शनिवार, 26 अगस्त 2023

मेरी नई ग़ज़ल

 प्यारे दोस्तो,

बुजुर्ग कह गए हैं कि हमेशा ग़ुस्से और आक्रोश में भरे रहना सेहत के लिए ठीक नहीं होता। इसीलिए आज पेश कर रहा हूं अपनी एक रोमांटिक ग़ज़ल- आप भी इसे गुनगुनाते हुए थोड़ा-सा रोमानी हो जाएँ! ❤😄


तुम्हारी नज़र का निशाना कहाँ है

नया ज़ख़्म फिर से लगाना कहाँ है


अभी ख़्वाब सोए हैं पलकों की ज़द में

अभी आंसुओं का ठिकाना कहाँ है


ये पहला सबक है ग़म-ए-आशिक़ी का

के कब रूठना है मनाना कहाँ है


खिला चाँद छत पर तो अक्सर वो रोए

हँसी और ख़ुशी का ज़माना कहाँ है


कभी गुल ने बुलबुल से क्या इल्तिजा की

हमें कब किसी को बताना कहाँ है


मोहब्बत के दीदार को तुम न तरसो

फ़क़त ये बता दो कि आना कहाँ है


-विजयशंकर चतुर्वेदी


(हुनरमंद लोग चाहें तो इसे अपनी आवाज़ में रिकॉर्ड करके मुझे लौटा भी सकते हैं। मैं हरगिज़ बुरा नहीं मानूँगा। 😂😂)

शनिवार, 18 जनवरी 2020

डोनाल्ड ट्रंप चुनाव भले हार जाएं लेकिन महाभियोग से बच निकलेंगे!


संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड जे. ट्रंप भले ही बड़बोलेपन में कहते फिर रहे हों कि जब उन्होंने बुश वंश, क्लिंटन वंश और ओबामा को हरा दिया था तो उनके खिलाफ चलाया जा रहा महाभियोग क्या चीज है, लेकिन आगामी चुनाव हारने की आशंका से उपजी धुकधुकी वे छिपा नहीं पा रहे. वह कह रहे हैं कि महाभियोग की कार्रवाई पूरी तरह से पक्षपातपूर्ण है और उन्हें एक 'फर्जी' प्रक्रिया से गुजरना होगा ताकि डेमोक्रेट (रिपब्लिकन ट्रंप के विपक्षी सांसद) इसे आजमा सकें और राष्ट्रपति पद का उनका उम्मीदवार चुनाव जीत सके.
महाभियोग की वर्तमान प्रक्रिया को लेकर ट्रंप ने दलील पेश की है कि 1692-93 के दौरान सालेम, मैसाचुसेट्स में डायन और भूत-प्रेत बताकर फांसी पर चढ़ाई गई बदकिस्मत महिलाओं और पुरुषों के जितनी यथोचित प्रक्रिया से भी उन्हें वंचित रखा गया है. लेकिन ट्रंप चाहे जितना विक्टिम कार्ड खेलें और अपने पक्ष में सहानुभूति जुटाने की कोशिश कर लें, अमेरिकी संसद के उच्च सदन सीनेट में उनके खिलाफ ऐतिहासिक महाभियोग की सुनवाई शुरू हो चुकी है. ट्रंप की धुकधुकी का कारण मात्र यह नहीं है कि सदन में ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी का बहुमत बारीक है, बल्कि यह भी है कि आरोपों की गंभीर प्रकृति को देखते हुए शक्तिशाली मीडिया और अधिकतर अमेरिकी मतदाता उनके खिलाफ हो गए हैं, जिससे हार का खतरा बढ़ गया है. यदि ट्रंप से मतभेद रखने वाले कुछ रिपब्लिकन सांसदों ने प्रस्ताव के पक्ष में वोट कर दिया तो उनको राष्ट्रपति पद से भी हटना पड़ जाएगा. लेकिन क्या वाकई ऐसा होगा?
ट्रंप पर आरोप है कि उन्होंने 2020 के आगामी राष्ट्रपति चुनाव के अपने संभावित प्रतिद्वंद्वी जो बिडेन की छवि खराब करने के लिए यूक्रेन से गैरकानूनी रूप से मदद मांगी. बता दें कि बिडेन के बेटे हंटर यूक्रेन की एक ऊर्जा व गैस कंपनी ‘बरीस्मा’ में बड़े अधिकारी के पद पर हैं. ट्रंप ने हंटर बिडेन के कारोबार के बारे में जानकारियां मांगी थीं, जिनका इस्तेमाल वह अपने चुनाव प्रचार के दौरान कर सकते थे. दूसरा आरोप यह है कि उन्होंने अपने राजनीतिक लाभ के लिए यूक्रेन को मिलने वाली आर्थिक मदद को रोक दिया और दस्तावेजों को दबाकर, सफेद झूठ और वाक्छल का इस्तेमाल करके, अपने स्टाफ या मंत्रिमंडल के किसी भी सदस्य को गवाही देने से रोक कर और कांग्रेस के सम्मनों का जवाब देने में नाकाम रहकर कांग्रेस को बाधित किया. अमेरिकी संविधान के मुताबिक ये दोनों ही ऐसे अपराध हैं, जिनके सिद्ध होने पर राष्ट्रपति को पद से हटाया जा सकता है.
अमेरिका के इतिहास में ऐसा तीसरी बार है जब सीनेट चैंबर उच्चतम न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता में महाभियोग की अदालत में तब्दील हो गया हो! उच्चतम न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश जॉन रॉबर्ट ने सांसदों को सीनेट में मौजूद 99 सांसदों को शपथ दिलाई कि वे इस बारे में निष्पक्ष निर्णय लेंगे कि अमेरिका के 45वें राष्ट्रपति को पद से हटाया जाए या नहीं. ट्रंप से पहले अमेरिकी राष्ट्रपति एंड्रयू जॉनसन के खिलाफ 1868 में और बिल क्लिंटन के खिलाफ 1998 में महाभियोग लगाया गया था, लेकिन अब तक किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति को महाभियोग द्वारा पद से हटाया नहीं जा सका. राष्ट्रपति निक्सन ने तो महाभियोग चलाए जाने से पहले ही अपना इस्तीफा सौंप दिया था और वाटरगेट टेप सार्वजनिक होने के बाद उन्होंने सबके सामने यह स्पष्ट कर दिया था कि वह सिरे से झूठ बोलते चले आ रहे हैं.
एंड्रयू जॉनसन के विरुद्ध आरोप था कि उन्होंने तत्कालीन रक्षा सचिव एडविन स्तेंटन को हटाकर उनकी जगह मेजर जनरल लोरेंजो थॉमस को नियुक्त करने का प्रयास किया और अंततः जनरल उलिसिस ग्रांट को अंतरिम रक्षा सचिव नियुक्त किया, जो 1867 में अमेरिकी कांग्रेस द्वारा पारित टेन्योर ऑफ ऑफिस एक्ट का स्पष्ट उल्लंघन था. बिल क्लिंटन के विरुद्ध आरोप यह था कि उन्होंने अरकांसस राज्य की पूर्व कर्मचारी पाउला कॉर्बिन जोंस द्वारा दाखिल यौन अपराध के मुकदमे में स्वयं के, जोंस और मोनिका लेविंस्की के संबंधों को लेकर झूठ बोला और न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयास किया.
पूर्व राष्ट्रपतियों की भांति ट्रंप के खिलाफ भी झूठ बोलने और अमेरिकी कांग्रेस को बाधित करने के ही आरोप लगे हैं. उन पर हैरानी भरा आरोप यह भी है कि यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदोमीर जेलेंस्की यदि हंटर बिडेन के कारोबार की जांच करने की हामी भर देते तो आर्थिक सहायता बहाल हो जाती! अब संसद की निगरानी समिति ने नया रहस्योद्घाटन किया है कि संसद की स्वीकृति के बावजूद व्हाइट हाउस ने यूक्रेन को दी जाने वाली सैन्य सहायता पर भी रोक लगा रखी है, जो यह कानून का स्पष्ट उल्लंघन है. चूंकि अमेरिका में चुनावी मौसम शुरू हो चुका है इसलिए स्वाभाविक रूप से यह मुद्दा भी एक राजनीतिक बवंडर की शक्ल ले चुका है और ट्रंप बुरी तरह घिर गए हैं.
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या पूर्व राष्ट्रपतियों की तरह ट्रंप भी महाभियोग से बच निकलेंगे या उन्हें पद से हटना पड़ेगा और कोई सजा मिलेगी? ट्रम्प मूल रूप से राजनेता नहीं, एक सफल निर्माण कारोबारी और होटल व्यापारी रहे हैं और इस धंधे को उन्होंने जिस अकड़ के साथ किया है, उसका वर्णन उन्होंने अपनी किताब ‘आर्ट ऑफ द डील’ में किया भी है. दक्षिणपंथियों द्वारा अपनाए जाने वाले सारे हथकंडे अपनाने में वह माहिर हैं. अमेरिकी अर्थव्यवस्था को खुद नए संकट में डालने वाले ट्रंप ने मतदाताओं को आशंकित करते हुए कहा है कि अगर चुनावों में डेमोक्रेटिक पार्टी की जीत होती है तो अर्थव्यवस्था तबाह हो जाएगी और शेयर बाजार डूब जाएगा.
अमेरिका में ट्रंप और उनकी रिपब्लिकन पार्टी श्वेत वर्चस्ववाद की पैरोकार है. ट्रंप का मानना है कि अमेरिका में सिर्फ श्वेतों को ही सच्चे नागरिक के रूप में समझा जा सकता है और बाहर से आने वाले महज परिस्थितिजन्य अमेरिकी हैं. इसी मान्यता के चलते ट्रंप ने अमेरिकी कांग्रेस की चार गैर-श्वेत महिला सदस्यों को अपने देश लौट जाने के लिए कह दिया था. उन्होंने बिना वारंट के छापा मारने को मंजूरी दी थी ताकि करीब 110 लाख ऐसे लोगों का प्रत्यर्पण किया जा सके, जिनके पास अमेरिकी दस्तावेज नहीं हैं, हालांकि ये लोग वर्षों से अमेरिका में रह रहे हैं. पिछले नवंबर में ट्रंप ने धमकी दी थी कि अमेरिका में जन्म लेने मात्र से नागरिकता मिलने की गारंटी खत्म की जा सकती है. जबकि अमेरिकी संविधान का 14वां संशोधन स्पष्ट करता है कि जो भी अमेरिका में जन्मा है, वह अमेरिकी नागरिक है.
श्वेत श्रेष्ठता वाला नस्लवाद रिपब्लिकन पार्टी के मूल में है, जो ट्रंप के हर बयान से झरता है. उन्होंने बेधड़क होकर मैक्सिको के निवासियों को "बलात्कारी", महिलाओं को "मादा सुअर" और "कुतियों" के रूप में चित्रित किया था और बड़ी ढिठाई के साथ यह घोषित किया था कि वह न्यूयॉर्क स्थित फिफ्थ एवेन्यू के ऐन बीच में खड़े होकर एक भी मतदाता खोए बगैर या कोई मुसीबत झेले बिना किसी को भी गोली से उड़ा सकते हैं! अश्वेत डेमोक्रेट बराक ओबामा का राष्ट्रपति चुना जाना रिपब्लिकन श्वेत नस्लवादियों के लिए नाकाबिले बर्दाश्त ठहरा था. उन्हें लगा कि जिस अमेरिका को वे जानते-पहचानते थे कि वह उनकी आंखों से सामने से नदारद हो गया है, उसे ‘पुनर्प्राप्त’ करना ही होगा. दरअसल डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका में समय चक्र को इतना पीछे ले जाना चाहते हैं, जहां चुने हुए जनप्रतिनिधि भी खुल कर नस्ली श्रेष्ठता की बोली बोल सकें.
इस मानसिकता को देखते हुए नहीं लगता कि रिपब्लिकन सांसदों के बहुमत वाली सीनेट में छोटे-मोटे आपसी मतभेदों के बावजूद ट्रंप के राष्ट्रपति पद को कोई खतरा पैदा होगा. ट्रम्प की नजर में चुनाव से ठीक पहले महाभियोग की कार्रवाई शुरू हो जाना सुर्खाब के पर लगने जैसी किसी उपलब्धि की तरह है, और इससे बच निकलने को, जिसका उनको भी पूरा यकीन है, वह अपने मुकुट में जड़े एक और हीरे की तरह बखान करते फिरेंगे.

गुरुवार, 16 जनवरी 2020

मुंबई का अंडरवर्ल्ड और राजनीतिक वर्ल्ड एक-दूसरे को खाद-पानी देते रहे हैं!


