रविवार, 30 दिसंबर 2007

बंधु, इस साल जहाँ रहो वहीं रोशनी लुटाओ!

एक और साल गया, लेकिन समाज व्यवस्था में बदलाव के संकेत दिख नहीं रहे हैं. कोई अगर यह कहे कि यूपी में मायावती का सरकार बना लेना किसी क्रांति की शुरुआत है या मोदी का गुजरात में फिर सत्तारूढ़ होना पतन की; तो वह समझ उसे मुबारक हो. इन दोनों घटनाक्रमों में पुनरावृत्ति है, नवीनता नहीं।

नए साल से सिर्फ़ उम्मीद रखकर क्या होगा? सक्रिय होना पड़ेगा बंधु! सक्रिय होने का यह मतलब नहीं है कि 'नौकरी छोड़ो, व्यापार करो." बल्कि मुराद ये है कि जहाँ रहो, वहीं रोशनी लुटाओ. अगले साल अगर आप इतना भी कर ले जाते हैं कि अपनी मान्यताओं और आदर्शों से समझौता न करें, सही-ग़लत में फर्क करना सीख सकें, बड़े से बड़े रिस्क की परवाह न करते हुए सही पक्ष का साथ दे सकें, तो साल सार्थक समझियेगा।

अपने आस-पास नज़र डालिए, जो लोग समाज परिवर्त्तन के काम में लगे हैं, उनकी सूची बनाइये, उनका साथ देने की कोशिश कीजिये. कोई व्यक्ति अगर आपके विचार से सहमत नहीं है तो उसके साथ ज़ोर-जबरदस्ती मत कीजिये. अपने व्यवहार तथा काम से अपनी बात साबित कीजिये. कवियों के कवि शमशेर ने कहा भी है- 'बात बोलेगी हम नहीं, भेद खोलेगी बात ही.'

'मेरे अकेले के बदल जाने से क्या होगा?'- अगर यह प्रश्न आपको निस्तेज कर दिया करता है तो मैं यहाँ एक किस्सा सुनना चाहूंगा।

एक राजा ने राजकुमारी की शादी में प्रजा के बीच ढिंढोरा पिटवाया कि बारातियों के स्वागत के लिए जिसके पास जितना हो सके, लोग आज की रात दूध दान करें. नगर के बीचों बीच एक हौज बनवाया गया ताकि लोग उसमें दूध डालें।

रात में एक दम्पति ने सोचा कि अगर वे एक लोटा दूध की जगह पानी डाल दें तो हौज भर के दूध में किसे पता चलेगा? उन्होंने ऐसा ही किया।

सुबह लोगों ने देखा तो जाहिर हुआ कि पूरा हौज ही पानी से भरा हुआ है।

तो देखा आपने एक आदमी की बेईमान सोच का क्या नतीजा निकला. इसी तरह अगर ज्यादा से ज्यादा लोगों की सोच जनहित वाली हो जाए तो पूरा मंजर ही बदल सकता है।

**प्रतिज्ञा कर लीजिये कि अगर आप लाभ के पद वाली किसी कुर्सी पर बैठे हैं तो उसका नाजायज फ़ायदा नहीं उठाएंगे और न ही किसी को उठाने देंगे।

** लांच-घूस से तौबा करेंगे और इसमें लिप्त लोगों का भंडाफोड़ करेंगे।

** अपने आस-पास के लोगों की समस्याओं को सुलझाने में ख़ुद दिलचस्पी दिखाएँगे और बदले में कोई उम्मीद न रखेंगे।

साल २००८ में इतना कर ले गए, तो समझो गंगा नहाई. मैं मानता हूँ कि पर उपदेश कुशल बहुतेरे. लेकिन यह शराब और सिगरेट छोड़ने जैसे अवास्तविक 'न्यू इयर रेजोल्यूशंस' जितना दुर्धर्ष भी नज़र नहीं आता.


और अंत में एक आजमाया हुआ नुस्खा: किसी का ब्लॉग पढ़कर यदि गुस्सा आ जाए तो कुर्सी से सीधे उठकर २० मिनट की दौड़ लगा आयें तथा लौटने पर धीरे-धीरे एक गिलास पानी पी जाएं.

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