाइन भी भरे जा सकते हैं. हमारा प्लान यही है. अच्छा हो अगर एग्जाम सेंटर अपने ही शहर में मिल जाए.’

इंटीरियर डेकोरेटर शादाब सिद्दीक़ी साहब चाहते हैं कि उनकी बेटी पढ़-लिख कर एमबीबीएस डॉक्टर बने. इसके लिए वह पिछले दो सालों से उसकी एआईपीएमटी (आल इंडिया प्री मेडिकल टेस्ट) की सख़्त तैयारी करा रहे थे. सीबीएसई द्वारा आयोजित इस टेस्ट की तारीख़ 1 मई मुकर्रर की गई है. इसे पास करने पर उनकी बेटी देशभर के मेडिकल कॉलेजों की 15 फीसदी मेरिट पोजीशन में शुमार हो जाएगी, और इस तरह शादाब साहब का सपना भी पूरा हो जाएगा.

नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में दाख़िला पाने ने लिए पेशे से चार्टर्ड एकाउंटेंट बख्शी जी का बेटा जी-तोड़ कोशिश कर रहा है. राजीव गांधी नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ़ लॉ, पटियाला की तरफ से आयोजित कॉमन लॉ एडमीशन टेस्ट (क्लैट) 8 मई को होना है जिसका नतीजा 23 मई को उसके सामने आ जाएगा. अगर कामयाब हो गया तो 1 जून से उसकी काउंसलिंग शुरू हो जाएगी.

मिसेज बख्शी ने पूरे मोहल्ले में मिठाइयां बांटने की तैयारियां अभी से कर रखी हैं लेकिन उनके मन में किंतु-परंतु भी व्यायाम कर रहा है. शेयर ब्रोकर भरत भाई का ब्लड प्रेशर 22 मई को होने जा रहे ‘द ज्वाइंट एंट्रेंस एग्जामिनेशन (जेईई) एडवांस्ड टेस्ट’ के दोनों पेपरों को लेकर बढ़ा हुआ है क्योंकि उनके बेटे की प्रॉपर तैयारी नहीं हो पाई; जबकि दोनों पेपर अनिवार्य हैं. इस टेस्ट के लिए 29 अप्रैल को रजिस्ट्रेशन शुरू होना है जिसकी स्कैन रिस्पॉन्स शीट 1 जून तक वेबसाइट पर दिखने लगेगी और 12 जून को उनके बेटे की क़िस्मत का फ़ैसला हो चुका होगा. पता नहीं भरत भाई 22 दिन का यह हिमयुग कैसे काटेंगे!

बच्चों की परवाह करने तक तो ठीक है लेकिन ‘थ्री ईडियट्स’ बार-बार देखने के बावजूद कैरियर को लेकर संतान से कहीं ज़्यादा माता-पिता द्वारा इतनी चिंता करना सचमुच चिंताजनक है. हमारे देश में कई प्रतियोगी परीक्षाएं होती रहती हैं. जैसे कि सिविल सेवा परीक्षा, इंजीनियरी सेवा परीक्षा, सीपीएमटी (CPMT), आईआईटी संयुक्त प्रवेश परीक्षा (IIT JEE), अखिल भारतीय इंजिनीयरिंग प्रवेश परीक्षा (AIEEE), सम्मिलित प्रवेश परीक्षा (कॉमन ऐडमिशन टेस्ट / CAT), प्रबंधन योग्यता परीक्षा (MAT), ओपेनमैट (OpenMAT), सार्वजनिक प्रवेश परीक्षा (कॉमन इंट्रैंस टेस्ट / CET), इंजीनियरी में स्नातक अभिरुचि परीक्षा या गेट (GATE), राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA) की परीक्षा, सम्मिलित रक्षा सेवा परीक्षा (CDS), संयुक्त विधि प्रवेश परीक्षा (कॉमन लॉ एडमिशन टेस्ट / CLAT), यूजीसी राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (यूजीसी नेट अथवा NET), केंद्रीय शिक्षक पात्रता परीक्षा‎ (Central Teacher Eligibility Test / CTET), संयुक्त प्रवेश स्क्रीनिंग परीक्षा (Joint Entrance Screening Test / JEST) आदि. उपर्युक्त परीक्षाओं में हम कभी पास होते हैं तो कभी फेल. लेकिन फेल होने पर हमें अपने सपने संतान के जरिए पूरा करने की ख़ब्त-सी सवार हो जाती है जो संतान के भी फेल हो जाने पर लगभग घातक सिद्ध होती है.

यहां किसी के बड़े-बड़े सपने देखने की मुख़ालिफ़त नहीं की जा रही है. लेकिन अभिभावकों को चाहिए कि वे अपने बच्चे की सही क्षमता पहचानें. कई मामलों में यह क्षमता कम भी हो सकती है. दुनिया का हर बच्चा एकसमान नहीं हो सकता. इसके उलट होता यह है कि माता-पिता प्रतियोगी परीक्षा देने जा रहे बच्चे के फ़ॉर्म तक ख़ुद भरते हैं.

अरे! जो बच्चा अपनी परीक्षा का फ़ॉर्म खुद नहीं भर सकता, बैंक जाकर अपना डीडी नहीं बनवा सकता, उसे प्रशासनिक केंद्र तक कुरियर नहीं कर सकता, अपना इग्जाम सेंटर नहीं खोज सकता; वह आईएएस-आईपीएस या डॉक्टरी-इंजीनियरी का टेस्ट क्या खाकर पास करेगा! लेकिन नहीं साहब, चूंकि पड़ोसी के बच्चे ने अमुक टेस्ट पास किया है इसलिए अपने बच्चे को उससे आगे निकालना आपने अपना धर्म बना लिया है. प्रतिभा जाति-पांत की मोहताज नहीं होती. होना यह चाहिए कि आप अपने बच्चे को स्वाबलंबी बनाएं. उसे अपना काम ख़ुद करने दें और सीखने का मौक़ा दें. अक्सर देखा जाता है कि जो मां-बाप घर में पड़ा अख़बार तक ठीक से नहीं पढ़ते वे किताब में घुसे रहने को लेकर बच्चे के सर पर चौबीसों घंटे सवार रहते हैं. पहले आप मिसाल तो पेश कीजिए. बच्चा मां-बाप से जितना सीखता है, उतना उसे दुनिया की कोई कोचिंग नहीं सिखा सकती.

अभिभावकों द्वारा अपनी संतान से प्रतियोगी परीक्षा की समय-सारिणी के मुताबिक तैयारी कराने, प्रश्न-पत्रों का पैटर्न समझाने और उनके खाने-पीने का पूरा ख़याल रखने में कोई हर्ज़ नहीं है. लेकिन अगर अभिभावक यह मानकर चलने लगें कि सफलता सौ टका मिलनी ही मिलनी है तो यह अपनी ही संतान के साथ अन्याय होगा. कई बार अनेक प्रयासों के बावजूद सफलता नहीं मिलती. इसका अर्थ यह नहीं है कि अभिभावक और संतान की दुनिया ख़त्म हो गई.