शिवसेना के राज्यसभा सांसद और प्रवक्ता संजय राउत बयानबहादुर आदमी हैं. अपने बयानों को जब वे शेरो-शायरी की चासनी में भिगो कर पेश करते हैं तो मामला बड़ा रंगीन हो जाया करता है. लेकिन जब मुंबई में एक मीडिया समूह के कार्यक्रम के दौरान उन्होंने दावा किया कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी अंडरवर्ल्ड डॉन करीम लाला से दक्षिणी मुंबई के पायधुनी इलाके में मिला करती थीं, तो मामला रंगीन होने की जगह संगीन हो गया, क्योंकि उनकी पार्टी शिवसेना महाराष्ट्र में जिस बैसाखी के सहारे गठबंधन की सरकार चला रही है, उसकी एक टांग कांग्रेस भी है.
अपने पत्रकारिता वाले नॉस्टैल्जिया में डूबकर राउत ने एक के बाद एक खुलासा करते हुए कहा था कि अस्सी के दशक में दाऊद इब्राहिम, छोटा शकील, शरद शेट्टी जैसे मुंबई के डॉन ही तय किया करते थे कि मुंबई पुलिस का कमिश्नर कौन होगा और कौन राज्य सचिवालय में बैठेगा और कौन मंत्रालय में बैठेगा! और यह भी कि हाजी मस्तान जब मंत्रालय पहुंचता था तो पूरा सचिवालय काम-धाम छोड़कर उसे देखने पहुंच जाता था! हालांकि राउत ने गांधी परिवार के प्रति सम्मान जताते हुए आज सफाई दे दी है कि इंदिरा जी करीम लाला से पठानों के नेता के रूप में मिलती थीं, किसी डॉन के रूप में नहीं. लेकिन महाराष्ट्र सरकार को अस्थिर करने का कोई मौका न चूकने वाली शिवसेना की पूर्व पार्टनर बीजेपी स्वभावतः राउत के इन हवाहवाई विवरणों को लेकर शिवसेना और कांग्रेस दोनों पर हमलावर हो गई है.
नब्बे के दशक में बाल ठाकरे का धमाकेदार इंटरव्यू लेकर लाइमलाइट में आए और कभी मराठी दैनिक ‘लोकसत्ता’ के स्टार पत्रकार रहे संजय राउत की आज एक शिवसेना नेता के रूप में सफाई और मजबूरी समझी जा सकती है. लेकिन यह बात सच है कि मुंबई के अंडरवर्ल्ड का राजनीतिक और फिल्मों से ऑफ द रिकॉर्ड चोली-दामन का नाता रहा है. यहां बॉलीवुड और अंडरवर्ल्ड के रिश्तों का जिक्र करना विषयांतर होगा. लेकिन मुंबई के प्रथम स्थापित डॉन हाजी मस्तान के गोद लिए बेटे सुंदर शेखर के मुताबिक, जिन्हें मस्तान सुलेमान मिर्जा कह कर बुलाता था, इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी जब भी मुंबई (तत्कालीन बंबई) आते थे, डैडी (मस्तान) से मिलते थे. ऐसे में इंदिरा जी को लेकर संजय राउत की बातें हवाहवाई नहीं लगतीं.
सत्तर और अस्सी के दशक की राजनीति के ट्रेंड को ट्रैक किया जाए तो वह घटनाक्रम उल्लेखनीय जान पड़ता है जिसके तहत कांग्रेस ने मुंबई में जड़ें जमा चुकी वामपंथी राजनीति को उखाड़ फेंकने के लिए शिवसेना को परदे के पीछे से आगे बढ़ाया था. उसी जमाने में कुख्यात तस्कर हाजी मस्तान के मुंबई ही नहीं बल्कि पूरे भारत में बढ़ते ग्लैमर और सामाजिक असर से भी तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी चिंतित रहती थीं. कहा जाता है कि मस्तान ने सरकार के प्रशासन में अपना ऐसा समानांतर सिस्टम स्थापित कर रखा था कि कई रसूखदार नेता भी अपना काम निकलवाने के लिए हाजी मस्तान की शरण में आते थे! मस्तान की गिरफ्तारी का आदेश मिलने पर पुलिस अधिकारी अक्सर बहाने बनाकर निकल लिया करते थे. आश्चर्य नहीं कि मस्तान को कमजोर करने के लिए इंदिरा गांधी ने मस्तान के प्रतिद्वंद्वी पठान गैंगस्टर करीम लाला को शह देने की चाल चली हो!
इंदिरा गांधी ने हाजी मस्तान को 1974 में पहली बार 'मीसा' के अंतर्गत गिरफ्तार करवाया था. लेकिन जब 1975 में इमरजेंसी लगने पर मस्तान को दूसरी बार गिरफ्तार किया गया तो सुनते हैं कि उसने इंदिरा गांधी को अपनी रिहाई के बदले सड़कों पर नोट बिछा देने की पेशकश की थी! जेल काटने के बाद हाजी मस्तान समझ चुका था कि लोहा ही लोहे को काट सकता है. लिहाजा उसने राजनीति का रुख किया और 1984 के दौरान मुंबई और भिवंडी में हुए दंगों के बाद बने माहौल का फायदा उठाते हुए दलित नेता प्रोफेसर जोगेंद्र कवाड़े के साथ मिलकर एक राजनीतिक दल ‘दलित मुस्लिम सुरक्षा महासंघ’ बना लिया. यह अलग बात है कि तस्करी की दुनिया का बेताज बादशाह हाजी मस्तान राजनीति की दुनिया का मामूली प्यादा भी न बन सका. अपराध की दुनिया में अपना सूरज ढलता देख कर ही मस्तान ने महाराष्ट्र; खासकर मुंबई में शिवसेना का विकल्प बनने इरादे से खुद की राजनीतिक पार्टी गठित की थी.
जैसा कि मशहूर है कि हर अपराधी छटपटाकर आखिरकार अपनी पनाहगाह राजनीति में ही ढूंढ़ता है और सफेदपोश बनना चाहता है. मस्तान के नक्शेकदम पर चलते हुए मुंबई के कई कुख्यात गैंगस्टरों ने पुलिस और अदालत के शिकंजे से बचने के लिए परोक्ष या अपरोक्ष रूप से राजनीति का दामन थामने की कोशिश की और कुछ तो इसमें काफी हद तक सफल भी हो गए. हमेशा झक सफेद कुर्ता व टोपी पहनने वाले तथा मुंबई के अंडरवर्ल्ड में ‘डैडी’ और ‘सुपारी किंग’ के नाम से कुख्यात दाऊद गैंग के दुश्मन अरुण गवली ने भी कानून के डर से राजनीति की शरण ली थी. 2004 में उसने ‘अखिल भारतीय सेना’ नाम से राजनीतिक दल बनाया और उसी साल हुए महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में उसने अपने कई उम्मीदवार उतारे और खुद अपनी दगड़ी चाल वाली चिंचपोंकली विधानसभा सीट से चुनाव जीत गया था. गवली कई बार पकड़ा गया, जेल भी काटी, लेकिन कहा जाता है कि राजनीतिक वरदहस्त और भ्रष्ट पुलिस अधिकारियों की मदद से वह हर बार बच निकलता था!
विधायक बनने के बाद गवली को लगने लगा कि अब तो उसे कोई टच ही नहीं कर सकता. एक समय था जब शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे डींग मारा करते थे कि अगर पाकिस्तान के पास दाउद है तो भारत के पास गवली है! गैंगवार में गवली का पलड़ा भारी देखते हुए मुंबई के कई बड़े बिल्डर और व्यापारी अपने कारोबार को बढ़ाने और अपने दुश्मनों को निबटाने के लिए गवली की मदद लेते थे. अंडरवर्ल्ड और राजनीतिक के नेक्सस का यह खुला उदाहरण था. यहां तक कि बाल ठाकरे अमर नाईक और गवली को हिंदू डॉन मानते हुए उनके खिलाफ होने वाली पुलिस कार्रवाइयों की कड़ी भर्त्सना किया करते थे! लेकिन जब 2008 में गवली ने 30 लाख रुपए की सुपारी लेकर शिवसेना के ही पार्षद कमलाकर जामसांडेकर की हत्या करवा दी तो शिवसेना गवली के खिलाफ हो गई.
मुंबई के चेम्बूर इलाके का गैंगस्टर छोटा राजन दाऊद गैंग का खासमखास था. लेकिन मुंबई बम धमाकों के बाद जब गैंग में साम्प्रदायिक आधार पर विभाजन हुआ तो छोटा राजन ने खुद के देशभक्त डॉन बनने का बड़ा स्कोप देखा और उसने दाऊद के करीबी गैंगस्टरों को सजा देने की कसम खाई. इसमें भी उसे बाल ठाकरे का ‘नैतिक’ समर्थन मिल गया था. दूसरी तरफ देखें तो रॉ के एक पूर्व अधिकारी एनके सूद ने कुछ साल पहले यह कह कर बड़ा धमाका किया था कि शरद पवार और अहमद पटेल जैसे कुछ प्रमुख भारतीय राजनीतिज्ञों के दाऊद इब्राहीम से करीबी संबंध रहे हैं!
हालांकि आरोप लगा देने या नाम उछाल देने से ही कोई बात साबित नहीं हो जाती. इंदिरा गांधी को लेकर संजय राउत ने जो बयान दिया है, उसके सबूत पेश करने की जिम्मेदारी भी उन्हीं की बनती है. लेकिन ऊपर के चंद उदाहरण यह बताने के लिए काफी हैं कि मुंबई का अंडरवर्ल्ड और राजनीतिक वर्ल्ड एक दूसरे को धर्मनिरपेक्ष ढंग से खाद-पानी देते रहे हैं.
-विजयशंकर चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार
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विश्वविद्यालयी हिंसा देश का भविष्य तबाह होने की राह पर ले जाएगी


संस्कृत वांङमय में प्राचीन भारत के छात्रों के लिए कहा जाता था- “काकचेष्टा बकोध्यानम्‌ श्वाननिद्रा तथैव च: । श्वल्पाहारी गृहत्यागी विद्यार्थिति पंच लक्षणम्‌॥“ अर्थात्‌ विद्यार्थी को कौव्वे की तरह जानने (ज्ञानप्राप्ति) की सतत चेष्टा करते रहना चाहिए, बगुले की तरह ध्यान केंद्रित करना (पढ़ाई में) चाहिए, कुत्ते की तरह सजग और सचेत मुद्रा में सोना चाहिए, उसे पेटू नहीं होना चाहिए और घर के मोह से मुक्त होना चाहिए।
लेकिन वर्तमान भारत में ये सारे लक्षण शीर्षासन करने लगे हैं। उपर्युक्त श्लोक विकृत ढंग से विद्यार्थियों से अधिक प्रशासकों पर सटीक बैठ रहा है। अध्यापकों और कुलपतियों की काकचेष्टा, बकोध्यान और श्वाननिद्रा शिक्षेतर गतिविधियों पर केंद्रित होकर रह गई है। राजनीतिक के ओवरडोज ने शैक्षणिक संस्थानों को स्कोर सेटल करने के अखाड़ों में तब्दील कर दिया है और छात्र इस या उस विचारधारा का झंडा उठाने वाले कार्यकर्ता बन कर रह गए हैं!
इसे दुर्भाग्य नहीं तो और क्या कहा जाए कि भारत के जिन विश्वविद्यालय कैम्पसों को छात्रों के सर्वांगीण विकास का स्वर्ग होना चाहिए था, विभिन्न मान्यताओं, सिद्धांतों और शिक्षण-पद्धतियों का कोलाज बनना था, आज वे बदले की राजनीति, असहिष्णुता, वैचारिक सफाए और दुर्भावनापूर्ण कार्रवाइयों की आश्रय-स्थली बन गए हैं! हिंसा इक्कीसवीं शताब्दी के समाप्त होने जा रहे पहले दशक की अखिल विश्वविद्यालयी परिघटना रही है। अब तो छात्रों को खुलेआम ‘अर्बन नक्सल’ करार दिया जा रहा है और उनकी अभिभावक केंद्र सरकार तथा कुलाधिपति खामोश हैं, असंख्य पूर्व छात्रों की प्रतिष्ठा दांव पर लगी होने के बावजूद विश्वविद्यालयों के सांस्थानिक रहनुमा धृतराष्ट्र बने बैठे हैं!
छात्रों के विभिन्न गुटों के बीच वैचारिक मतभेद, राजनीतिक सक्रियता, चुनावी झड़पें और युवकोचित हिंसा इन कैम्पसों के लिए कोई नया फिनॉमिना नहीं है। जो लोग छात्रों को सिर्फ अपनी पढ़ाई से ही काम रखने की नसीहतें देते हैं, उन्हें मालूम होना चाहिए कि छात्र राजनीति और छात्र-संघों का सुनहरी इतिहास आजादी से पहले ही लिख दिया गया था। फिर चाहे वह 1920 का असहयोग आंदोलन हो, जिसमें छात्रों ने अपने-अपने शिक्षण संस्थानों का बहिष्कार किया था और कइयों ने पढ़ाई अधर में छोड़ दी थी या 1930 में छिड़े सविनय अवज्ञा आंदोलन का दौर हो, जब छात्र अहिंसक आंदोलन किया करते थे और विदेशी वस्त्रों की होलियां जलाते थे। आजादी के बाद आपातकाल के दौर में जीवनावश्यक वस्तुओं की बढ़ती महंगाई के विरोध में छात्र सड़कों पर उतरे। जेएनयू के छात्रों के विरोध के चलते ‘आयरन लेडी’ इंदिरा गांधी तक को चांसलर का पद छोड़ना पड़ा था। नब्बे के दशक में वीपी सिंह द्वारा लागू किए गए मंडल कमीशन के विरोध की राष्ट्रव्यापी चिंगारी एक छात्र राजीव गोस्वामी ने ही जलाई थी। अन्ना हजारे का आंदोलन हो या निर्भया कांड के खिलाफ पैदा आक्रोश, छात्रों ने बिना किसी पूर्वग्रह के हर जरूरी मौके पर बल भर आवाज बुलंद की है। जेपी आंदोलन से निकले कितने ही छात्र नेता आज केंद्र और राज्य सरकारों का महत्वपूर्ण हिस्सा बन कर अपनी बुजुर्गी काट रहे हैं।
लेकिन हम इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं कर सकते कि केंद्र में पीएम मोदी की अगुवाई में दक्षिणपंथी रुझान वाली सरकार का पहला कार्यकाल शुरू होते ही वामपंथी विचारों के दबदबे वाला जेएनयू कैम्पस छात्र हिंसा-चक्र की धुरी बना कर उभारा गया है। उसे 'राष्ट्रविरोधी' गतिविधियों तथा ‘व्यभिचार’ का केंद्र प्रचारित करके लगातार उसकी छवि काली करने की कोशिश की गई है। जबकि जेएनयू ने बार-बार ‘यूनिवर्सिटी ऑफ इक्सीलेंस’ का खिताब जीतकर तमाम दुष्प्रचार को मिथ्या साबित किया है। जेएनयू ही नहीं, दिल्ली विश्वविद्यालय, हैदराबाद विश्वविद्यालय, जादवपुर विश्वविद्यालय, अलीगढ़ विश्वविद्यालय, बीएचयू और जामिया मिलिया इस्लामिया समेत केरल के कई विश्वविद्यालय परिसर भी शिक्षेतर वजहों से उपजी हिंसक कार्रवाइयों का शिकार बने हैं। विश्वविद्यालयी हिंसा के नए अध्याय में कैम्पसों के भीतर पुलिस की लाठी-गोली हावी हो चली है। चित्र यही उभरता है कि पठन-पाठन के तीर्थों को अपवित्र किया जा रहा है।
यह भी आईने की तरह साफ है कि देश के अलग-अलग कैम्पसों की हिंसक झड़पों में परस्पर विरोधी विचारपद्धतियों से पोषित एवं संवर्द्धित छात्र संगठनों के बीच होने वाले टकराव की अहम भूमिका रही है। नाम लेकर कहें तो वामपंथी आधार वाले छात्र संगठनों (आइसा, डीएसएफ , डीवायएफआई और एसएफआई आदि), कांग्रेस समर्थित एनएसयूआई और दक्षिणपंथी रुझान वाले अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद्‌ (एवीबीपी) की रस्साकसी ने बार-बार इन हिंसक घटनाओं को जन्म दिया है। चूंकि एवीबीपी सत्तारूढ़ दल बीजेपी का छात्र-मोर्चा है, इसलिए हर मामले में उसके सदस्यों को एडवांटेज मिलता है। एवीबीपी का सूत्र-वाक्य है- “छात्र शक्ति, राष्ट्र शक्ति”। लेकिन जान पड़ता है कि वे अपनी परिषद्‌ से बाहर के छात्रों के लिए कोई शक्ति शेष नहीं छोड़ना चाहते! एवीबीपी को मजबूत करने के इरादे से सत्ताधारी खेमे के नेता और संघ प्रचारक अक्सर कैम्पसों के माहौल को 'राष्ट्रवादी' बनाने के लिए प्रशासन की तरफ से कभी 'करगिल विजय दिवस' तो कभी 'दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद' के नाम पर बड़े-बड़े आयोजन करवाते रहते हैं। जेएनयू में तो वीसी जगदीश कुमार ने छात्रों में राष्ट्रवाद की भावना जगाने के लिए तीन साल पहले कैंपस के अंदर सेना का वास्तविक टैंक रखवाने की मांग की थी।
आदर्श स्थिति तो यही है कि हमारे विश्वविद्यालय पूर्ण सरकारी सहयोग और समर्थन से अंतरराष्ट्रीय स्तर की शैक्षणिक गुणवत्ता और शोध के लिए विख्यात हों। उन्हें कद्दावर नेता, राजनयिक, कलाकार और अपने-अपने क्षेत्रों के अधिकारी विद्वान तैयार करने के लिए जाना जाए। लेकिन आज देश-विदेश में इनकी शोहरत- छात्र-आत्महत्या, साजिश के अड्डों, लाठी, पत्थर और लोहे की छड़ें लेकर घूमने वाले नकाबपोशों, होस्टलों में घुस कर किए जाने हमलों, धरना-प्रदर्शनों, गलाफाड़ नारेबाजी, देशद्रोह के मुकदमों, जातिगत भेदभाव, विषमानुपातिक शुल्क-वृद्धि आदि के लिए ज्यादा फैल रही है।
कभी कैम्पसों के माहौल में अकादमिक स्वायत्तता, छात्र-संघों के चुनाव, विश्वविद्यालय प्रशासन में छात्र-संघों का दखल, प्रवेश-प्रक्रिया में बदलाव, पढ़ने-पढ़ाने की भाषा, पुस्तकालयों और अन्य संसाधनों की कमी, अनुदान कटौती और शुल्क-वृद्धि जैसे मुद्दे गरमी पैदा किया करते थे, लेकिन अब कश्मीर की आजादी, अनुच्छेद 370, एनआरसी, पाकिस्तान, अफजल गुरु, जिन्ना, नागरिकता कानून, तिहरा तलाक, राम मंदिर, सबरीमला, मॉब लिंचिंग, मूर्तिभंजन, संविधान का निरादर, चार्जशीट, कंडोम, नियुक्तियों का अतार्किक विरोध जैसे मुद्दे उबाल पैदा करते हैं। इन मुद्दों को राजनीतिक दल अपने-अपने स्वार्थों के चश्मे से देखते-तोलते हैं लेकिन छात्रों की समस्याओं को घोषणा-पत्रों का हिस्सा कभी नहीं बनाते।
विश्वविद्यालय कैम्पस के भीतर अगर छात्र राजनीति करते हैं, तो आप उसे कदाचार का नाम नहीं दे सकते। उच्च शिक्षा का उद्देश्य सरकारी कारकून तैयार करना नहीं बल्कि युवकों का सर्वांगीण व्यक्तिगत और चारित्रिक विकास करना होता है। अगर कल के नीति निर्माता आज की समस्याओं पर विचार-मंथन नहीं करेंगे तो सटीक समाधान निकालने और निर्णय लेने की क्षमता उनमें कैसे विकसित होगी? वंशवाद की राजनीति का खात्मा कैसे होगा? इसीलिए छात्र-राजनीति को समकालीन राष्ट्रीय परिदृश्य का प्रतिबिम्ब कहा जाता है। यह देश को प्रभावित करने वाले मुद्दों से जुड़ाव, नागरिक समस्याओं के प्रति जागरूकता और समाज का वर्गीय प्रतिनिधित्व कैम्पस में ही पैदा कर देती है। शिक्षा का असल मतलब डिग्री हासिल करके कोई नौकरी पकड़ लेना नहीं होता, बल्कि अच्छे और बुरे के बीच चुनाव करने की सलाहियत पैदा करके अच्छाई के हक में आवाज बुलंद करना उसका मूल उद्देश्य होता है।
हमारे कैम्पसों में हिंसा की बाढ़ का कारण शैक्षणिक अथवा राष्ट्रीय मुद्दों को लेकर होने वाली छात्र राजनीति नहीं है। इस हिंसा का असली कारण सरकार से असहमत छात्रों को भयभीत करने के लिए सत्तारूढ़ दल समर्थित छात्र विंग को शह और अभयदान दिया जाना है। मामला इस हद तक जा पहुंचा है कि जिन छात्र-छात्राओं का माथा फूटता है, एफआईआर उन्हीं के खिलाफ दर्ज करवा दी जाती है! राहत इंदौरी का शेर याद आता है- “अब कहां ढूंढने जाओगे हमारे कातिल / आप तो कत्ल का इल्जाम हमीं पर रख दो।”
अगर कोई हिंसक हथियारबंद भीड़ भारत के सबसे शानदार और प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में घुस कर मारकाट और तोड़फोड़ कर सकती है और सुरक्षा में तैनात पुलिस छात्रावास, छात्रों व अध्यापकों की सुरक्षा करने में नाकाम रहती है; अपने आकाओं के इशारों पर उपद्रवी छात्र-छात्राओं को गिरफ्तार नहीं करती, तो ऐसे हालात में आखिर देश का कौन-सा कैम्पस सुरक्षित है? उस पर भी विभिन्न प्रचार-प्रसार माध्यमों के जरिए विरोधी विचारधारा वाले छात्रों को खलनायक, आतंकवादी, देशद्रोही और जाने क्या-क्या साबित करने का राजनीतिक अभियान जारी है। ऐसे में छात्रों पर हिंसक हमलों का खतरा कई गुना बढ़ गया है। लेकिन जो लोग अंधविरोध और समर्थन के वशीभूत होकर किसी भी वैचारिक पक्ष वाले छात्रों के वर्तमान दमन का जश्न मना रहे हैं उन्हें अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए कि जो समाज छात्रों की पुलिसिया पिटाई और अपने विश्वविद्यालयों में हिंसा का समर्थन करता है, वह अपने भविष्य के तबाह होने की राह पर निकल पड़ता है!
-विजयशंकर चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार

