गुरुवार, 16 जनवरी 2020

सीएए और एनआरसी के विरोध में उतरी महिलाएं सत्ता की चूलें हिला सकती हैं



इतिहास गवाह है कि एक कट्टर और रूढ़िवादी भारतीय समाज में हिंदू और मुस्लिम महिलाएं 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से पहले बड़े पैमाने पर सड़कों पर कभी नहीं उतरी थीं, और हमारी आंखों के सामने इतिहास बन रहा है जब धार्मिक भेदभाव को हवा देने वाले नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) और नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर (एनआरसी) के विरोध में करोड़ों भारतीय नागरिकों के साथ हिंदू-मुस्लिम महिलाएं कंधे से कंधा मिलाकर देशव्यापी आंदोलन कर रही हैं. कोलकाता में पिछले हफ्ते एक युवती ने अपने हाथ में जो तख्ती थाम रखी थी, उस पर लिखा संदेश वर्तमान संदर्भों में बेहद मानीखेज है- “मेरे पिता जी को लगता है कि मैं इतिहास की पढ़ाई कर रही हूं; वे नहीं जानते कि मैं इतिहास रचने में मुब्तिला हूं."
दिल्ली के जामिया नगर स्थित मुस्लिम बहुल मोहल्ले शाहीन बाग की महिलाएं बीते दो हफ्तों से ज्यादा समय से सीएए और एनआरसी के खिलाफ अहिंसक प्रदर्शन करती आ रही हैं. कुछ महिलाएं तो कई दिनों से घर ही नहीं गई हैं, अन्य महिलाएं अपने बाल-बच्चों के साथ धरने पर बैठी हैं. अशिक्षित होने के बावजूद अनगिनत महिलाएं इस बात से पूरी तरह वाकिफ हैं कि राष्ट्रव्यापी एनआरसी लागू करने की सरकारी योजना में दांव पर क्या लगा हुआ है. ये सभी समझती हैं कि महिलाएं ज्यादा असुरक्षित एवं सहज शिकार बन जाने की स्थिति में होती हैं: संपत्ति के कागजात आम तौर पर पुरुषों के नाम पर होते हैं, और कइयों के पास तो भारतीय नागरिकता साबित करने हेतु जरूरी दस्तावेज ही नहीं हैं. असम में संपन्न एनआरसी गवाह है कि वहां के हिंदीभाषी और बंगाली समुदाय के जिन लोगों ने असम से बाहर शादी की थी, उनकी पत्नियों का नाम कट चुका है. उन महिलाओं ने अपने-अपने मायकों से दस्तावेज जुटाए थे लेकिन वे निर्धारित अर्हताओं पर खरे नहीं उतरे. महिलाओं के मन में व्याप्त असुरक्षा का अंदाजा लगाया जा सकता है क्योंकि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने स्पष्ट कह दिया है कि देशव्यापी एनआरसी में आधार कार्ड वगैरह से काम नहीं चलेगा.
बात सिर्फ शाहीन बाग ही नहीं है; मुंबई, औरंगाबाद, बैंगलोर, जयपुर, पटना, चेन्नई जैसे शहरों में महिलाओं ने खामोश प्रदर्शन किए हैं. धरना-प्रदर्शनों में जिस नारे ने सबका ध्यान खींचा, वो था- “जब हिंदू-मुस्लिम राजी, तो क्या करेगा नाजी?” अभिनेत्री रेणुका शहाणे ने पीएम को संबोधित करते हुए ट्वीट किया- “असली टुकड़े-टुकड़े गैंग आपका आईटी सेल है सर!... उन्हें नफरत फैलाने से रोकिए.” यह महिलाओं की इतिहास दृष्टि, गहरी राजनीतिक समझ, हालात पर पैनी नजर, निर्भीकता, कल्पनाशीलता, आत्मसंयम और बेहद अनुशासित होने का द्योतक है. प्रतिरोधी आंदोलन में महिलाओं की उपस्थिति, उनकी दृढ़ता और अहिंसक प्रवृत्ति ही इस दावे को खारिज करने के लिए काफी है कि इन प्रदर्शनों को "विपक्ष" अथवा "बाहर से उकसावा देने वालों" द्वारा हवा दी गई है. इन विरोध प्रदर्शनों के निहितार्थ बड़े गहरे हैं. भारतीय महिलाओं ने जामिया मिलिया और समूचे उत्तर प्रदेश में अनाहूत क्रूर पुलिसिया हिंसा के सामने अपनी अहिंसा की ताकत और संविधान के प्रति निष्ठा दिखा दी है.
गौर करने की बात यह है कि इन महिलाओं को आप वर्गीकृत करना चाहें, तो बड़ी मुश्किल होगी. इनमें फिल्म अभिनेत्रियों से लेकर शिक्षिकाएं, नर्सें, निजी दफ्तरों की कामकाजी महिलाएं, स्कूली पढ़ाई से लेकर उच्चतर शोध करने वाली छात्राएं, रोज कुआं खोदने और रोज पानी पीने वाली मजदूरिनें, बुरके में सरापा ढंकी महिलाएं, बालों को हिजाब में छुपाती युवतियां, गृहणियां- यानी जीवन के हर क्षेत्र से जुड़ी हर आयु-वर्ग की पेशेवर और आम महिलाएं शामिल हैं. घरों से निकलकर सड़क पर उतरी इन महिलाओं में अधिकांश संख्या उनकी है, जो अशिक्षित हैं, परिजनों से भयभीत हैं लेकिन पुलिस की लाठी से जरा भी नहीं डरतीं! पहचाने जाने के डर से कुछ तो अपना पूरा या असली नाम भी नहीं बताना चाहतीं लेकिन सीएए और एनआरसी के आसन्न खतरों को वे अपनी टूटी-फूटी भाषा से लेकर अंग्रेजी और परिष्कृत हिंदी में जबान दे रही हैं.