पहले अभिभावक को असफलता का महत्त्व समझना पड़ेगा तब कहीं जाकर संतान में संघर्ष करने की शक्ति उत्पन्न होगी और एक दिन वह सफल होकर दिखाएगी. प्रतियोगी परीक्षा में पास होने के लिए अभिभावक को संतान के पीछे लट्ठ लेकर नहीं पड़ना चाहिए बल्कि उसे उचित माहौल और समय देना चाहिए. लेकिन होता यह है कि जैसे-जैसे परीक्षा का दिन नजदीक आता है, बच्चे से ज़्यादा अभिभावकों के दिल की धड़कनें तेज़ होने लगती हैं; जैसे कि उन्हें ख़ुद पर्चा हल करना हो! बच्चा कितनी भी मेहनत क्यों न कर ले, अभिभावक उसको लेकर अक्सर नर्वस नज़र आते हैं.

बड़ी प्रतियोगी परीक्षाओं के इस मौसम में अगर आपका बच्चा भी किसी प्रतियोगी परीक्षा में बैठने जा रहा है तो उसकी आंखें सींच-सींचकर उसे रात-रात भर जगाने की बजाए नींद पूरी कर लेने दें. रात्रि-जागरण करके सुबह परीक्षा देने पहुंचे बच्चों को प्रश्न ही नहीं समझ में आते. आख़िरी मिनट में परीक्षा केंद्र पर पड़ाव डालकर बच्चे की आंखों तले किताबें अड़ाए रखना तो और भी बुरी बात है. आपको भले ही परीक्षा हॉल के गेट तक पूरी तैयारी करवाने की शांति मिल जाए लेकिन बच्चे का दिमाग़ अशांत हो जाएगा. वह भ्रमित भी हो सकता है और पर्चे में पूछे गए प्रश्नों का जवाब निल बटा सन्नाटा हो सकता है…और आपके सपनों पर पानी फिर सकता है. शुभ परीक्षा!

रविवार, 24 अप्रैल 2016

बोतलबंद पानी के बाद अब आया बोतलबंद हवा का ज़माना!