फैज की नज्म पर हंगामा क्यों है बरपा?


फैज अहमद फैज की नज्म पर ऐतराज जताने वालों का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए आजकल जहां सोशल मीडिया पर “हम फेकेंगे” और “हम बेचेंगे” जैसे उनवानों से उल्था नज्में चलाई जा रही हैं, वहीं कवि बोधिसत्व ने अपने फेसबुक पेज पर मूल रचना “हम देखेंगे” का हिंदी में गंभीर भावानुवाद पेश किया है, जो फैज के पाक इरादों का खुलासा करती है. कृपया आप भी देखें-

।। हम देखेंगे।।
पक्का है कि हम भी देखेंगे
वो दिन कि जिसका है वचन मिला
जो "विधि विधान" में है कहा गया
जब पाप का भारी पर्वत भी
रुई की तरह उड़ जाएगा
हम भले जनों के चरणों तले
जब धरती धड़ धड़ धड़केगी
और राजाओं के सिर ऊपर
जब बज्जर बिजली कड़केगी
जब स्वर्गलोक के देव राज्य से
सब पापी संहारे जाएंगे
हम मन के सच्चे और भोले
गद्दी पर बिठाए जाएंगे
सब राजमुकुट उछाले जाएंगे
सिंहासन ढहाए जाएंगे
बस नाम रहेगा "परमेश्वर" का
जो साकार भी है और निराकार भी
जो दृश्य भी है और दर्शक भी
उट्ठेगा “मैं ही ब्रह्म" का एक नारा
जो मैं भी हूं और तुम भी हो
और राज करेगा "पूर्णब्रह्म"
जो मैं भी हूं और तुम भी हो
हम देखेंगे!

आम जनता के दुख-दर्द, उसके संघर्ष, समाजी व सियासी मसाइल और टूटे हुए दिलों की तड़प को अपनी शायरी में पिरोने वाले इंकलाबी और रूमानी शायर फैज अहमद फैज एक मुहावरे के मुताबिक अपना ही यह बारीक शेर याद कर करके कब्र में बेचैनी से करवटें बदल रहे होंगे कि “वो बात सारे फसाने में जिसका जिक्र न था/वो बात उनको बहुत नागवार गुजरी है”. मुहावरे का हवाला इसलिए दे रहा हूं कि फैज तरक्कीपसंद शायरी का मरकज थे और आदमी के खुदा नामक ख्वाब में उनका यकीन नहीं था. ऐसे में कब्र, जन्नत, खल्क-ए-खुदा, अनल-हक, अर्ज-ए-खुदा और बुत जैसे अल्फाज के मानी उनके लिए वही नहीं थे, जो शब्दकोश में लिखे होते हैं. इंसान की जिजीविषा ही उनके लिए पहली और आखिरी हस्ती थी. फैज के लिए ‘बुत’ का मतलब किसी देवता की ‘मूर्ति’ नहीं है, बल्कि इस जमीन पर रहने वाले उन लोगों से है, जो खुद को खुदा समझते हैं और लोगों पर जुल्म-ओ-सितम ढाते हैं. बहरहाल, उनकी शायरी पर तजकिरा पेश करना यहां हमारा मकसद नहीं है, लिहाजा हम सीधे मुद्दे की बात पर आते हैं.

फैज की एक बड़ी मकबूल नज्म है- “हम देखेंगे”. इसे तमाम ऐसे लोग एक हथियार की तरह प्रयोग करते आए हैं, जो हर किस्म की निरंकुशता और जोर-ओ-जब्र की मुखालिफत किया करते हैं; हिंदुस्तान में भी और पाकिस्तान में भी. पिछले दिनों नागरिकता कानून के विरोध में कानपुर आईआईटी के छात्रों ने रैली निकाली, जिसे नाम दिया गया था- ‘इन सॉलिडैरिटी विद जामिया’. उसमें जब फैज की इस नज्म को पढ़ा गया, तो फैकल्टी के कुछ सदस्यों ने इसके संदेश को भारत विरोधी, हिंदू विरोधी और सांप्रदायिक करार देते हुए बाकायदा एक जांच समिति गठित करवा दी! आपत्ति जताने वाले लोग नज्म की इन पंक्तियों- “जब अर्ज-ए-खुदा के काबे से/सब बुत उठवाए जाएंगे/हम अहल-ए-सफा मरदूद-ए-हरम/मसनद पे बिठाए जाएंगे/सब ताज उछाले जाएंगे/सब तख्‍त गिराए जाएंगे/बस नाम रहेगा अल्लाह का”- पर खास ऐतराज जता रहे हैं. उनको लगता है कि नज्म में इस्लाम का कोई कट्टर अनुयायी काल्पनिक जन्नत का दृश्य प्रस्तुत करते हुए अपनी गहरी आस्था के मुताबिक हश्र के दिन का वर्णन कर रहा है और ‘बुत’ उठवाने की चाह जता कर हिंदुओं की मूर्तिपूजा का विरोध कर रहा है!
मशहूर शायर व फिल्म लेखक-गीतकार जावेद अख्‍तर तथा खुद फैज साहब की बेटी सलीमा हाशमी ने कहा है कि फैज और इस नज्म को हिंदू विरोधी बताना इतना दुखद, अजीब और हास्यास्पद है कि इसके बारे में कोई गंभीर प्रतिक्रिया भी नहीं दी जा सकती. मशहूर-ओ-मारूफ शायर मुनव्वर राणा ठीक ही कह रहे हैं कि हमारे देश के जो मौजूदा हालात हैं, उसमें हर चीज को सांप्रदायिक बनाए बिना सियासतदानों का काम नहीं चलता और नफरत इस देश में आजकल आक्सीजन का काम करती है. अगर यही नज्म राष्ट्रकवि दिनकर या मधुशाला वाले बच्चन साहब ने लिखी होती, तो कोई हंगामा नहीं होता.
मुनव्वर राणा की बात में दम है. आजकल सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं और संगठनों में ऐसे लोगों का कब्जा हो चुका है जो एक खास किस्म से सोचने के लिए प्रशिक्षित किए गए हैं. जिन्हें साहित्य का ‘स’ नहीं मालूम, वे मीर-ओ-गालिब को खारिज कर देते हैं और कबीर-तुलसी-निराला की कविता को इलेक्ट्रिक शॉक देकर परखना चाहते हैं. दरहकीकत फैज ने कहा है कि धरती पर जो भी तानाशाह मौजूद हैं, उन सभी के बुत उठवा दिए जाएंगे. जनता की क्रांति आएगी और सिर्फ एक ताकत राज करेगी, जो ‘खल्क-ए-खुदा’ यानी खुदा की बनाई जनता ही होगी. लेकिन इतनी सी बात भी समझ पाना ‘असाहित्यिक’ और ‘जनविरोधी’ दिमागों के वश की बात नहीं है. कवि-पत्रकार मित्र चंद्रभूषण की राय में उपमाएं कवि के सोचने का तरीका हैं. लेकिन अपनी औकात के पार जाने के लिए उसे रूपकों के जोखिम भरे कारोबार में उतरना पड़ता है, जहां किसी भी बात का कुछ भी अर्थ लगाया जा सकता है.
जाहिर है कि जब खुद कवि के लिए यह चुनौतीपूर्ण कार्य है तो पाठक की विकृत मानसिक बुनावट अनर्थ करने में उत्प्रेरक की भूमिका ही निभाएगी. “हम होंगे कामयाब” पंक्ति का हासिल किसी क्रांतिकारी, भ्रष्ट नेता अथवा डाकू के लिए एकसमान नहीं हो सकता. आखिरकार सब अपने-अपने तरीके से कामयाब ही होना चाहते हैं. इसमें कवि या शायर का क्या दोष है? जिनके मस्तिष्क में ग्रांड कैनियन से भी गहरे सांप्रदायिक सोच वाला तंत्रिका पथ खोद दिया गया है, वे सिंधु और गंगा-यमुना के बहते हुए पानी में भी हिंदू-मुसलमान के रंग खोज लेते हैं. कविता के सकारात्मक और गूढ़ निहितार्थ समझने की तरफ उनकी सोच जा ही नहीं सकती. इस दिशा में प्रशिक्षण देने वाली कोई शाखा भी भारत में नहीं चलाई जा रही है कि उनकी सोच वाला तंत्रिका पथ बदला जा सके.

मजे की बात है कि ऐतराज जताने वाले लोग अपने ड्रांइग रूमों में फैज की रूमानी गजलें सुनकर अपना गम गलत करते हैं लेकिन उनकी शायरी के इंकिलाबी तेवर से परहेज करते हैं. यानी मीठा-मीठा गड़प और कड़वा-कड़वा थू! मेहदी हसन गा दें कि “कर रहा था गम-ए-जहां का हिसाब/आज तुम याद बे-हिसाब आए”, तो इन्हें तन्हाई में महबूबा की बेवफाई याद आ जाएगी और अगर ये शेर सामने पड़ जाए कि “निसार मैं तेरी गलियों के ऐ वतन कि जहां/ चली है रस्म कि कोई न सर उठा के चले”, तो इन्हें सांप सूंघ जाएगा!