कई महिला आंदोलकारी हर दशक की शुरुआत में होने वाली जनगणना, एनपीआर 2010, एनपीआर 2019 और एनआरसी के बीच के फर्क को बड़ी स्पष्टता से खोल कर रख रही हैं. वे डिटेंशन शिविरों की हकीकत और हालात से भी वाकिफ हैं और इस मामले में बोले गए मोदी-शाह के झूठ को भी भीड़ के सामने उजागर करती हैं. वे इस बात का भी खुलासा करती हैं कि बाप-दादाओं के दस्तावेज जुटाने में भारतीयों, खासकर गरीबों और मध्य वर्ग के नागरिकों के सामने कैसी-कैसी मुसीबतें पैदा होंगी. एनआरसी, एनपीआर और सीएए की उपयोगिता को लेकर प्रधानमंत्री मोदी, केंद्रीय गृह-मंत्री अमित शाह और केंद्र सरकार के अन्य मंत्रियों द्वारा दिए गए बयानों का अंतर्विरोध सबके सामने ला रही हैं. जामिया की तीन छात्राएं-आयशा रेना, लबीदा फरजाना और चंदा यादव तो पुलिस की लाठियों के सामने एक साथी छात्र की ढाल बन गई थीं. उन्हें लाठी भांजने वाले पुलिसकर्मियों और साथी छात्र के बीच में पड़ कर प्रतिवाद करते हुए और अकल्पनीय क्रूरता के लिए पुलिसवालों को फटकार लगाते हुए देखा जा सकता है.
अब तक महिलाएं प्रायः लैंगिक भेदभाव और मनचलों की छेड़छाड़ के खिलाफ मुखर होती रही हैं, लेकिन संविधान की मूल भावना के साथ हुई छेड़छाड़ को रोकने के लिए उनका इस तरह आक्रोशित होना भारतीय परिप्रेक्ष्य में अभूतपूर्व है. उन्होंने जता दिया है कि पानी सर के ऊपर से गुजर चुका है और चुनावी जीत के मद में चूर, बड़बोली, मिथ्यावादी, निरंकुश और अधिनायकवादी सरकार के सामने वे आत्मसमर्पण नहीं करनेवाली हैं. राजनीतिक आरोपों और सत्तारूढ़ खेमे के दावों के विपरीत इन विरोध प्रदर्शनों की खास बात यह है कि महिलाओं की इस अप्रत्याशित जुटान के पीछे किसी संगठन या संस्था या समूह या दल का हाथ नहीं है. विरोध जताने के लिए स्थान या अवसर की परवाह भी नहीं की गई है. एक ओर जहां दिल्ली को नोएडा से जोड़ने वाले मुख्य हाईवे के एक हिस्से पर कब्जा जमाया गया, तो दूसरी तरफ पांडिचेरी विश्वविद्यालय की स्वर्णपदक विजेता रबीहा अब्दुर्रहीम और जादवपुर विश्वविद्यालय की देबास्मिता चौधरी ने कैम्पस में आयोजित दीक्षांत समारोहों के मंचों पर ही सीएए का कड़ा विरोध दर्शाया. दक्षिण भारतीय अभिनेत्री रीमा कलिंगल ने अपने फेसबुक पेज पर लिखा- “धर्म के आधार पर हमारे शांतिपूर्ण राष्ट्र को मत बांटिए.”
महिलाओं की यह जागरूकता इस संदर्भ में भी उल्लेखनीय है कि हिंदू समाज में सदा से हावी जबर्दस्त पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण ने कथित महिला सशक्तीकरण के नाम पर चंद रेवड़ियां बांटने के अलावा कभी भी लड़कियों और महिलाओं के बारे में गहराई से सोचने की जहमत नहीं उठाई. इस्लाम में प्रदत्त औरतों के हुकूक की लाख दुहाई देने के बावजूद मुस्लिम महिलाएं कठमुल्लों की कठपुतलियां बना कर रख दी गईं. महिलाओं को हमेशा "भारतीय नारीत्व" की पवित्र आभा में लपेटे रखने का प्रयास किया गया. इस पसमंजर में वर्तमान विरोध प्रदर्शन हिंदू-मुस्लिम महिलाओं की छवियों का एक दिलेर और मर्मभेदी कोलाज पेश करते हैं, जिन्होंने लादी गई हिफाजत के पिंजरे को तोड़ दिया है और लोकतांत्रिक असंतोष के लबालब भरे तूफानी समंदर में छलांग लगा दी है. उनका बाहर निकला एक-एक कदम किसी भी जनविरोधी और महाशक्तिशाली सत्ता की चूलें हिला सकता है.
- विजयशंकर चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार

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