ज़्यादा दिन नहीं गुज़रे हैं जब लोग दूसरों को दिखा-दिखा कर बोतलबंद पानी किया करते थे गोया अमृतपान कर रहे हों! मोबाइल की तरह यह भी एक स्टेट्स सिंबल था. अब बोतलबंद पानी (बोतल 1 की हो या 100 लीटर की) पीना मजबूरी बन गया है. इस बाज़ारू दुनिया में जो इसे नहीं ख़रीद सकते वे तब भी प्यासे मर रहे थे, आज भी मर रहे हैं. भारत की आज़ादी के 70 वर्षों बाद सरकारी उपलब्धि यह है कि जल-स्रोतों को गटर बना दिया गया है और साफ पानी विलासी अमीरों का शग़ल लगता है. इसलिए चौंकिए मत और बोतलबंद पानी के बाद अब बोतलबंद हवा को स्टेटस सिंबल बनाने के लिए तैयार हो जाइए, क्योंकि वायु-प्रदूषण की मारी इस दुनिया में बाक़ायदा इसका व्यापार शुरू हो चुका है और भारत भी हवा व्यापारियों की ज़द में है. वायु-प्रदूषण के विविध कारण और समाधान उनकी चिंता का विषय नहीं हैं. वैसे भी मुनाफ़ापिस्सुओं के लिए हर संकट एक सुनहरी अवसर ही होता है.
विकास की अंधी दौड़ में शामिल चीन जैसे विकसित देशों की ऐसी पर्यावरणीय दुर्गति हुई है कि वहां लाखों लोग अभी से बोतलबंद हवा ख़रीदकर सांस ले रहे हैं. ‘बर्कले अर्थ’ की रपट के अनुसार चीन में वायु-प्रदूषण से रोज़ाना लगभग 4000 मौतें होती हैं! यही भय है कि बीजिंग समेत चीन के कई बड़े शहरों में बोतलबंद हवा का बिजनेस तेज़ी से फल-फूल रहा है. जल्द ही विकासशील भारत भी इससे अछूता नहीं रहेगा. कंक्रीट के जंगल खड़े करने की होड़ ने पर्यावरण में असंतुलन पैदा कर दिया है. इसका नतीजा यह है कि भारत के कुछ राज्यों में अप्रत्याशित 5080 किमी नया वन-क्षेत्र विकसित होने के बावजूद सार्थक परिणाम सामने नहीं आ रहे हैं. महानगरों में अपर्याप्त पर्यावरण संवर्धन व वायु-प्रदूषण पसली का दर्द बना हुआ है. जाहिर है ऐसे में पहाड़ों की ताज़गी देने वाली हवा के लुभावने पैकेट पानी की ही तरह हाथोंहाथ बिकेंगे. देश में बोतलबंद हवा जल्द ही हकीक़त और मजबूरी बन जाएगी. अभी वायु-प्रदूषण से बचने के लिए लोग दस्युओं की तरह घर से नाक-कान-मुंह बांध कर निकला करते हैं लेकिन जल्द ही वे आईसीयू में भर्ती किसी मरीज़ की भांति हवा की छोटी-बड़ी बोतलें गले में लटकाए नज़र आएंगे!
बिजनेसमैन पूरे विश्व में बहुत जल्द संभावनाएं सूंघ लिया करते हैं और उनके सेल्समैन हिमालय में भी बर्फ़ बेच आते हैं. सनातन संस्कृति वाले भारत में ज्ञानियों की धारणा थी कि धरती पर धूप-हवा-पानी सनातन तौर पर मुफ़्त और प्रचुर है लेकिन ‘वैश्वीकरण’ के इस दौर में पानी के बाद अब हवा भी बाज़ार में बिठा दी गई है. कनाडा की ‘वाइटैलिटी एयर बैंफ एंड लेक’ नामक कंपनी ने अपने यहां के चट्टानी पर्वतों और कंचन जल से घिरे प्राकृतिक हरे-भरे स्थलों की ताज़ा हवा बोतलों में बंद करके यूएसए और मध्य-पूर्व के देशों को बेचना शुरू कर दिया है. यह कंपनी कनाडा की दो स्थलों- बैंफ एवं लेक लुइस के निर्मल वातावरण से हवा को बोतलबंद कर रही हैं. ग्राहकी का आलम यह है कि उक्त कंपनी हवा बेचकर मालामाल हो रही है. चीन में तो क्रेज़ इस क़दर बढ़ गया है कि लोग बोतलबंद हवा ख़रीदकर जन्मदिन और शादियों में गिफ़्ट कर रहे हैं.
वाइटैलिटी एयर बैंफ एंड लेक ने शुद्ध हवा के अपने दो ब्रांड बाज़ार में उतारे थे- बैंफ एयर और लेक लुइस. कंपनी के संस्थापक मोजेज लेक ने 2014 में जब इस हवा का पहला पैकेट बेचा था तब उन्हें इसकी कल्पना भी नहीं रही होगी कि हवा का धंधा उनकी किस्मत बदल देगा. चीन में उन्हें इतना बड़ा बाज़ार मिला कि पिछले दिसंबर में दुकान का श्रीगणेश करने के तुरंत बाद ही 500 बोतलें पलक झपकते बिक गई थीं. बीजिंग में बैंफ एयर की 3 लीटर की बोतल आज लगभग 952 रुपए और 7.7 लीटर का बाटला 1542 रुपए में बिक रहा है.
दुनिया में हवा का बाज़ार बढ़ता देखकर ब्रिटेन के 27 वर्षीय लियो डे वाट्स भी ‘आएटहाएर’ कंपनी बनाकर शुद्ध हवा की खेती में कूद पड़े हैं और इस साल के शुरुआती तीन महीनों में ही हज़ारों पाउंड कमा चुके हैं. लियो की टीम शुद्ध हवा भरने सुबह 5 बजे ही ब्रिटेन के समरसेट, डोरसेट तथा वेल्स जैसे प्राकृतिक सुषमायुक्त इलाक़ों में जाती है और ग्राहकों की ख़ास मांगों के अनुरूप सप्लाई कर देती है. हवा के लिए लियो किसी दिन पहाड़ की चोटी पर चढ़ते हैं तो किसी दिन गहरी घाटियों में उतरते हैं. उनका मानना है कि अगर वायु-प्रदूषण का धरती पर यही हाल रहा तो निकट भविष्य में हज़ारों कंपनियां हवा के धंधे में उग आएंगी.
भारत में औद्योगिक शहरों की सांसें पहले से ही थमी हुई थीं, अब छोटे और मझोले शहरों का दम भी घुटने लगा है. केंद्रीय प्रदूषण बोर्ड की ताज़ा रपट कहती है कि सबसे प्रदूषित शहर मुजफ्फ़रपुर (बिहार) है और उसके बाद लखनऊ का नंबर आता है. यह आश्चर्यजनक है क्योंकि ये दोनों शहर उद्योगबहुल नहीं हैं! रपट से यह भी स्पष्ट हुआ है कि देश के 10 सबसे ज़्यादा प्रदूषित शहरों में से 6 शहर औद्योगिक रूप से पिछड़े उत्तर प्रदेश और बिहार के हैं जबकि औद्योगिक एवं आर्थिक गतिविधियों का केंद्र मुंबई, बंगलुरु और चेन्नई जैसे महानगरों में प्रदूषण उक्त शहरों से कम है. ऐसे में वायु-प्रदूषण को उद्योग-धंधों मात्र से सीधा जोड़ देना तर्कसंगत नहीं लगता. योजनाकारों व पर्यावरणविदों को इसका निदान और इलाज़ खोजना होगा. लखनऊ के बाद घटते क्रम में प्रदूषण-स्तर दिल्ली, वाराणसी, पटना, फ़रीदाबाद, कानपुर, आगरा, गया, नवी मुंबई, मुंबई और पंचकूला (हरियाणा) का है. अर्थात हवा की गुणवत्ता के आधार पर पंचकूला सबसे माकूल शहर है और मुजफ्फ़रपुर सर्वाधिक दमघोंटू!
घर-घर वायु-प्रदूषण के पसमंजर में अगर भारत जल्द ही हवा बेचने का केंद्र बन जाए तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए. मौक़े का फ़ायदा उठाने के लिए देसी-विदेशी कंपनियां भारत की नदी-घाटियों एवं पर्वतशृंखलाओं की ख़ाक छानती नज़र आने लगें तो अचंभित मत होइएगा. सरकार पर्यावरण के नियमों को शिथिल कर उन्हें हवा के अंधाधुंध दोहन का लाइसेंस जारी कर दे तब भी चकित मत होइएगा. शुद्ध हवा की पैकेजिंग के नाम पर अगर नदी-पहाड़ों की हवा अशुद्ध कर दी जाए तो उंगली मत उठाइगा. आख़िर यह सब आपकी बेहतरी के लिए किया जाएगा. भले ही आगे चलकर यही कंपनियां दूषित पानी की तर्ज़ पर हवा की जगह बोतलों में धुंआ भरकर बेचने लगें और लोगों को मजबूरी में वही पीना पड़े!
कनाडा की वाइटैलिटी एयर बैंफ एंड लेक कंपनी और ब्रिटेन की आएटहाएर कंपनी की भारत पर बराबर नज़र है. यहां वह किस भाव से हवा बेचेंगे यह समय आने पर जाहिर किया जाएगा. हालांकि विशेषज्ञ भारत में हवा-व्यापार को मुनाफ़े का सौदा नहीं मानते. उनकी आशंका है कि यह संपन्न लोगों का चोंचला ही बन कर रह जाएगा. देश का मध्यवर्ग और ग़रीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाले करोड़ों लोग बच्चों का राशन-पानी तो ठीक से ख़रीद नहीं पाते; बाज़ार से हवा ख़रीद कर पीने की औक़ात कहां से पैदा करेंगे! यह और बात है कि पहले वे प्यास से मर रहे थे अब श्वांस से भी मरा करेंगे!