किस्सा ये है कि फैज ने “हम देखेंगे” नज्म पाकिस्तान को धार्मिक कट्टरता की जहालत में ठेलने वाले तानाशाह जिया उल हक की कारस्तानियों के विरोध में प्रतीकात्मक ढंग से लिखी थी. इसमें उनका कोई धार्मिक दृष्टिकोण नहीं था. अगर यह नज्म हिंदू विरोधी होती तो पाकिस्तान में महिलाओं के साड़ी पहनने तक को प्रतिबंधित करने वाला यह निष्ठुर जनरल इस नज्म को सेंसर करवा कर फैज को जेल में न ठूंसता बल्कि उन्हें ईनाम-ओ-इकराम से नवाजता. जेल में ही बेफिक्र होकर फैज ने लिखा था- “बोल कि लब आजाद हैं तेरे/बोल जबां अब तक तेरी है/तेरा सुतवां जिस्म है तेरा/बोल कि जां अब तक तेरी है”. सच तो यह है कि जिया उल हक की वजह से फैज पाकिस्तान में चैन से नहीं रह पाए. कभी उनको फिलिस्तीन में शरण लेनी पड़ती थी, तो कभी सोवियत रूस में अनुवाद करके पेट पालना पड़ता था, क्योंकि फैज की शायरी भूख, गरीबी, अत्याचार का खात्मा करने के लिए पाकिस्तानी अवाम का आवाहन करती थी और सच का साथ देने वालों के दिलों में सड़क पर संघर्ष करने की आग पैदा करती थी. आजादी के फरेब का पर्दाफाश करते हुए ऐलान करती थी- “ये दाग-दाग उजाला, ये शबगजीदा सहर, वो इंतजार था जिसका, ये वो सहर तो नहीं”. लब्बोलुबाब यह कि फैज ने हर मुश्किल वक्त में अपनी आवाज बुलंद की और कई पीढ़ियों के मुंह में जबान डाल दी.

यही एक चीज नज्म पर आपत्ति उठाने वालों को खल रही है. स्पष्ट है कि या तो ये लोग सत्ता के साथ हैं या सत्ता से भयभीत हैं. अविभाजित भारत के सियालकोट में जन्मे फैज ने जीते जी पाकिस्तान के हुक्मरानों और मुल्लाओं से पत्थर खाए और मरने के बाद भारत में गालियां खा रहे हैं. फैज की शायरी सियासी सरहदों को लांघने वाली शायरी है. उसे हिंदुस्तान और पाकिस्तान की मौजूदा बायनरी में कैद करके नहीं देखा जा सकता. क्या दिन आ गए हैं कि शेर-ओ-शायरी की किस्मत सरकारी मशीन के चंद पुर्जे तय करने लगे हैं! इस नुक्ते पर मिर्जा गालिब का यह शेर याद आता है- “या रब वो न समझे हैं न समझेंगे मिरी बात/ दे और दिल उनको जो न दे मुझको जबां और.”
-विजयशंकर चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार

सीएए और एनआरसी के विरोध में उतरी महिलाएं सत्ता की चूलें हिला सकती हैं



इतिहास गवाह है कि एक कट्टर और रूढ़िवादी भारतीय समाज में हिंदू और मुस्लिम महिलाएं 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से पहले बड़े पैमाने पर सड़कों पर कभी नहीं उतरी थीं, और हमारी आंखों के सामने इतिहास बन रहा है जब धार्मिक भेदभाव को हवा देने वाले नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) और नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर (एनआरसी) के विरोध में करोड़ों भारतीय नागरिकों के साथ हिंदू-मुस्लिम महिलाएं कंधे से कंधा मिलाकर देशव्यापी आंदोलन कर रही हैं. कोलकाता में पिछले हफ्ते एक युवती ने अपने हाथ में जो तख्ती थाम रखी थी, उस पर लिखा संदेश वर्तमान संदर्भों में बेहद मानीखेज है- “मेरे पिता जी को लगता है कि मैं इतिहास की पढ़ाई कर रही हूं; वे नहीं जानते कि मैं इतिहास रचने में मुब्तिला हूं."
दिल्ली के जामिया नगर स्थित मुस्लिम बहुल मोहल्ले शाहीन बाग की महिलाएं बीते दो हफ्तों से ज्यादा समय से सीएए और एनआरसी के खिलाफ अहिंसक प्रदर्शन करती आ रही हैं. कुछ महिलाएं तो कई दिनों से घर ही नहीं गई हैं, अन्य महिलाएं अपने बाल-बच्चों के साथ धरने पर बैठी हैं. अशिक्षित होने के बावजूद अनगिनत महिलाएं इस बात से पूरी तरह वाकिफ हैं कि राष्ट्रव्यापी एनआरसी लागू करने की सरकारी योजना में दांव पर क्या लगा हुआ है. ये सभी समझती हैं कि महिलाएं ज्यादा असुरक्षित एवं सहज शिकार बन जाने की स्थिति में होती हैं: संपत्ति के कागजात आम तौर पर पुरुषों के नाम पर होते हैं, और कइयों के पास तो भारतीय नागरिकता साबित करने हेतु जरूरी दस्तावेज ही नहीं हैं. असम में संपन्न एनआरसी गवाह है कि वहां के हिंदीभाषी और बंगाली समुदाय के जिन लोगों ने असम से बाहर शादी की थी, उनकी पत्नियों का नाम कट चुका है. उन महिलाओं ने अपने-अपने मायकों से दस्तावेज जुटाए थे लेकिन वे निर्धारित अर्हताओं पर खरे नहीं उतरे. महिलाओं के मन में व्याप्त असुरक्षा का अंदाजा लगाया जा सकता है क्योंकि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने स्पष्ट कह दिया है कि देशव्यापी एनआरसी में आधार कार्ड वगैरह से काम नहीं चलेगा.
बात सिर्फ शाहीन बाग ही नहीं है; मुंबई, औरंगाबाद, बैंगलोर, जयपुर, पटना, चेन्नई जैसे शहरों में महिलाओं ने खामोश प्रदर्शन किए हैं. धरना-प्रदर्शनों में जिस नारे ने सबका ध्यान खींचा, वो था- “जब हिंदू-मुस्लिम राजी, तो क्या करेगा नाजी?” अभिनेत्री रेणुका शहाणे ने पीएम को संबोधित करते हुए ट्वीट किया- “असली टुकड़े-टुकड़े गैंग आपका आईटी सेल है सर!... उन्हें नफरत फैलाने से रोकिए.” यह महिलाओं की इतिहास दृष्टि, गहरी राजनीतिक समझ, हालात पर पैनी नजर, निर्भीकता, कल्पनाशीलता, आत्मसंयम और बेहद अनुशासित होने का द्योतक है. प्रतिरोधी आंदोलन में महिलाओं की उपस्थिति, उनकी दृढ़ता और अहिंसक प्रवृत्ति ही इस दावे को खारिज करने के लिए काफी है कि इन प्रदर्शनों को "विपक्ष" अथवा "बाहर से उकसावा देने वालों" द्वारा हवा दी गई है. इन विरोध प्रदर्शनों के निहितार्थ बड़े गहरे हैं. भारतीय महिलाओं ने जामिया मिलिया और समूचे उत्तर प्रदेश में अनाहूत क्रूर पुलिसिया हिंसा के सामने अपनी अहिंसा की ताकत और संविधान के प्रति निष्ठा दिखा दी है.
गौर करने की बात यह है कि इन महिलाओं को आप वर्गीकृत करना चाहें, तो बड़ी मुश्किल होगी. इनमें फिल्म अभिनेत्रियों से लेकर शिक्षिकाएं, नर्सें, निजी दफ्तरों की कामकाजी महिलाएं, स्कूली पढ़ाई से लेकर उच्चतर शोध करने वाली छात्राएं, रोज कुआं खोदने और रोज पानी पीने वाली मजदूरिनें, बुरके में सरापा ढंकी महिलाएं, बालों को हिजाब में छुपाती युवतियां, गृहणियां- यानी जीवन के हर क्षेत्र से जुड़ी हर आयु-वर्ग की पेशेवर और आम महिलाएं शामिल हैं. घरों से निकलकर सड़क पर उतरी इन महिलाओं में अधिकांश संख्या उनकी है, जो अशिक्षित हैं, परिजनों से भयभीत हैं लेकिन पुलिस की लाठी से जरा भी नहीं डरतीं! पहचाने जाने के डर से कुछ तो अपना पूरा या असली नाम भी नहीं बताना चाहतीं लेकिन सीएए और एनआरसी के आसन्न खतरों को वे अपनी टूटी-फूटी भाषा से लेकर अंग्रेजी और परिष्कृत हिंदी में जबान दे रही हैं.
कई महिला आंदोलकारी हर दशक की शुरुआत में होने वाली जनगणना, एनपीआर 2010, एनपीआर 2019 और एनआरसी के बीच के फर्क को बड़ी स्पष्टता से खोल कर रख रही हैं. वे डिटेंशन शिविरों की हकीकत और हालात से भी वाकिफ हैं और इस मामले में बोले गए मोदी-शाह के झूठ को भी भीड़ के सामने उजागर करती हैं. वे इस बात का भी खुलासा करती हैं कि बाप-दादाओं के दस्तावेज जुटाने में भारतीयों, खासकर गरीबों और मध्य वर्ग के नागरिकों के सामने कैसी-कैसी मुसीबतें पैदा होंगी. एनआरसी, एनपीआर और सीएए की उपयोगिता को लेकर प्रधानमंत्री मोदी, केंद्रीय गृह-मंत्री अमित शाह और केंद्र सरकार के अन्य मंत्रियों द्वारा दिए गए बयानों का अंतर्विरोध सबके सामने ला रही हैं. जामिया की तीन छात्राएं-आयशा रेना, लबीदा फरजाना और चंदा यादव तो पुलिस की लाठियों के सामने एक साथी छात्र की ढाल बन गई थीं. उन्हें लाठी भांजने वाले पुलिसकर्मियों और साथी छात्र के बीच में पड़ कर प्रतिवाद करते हुए और अकल्पनीय क्रूरता के लिए पुलिसवालों को फटकार लगाते हुए देखा जा सकता है.
अब तक महिलाएं प्रायः लैंगिक भेदभाव और मनचलों की छेड़छाड़ के खिलाफ मुखर होती रही हैं, लेकिन संविधान की मूल भावना के साथ हुई छेड़छाड़ को रोकने के लिए उनका इस तरह आक्रोशित होना भारतीय परिप्रेक्ष्य में अभूतपूर्व है. उन्होंने जता दिया है कि पानी सर के ऊपर से गुजर चुका है और चुनावी जीत के मद में चूर, बड़बोली, मिथ्यावादी, निरंकुश और अधिनायकवादी सरकार के सामने वे आत्मसमर्पण नहीं करनेवाली हैं. राजनीतिक आरोपों और सत्तारूढ़ खेमे के दावों के विपरीत इन विरोध प्रदर्शनों की खास बात यह है कि महिलाओं की इस अप्रत्याशित जुटान के पीछे किसी संगठन या संस्था या समूह या दल का हाथ नहीं है. विरोध जताने के लिए स्थान या अवसर की परवाह भी नहीं की गई है. एक ओर जहां दिल्ली को नोएडा से जोड़ने वाले मुख्य हाईवे के एक हिस्से पर कब्जा जमाया गया, तो दूसरी तरफ पांडिचेरी विश्वविद्यालय की स्वर्णपदक विजेता रबीहा अब्दुर्रहीम और जादवपुर विश्वविद्यालय की देबास्मिता चौधरी ने कैम्पस में आयोजित दीक्षांत समारोहों के मंचों पर ही सीएए का कड़ा विरोध दर्शाया. दक्षिण भारतीय अभिनेत्री रीमा कलिंगल ने अपने फेसबुक पेज पर लिखा- “धर्म के आधार पर हमारे शांतिपूर्ण राष्ट्र को मत बांटिए.”
महिलाओं की यह जागरूकता इस संदर्भ में भी उल्लेखनीय है कि हिंदू समाज में सदा से हावी जबर्दस्त पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण ने कथित महिला सशक्तीकरण के नाम पर चंद रेवड़ियां बांटने के अलावा कभी भी लड़कियों और महिलाओं के बारे में गहराई से सोचने की जहमत नहीं उठाई. इस्लाम में प्रदत्त औरतों के हुकूक की लाख दुहाई देने के बावजूद मुस्लिम महिलाएं कठमुल्लों की कठपुतलियां बना कर रख दी गईं. महिलाओं को हमेशा "भारतीय नारीत्व" की पवित्र आभा में लपेटे रखने का प्रयास किया गया. इस पसमंजर में वर्तमान विरोध प्रदर्शन हिंदू-मुस्लिम महिलाओं की छवियों का एक दिलेर और मर्मभेदी कोलाज पेश करते हैं, जिन्होंने लादी गई हिफाजत के पिंजरे को तोड़ दिया है और लोकतांत्रिक असंतोष के लबालब भरे तूफानी समंदर में छलांग लगा दी है. उनका बाहर निकला एक-एक कदम किसी भी जनविरोधी और महाशक्तिशाली सत्ता की चूलें हिला सकता है.
- विजयशंकर चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार

शुक्रवार, 4 अक्टूबर 2019

ट्रैफिक कानून संशोधित- क्या अब भारतीय सड़कों पर सचमुच रामराज उतरेगा?


बात हल्के-फुल्के अंदाज में शुरू की जाए तो ऐसा लगता है कि जैसे देश में मोटर वाहन (संशोधन) विधेयक 2019 को तेलुगु सुपरस्टार महेश बाबू की फिल्म 'भारत अने नेनु' का वह सीन देख कर लागू किया गया है, जिसमें नायक मुख्यमंत्री की भूमिका में है और अधिकारियों को ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन करने वालों पर कई गुना ज्यादा जुर्माना ठोकने का आदेश दे रहा है. यह बात और है कि नए निमय लागू होने के पहले दिन से ही देश भर में वाहन चालक ट्रैफिक पुलिस के सामने ‘तू डाल-डाल मैं पात-पात’ वाली तरकीबें आजमाने को मजबूर हैं और उनके फिल्मों से भी मजेदार कॉमेडी सीन सोशल मीडिया पर देखने को मिल रहे हैं.
सड़क परिवहन को लेकर भारतीय समाज में इतनी कहावतें, लोकोक्तियां और मिथक प्रचलित हैं कि लगता है जैसे ट्रैफिक के नियम तोड़ना कोई शानदार कारनामा हो. रांग साइड में वाहन घुसेड़ना, छोटे-से वाहन में पूरा मोहल्ला लेकर चलना, नो पार्किंग जोन में वाहन पार्क करना, स्कूलों-अस्पतालों के दरवाजे पर जोर-जोर से हॉर्न बजाना, सिग्नल तोड़ कर आगे बढ़ जाना, जेब्रा क्रॉसिंग पर वाहन बढ़ा लेना गर्व की बात समझी जाती है. हमारे विंध्य क्षेत्र (एमपी) में तो बच्चे-बच्चे की जबान पर चढ़ा हुआ है- ‘पकड़ के हैंडल, तोड़ के सिग्नल, मार के पैडल, जांय दे कक्का सांय-सांय!’ पंजाब के किसी भी ड्रायवर से पूछिए, वह बताएगा कि सड़क पर ‘मत्स्य न्याय’ होता है और ‘जंगल का कानून’ चलता है!