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2016

यहूदी शाहकारों के बगैर मुंबई का नक्शा पूरा नहीं होता


दक्षिण मुंबई के कोलाबा की चौथी पास्ता लेन के पीछे होरमस जी स्ट्रीट में स्थित चबाड हाउस उर्फ नरीमन हाउस की सड़क पर अब भी जिंदगी का कारोबार चला करता है. नहीं है तो वर्ष 2003 से यह यहूदी केंद्र चलाने वाला युवा दम्पति रब्बी गाव्रियल और उनकी पांच माह की गर्भवती पत्नी रिवका होल्त्जबर्ग, जो बुधवार, 26 नवंबर, 2008 को 9 बजकर 45 मिनट पर हुए आतंकवादी हमले में दुनिया से असमय उठा दिए गए थे.
चबाड हाउस कभी यहूदी समुदाय की गतिविधियों का प्रमुख केंद्र हुआ करता था. यहां सिनॉगॉग (यहूदी उपासना-गृह और प्रार्थना-मंदिर) था, तोरा सिखाने वाली कक्षाएं चलती थीं, स्थानीय यहूदियों की शादियां तथा नशे की रोकथाम जैसे कई हितकारी क्रियाकलाप सम्पन्न होते थे. यहूदी पर्यटकों और व्यापारियों की तो जैसे यह मुंबई में एकमात्र शरणस्थली थी. ईश्वर से नजदीकी महसूस करने, कोशेर भोजन का जायका चखने या यहूदी छुट्टियां मनाने वालों के लिए चबाड हाउस के दरवाजे हमेशा खुले रहते थे. लेकिन आतंकवादियों की गोलीबारी और धमाकों से जब यह दुनिया उजड़ी थी तो दिन-रात जागने-भागने वाली कोलाहल भरी मुंबई ने जोर से जाना कि इस महानगर में यहूदी भी बसते हैं. यह बात और है कि आतंकवादी हमले के छह साल बाद 26 अगस्त, 2014 को एक और रब्बी इज्रोइल कोज़्लोवस्की और उनकी पत्नी चाया ने उसी नेस्तनाबूद चबाड हाउस को फिर आबाद कर दिया था. राख के ढेर से फीनिक्स पक्षी की तरह फिर जीवित हो उठना दुनिया भर के यहूदियों की बड़ी विशेषता रही है.
सन 1940 का जमाना था जब मुंबई में यहूदी खूब फल-फूल रहे थे और उनकी संख्या 30 हजार के पार हो गई थी. आज वे उंगलियों पर गिनने लायक बचे हैं, जिनमें से ज्यादातर मुंबई और इसके आसपास बसते हैं. लेकिन संख्या पर मत जाइए, मुंबई के इतिहास पर छोड़े गए उनके पूर्वजों के निशान मुंबई के परिदृश्य और भूदृश्य पर आज भी अमिट और स्थायी हैं. बहुत कम लोगों को पता होगा कि भारत का एक लैंडमार्क माने जाने वाला गेटवे ऑफ इंडिया के निर्माण में सबसे बड़ा दानकर्ता एक यहूदी ही था- सर जैकब ससून.
माना जाता है कि मुंबई में यहूदियों के सामूहिक आगमन का श्रीगणेश 18वीं सदी में हुआ. इस संगम में दो बिलकुल अलग धाराएं थीं- बेन इजरायली (इजरायल के लाल) और बगदादी. बेन इजरायली समुदाय कोंकण के गांवों से आया था जिसके बारे में कहा जाता है कि वे उन इजरायली यहूदियों के वंशज हैं जिनका जलपोत 175 ईसा पूर्व में कोंकण तट पर नष्ट हो गया था. जूडिया से आए उस जलपोत में 7 यहूदी परिवार थे. वे यूनानी सम्राट एंटियोकस चतुर्थ एपीफानेस के समय वतन से निकले थे. बगदादी यहूदी वे हैं जो मामलूक वंश के आखिरी शासक दाउद पाशा द्वारा 19वीं सदी की शुरुआत में मचाई गई तबाही और भीषण नरसंहार के बाद इराक से भागे थे.
मुंबई में बसने वाला पहला बगदादी यहूदी जोसफ सेमाह बताया जाता है, जो सन 1730 में सूरत छोड़कर आया था. बेन इजरायली समुदाय के पहले सदस्य सन 1749 में कोंकण के गांवों से यहां पहुंचे. उन दिनों अंग्रेजों द्वारा मुंबई में विकसित किए जा रहे व्यापारिक ढांचागत विकास ने इन्हें बेहद आकर्षित किया था. मुंबई में बसने के बाद इन्हें अपने पूजागृहों की जरूरत भी महसूस हुई. सो कोंकण से आए सैम्युएल इजेकील दिवेकर (मूल नाम सामाजी हसाजी दिवेकर) नामक यहूदी ने मुंबई का प्रथम सिनॉगॉग मई 1796 में स्थापित किया, जिसका नाम था ‘शारे राहामीम’ जिसे गेट ऑफ मर्सी सिनॉगॉग भी कहा जाता है. यह उन्हीं के नाम की गई गली 254, सैम्युअल स्ट्रीट, मुंबई- 400 003 में स्थित है. इसके बाद तो जैसे दूसरे सिनॉगॉगों और प्रार्थना-गृहों की बाढ़ सी आ गई. टनटनपुरा स्ट्रीट में 4 जून 1843 को ‘शारे रेशन’ या नया सिनॉगॉग, सर जेजे मार्ग पर 1861 में ‘मेगन डेविड सिनॉगॉग’, जैकब सर्कल में 1886 में ‘टिफेरेथ इजरायल सिनॉगॉग’ जैसे कुल आठ सिनॉगॉग और प्रार्थना-गृह यहूदियों की बढ़ती आबादी के मद्देनजर सन 1946 तक मुंबई में बनाए जाते रहे.
लेकिन यह 1832 का साल था जब दाउद पाशा के अत्याचारों से तंग आकर डेविड ससून अपने कई यहूदी साथियों के साथ मुंबई आए और यहां के यहूदियों की महिमा एवं इतिहास को हमेशा-हमेशा के लिए बदल कर रख दिया था. उनकी डेविड ससून एंड कंपनी ने देखते ही देखते मुंबई में कपड़ा मिलें तथा अन्य उद्योग-धंधे व संस्थान खड़े कर दिए. लेकिन उनका सबसे बड़ा योगदान था परोपकार के कार्यों में अपार धन लगाने का. उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में डेविड ससून ने डेविड ससून मैकेनिक्स संस्थान, डेविड ससून लाइब्रेरी, विक्टोरिया गार्डेंस (आज का वीरमाता जीजाबाई उद्यान) में क्लॉक टॉवर और विक्टोरिया एंड एल्बर्ट म्यूजियम (आज का भाऊ दाजी लाड संग्रहालय) में ऐतिहासिक स्मारक बनवाने जैसे कई ऐतिहासिक कार्य किए.
सन 1875 में डेविड ससून के बेटे एल्बर्ट ने मुंबई की ऐसी पहली गोदी कोलाबा में बनवाई जिसमें जलपोत तैरने लायक पानी हर हाल में बरकरार रखा जाता है, उसे हम ससून डॉक के नाम से जानते हैं. सन 1884 में सर जैकब ससून ने फोर्ट में केनसेथ इलियाहू सिनॉगॉग बनवाया था, जहां चबाड हाउस शुरू होने के पहले तक ताजमहल और ओबेरॉय होटलों में ठहरने वाले यहूदी आसानी से पहुंचा करते थे. डेविड ससून की विरासत में जेजे हॉस्पिटल परिसर में खड़ा डेविड ससून औद्योगिक एवं सुधार संस्थान, मुंबई का कॉमेथ हाउस जो उनका मुख्यालय भी था, रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस, बाम्बे फ्लाइंग क्लब, निवारा ओल्ड एज होम, फ्लोरा फाउंटेन और मेसीना हॉस्पिटल जैसे न जाने कितने स्मारक शामिल हैं, जो आज भी हमें मुंबई का पता देते हैं.
डेविड ससून की मृत्यु तो सन 1864 में ही हो चुकी थी लेकिन सामुदायिक गतिविधियां आगे के दशकों तक हंसती-खिलखिलाती रहीं. फिर मातृभूमि के आकर्षण में 50 के दशक के दौरान मुंबई से यहूदियों का बहिर्गमन शुरू हुआ, जो आज तक जारी है. हालत यह है कि इजरायल में पैदा हुए यहूदी भारत के बारे में अधिक नहीं जानते और मुंबई में बचे अधिकांश यहूदी 70 से ऊपर की अवस्था के हैं. 73वर्षीय निसिम मोजेस नामक सज्जन ने भारत के यहूदियों की वंशावली, सामूहिक गान, मराठी-हिब्रू मिश्रित भाषा और खान-पान की एक फेहरिस्त तैयार करने की कोशिश की है और सन 1671 से लेकर आज तक के करीब 40000 यहूदियों का वंशवट खड़ा भी कर लिया है. लेकिन आज पूरे भारत में उनकी आबादी 5000 के आसपास ही बची है और वह भी तेज़ी से खत्म हो रही है. फिर भी इतना तो तय है कि मुंबई का नक्शा यहूदियों के बनाए शाहकारों के बगैर पूरा नहीं होता. गौर से सुनें तो आज भी सूने सिनॉगॉगों में गूंजने वाली उनकी सामूहिक प्रार्थनाएं सुनाई दे जाएंगी.

शुक्रवार, 15 जून 2012

मेहदी हसन: आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ

मेहदी हसन साहब का भारत से ऐसा रिश्ता है कि जिसे कहते हैं कि उनकी तो यहाँ नाल गड़ी है. राजस्थान में जहाँ वह पैदा हुए थे उनके लूणा गाँव के पुराने लोग प्यार से उन्हें महेदिया कहकर बुलाते थे. मेहदी हसन अपनी जन्मस्थली से गहरे जुड़े हुए थे. वह विभाजन के बाद तीन बार गाँव आये. वहां अपने दादा की मजार बनवाई. गौर करने की बात यह है कि वह जब भी गाँव आते थे तो गांववालों से शेखावटी बोली में ही बात करते थे. गाँव वालों ने एक एजेंसी को बताया कि मेहदी हसन को गाने के साथ-साथ पहलवानी का भी शौक था और जब पिछली बार वह गाँव आये थे तो उनके बचपन के एक दोस्त अर्जुन जांगिड़ ने मज़ाक-मज़ाक में कुश्ती लड़ने की चुनौती देकर पुरानी यादों को ताज़ा कर दिया था. अब अर्जुन जांगिड़ भी इस दुनिया में नहीं रहे.
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पता नहीं क्यों किसी बड़े फ़नकार के गुज़र जाने के बाद उसे हर माध्यम में ढूंढ और पा लेने की बेचैनी दम नहीं लेने देती. यूं तो मेरे मोबाइल के मेमोरी कार्ड में हसन साहब की कई गज़लें हैं जिन्हें मैं अक्सर सुना करता हूं, लेकिन परसों (13 जून 2012) जब उनके निधन की ख़बर सुनी तो सन्न रह गया और उन्हें बहुत करीब से पा लेने के लिए छटपटाने लगा. इंटरनेट पर विविध सामग्री उनके बारे में पढ़ डाली. यू ट्यूब पर उनकी गायी अमर गज़लें आँख मूंदे सुनता रहा और न जाने किस किस दुनिया की सैर करता रहा.

जिन लोगों ने मेहदी हसन साहब को गाते सुना और देखा है उन्हें मैं भाग्यशाली समझता हूं. टीवी पर स्वरकोकिला लता मंगेशकर, खैय्याम साहब, आबिदा परवीन, हरिहरन, पंकज उधास, तलत अज़ीज़ और अन्य संगीत नगीनों की राय मेहदी साहब के बारे में देखता-सुनता रहा. लता जी ने तो उनके बारे में एक बार कुछ इस तरह कहा था कि मेहदी हसन साहब के गले से ख़ुदा बोलता है.

मैंने इलेक्ट्रौनिक उपकरणों के जरिये ही मेहदी साहब को सुना है लेकिन उनकी आवाज़ मशीन को भी इंसानी गला दे देती है. उनकी आवाज़ में मुलायमियत होने के साथ-साथ वह वज़न भी है जो शायर के शब्दों और भावनाओं को श्रोता की रगों में उतार देता है. यही वजह है कि उनकी गायिकी सरहदों की दूरियां पाट देती है. हवाओं और पानियों में घुलकर एक से दूसरे देस निकल जाती है. बेख़याली के आलम में मैं सुनता रहा- 'रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ, आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ', 'ज़िंदगी में तो सभी प्यार किया करते हैं, मैं तो मर कर भी मेरी जान तुझे चाहूंगा', 'अबके हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें, जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें,' 'मोहब्बत करने वाले कम न होंगे, तेरी महफ़िल में लेकिन हम न होंगे', 'पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है, जाने न जाने गुल ही न जाने, बाग़ तो सारा जाने है,' 'गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौबहार चले, चले भी आओ के गुलशन का कारोबार चले', 'दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के, वो कौन जा रहा है शब-ए-ग़म गुज़ार के,' 'आये कुछ अब्र कुछ शराब आये, उसके बाद आये जो अज़ाब आये', 'रफ्ता रफ्ता वो मेरी हस्ती का सामाँ हो गए.....लिस्ट बहुत लम्बी है. लेकिन जब भी मैं उनका गाया 'प्यार भरे दो शर्मीले नैन' सुनता हूँ तो मेरी वाणी मूक हो जाती है. जिस तरह से उन्होंने 'प्यार भरे' की शुरुआत की है वह भला कोई क्या खाकर कर सकेगा.

मेहदी हसन को सुनते हुए कभी अभिजातपन का एहसास नहीं होता. लगता है जैसे अपने ही परिवेश का कोई देसी आदमी पक्का गाना गा रहा हो. उनकी आवाज़ में राजस्थान की गमक को साफ़ महसूस किया जा सकता है (मेहदी हसन का जन्म 18 जुलाई 1927, राजस्थान, जिला-झुंझनू, गाँव-लूणा, अविभाजित भारत में हुआ था). उनकी ग़ज़ल गायिकी शास्त्रीय होते हुए भी मिट्टी की खुशबू से सराबोर है. वह जहां पूरी महफ़िल के लिए गाते प्रतीत होते हैं वहीं एक एक श्रोता के लिए भी और सबसे बढ़कर वह स्वयं में खोकर स्वयं के लिए गाते प्रतीत होते हैं. ग़ज़ल सम्राट जगजीत सिंह जी ने मुझसे एक बार मेरे प्लस चैनल के दिनों में कहा था- "नई पीढ़ी के ग़ज़ल गायकों को अगर लम्बी रेस का घोड़ा बनना है तो उन्हें अपना शास्त्रीय आधार पुख्ता करना होगा और यह बात उन्होंने मेहदी हसन साहब से सीखी है."