जिस वाहन में जितने ज्यादा पहिए होते हैं, उसका उतना बड़ा रुतबा होता है. बारह चका वाला मालवाहक ट्रक उखड़ी हुई सड़क पर भी खुद को व्हेल मछली और दोपहिया वाहन को झींगा मछली मान कर चलता है. ट्रैफिक वाले कितने भी बड़े बोर्ड लगाएं कि ‘दुर्घटना से देर भली’, लेकिन वाहनवीरों के बीच यह मान्यता पुख्ता हो चुकी है कि सड़क दुर्घटनाएं अपनी लापरवाही से नहीं बल्कि दूसरों की असावधानियों के चलते ही होती हैं. यातायात के नियम तोड़ने वालों के पास ट्रैफिक वालों को गच्चा देकर पतली गली से निकलने, नाकाबंदी करने वालों पर पद या पैसों का रौब झाड़ने, किसी रिश्तेदार मंत्री या अधिकारी का नाम उछाल कर साफ बच निकलने की ऐसी-ऐसी वीरगाथाएं होती हैं कि उनके सामने पृथ्वीराज रासो लिखने वाले महाकवि चंदबरदाई भी पानी भरें! भले ही उनके पास हेलमेट, ड्रायविंग लाइसेंस, रजिस्ट्रेशन, टैक्स, बीमा और वाहन के एक भी कागजात न पाए जाते हों!


राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद द्वारा संशोधित विधेयक को मंजूरी मिलने के बाद 1 सितंबर, 2019 से प्रभावी नियमों के अंतर्गत जुर्माना राशि 30 गुना तक बढ़ा दी गई है और चालक अथवा वाहन स्वामी को सलाखों के पीछे भेजने के साथ-साथ उनके लाइसेंस निरस्त करने के भी प्रावधान हैं. और तो और, यदि किसी नाबालिग से वाहन चलाते समय कोई दुर्घटना हो जाती है तो उसके माता-पिता या अभिभावक को 3 साल तक की जेल काटनी पड़ेगी. सभी नियम और जुर्माना विस्तार से देखने के लिए कृपया यह लिंक क्लिक करें - https://sarkaricourse.com/motor-vehicle-act-2019/


लेकिन ऐसा भी नहीं होना चाहिए कि 'पइसा कै टोरबा, टका मुड़उनी’ (एक पैसे का बच्चा और उसके मुंडन का खर्च एक रुपया) वाली कहावत सिद्ध होने लगे. कहीं ऐसा न हो कि कर्ज की ईएमआई चुका कर वाहन खरीदने वालों को जुर्माना भरने के लिए नया कर्ज लेना पड़ जाए! हालांकि लिंक देखने पर यही आभास होता है कि पुराने अधिनियम को वाहन चालकों की भलाई के लिए ही संशोधित किया गया है. संशोधित एक्ट के प्रावधानों में यह व्यवस्था है कि हर दुर्घटना की साइंटिफिक जांच होगी और कारणों की तह तक जाकर दुर्घटना की हर वजह दूर की जाएगी, ड्राइविंग लाइसेंस जारी करने के पहले ऑनलाइन टेस्ट होगा, जिससे रिश्वत देकर लाइसेंस हथियाने वाले अनाड़ियों की छंटनी हो जाएगी, अगर सड़क की डिजाइनिंग में खराबी है या सड़क के टूटा-फूटा होने की वजह से कोई एक्सीडेंट हुआ है तो उसके लिए संबंधित विभाग के इंजीनियर और ठेकेदार भी जिम्मेदार माने और धरे जाएंगे, किसी घायल को अस्पताल पहुंचाने वाले मददगार व्यक्ति को कानून के पचड़ों से घायल नहीं होने दिया जाएगा.


इसके उलट चर्चा यह गर्म है कि नोटबंदी और जीएसटी आदि के चलते अर्थव्यवस्था को हुए नुकसान की भरपाई के लिए सरकार ने नया वसूली अभियान चलाया है. इस पर केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी का कहना है कि पैसे से ज्यादा कीमत लोगों की जान की है और जुर्माने में भारी वृद्धि का फैसला कानून का पालन अनिवार्य बनाने के लिए किया गया है, सरकारी खजाना भरने के मकसद से नहीं. लेकिन भारी जुर्माने की मार झेल रहे लोग बेहद आक्रोश में हैं. एक शख्स ने ट्विटर पर लिख मारा कि नए एक्ट में सिर्फ फांसी की सजा का प्रावधान ही नहीं है, बाकी सब सजाएं हैं. एक साहब ने कुछ इस तरह से खुन्नस निकाली- ‘जिस तरह सरकार बिना हेलमेट के या ज्यादा सवारी बिठाने पर जुर्माना ठोक रही है, क्या हम भी उसी तरह टूटी हुई सड़क, बंद पड़े सिग्नल, किसी चौराहे पर ट्रैफिक पुलिस वाला न होने या ट्रैफिक जाम की स्थिति में सरकार पर जुर्माना ठोक सकते हैं?’ हद तो यह है कि अगर बीच सड़क पर गाय या भैंस विराजमान हैं तो इसका जिम्मेदार भी ट्रैफिक पुलिस को ही माना जा रहा है!


लोगों को समझना चाहिए कि ट्रैफिक नियमों का अनुपालन इसलिए भी जरूरी है कि हमारे देश में आतंकवाद के कारण कम और सड़क हादसों में उससे कई गुना लोग मारे जाते हैं. तथ्य है कि सड़क दुर्घटनाओं में हर साल करीब डेढ़ लाख लोगों की जान चली जाती है और साढ़े चार लाख से ज्यादा लोग घायल होते हैं. मरने वालों में 60 फीसदी लोग 18 से 35 की चरम उत्पादक आयुवर्ग के होते हैं. प्रापर्टी के नुकसान का आकलन किया जाए तो वह देश की जीडीपी के दो फीसदी के बराबर बैठता है. बड़े-बड़े मंत्री-संत्री, वैज्ञानिक-खिलाड़ी और कवि-कलाकार भीषण सड़क दुर्घटनाओं में जान गवां चुके हैं. इसी बिंदु पर प्रतिप्रश्न उठता है कि आम लोगों के लिए यातायात के नियम तो सख्त बना दिए गए हैं लेकिन क्या सरकार व प्रशासन की गलतियों और लापरवाहियों तथा भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे ट्रैफिक कर्मचारियों की वजह से जनता को होने वाले नुकसान, दुर्घटनाओं, यहां तक कि लोगों की मौत के लिए किसी को सजा या जुर्माना होगा कि नहीं?


सरकार सिर्फ कानून बना कर बरी नहीं हो जाती. अगर वह लोगों से नए ट्रैफिक नियमों का अक्षरशः पालन करने की अपेक्षा करती है तो लोग भी अपेक्षा करते हैं कि संशोधित एक्ट के सभी जनहितैषी प्रावधानों पर सरकार की तरफ से अक्षरशः अमल किया जाए. विडंबना यह है कि जुर्माना वसूली तो तत्काल चालू हो गई, लेकिन संशोधित कानून में उल्लिखित बुनियादी इंफ्रास्ट्रक्चर का कोई अता-पता नहीं है. हाईवे की यह वनवे कार्रवाई लोगों को आखिर कब तक और किस हद तक पचेगी? यातायात के नियम तोड़ने वालों के प्रति हमारी कोई सहानुभूति नहीं है लेकिन सरकार को भी चाहिए कि वह सड़कों को गड्ढामुक्त करे, मेनहोल बंद करे, जाम की समस्या से निजात दिलाए, सांड, गाय, भैंस, सुअर, घोड़े, कुत्ते, गधे तथा नीलगाय जैसे आवारा पशुओं के सड़क पर खुलेआम घूमने और बैठने को रोके, सड़कों का चौतरफा अतिक्रमण हटाए, सिग्नल चाक-चौबंद करे, पुलों और सड़कों पर रोशनी की व्यवस्था करे तभी तो यह भारी जुर्माना और सजा तर्कसंगत व न्यायसंगत लगेगी.


हमारी सरकार मानती है कि सख्त सजा का डर ही लोगों को अपराध करने से रोक सकता है. नए ट्रैफिक नियमों की खासियत यही है कि वे बेहद सख्त हैं. उम्मीद की जानी चाहिए कि नए नियम जनता की मुट्ठी गरम करने की लत और सरकारी अमले की ऊपरी कमाई की हवस का शिकार नहीं होंगे. पूरा ट्रांसपोर्ट और ट्रैफिक सिस्टम आने वाले सालों में पटरी पर आ जाएगा और यातायात को लेकर लोगों में इतना आत्म अनुशासन पैदा हो जाएगा कि जुर्माना और सजा की नौबत ही नहीं आएगी. अगर इतना हो गया तो भारतीय सड़कों पर रामराज्य आने से कोई नहीं रोक सकता!

जरा-सी भी बाढ़ क्यों बर्दाश्त नहीं कर पाते हमारे शहर?


मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, हैदराबाद, अहमदाबाद, सूरत, दिल्ली... कोई महानगर नहीं बचा है, जिसने पिछले एक दशक के दौरान जलप्रलय न भोगा हो! हाल की कुछ तबाहियों को याद करें तो साल 2000 में हैदराबाद के हुसैन सागर के पास बनी कई झोपड़पट्टियां बाढ़ में बह गई थीं. पेड़ उखड़ कर बीच सड़क पर पड़े थे और शहर की रफ्तार ठप पड़ गई थी. सूरत में 2006 की बाढ़ ने 200 से ज्यादा लोगों और सैकड़ों पशुओं की जान ले ली थी. राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान 2010 में दिल्ली तिब्बती बाजार से लेकर खेल गांव तक पानी-पानी हो गई थी. लेकिन 26 जुलाई 2005 को मुंबई में आई बाढ़ सबसे विकराल थी. इसमें यह विराट महानगर लगभग आधा डूब गया था, सभी बुनियादी सेवाएं गायब थीं और जान-माल के नुकसान की तो कोई इंतहा नहीं थी. अधिक वर्षा, समुद्री किनारा और बाबा आदम के जमाने का ड्रेनेज सिस्टम मुंबई और चेन्नई का लगभग हर दूसरे साल गला घोंट देता है. इन दिनों बिहार की राजधानी पटना में जलप्रलय का मंजर है.


कोई ऐसा मानसून नहीं गुजरता जो देश के किसी न किसी नगर अथवा महानगर में तबाही न मचाता हो. हर कोई जानता है कि अगले मानसून में क्या होने जा रहा है. लेकिन जैसे ही जिंदगी पटरी पर लौटती है, शहर के लोग और स्थानीय प्रशासन उस तबाही को ऐसे भूल जाते हैं, जैसे कि वह प्राचीन ग्रंथों में वर्णित कोई किस्सा हो! हर बार ड्रेनेज, नालियों की साफ-सफाई और बाढ़ से निबटने के लिए आपदा-प्रबंधन का पहले से ज्यादा बजट बनता है और स्वाहा हो जाता है. हर बार मानसून से ठीक पहले नालियों और ड्रेनेज का कचरा निकालकर उसी के बगल में छोड़ दिया जाता है और बरसात होने पर उसी में समा जाता है. हर बार मंत्री-संत्री इंद्रदेव का अचानक कोप हो जाने का रोना रोते हैं, जो उस शहर के बाशिंदों और देश की आंखों में धूल झोंकने से ज्यादा कुछ नहीं है.


भारतीय मायथालॉजी में कहा गया है कि जब किसी नगर की रचना दोषपूर्ण हो जाती थी तो भगवान इंद्र अपना पुरंदर रूप धारण करके उस नगर को नष्ट कर देते थे. अधिकारियों को इस कथा से सबक हासिल करना चाहिए क्योंकि नगर की संरचना को दोषमुक्त बनाए रखना और बेहतर जल-निकासी की योजनाएं बनाना उनके हाथ में ही होता है. अल्पावधि में अत्यधिक वर्षा को शहर डुबाने का जिम्मेदार ठहराने का सीधा मतलब भू-माफिया, राजनीतिज्ञों, बिल्डरों, पूंजीपतियों के गठजोड़ को पाप की भागीदारी से मुक्त करना है, जो आधुनिक नगर-संरचनाओं को विकृत करने में वर्षों से जुटे हुए हैं. यह गठजोड़ शहरों के बीच की खुली जगहों को नगर-प्रशासन के नियंत्रण से मुक्त करवाता है, उन पर अवैध कब्जा होने देता है, समुद्र और बड़ी नदियों के किनारे की दलदली भूमि और मैंग्रोव्स कटवाता-पटवाता है, व्यावसायिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए वहां गगनचुम्बी इमारतें, मल्टीप्लेक्स और शॉपिंग कॉम्प्लेक्स वगैरह खड़े करवा देता है.


इसका सीधा असर यह हुआ है कि वर्षा का जो जल खुली जगहों की जमीन से होता हुआ भू-गर्भ में संचित हो जाता था, या बाढ़ का जो अतिरिक्त पानी नदी-नालों से होता हुआ सागरों तक पहुंच जाता था, उसके रास्ते अवरुद्ध हो गए हैं. हम देख रहे हैं कि प्राचीन नगर-संरचनाओं की बुनियाद पर खड़े कोलकाता और पटना जैसे कई आधुनिक शहर भी चोक हो चुके हैं. शहरों के भीतर मौजूद छोटी-मोटी जलधाराएं, नदियां, कुदरती नाले, कुएं, तालाब, जोहड़, बावड़ियों जैसी संरचनाएं भी जल-संचयन, बाढ़ को नियंत्रित करने अथवा अतिरिक्त जल की प्राकृतिक-निवृत्ति में बड़ी सहायक होती थीं. लेकिन अब इन समतल की जा चुकी जगहों को राजनेता और बिल्डर प्राइम लोकेशन बताकर ऊंचे दामों पर बेचते हैं और पीने का पानी गंगा (दिल्ली में), कृष्णा (हैदराबाद में), कावेरी (बैंगलुरु में) जैसी दूर-दराज की नदियों से लाया जाता है!


मुंबई के अंदर मीठी और ओशिवरा समेत 7 नदियां थीं जो नेशनल पार्क से निकलकर विभिन्न खाड़ियों में जा गिरती थीं. वर्षा जल का दबाव कम करने में इनकी बड़ी भूमिका थी. लेकिन रासायनिक और औद्योगिक कचरे, इमारतों के मलबे, प्लास्टिक और तरह-तरह के भंगार से पटी ये नदियां बाढ़ का पानी सड़कों पर उड़ेल कर बीच में ही लुप्त हो जाती हैं. मुंबई का ड्रेनेज सिस्टम 21 सदी की शुरुआत में तब की विरल बसाहट के हिसाब से यह सोच कर डिजाइन किया गया था कि अगर प्रतिघंटे अधिकतम 25 मिलीमीटर वर्षा हुई तो आधा पानी मिट्टी में जज्ब हो जाएगा. लेकिन आज वर्षा का अवरुद्ध पानी रेल की पटरियों को नदियां बना देता है.