मेहदी हसन साहब ने बड़ी सादगी से राग यमन और ध्रुपद को ग़जलों में ढाला और ग़ज़ल गायिकी को उस दौर में परवान चढ़ाया जब ग़ज़ल गायिकी का मतलब उस्ताद बरकत अली खान, बेगम अख्तर और मुबारक बेगम हुआ करता था. हालांकि हसन साहब कोई ग़ज़ल गायक बनने का उद्देश्य लेकर नहीं चले थे. आठ साल की उम्र में उन्होंने फाजिल्का बंगला (अविभाजित पंजाब) में अपना जो पहला परफौरमेंस दिया था वह ध्रुपद-ख़याल आधारित था...और उन्हें जब पहला बड़ा मौका मिला 1957 में पाकिस्तान रेडियो पर, तो वह ठुमरी गायन के लिए था. ध्रुपद शास्त्रीय संगीत के कुछ सबसे पुराने रूपों में से एक माना जाता है. खान साहब की ट्रेनिंग ही ध्रुपद गायिकी में हुई थी. उनके पिता उस्ताद अज़ीम खान और चाचा उस्ताद इस्माइल खान साहब बचपन से ही रोजाना उन्हें ध्रुपद का रियाज़ कराते थे. दरअसल मेहदी हसन साहब का पूरा खानदान ही गायिकी परंपरा से जुड़ा चला आ रहा था. वह अक्सर ज़िक्र करते थे कि उनकी पीढ़ी 'कलावंत घराना' की 16वीं पीढ़ी है.

लेकिन रेडियो पाकिस्तान के दो अधिकारियों जेडए बुखारी और रफीक अनवर साहब ने मेहदी हसन की उर्दू शायरी में प्रगाढ़ अभिरुचि को देखते हुए उनका प्रोत्साहन किया और गज़लें गाने का मौका दिया. मेहदी हसन इन दोनों सख्शियतों का सार्वजनिक तौर पर ज़िन्दगी भर आभार मानते रहे. आज दुनिया भर के ग़ज़ल प्रेमी भी उनका आभार मानते हैं कि उन्होंने हमें 'शहंशाह-ए-ग़ज़ल' दिया और ग़ज़ल गायिकी को उसका नया रहनुमा.

मेहदी हसन साहब की ज़िंदगी किसी समतल मैदान की तरह कभी नहीं रही. वह वक़्त के थपेड़ों से दो-चार होते रहे. उनका कलाकारों से भरा-पूरा परिवार आर्थिक संकटों से घिरा ही रहता था. बचपन में मेहदी हसन साहब को अविभाजित पंजाब सूबे के चिचावतनी कस्बे की एक साइकल सुधारने वाली दूकान में काम करना पड़ा. थोडा बड़ा होने पर वह कार और डीजल ट्रैक्टर मैकेनिक का काम सीख गए और परिवार की मदद करते रहे. जव वह २० साल के हुए तो भारत-पाक बंटवारा हो गया और वह परिवार के साथ पाकिस्तान चले गए जहाँ आर्थिक मुश्किलों का नया दौर शुरू हुआ. इस सबके बावजूद उन्होंने संगीत के प्रति अपनी लगन में कमी नहीं आने दी. वहां छोटे-मोटे प्रोग्राम करते रहे. और तभी उनको मिला पहला ब्रेक पाकिस्तान रेडियो पर, जिसका ज़िक्र हम पहले कर चुके हैं.

ग़ज़ल गायिकी में स्थापित होने के साथ ही उन्हें पाकिस्तान फिल्म इंडस्ट्री ने हाथोंहाथ लिया. उनके गाये फ़िल्मी नगमें, दोगाने, गज़लें पाकिस्तानी फिल्म संगीत की विरासत बन गए हैं. मलिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ के साथ उनका गाया 'आपको भूल जाएँ हम, इतने तो बेवफा नहीं' (फिल्म-तुम मिले प्यार मिला, 1969), नाहीद अख्तर के साथ 'ये दुनिया रहे न रहे मेरे हमदम' (मेरा नाम है मोहब्बत, 1975), 'आज तक याद है वो प्यार का मंजर मुझको' (सेहरे के फूल), 'जब कोई प्यार से बुलाएगा' (ज़िंदगी कितनी हसीं है, 1967), 'दुनिया किसी के प्यार में जन्नत से कम नहीं' जैसे सैकड़ों सुपरहिट फ़िल्मी नगमें उनके नाम दर्ज़ हैं.

एक गायक के तौर पर मेहदी हसन कई बार भारत आये. भारत के संगीत रसिकों ने हमेशा उन्हें सर-आँखों पर बिठाया. उनके क्रेज़ का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब खान साहब पहली बार भारत आये तब 'टाइम्स ऑफ़ इण्डिया' ने पहले पेज पर किसी राष्ट्राध्यक्ष के आगमन की तरह बड़ी-सी तस्वीर छापी थी और कैप्शन दिया था- 'मेहदी हसन एराइव्स'. सच है, इस कायनात में ग़ज़लों का अगर कोई राष्ट्र होता हो तो वह उसके आजीवन राष्ट्राध्यक्ष ही थे. आख़िरी बार जब वह सन 2000 में भारत आये थे तो जल्द ही फिर आने का वादा करके गए थे लेकिन उनकी फेफड़ों की बीमारी ने ऐसा घेरा कि साँस साथ छोड़ने लगी. खुदा की आवाज़ का एहसास कराने वाले फ़नकार की धीरे-धीरे आवाज़ भी जाती रही और अंततः फ़नकार भी हमसे रुखसत लेकर सदा के लिए दुनिया से चला गया.

मुझे अब भी यह खबर झूठी लग रही है. मगर मृत्यु एक कड़वी सच्चाई है. मेंहदी साहब को श्रद्धांजलि देने के लिए उन्हीं के गाये शब्द उधार लेकर इतना ही कहता हूँ- ‘आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ.....’

शुक्रवार, 18 मई 2012

कवि तुषार धवल के चित्र: शिव, प्रकृति-पुरुष और वेलेंटाइन्स

एक कवि यदि चित्र बनाये तो कैसा होगा? वह जो शब्दों से एक संसार रचता है, वही अब लकीरों और रंगों से संसार रचे तो कैसा होगा? क्या शब्द लकीर ओढ़ लेते होंगे या फिर वहां सिर्फ शब्दातीत ही होता होगा? क्या कवि अपने भीतर के किसी अलग तहखाने से चित्र लाता है और किसी अन्य से कविता? या फिर उसकी कविता का वही संसार एक अलग रूप-रंग में चित्र के रूप में उद्भासित होता है ? इसकी पड़ताल के लिए अलग अलग समय पर अलग अलग कवि-चित्रकारों की कृतियों को परखा गया है और अब तक इस बारे में कोई स्थाई राय नहीं बन पाई है. वजह ये कि हर रचनाकार का अपना सृजन धर्म अलहदा होता है, और यही वह कुंजी है जो विपुल सृजन के विश्व का ताला खोलती और उसे समृद्ध करती है.

देश और दुनिया में ऐसे कवियों की कमी नहीं है जो चित्रकार भी हैं, या थे. उन्हीं तमाम लोगों की कतार में एक और नाम है तुषार धवल का. यूँ तो तुषार धवल को हिंदी के लोग एक कवि के तौर पर जानते हैं, पर चित्रकार के रूप में भी वे सक्रिय हैं, और इसे हममें से कम लोग ही जानते होंगे.

पिछले माह दिनांक 9 अप्रैल से 14 अप्रैल के मध्य मुंबई की प्रतिष्ठित 'सिमरोज़ा आर्ट गैलेरी' में तुषार धवल के चित्रों की प्रदर्शनी आयोजित की गयी जिसका नाम unconscious calling रखा गया. दरअसल यह नाम भी चित्रकार के मन की परतें खोलता प्रतीत होता है! तुषार दरअसल सृजन धर्मिता को अचेतन मन से उठता हुआ पाते हैं. यहाँ उन पर फ्रायड के मनोवैज्ञानिक चिंतन का प्रभाव देखा जा सकता है. प्रदर्शित चित्रों में तुषार धवल के चित्रों की तीन श्रृंखलाओं ने विशेष तौर पर ध्यान आकर्षित किया. ये चित्र श्रृंखलाएं थीं :- शिव, प्रकृति-पुरुष, और वेलेंटाइन्स. इन सभी चित्रों में जहाँ क्रमशः उनकी चित्र यात्रा को देखा जा सकता है वहीँ उनके अचेतन मन पर उठती छवियों को भी समझा जा सकता है. ये सभी चित्र एक ओर स्त्री-पुरुष संबंधों की बौद्धिक, मनोवैज्ञानिक, भावनात्मक और सामाजिक पड़ताल करते हैं तो दूसरी ओर उनमें फंतासी का भी विपुल प्रयोग दीखता है. यहाँ स्त्री-पुरुष अपने शारीरिक आयामों को तोड़ते हुए नज़र आते है, जैसे एक भीतरी तत्त्व इनकी देह रचना को तोड़ बाहर निकल कर खुद को व्यक्त करना चाह रहा है. यहाँ तुषार की ही ये काव्य पंक्तियाँ बरबस याद आ जाती हैं--

"आओ तन बदल लें
गहरे अंतर में
दरक गए हैं सीमान्त
काल की शिखा से तोड़ लाया यह पल
परिधि को तोड़ निकला
अनंत यात्रा यह भी इस कथा की ...”

अपनी कविताओं की ही तरह अपने चित्रों में भी तुषार भौतिक से पार-भौतिक तक की यात्रा करते हैं. फिर चाहे वह शिव का सूक्ष्म निरूपण हो या फिर ‘शेष 1’, जिसमें उन्हें पहली बार एक नया फॉर्म प्राप्त हुआ, या फिर प्रकृति-पुरुष और वेलेंटाइन्स. सबमें चित्रकार इस भौतिक विश्व के पीछे की उर्जा को तलाश रहा है. अपने नए मुहावरों में तुषार के चित्रित चरित्र 'मुंडा हुआ सर, लम्बी खिंची हुई गर्दन और गोल उठे हुए कंधे' वाले हैं और प्रायः इनकी नाक या आँख नहीं होती है. तुषार का मानना है कि प्राणिमात्र की भाव भंगिमाओं का यदि अध्ययन किया जाये तो उनकी गर्दन के खिंचाव से ही उनके भीतर के भावों को समझा जा सकता है. साथ ही वे मछली, कमल और अर्धचन्द्र को बिम्बों के रूप में लाते हैं. गौरतलब है कि ये बिम्ब तुषार की कविताओं में भी आते हैं. इसी तलाश में अभिव्यक्ति के नए नए फॉर्मों पर वे अभी काम कर रहे हैं. उनकी रेखाओं में एक आंतरिक लय, जो उनकी कविताओं में भी पाई जाती है, स्पष्ट दीखती है. इसके साथ कोमल रंगों के चटख सम्मिलन से वे एक सूक्ष्म विश्व की रचना करते हैं जो प्रायः दृश्यमान नहीं है. एक और बात, अपनी "काला राक्षस" जैसी लम्बी कविता में जिस तरह तुषार ने फंतासी का इस्तेमाल किया है, लगभग वही रूप इन चित्रों में भी नज़र आता है.

इस प्रदर्शनी का उद्घाटन श्रीमती संगीता जिंदल, जो 'आर्ट इंडिया' नामक प्रतिष्ठित कला पत्रिका की संपादक हैं, ने किया. उद्घाटन समारोह में मुंबई और पुणे कला जगत के कई परिचित चेहरों के साथ साथ फिल्म जगत से जुड़े लोग, साहित्य सेवी तथा नौकरशाही से जुड़े लोग शरीक हुए.

यह कहा जा सकता है कि तुषार की कविता और चित्रकारी एक दूसरे की स्पर्धी नहीं बल्कि सहधर्मिणी एवं सहगामिनी हैं तथा कहीं-कहीं एक दूसरे की पूरक भी. जिस तरह एक कलाकार के भीतर अनेक रचनात्मक जगत एक साथ सक्रिय रहते हैं उसी तरह उसके अंतरतम में कई विधाएं एकसाथ प्रस्फुटित होने के इंतज़ार में रहती हैं. कोई कथ्य या विषयवस्तु धरातल पर किस रूप में खिले, यह कह पाना या तय कर पाना हमेशा कठिन होता है. इन अर्थों में तुषार जी की चित्रकारी और कविता एक दूसरे का संबल तथा विस्तार भी है. तुषार एक कवि के रूप में अधिक मुखर होंगे या एक चित्रकार के रूप में, या फिर दोनों ही में उनकी गति सम-इन्द्रधनुषी सिद्ध होगी, यह समय ही सिद्ध करेगा. उनकी इस उज्जवल रचनाधर्मी यात्रा के लिए हमारी शुभकामनायें!