दिल्ली की बात करें तो आज जहां व्यस्ततम आईटीओ रोड है वहां से एक नाला बहा करता था और बाढ़ का पानी यमुना में ले जाता था. लेकिन आज पहली बारिश में ही यह इलाका जलमग्न होता है. रिंग रोड बनाते समय दिल्ली के स्लोप को ध्यान में नहीं रखा गया, न ही इस बात का इंतजाम किया गया कि वर्षा का अतिरिक्त जल किधर से कहां जाएगा. राजधानी के जितने भी बस स्टैंड हैं, लगभग सबके सब जल-एकत्रित होने की जगहों को पाट कर बनाए गए हैं. कभी दिल्ली में नजफगढ़ झील, डाबर इलाके और यमुना पार समेत लगभग 800 जगहों पर स्थायी तौर पर पानी संग्रहीत रहता था, आज इनमें से अधिकांश जल-स्रोत गायब हैं और वहां कब्जा या निर्माण हो चुका है.


स्वभावतः पानी अपना रास्ता स्वयं खोज और बना लेता है. कोसी नदी का हर साल मानवनिर्मित तटबंध तोड़ कर रास्ते बदल लेना इसका जीवंत उदाहरण है. लेकिन पटना के बीच नागरिकों द्वारा की गई अवैध घेराबंदी को तोड़ कर वर्षा का जल आखिर कहां जाए, क्या करे! मजबूर होकर वह हहराता हुआ आपके-हमारे ड्राइंग रूम में घुसता चला आता है. इस स्थिति से बचने के लिए, शहर में जब कोई निजी मकान या बहुमंजिला इमारत बनाता है तो उसे उस प्लॉट और प्रभावित क्षेत्र द्वारा जज्ब किए जाने वाले वर्षा जल का विकल्प तैयार करना चाहिए, वरना वह आस-पास के इलाके में संचित होकर बाढ़ ला देगा. इमारत के आस-पास पार्किंग और फुटपाथ पर कंक्रीट व अस्फाल्ट के बजाए पत्थर बिछाना, वृक्षारोपण और प्राकृतिक ड्रेनेज के अनुसार ही सड़कें बनाना समझदारी का काम है. इसके लिए हम पाटिलपुत्र की नगर-रचना की ओर देख सकते हैं. कहते हैं कि जब महाराजा अजातशत्रु वैशाली के वज्जि गणसंघ को जीतने के लिए पाटलिपुत्र किले के निर्माण हेतु गंगा की तटबंदी करा रहे थे, तब गौतम बुद्ध वहां का पधारे थे और शहर को आशीर्वाद देते हुए आगाह किया था कि किसी नगर के ह्रास के कारण होते हैं- आग, पानी, और शहरवासियों में कलह. अजातशत्रु और बाद के मगध-शासकों ने इस बात का ध्यान रखा था लेकिन आज का शासक-वर्ग उस शिक्षा को भूल चुका है. कलिकाता गांव आज विशाल कोलकाता में तब्दील हो चुका है लेकिन जलनिकासी हुगली नदी के रहमोकरम पर ही है.


बाढ़ में फंसे असहाय लोगों और निरीह पशु-पक्षियों की तस्वीरें और कहानियां हम सबने देखी-सुनी हैं. सदी के महानायक अमिताभ बच्चन का जुहू (मुंबई) स्थित घर जल-प्लावित होते देखा है. पटनावासी बिहार के उप-मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी को परिवार सहित सड़क पर खड़ा देख चुके हैं. लेकिन हम लोग अब भी यह नहीं समझ रहे हैं कि बादल जितना भी पानी बरसाते हैं, वह भू-जल बनने के लिए होता है, बाढ़ लाने के लिए नहीं. उसे बाढ़ के रूप में हम और आप बदलते हैं, क्योंकि बेकार में बही एक-एक बूंद बाढ़ लाने में योगदान करती है. हमारे शहर वर्षा के अतिरिक्त जल को क्यों बर्दाश्त नहीं कर पाते, इसे समझना कोई रॉकेट साइंस नहीं है. पर्याप्त जल-संचयन, उचित जल-संरक्षण और सटीक जल-प्रबंधन करने की प्राचीन-कला सीख कर आज भी हम बाढ़ की विभीषिका से निबट सकते हैं. लेकिन जनता के पैसे से बनी हर योजना में से अपना हिस्सा निकाल लेने और आग लगने पर ही कुआं खोदने की हमारी आदत जाती नहीं है!


-विजयशंकर चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार
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शुक्रवार, 29 अप्रैल 2016

प्रतियोगी परीक्षाओं का मौसम आया, अभिभावकों के लिए टेंशन लाया

कल जे ई ई मेंस के रिजल्ट आ गए-
जिन सुधी अभिभावकों ने अपने पुत्र-पुत्रियों को उच्च चिकित्सा एवं तकनीकी शिक्षा दिलाने का सपना देख रखा है उनके लिए एक पांव पर खड़े होने का उष्ण मौसम आ गया है. मई और जून 2016 में कई प्रतियोगी परीक्षाएं होने जा रही हैं, जिनमें से प्रमुख हैं- एआईपीएमटी जो 1 मई को होनी है, क्लैट 8 मई को होगी, जेईई एडवांस्ड 22 मई को और सीईटी परीक्षा 2 जून को आयोजित होगी, 4 जून से द इंस्टीट्यूट ऑफ कंपनी सेक्रेटरीज ऑफ़ इंडिया की परीक्षाएं शुरू हो रही हैं, 10 जून से भारतीय बीमा संस्थान की परीक्षाएं होंगी.

इन दिनों धुनी छात्र-छात्राएं कोचिंग क्लासों, स्टडी रूमों, पुस्तकालयों, गार्डनों, छतों, गलियारों आदि को अपना रीडिंग रूम बनाए हुए हैं और इस तपती-चुभती गर्मी में भी मेडिकल, इंजीनियरिंग, कानून और अन्य पाठ्यक्रमों में दाख़िले के लिए दिन-रात पसीना बहा रहे हैं.

माता-पिता उनके टेबल पर सर रख कर सो जाने की आदत पर पैनी नज़र रखे हुए हैं और चाय-पानी की सप्लाई में जरा भी कोताही नहीं बरत रहे. कुछ छात्रों के अभिभावक इस बात को लेकर भी माथा पकड़ कर बैठे हुए हैं कि कैसे उनके बच्चे ऊंची से ऊंची रैंक एवं अंक प्राप्त करें ताकि प्रतिष्ठित और मनचाहे शिक्षा संस्थानों में उन्हें आसानी से दाख़िला मिल जाए. किसी ठंडे पहाड़ी स्थल पर ग्रीष्म ऋतु का लुत्फ़ उठाने का ख़याल फ़िलहाल उनके दिमाग़ से कोसों दूर है.

मेरे एक पीडब्ल्यूडी इंजीनियर मित्र की बेटी को डीएवीवी इंदौर के अंडरग्रेजुएट कोर्स में दाख़िला लेना है. वह इतने बेताब हैं कि बेटी की जगह सीईटी का पूरा कार्यक्रम ख़ुद उन्होंने रट लिया है जबकि परीक्षा को अभी महीना भर से ज़्यादा समय बाक़ी है. वह एक सांस में बताते हैं- ‘कॉमन इंट्रेंस टेस्ट 2 जून को और पहली काउंसलिंग 23 को होनी है. कुल मिलाकर 35 कोर्सेस हैं, जिनके लिए इग्जाम्स 9 शहरों में होने हैं. इनके लिए एप्लीकेशन ऑनलाइन भी भरे जा सकते हैं. हमारा प्लान यही है. अच्छा हो अगर एग्जाम सेंटर अपने ही शहर में मिल जाए.’

इंटीरियर डेकोरेटर शादाब सिद्दीक़ी साहब चाहते हैं कि उनकी बेटी पढ़-लिख कर एमबीबीएस डॉक्टर बने. इसके लिए वह पिछले दो सालों से उसकी एआईपीएमटी (आल इंडिया प्री मेडिकल टेस्ट) की सख़्त तैयारी करा रहे थे. सीबीएसई द्वारा आयोजित इस टेस्ट की तारीख़ 1 मई मुकर्रर की गई है. इसे पास करने पर उनकी बेटी देशभर के मेडिकल कॉलेजों की 15 फीसदी मेरिट पोजीशन में शुमार हो जाएगी, और इस तरह शादाब साहब का सपना भी पूरा हो जाएगा.

नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में दाख़िला पाने ने लिए पेशे से चार्टर्ड एकाउंटेंट बख्शी जी का बेटा जी-तोड़ कोशिश कर रहा है. राजीव गांधी नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ़ लॉ, पटियाला की तरफ से आयोजित कॉमन लॉ एडमीशन टेस्ट (क्लैट) 8 मई को होना है जिसका नतीजा 23 मई को उसके सामने आ जाएगा. अगर कामयाब हो गया तो 1 जून से उसकी काउंसलिंग शुरू हो जाएगी.

मिसेज बख्शी ने पूरे मोहल्ले में मिठाइयां बांटने की तैयारियां अभी से कर रखी हैं लेकिन उनके मन में किंतु-परंतु भी व्यायाम कर रहा है. शेयर ब्रोकर भरत भाई का ब्लड प्रेशर 22 मई को होने जा रहे ‘द ज्वाइंट एंट्रेंस एग्जामिनेशन (जेईई) एडवांस्ड टेस्ट’ के दोनों पेपरों को लेकर बढ़ा हुआ है क्योंकि उनके बेटे की प्रॉपर तैयारी नहीं हो पाई; जबकि दोनों पेपर अनिवार्य हैं. इस टेस्ट के लिए 29 अप्रैल को रजिस्ट्रेशन शुरू होना है जिसकी स्कैन रिस्पॉन्स शीट 1 जून तक वेबसाइट पर दिखने लगेगी और 12 जून को उनके बेटे की क़िस्मत का फ़ैसला हो चुका होगा. पता नहीं भरत भाई 22 दिन का यह हिमयुग कैसे काटेंगे!

बच्चों की परवाह करने तक तो ठीक है लेकिन ‘थ्री ईडियट्स’ बार-बार देखने के बावजूद कैरियर को लेकर संतान से कहीं ज़्यादा माता-पिता द्वारा इतनी चिंता करना सचमुच चिंताजनक है. हमारे देश में कई प्रतियोगी परीक्षाएं होती रहती हैं. जैसे कि सिविल सेवा परीक्षा, इंजीनियरी सेवा परीक्षा, सीपीएमटी (CPMT), आईआईटी संयुक्त प्रवेश परीक्षा (IIT JEE), अखिल भारतीय इंजिनीयरिंग प्रवेश परीक्षा (AIEEE), सम्मिलित प्रवेश परीक्षा (कॉमन ऐडमिशन टेस्ट / CAT), प्रबंधन योग्यता परीक्षा (MAT), ओपेनमैट (OpenMAT), सार्वजनिक प्रवेश परीक्षा (कॉमन इंट्रैंस टेस्ट / CET), इंजीनियरी में स्नातक अभिरुचि परीक्षा या गेट (GATE), राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA) की परीक्षा, सम्मिलित रक्षा सेवा परीक्षा (CDS), संयुक्त विधि प्रवेश परीक्षा (कॉमन लॉ एडमिशन टेस्ट / CLAT), यूजीसी राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (यूजीसी नेट अथवा NET), केंद्रीय शिक्षक पात्रता परीक्षा‎ (Central Teacher Eligibility Test / CTET), संयुक्त प्रवेश स्क्रीनिंग परीक्षा (Joint Entrance Screening Test / JEST) आदि. उपर्युक्त परीक्षाओं में हम कभी पास होते हैं तो कभी फेल. लेकिन फेल होने पर हमें अपने सपने संतान के जरिए पूरा करने की ख़ब्त-सी सवार हो जाती है जो संतान के भी फेल हो जाने पर लगभग घातक सिद्ध होती है.

यहां किसी के बड़े-बड़े सपने देखने की मुख़ालिफ़त नहीं की जा रही है. लेकिन अभिभावकों को चाहिए कि वे अपने बच्चे की सही क्षमता पहचानें. कई मामलों में यह क्षमता कम भी हो सकती है. दुनिया का हर बच्चा एकसमान नहीं हो सकता. इसके उलट होता यह है कि माता-पिता प्रतियोगी परीक्षा देने जा रहे बच्चे के फ़ॉर्म तक ख़ुद भरते हैं.

अरे! जो बच्चा अपनी परीक्षा का फ़ॉर्म खुद नहीं भर सकता, बैंक जाकर अपना डीडी नहीं बनवा सकता, उसे प्रशासनिक केंद्र तक कुरियर नहीं कर सकता, अपना इग्जाम सेंटर नहीं खोज सकता; वह आईएएस-आईपीएस या डॉक्टरी-इंजीनियरी का टेस्ट क्या खाकर पास करेगा! लेकिन नहीं साहब, चूंकि पड़ोसी के बच्चे ने अमुक टेस्ट पास किया है इसलिए अपने बच्चे को उससे आगे निकालना आपने अपना धर्म बना लिया है. प्रतिभा जाति-पांत की मोहताज नहीं होती. होना यह चाहिए कि आप अपने बच्चे को स्वाबलंबी बनाएं. उसे अपना काम ख़ुद करने दें और सीखने का मौक़ा दें. अक्सर देखा जाता है कि जो मां-बाप घर में पड़ा अख़बार तक ठीक से नहीं पढ़ते वे किताब में घुसे रहने को लेकर बच्चे के सर पर चौबीसों घंटे सवार रहते हैं. पहले आप मिसाल तो पेश कीजिए. बच्चा मां-बाप से जितना सीखता है, उतना उसे दुनिया की कोई कोचिंग नहीं सिखा सकती.

अभिभावकों द्वारा अपनी संतान से प्रतियोगी परीक्षा की समय-सारिणी के मुताबिक तैयारी कराने, प्रश्न-पत्रों का पैटर्न समझाने और उनके खाने-पीने का पूरा ख़याल रखने में कोई हर्ज़ नहीं है. लेकिन अगर अभिभावक यह मानकर चलने लगें कि सफलता सौ टका मिलनी ही मिलनी है तो यह अपनी ही संतान के साथ अन्याय होगा. कई बार अनेक प्रयासों के बावजूद सफलता नहीं मिलती. इसका अर्थ यह नहीं है कि अभिभावक और संतान की दुनिया ख़त्म हो गई.