रविवार, 22 अप्रैल 2012

प्रायवेट स्कूलों में 25% आरक्षण और आदम के बच्चे

ज़रा सोचिये कि जब धारावी की झोपड़पट्टी का कोई बच्चा किसी इंटरनेशनल स्कूल में शान से क्लास अटेंड करेगा तो कितना अद्भुत नज़ारा होगा! धर्म, जाति, भाषा, वर्ग के कितने बंधन चकनाचूर होंगे. कई फ़िल्मी कहानियां हकीक़त बन सकती हैं. कई हाथ आसमान छू सकते हैं. कई सपने साकार हो सकते हैं. समाज में समरसता का एक नया दौर शुरू हो सकता है. कई किताबी बातें अमली जामा पहन सकती हैं.
यह कल्पना करके ही रोमांच हो आता है कि मुंबई के जुहू कोलीवाड़ा में रहनेवाले गरीब मच्छीमारों के बच्चे 2 फर्लांग दूर जुहू तारा रोड पर स्थित उस जमनाबाई नरसी स्कूल में दाखिला ले सकेंगे जहां फ़िल्मी सितारों और उद्योगपतियों के बच्चे पढ़ते हैं! वे करीब से देख सकेंगे कि किस फिल्म सितारे का बेटा अपने टिफिन में क्या लेकर आया है,किस उद्योगपति के बेटे ने किस विलायती कंपनी के जूते पहन रखे हैं या यूनीफॉर्म की दुनिया में नया फैशन क्या चल रहा है. वे यह भी जान सकेंगे कि पॉकेट मनी क्या बला होती है और उनके माता-पिता की महीने भर की कमाई से ज्यादा पैसे इस मद में अमीर बच्चे किस मासूमियत से उड़ा देते हैं.


ज़रा सोचिये कि जब धारावी की झोपड़पट्टी का कोई बच्चा किसी इंटरनेशनल स्कूल में शान से क्लास अटेंड करेगा तो कितना अद्भुत नज़ारा होगा! धर्म, जाति, भाषा, वर्ग के कितने बंधन चकनाचूर होंगे. कई फ़िल्मी कहानियां हकीक़त बन सकती हैं. कई हाथ आसमान छू सकते हैं. कई सपने साकार हो सकते हैं. समाज में समरसता का एक नया दौर शुरू हो सकता है. कई किताबी बातें अमली जामा पहन सकती हैं.


यह मुमकिन होने जा रहा है राईट टू एजूकेशन एक्ट के प्रावधानों पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर लग जाने के चलते. प्रावधान यह है कि देश भर के प्रायवेट स्कूलों को गरीब तबके के बच्चों के लिए 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित करनी ही करनी हैं. बिना सरकारी मदद वाली अल्पसंख्यक प्रायवेट स्कूलों को इस दायरे से बाहर रखा गया है.


केंद्र सरकार ने सभी राज्यों से कहा है कि वे उपलब्ध सीटों तथा लाभान्वित होनेवाले छात्रों की सूची यथाशीघ्र भेजें. एक अनुमान के मुताबिक़ महाराष्ट्र में करीब 6000 प्रायवेट स्कूल हैं और इनमें 88000 से अधिक गरीब छात्रों को दाखिला दिया जा सकता है. ऐसे में पूरे देश की कल्पना कीजिये. एक करोड़ से ज्यादा गरीब छात्र पहले ही वर्ष लाभान्वित हो सकते हैं. लेकिन कहना जितना आसान है, करना उतना ही कठिन.

आर्थिक रूप से पिछड़े छात्रों को 25 प्रतिशत आरक्षण मिलना कम से कम इस साल तो संभव नहीं लगता. राज्य सरकारों ने अभी तक इस सम्बन्ध में स्कूलों को विशेष दिशा-निर्देश जारी नहीं किये हैं. दूसरी ओर प्रायवेट स्कूल दावा कर रहे हैं कि उनके यहाँ सीटें पहले ही फुल हो चुकी हैं क्योंकि अगले सत्र के एडमीशन की प्रक्रिया पूरी हो गयी है. उधर शिक्षा कार्यकर्ताओं का कहना है कि ये स्कूल जून के पहले एडमीशन प्रक्रिया बंद नहीं कर सकते. एनजीओ 'फोरम फॉर फेयरनेस इन एजूकेशन' के अध्यक्ष जयंत जैन ने धमकी दी है कि अगर इसी साल से सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर अमल नहीं हुआ तो हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की जायेगी. तर्क यह है कि प्रायवेट स्कूलों को एडमीशन लेने में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए थी. हाई कोर्ट की औरंगाबाद खंडपीठ ने पिछले साल ही यह रूलिंग दी थी कि स्कूलों को जून के आसपास एडमीशन लेना चाहिए.


जाहिर है कि बहुत कठिन है डगर पनघट की. समाज विज्ञान भले ही सिद्ध कर चुका है कि अगर समान अवसर मिले तो कामयाबी पाने के लिए गरीब-अमीर होना कोई मायने नहीं रखता. लेकिन सामाजिक समरसता की जिसे पड़ी हो वह अपना घर फूंके. प्रायवेट स्कूलों की हीला-हवाली से जाहिर है कि वे अपने माल कमाऊ बिजनेस मॉडल को आसानी से चौपट नहीं होने देंगे.

अब 'देवताओं' के बच्चों के साथ क्लासरूम में बैठने वाले 25 प्रतिशत 'आदम' के बच्चों से यह तो नहीं कहा जा सकता कि फलां ब्रांड के जूते पहन कर आओ, ज्ञानवर्द्धक पिकनिक के नाम पर लाखों का चेक डैडी से कटवा कर भेजो, एनुवल फंक्शन के नाम पर हजारों रुपये कंट्रीब्यूट करो. उनसे यह भी नहीं कह सकते कि सुप्रीम कोर्ट की कृपा से आये हो तो एसी क्लासरूम से बाहर जाकर बैठो. यह भी नहीं कह सकते कि तुम्हारे जैसे झोपड़ावासियों की संगत में ये महलवासी बच्चे बिगड़ रहे हैं इसलिए स्कूल आना ही बंद कर दो. इस सूरत-ए-हाल में प्रायवेट स्कूल वाले क्या करें! फिलहाल उन्हें यही सूझ रहा है कि सीटें न होने का बहाना बनाया जाए. क्या करें, देश की सबसे बड़ी अदालत का आदेश है, टाला भी नहीं जा सकता.


आशंकाओं कुशंकाओं के बावजूद इतना तो तय है कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश पूरी तरह इस सत्र से न सही अगले सत्र से लागू करना ही होगा. चाहे प्रायवेट स्कूल वाले अपने यहाँ सीटें बढाएं या नए स्कूल खोलें, गरीब बच्चों को 25 प्रतिशत सीटों पर बिठाकर पढ़ाना ही पड़ेगा. ऐसे में सरकारों को इस बात की कड़ी निगरानी करनी पड़ेगी कि प्रायवेट स्कूलों के अन्दर गरीब बच्चों के साथ शिक्षण अथवा व्यवहार में किसी तरह का भेदभाव न होने पाए. सबसे अहम बात यह है कि शिक्षा कार्यकर्ताओं को चौकस रहना पड़ेगा कि कहीं किसी गरीब की जगह अमीर बच्चे को झोपड़ावासी या नौकरानी-पुत्र बनाकर एडमीशन देने का खेल शुरू न हो जाए यानी बैक डोर इंट्री. और अगर यह सिलसिला चला तो आगे चलकर घृणा के नए प्रतिमान भी स्थापित हो सकते हैं!

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