पहले अभिभावक को असफलता का महत्त्व समझना पड़ेगा तब कहीं जाकर संतान में संघर्ष करने की शक्ति उत्पन्न होगी और एक दिन वह सफल होकर दिखाएगी. प्रतियोगी परीक्षा में पास होने के लिए अभिभावक को संतान के पीछे लट्ठ लेकर नहीं पड़ना चाहिए बल्कि उसे उचित माहौल और समय देना चाहिए. लेकिन होता यह है कि जैसे-जैसे परीक्षा का दिन नजदीक आता है, बच्चे से ज़्यादा अभिभावकों के दिल की धड़कनें तेज़ होने लगती हैं; जैसे कि उन्हें ख़ुद पर्चा हल करना हो! बच्चा कितनी भी मेहनत क्यों न कर ले, अभिभावक उसको लेकर अक्सर नर्वस नज़र आते हैं.

बड़ी प्रतियोगी परीक्षाओं के इस मौसम में अगर आपका बच्चा भी किसी प्रतियोगी परीक्षा में बैठने जा रहा है तो उसकी आंखें सींच-सींचकर उसे रात-रात भर जगाने की बजाए नींद पूरी कर लेने दें. रात्रि-जागरण करके सुबह परीक्षा देने पहुंचे बच्चों को प्रश्न ही नहीं समझ में आते. आख़िरी मिनट में परीक्षा केंद्र पर पड़ाव डालकर बच्चे की आंखों तले किताबें अड़ाए रखना तो और भी बुरी बात है. आपको भले ही परीक्षा हॉल के गेट तक पूरी तैयारी करवाने की शांति मिल जाए लेकिन बच्चे का दिमाग़ अशांत हो जाएगा. वह भ्रमित भी हो सकता है और पर्चे में पूछे गए प्रश्नों का जवाब निल बटा सन्नाटा हो सकता है…और आपके सपनों पर पानी फिर सकता है. शुभ परीक्षा!

रविवार, 24 अप्रैल 2016

बोतलबंद पानी के बाद अब आया बोतलबंद हवा का ज़माना!

ज़्यादा दिन नहीं गुज़रे हैं जब लोग दूसरों को दिखा-दिखा कर बोतलबंद पानी किया करते थे गोया अमृतपान कर रहे हों! मोबाइल की तरह यह भी एक स्टेट्स सिंबल था. अब बोतलबंद पानी (बोतल 1 की हो या 100 लीटर की) पीना मजबूरी बन गया है. इस बाज़ारू दुनिया में जो इसे नहीं ख़रीद सकते वे तब भी प्यासे मर रहे थे, आज भी मर रहे हैं. भारत की आज़ादी के 70 वर्षों बाद सरकारी उपलब्धि यह है कि जल-स्रोतों को गटर बना दिया गया है और साफ पानी विलासी अमीरों का शग़ल लगता है. इसलिए चौंकिए मत और बोतलबंद पानी के बाद अब बोतलबंद हवा को स्टेटस सिंबल बनाने के लिए तैयार हो जाइए, क्योंकि वायु-प्रदूषण की मारी इस दुनिया में बाक़ायदा इसका व्यापार शुरू हो चुका है और भारत भी हवा व्यापारियों की ज़द में है. वायु-प्रदूषण के विविध कारण और समाधान उनकी चिंता का विषय नहीं हैं. वैसे भी मुनाफ़ापिस्सुओं के लिए हर संकट एक सुनहरी अवसर ही होता है.
विकास की अंधी दौड़ में शामिल चीन जैसे विकसित देशों की ऐसी पर्यावरणीय दुर्गति हुई है कि वहां लाखों लोग अभी से बोतलबंद हवा ख़रीदकर सांस ले रहे हैं. ‘बर्कले अर्थ’ की रपट के अनुसार चीन में वायु-प्रदूषण से रोज़ाना लगभग 4000 मौतें होती हैं! यही भय है कि बीजिंग समेत चीन के कई बड़े शहरों में बोतलबंद हवा का बिजनेस तेज़ी से फल-फूल रहा है. जल्द ही विकासशील भारत भी इससे अछूता नहीं रहेगा. कंक्रीट के जंगल खड़े करने की होड़ ने पर्यावरण में असंतुलन पैदा कर दिया है. इसका नतीजा यह है कि भारत के कुछ राज्यों में अप्रत्याशित 5080 किमी नया वन-क्षेत्र विकसित होने के बावजूद सार्थक परिणाम सामने नहीं आ रहे हैं. महानगरों में अपर्याप्त पर्यावरण संवर्धन व वायु-प्रदूषण पसली का दर्द बना हुआ है. जाहिर है ऐसे में पहाड़ों की ताज़गी देने वाली हवा के लुभावने पैकेट पानी की ही तरह हाथोंहाथ बिकेंगे. देश में बोतलबंद हवा जल्द ही हकीक़त और मजबूरी बन जाएगी. अभी वायु-प्रदूषण से बचने के लिए लोग दस्युओं की तरह घर से नाक-कान-मुंह बांध कर निकला करते हैं लेकिन जल्द ही वे आईसीयू में भर्ती किसी मरीज़ की भांति हवा की छोटी-बड़ी बोतलें गले में लटकाए नज़र आएंगे!
बिजनेसमैन पूरे विश्व में बहुत जल्द संभावनाएं सूंघ लिया करते हैं और उनके सेल्समैन हिमालय में भी बर्फ़ बेच आते हैं. सनातन संस्कृति वाले भारत में ज्ञानियों की धारणा थी कि धरती पर धूप-हवा-पानी सनातन तौर पर मुफ़्त और प्रचुर है लेकिन ‘वैश्वीकरण’ के इस दौर में पानी के बाद अब हवा भी बाज़ार में बिठा दी गई है. कनाडा की ‘वाइटैलिटी एयर बैंफ एंड लेक’ नामक कंपनी ने अपने यहां के चट्टानी पर्वतों और कंचन जल से घिरे प्राकृतिक हरे-भरे स्थलों की ताज़ा हवा बोतलों में बंद करके यूएसए और मध्य-पूर्व के देशों को बेचना शुरू कर दिया है. यह कंपनी कनाडा की दो स्थलों- बैंफ एवं लेक लुइस के निर्मल वातावरण से हवा को बोतलबंद कर रही हैं. ग्राहकी का आलम यह है कि उक्त कंपनी हवा बेचकर मालामाल हो रही है. चीन में तो क्रेज़ इस क़दर बढ़ गया है कि लोग बोतलबंद हवा ख़रीदकर जन्मदिन और शादियों में गिफ़्ट कर रहे हैं.
वाइटैलिटी एयर बैंफ एंड लेक ने शुद्ध हवा के अपने दो ब्रांड बाज़ार में उतारे थे- बैंफ एयर और लेक लुइस. कंपनी के संस्थापक मोजेज लेक ने 2014 में जब इस हवा का पहला पैकेट बेचा था तब उन्हें इसकी कल्पना भी नहीं रही होगी कि हवा का धंधा उनकी किस्मत बदल देगा. चीन में उन्हें इतना बड़ा बाज़ार मिला कि पिछले दिसंबर में दुकान का श्रीगणेश करने के तुरंत बाद ही 500 बोतलें पलक झपकते बिक गई थीं. बीजिंग में बैंफ एयर की 3 लीटर की बोतल आज लगभग 952 रुपए और 7.7 लीटर का बाटला 1542 रुपए में बिक रहा है.
दुनिया में हवा का बाज़ार बढ़ता देखकर ब्रिटेन के 27 वर्षीय लियो डे वाट्स भी ‘आएटहाएर’ कंपनी बनाकर शुद्ध हवा की खेती में कूद पड़े हैं और इस साल के शुरुआती तीन महीनों में ही हज़ारों पाउंड कमा चुके हैं. लियो की टीम शुद्ध हवा भरने सुबह 5 बजे ही ब्रिटेन के समरसेट, डोरसेट तथा वेल्स जैसे प्राकृतिक सुषमायुक्त इलाक़ों में जाती है और ग्राहकों की ख़ास मांगों के अनुरूप सप्लाई कर देती है. हवा के लिए लियो किसी दिन पहाड़ की चोटी पर चढ़ते हैं तो किसी दिन गहरी घाटियों में उतरते हैं. उनका मानना है कि अगर वायु-प्रदूषण का धरती पर यही हाल रहा तो निकट भविष्य में हज़ारों कंपनियां हवा के धंधे में उग आएंगी.
भारत में औद्योगिक शहरों की सांसें पहले से ही थमी हुई थीं, अब छोटे और मझोले शहरों का दम भी घुटने लगा है. केंद्रीय प्रदूषण बोर्ड की ताज़ा रपट कहती है कि सबसे प्रदूषित शहर मुजफ्फ़रपुर (बिहार) है और उसके बाद लखनऊ का नंबर आता है. यह आश्चर्यजनक है क्योंकि ये दोनों शहर उद्योगबहुल नहीं हैं! रपट से यह भी स्पष्ट हुआ है कि देश के 10 सबसे ज़्यादा प्रदूषित शहरों में से 6 शहर औद्योगिक रूप से पिछड़े उत्तर प्रदेश और बिहार के हैं जबकि औद्योगिक एवं आर्थिक गतिविधियों का केंद्र मुंबई, बंगलुरु और चेन्नई जैसे महानगरों में प्रदूषण उक्त शहरों से कम है. ऐसे में वायु-प्रदूषण को उद्योग-धंधों मात्र से सीधा जोड़ देना तर्कसंगत नहीं लगता. योजनाकारों व पर्यावरणविदों को इसका निदान और इलाज़ खोजना होगा. लखनऊ के बाद घटते क्रम में प्रदूषण-स्तर दिल्ली, वाराणसी, पटना, फ़रीदाबाद, कानपुर, आगरा, गया, नवी मुंबई, मुंबई और पंचकूला (हरियाणा) का है. अर्थात हवा की गुणवत्ता के आधार पर पंचकूला सबसे माकूल शहर है और मुजफ्फ़रपुर सर्वाधिक दमघोंटू!
घर-घर वायु-प्रदूषण के पसमंजर में अगर भारत जल्द ही हवा बेचने का केंद्र बन जाए तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए. मौक़े का फ़ायदा उठाने के लिए देसी-विदेशी कंपनियां भारत की नदी-घाटियों एवं पर्वतशृंखलाओं की ख़ाक छानती नज़र आने लगें तो अचंभित मत होइएगा. सरकार पर्यावरण के नियमों को शिथिल कर उन्हें हवा के अंधाधुंध दोहन का लाइसेंस जारी कर दे तब भी चकित मत होइएगा. शुद्ध हवा की पैकेजिंग के नाम पर अगर नदी-पहाड़ों की हवा अशुद्ध कर दी जाए तो उंगली मत उठाइगा. आख़िर यह सब आपकी बेहतरी के लिए किया जाएगा. भले ही आगे चलकर यही कंपनियां दूषित पानी की तर्ज़ पर हवा की जगह बोतलों में धुंआ भरकर बेचने लगें और लोगों को मजबूरी में वही पीना पड़े!
कनाडा की वाइटैलिटी एयर बैंफ एंड लेक कंपनी और ब्रिटेन की आएटहाएर कंपनी की भारत पर बराबर नज़र है. यहां वह किस भाव से हवा बेचेंगे यह समय आने पर जाहिर किया जाएगा. हालांकि विशेषज्ञ भारत में हवा-व्यापार को मुनाफ़े का सौदा नहीं मानते. उनकी आशंका है कि यह संपन्न लोगों का चोंचला ही बन कर रह जाएगा. देश का मध्यवर्ग और ग़रीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाले करोड़ों लोग बच्चों का राशन-पानी तो ठीक से ख़रीद नहीं पाते; बाज़ार से हवा ख़रीद कर पीने की औक़ात कहां से पैदा करेंगे! यह और बात है कि पहले वे प्यास से मर रहे थे अब श्वांस से भी मरा करेंगे!

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2016

यहूदी शाहकारों के बगैर मुंबई का नक्शा पूरा नहीं होता


दक्षिण मुंबई के कोलाबा की चौथी पास्ता लेन के पीछे होरमस जी स्ट्रीट में स्थित चबाड हाउस उर्फ नरीमन हाउस की सड़क पर अब भी जिंदगी का कारोबार चला करता है. नहीं है तो वर्ष 2003 से यह यहूदी केंद्र चलाने वाला युवा दम्पति रब्बी गाव्रियल और उनकी पांच माह की गर्भवती पत्नी रिवका होल्त्जबर्ग, जो बुधवार, 26 नवंबर, 2008 को 9 बजकर 45 मिनट पर हुए आतंकवादी हमले में दुनिया से असमय उठा दिए गए थे.
चबाड हाउस कभी यहूदी समुदाय की गतिविधियों का प्रमुख केंद्र हुआ करता था. यहां सिनॉगॉग (यहूदी उपासना-गृह और प्रार्थना-मंदिर) था, तोरा सिखाने वाली कक्षाएं चलती थीं, स्थानीय यहूदियों की शादियां तथा नशे की रोकथाम जैसे कई हितकारी क्रियाकलाप सम्पन्न होते थे. यहूदी पर्यटकों और व्यापारियों की तो जैसे यह मुंबई में एकमात्र शरणस्थली थी. ईश्वर से नजदीकी महसूस करने, कोशेर भोजन का जायका चखने या यहूदी छुट्टियां मनाने वालों के लिए चबाड हाउस के दरवाजे हमेशा खुले रहते थे. लेकिन आतंकवादियों की गोलीबारी और धमाकों से जब यह दुनिया उजड़ी थी तो दिन-रात जागने-भागने वाली कोलाहल भरी मुंबई ने जोर से जाना कि इस महानगर में यहूदी भी बसते हैं. यह बात और है कि आतंकवादी हमले के छह साल बाद 26 अगस्त, 2014 को एक और रब्बी इज्रोइल कोज़्लोवस्की और उनकी पत्नी चाया ने उसी नेस्तनाबूद चबाड हाउस को फिर आबाद कर दिया था. राख के ढेर से फीनिक्स पक्षी की तरह फिर जीवित हो उठना दुनिया भर के यहूदियों की बड़ी विशेषता रही है.
सन 1940 का जमाना था जब मुंबई में यहूदी खूब फल-फूल रहे थे और उनकी संख्या 30 हजार के पार हो गई थी. आज वे उंगलियों पर गिनने लायक बचे हैं, जिनमें से ज्यादातर मुंबई और इसके आसपास बसते हैं. लेकिन संख्या पर मत जाइए, मुंबई के इतिहास पर छोड़े गए उनके पूर्वजों के निशान मुंबई के परिदृश्य और भूदृश्य पर आज भी अमिट और स्थायी हैं. बहुत कम लोगों को पता होगा कि भारत का एक लैंडमार्क माने जाने वाला गेटवे ऑफ इंडिया के निर्माण में सबसे बड़ा दानकर्ता एक यहूदी ही था- सर जैकब ससून.
माना जाता है कि मुंबई में यहूदियों के सामूहिक आगमन का श्रीगणेश 18वीं सदी में हुआ. इस संगम में दो बिलकुल अलग धाराएं थीं- बेन इजरायली (इजरायल के लाल) और बगदादी. बेन इजरायली समुदाय कोंकण के गांवों से आया था जिसके बारे में कहा जाता है कि वे उन इजरायली यहूदियों के वंशज हैं जिनका जलपोत 175 ईसा पूर्व में कोंकण तट पर नष्ट हो गया था. जूडिया से आए उस जलपोत में 7 यहूदी परिवार थे. वे यूनानी सम्राट एंटियोकस चतुर्थ एपीफानेस के समय वतन से निकले थे. बगदादी यहूदी वे हैं जो मामलूक वंश के आखिरी शासक दाउद पाशा द्वारा 19वीं सदी की शुरुआत में मचाई गई तबाही और भीषण नरसंहार के बाद इराक से भागे थे.
मुंबई में बसने वाला पहला बगदादी यहूदी जोसफ सेमाह बताया जाता है, जो सन 1730 में सूरत छोड़कर आया था. बेन इजरायली समुदाय के पहले सदस्य सन 1749 में कोंकण के गांवों से यहां पहुंचे. उन दिनों अंग्रेजों द्वारा मुंबई में विकसित किए जा रहे व्यापारिक ढांचागत विकास ने इन्हें बेहद आकर्षित किया था. मुंबई में बसने के बाद इन्हें अपने पूजागृहों की जरूरत भी महसूस हुई. सो कोंकण से आए सैम्युएल इजेकील दिवेकर (मूल नाम सामाजी हसाजी दिवेकर) नामक यहूदी ने मुंबई का प्रथम सिनॉगॉग मई 1796 में स्थापित किया, जिसका नाम था ‘शारे राहामीम’ जिसे गेट ऑफ मर्सी सिनॉगॉग भी कहा जाता है. यह उन्हीं के नाम की गई गली 254, सैम्युअल स्ट्रीट, मुंबई- 400 003 में स्थित है. इसके बाद तो जैसे दूसरे सिनॉगॉगों और प्रार्थना-गृहों की बाढ़ सी आ गई. टनटनपुरा स्ट्रीट में 4 जून 1843 को ‘शारे रेशन’ या नया सिनॉगॉग, सर जेजे मार्ग पर 1861 में ‘मेगन डेविड सिनॉगॉग’, जैकब सर्कल में 1886 में ‘टिफेरेथ इजरायल सिनॉगॉग’ जैसे कुल आठ सिनॉगॉग और प्रार्थना-गृह यहूदियों की बढ़ती आबादी के मद्देनजर सन 1946 तक मुंबई में बनाए जाते रहे.
लेकिन यह 1832 का साल था जब दाउद पाशा के अत्याचारों से तंग आकर डेविड ससून अपने कई यहूदी साथियों के साथ मुंबई आए और यहां के यहूदियों की महिमा एवं इतिहास को हमेशा-हमेशा के लिए बदल कर रख दिया था. उनकी डेविड ससून एंड कंपनी ने देखते ही देखते मुंबई में कपड़ा मिलें तथा अन्य उद्योग-धंधे व संस्थान खड़े कर दिए. लेकिन उनका सबसे बड़ा योगदान था परोपकार के कार्यों में अपार धन लगाने का. उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में डेविड ससून ने डेविड ससून मैकेनिक्स संस्थान, डेविड ससून लाइब्रेरी, विक्टोरिया गार्डेंस (आज का वीरमाता जीजाबाई उद्यान) में क्लॉक टॉवर और विक्टोरिया एंड एल्बर्ट म्यूजियम (आज का भाऊ दाजी लाड संग्रहालय) में ऐतिहासिक स्मारक बनवाने जैसे कई ऐतिहासिक कार्य किए.
सन 1875 में डेविड ससून के बेटे एल्बर्ट ने मुंबई की ऐसी पहली गोदी कोलाबा में बनवाई जिसमें जलपोत तैरने लायक पानी हर हाल में बरकरार रखा जाता है, उसे हम ससून डॉक के नाम से जानते हैं. सन 1884 में सर जैकब ससून ने फोर्ट में केनसेथ इलियाहू सिनॉगॉग बनवाया था, जहां चबाड हाउस शुरू होने के पहले तक ताजमहल और ओबेरॉय होटलों में ठहरने वाले यहूदी आसानी से पहुंचा करते थे. डेविड ससून की विरासत में जेजे हॉस्पिटल परिसर में खड़ा डेविड ससून औद्योगिक एवं सुधार संस्थान, मुंबई का कॉमेथ हाउस जो उनका मुख्यालय भी था, रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस, बाम्बे फ्लाइंग क्लब, निवारा ओल्ड एज होम, फ्लोरा फाउंटेन और मेसीना हॉस्पिटल जैसे न जाने कितने स्मारक शामिल हैं, जो आज भी हमें मुंबई का पता देते हैं.
डेविड ससून की मृत्यु तो सन 1864 में ही हो चुकी थी लेकिन सामुदायिक गतिविधियां आगे के दशकों तक हंसती-खिलखिलाती रहीं. फिर मातृभूमि के आकर्षण में 50 के दशक के दौरान मुंबई से यहूदियों का बहिर्गमन शुरू हुआ, जो आज तक जारी है. हालत यह है कि इजरायल में पैदा हुए यहूदी भारत के बारे में अधिक नहीं जानते और मुंबई में बचे अधिकांश यहूदी 70 से ऊपर की अवस्था के हैं. 73वर्षीय निसिम मोजेस नामक सज्जन ने भारत के यहूदियों की वंशावली, सामूहिक गान, मराठी-हिब्रू मिश्रित भाषा और खान-पान की एक फेहरिस्त तैयार करने की कोशिश की है और सन 1671 से लेकर आज तक के करीब 40000 यहूदियों का वंशवट खड़ा भी कर लिया है. लेकिन आज पूरे भारत में उनकी आबादी 5000 के आसपास ही बची है और वह भी तेज़ी से खत्म हो रही है. फिर भी इतना तो तय है कि मुंबई का नक्शा यहूदियों के बनाए शाहकारों के बगैर पूरा नहीं होता. गौर से सुनें तो आज भी सूने सिनॉगॉगों में गूंजने वाली उनकी सामूहिक प्रार्थनाएं सुनाई दे जाएंगी.

शुक्रवार, 15 जून 2012

मेहदी हसन: आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ

मेहदी हसन साहब का भारत से ऐसा रिश्ता है कि जिसे कहते हैं कि उनकी तो यहाँ नाल गड़ी है. राजस्थान में जहाँ वह पैदा हुए थे उनके लूणा गाँव के पुराने लोग प्यार से उन्हें महेदिया कहकर बुलाते थे. मेहदी हसन अपनी जन्मस्थली से गहरे जुड़े हुए थे. वह विभाजन के बाद तीन बार गाँव आये. वहां अपने दादा की मजार बनवाई. गौर करने की बात यह है कि वह जब भी गाँव आते थे तो गांववालों से शेखावटी बोली में ही बात करते थे. गाँव वालों ने एक एजेंसी को बताया कि मेहदी हसन को गाने के साथ-साथ पहलवानी का भी शौक था और जब पिछली बार वह गाँव आये थे तो उनके बचपन के एक दोस्त अर्जुन जांगिड़ ने मज़ाक-मज़ाक में कुश्ती लड़ने की चुनौती देकर पुरानी यादों को ताज़ा कर दिया था. अब अर्जुन जांगिड़ भी इस दुनिया में नहीं रहे.
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पता नहीं क्यों किसी बड़े फ़नकार के गुज़र जाने के बाद उसे हर माध्यम में ढूंढ और पा लेने की बेचैनी दम नहीं लेने देती. यूं तो मेरे मोबाइल के मेमोरी कार्ड में हसन साहब की कई गज़लें हैं जिन्हें मैं अक्सर सुना करता हूं, लेकिन परसों (13 जून 2012) जब उनके निधन की ख़बर सुनी तो सन्न रह गया और उन्हें बहुत करीब से पा लेने के लिए छटपटाने लगा. इंटरनेट पर विविध सामग्री उनके बारे में पढ़ डाली. यू ट्यूब पर उनकी गायी अमर गज़लें आँख मूंदे सुनता रहा और न जाने किस किस दुनिया की सैर करता रहा.

जिन लोगों ने मेहदी हसन साहब को गाते सुना और देखा है उन्हें मैं भाग्यशाली समझता हूं. टीवी पर स्वरकोकिला लता मंगेशकर, खैय्याम साहब, आबिदा परवीन, हरिहरन, पंकज उधास, तलत अज़ीज़ और अन्य संगीत नगीनों की राय मेहदी साहब के बारे में देखता-सुनता रहा. लता जी ने तो उनके बारे में एक बार कुछ इस तरह कहा था कि मेहदी हसन साहब के गले से ख़ुदा बोलता है.

मैंने इलेक्ट्रौनिक उपकरणों के जरिये ही मेहदी साहब को सुना है लेकिन उनकी आवाज़ मशीन को भी इंसानी गला दे देती है. उनकी आवाज़ में मुलायमियत होने के साथ-साथ वह वज़न भी है जो शायर के शब्दों और भावनाओं को श्रोता की रगों में उतार देता है. यही वजह है कि उनकी गायिकी सरहदों की दूरियां पाट देती है. हवाओं और पानियों में घुलकर एक से दूसरे देस निकल जाती है. बेख़याली के आलम में मैं सुनता रहा- 'रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ, आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ', 'ज़िंदगी में तो सभी प्यार किया करते हैं, मैं तो मर कर भी मेरी जान तुझे चाहूंगा', 'अबके हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें, जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें,' 'मोहब्बत करने वाले कम न होंगे, तेरी महफ़िल में लेकिन हम न होंगे', 'पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है, जाने न जाने गुल ही न जाने, बाग़ तो सारा जाने है,' 'गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौबहार चले, चले भी आओ के गुलशन का कारोबार चले', 'दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के, वो कौन जा रहा है शब-ए-ग़म गुज़ार के,' 'आये कुछ अब्र कुछ शराब आये, उसके बाद आये जो अज़ाब आये', 'रफ्ता रफ्ता वो मेरी हस्ती का सामाँ हो गए.....लिस्ट बहुत लम्बी है. लेकिन जब भी मैं उनका गाया 'प्यार भरे दो शर्मीले नैन' सुनता हूँ तो मेरी वाणी मूक हो जाती है. जिस तरह से उन्होंने 'प्यार भरे' की शुरुआत की है वह भला कोई क्या खाकर कर सकेगा.

मेहदी हसन को सुनते हुए कभी अभिजातपन का एहसास नहीं होता. लगता है जैसे अपने ही परिवेश का कोई देसी आदमी पक्का गाना गा रहा हो. उनकी आवाज़ में राजस्थान की गमक को साफ़ महसूस किया जा सकता है (मेहदी हसन का जन्म 18 जुलाई 1927, राजस्थान, जिला-झुंझनू, गाँव-लूणा, अविभाजित भारत में हुआ था). उनकी ग़ज़ल गायिकी शास्त्रीय होते हुए भी मिट्टी की खुशबू से सराबोर है. वह जहां पूरी महफ़िल के लिए गाते प्रतीत होते हैं वहीं एक एक श्रोता के लिए भी और सबसे बढ़कर वह स्वयं में खोकर स्वयं के लिए गाते प्रतीत होते हैं. ग़ज़ल सम्राट जगजीत सिंह जी ने मुझसे एक बार मेरे प्लस चैनल के दिनों में कहा था- "नई पीढ़ी के ग़ज़ल गायकों को अगर लम्बी रेस का घोड़ा बनना है तो उन्हें अपना शास्त्रीय आधार पुख्ता करना होगा और यह बात उन्होंने मेहदी हसन साहब से सीखी है."

मेहदी हसन साहब ने बड़ी सादगी से राग यमन और ध्रुपद को ग़जलों में ढाला और ग़ज़ल गायिकी को उस दौर में परवान चढ़ाया जब ग़ज़ल गायिकी का मतलब उस्ताद बरकत अली खान, बेगम अख्तर और मुबारक बेगम हुआ करता था. हालांकि हसन साहब कोई ग़ज़ल गायक बनने का उद्देश्य लेकर नहीं चले थे. आठ साल की उम्र में उन्होंने फाजिल्का बंगला (अविभाजित पंजाब) में अपना जो पहला परफौरमेंस दिया था वह ध्रुपद-ख़याल आधारित था...और उन्हें जब पहला बड़ा मौका मिला 1957 में पाकिस्तान रेडियो पर, तो वह ठुमरी गायन के लिए था. ध्रुपद शास्त्रीय संगीत के कुछ सबसे पुराने रूपों में से एक माना जाता है. खान साहब की ट्रेनिंग ही ध्रुपद गायिकी में हुई थी. उनके पिता उस्ताद अज़ीम खान और चाचा उस्ताद इस्माइल खान साहब बचपन से ही रोजाना उन्हें ध्रुपद का रियाज़ कराते थे. दरअसल मेहदी हसन साहब का पूरा खानदान ही गायिकी परंपरा से जुड़ा चला आ रहा था. वह अक्सर ज़िक्र करते थे कि उनकी पीढ़ी 'कलावंत घराना' की 16वीं पीढ़ी है.

लेकिन रेडियो पाकिस्तान के दो अधिकारियों जेडए बुखारी और रफीक अनवर साहब ने मेहदी हसन की उर्दू शायरी में प्रगाढ़ अभिरुचि को देखते हुए उनका प्रोत्साहन किया और गज़लें गाने का मौका दिया. मेहदी हसन इन दोनों सख्शियतों का सार्वजनिक तौर पर ज़िन्दगी भर आभार मानते रहे. आज दुनिया भर के ग़ज़ल प्रेमी भी उनका आभार मानते हैं कि उन्होंने हमें 'शहंशाह-ए-ग़ज़ल' दिया और ग़ज़ल गायिकी को उसका नया रहनुमा.

मेहदी हसन साहब की ज़िंदगी किसी समतल मैदान की तरह कभी नहीं रही. वह वक़्त के थपेड़ों से दो-चार होते रहे. उनका कलाकारों से भरा-पूरा परिवार आर्थिक संकटों से घिरा ही रहता था. बचपन में मेहदी हसन साहब को अविभाजित पंजाब सूबे के चिचावतनी कस्बे की एक साइकल सुधारने वाली दूकान में काम करना पड़ा. थोडा बड़ा होने पर वह कार और डीजल ट्रैक्टर मैकेनिक का काम सीख गए और परिवार की मदद करते रहे. जव वह २० साल के हुए तो भारत-पाक बंटवारा हो गया और वह परिवार के साथ पाकिस्तान चले गए जहाँ आर्थिक मुश्किलों का नया दौर शुरू हुआ. इस सबके बावजूद उन्होंने संगीत के प्रति अपनी लगन में कमी नहीं आने दी. वहां छोटे-मोटे प्रोग्राम करते रहे. और तभी उनको मिला पहला ब्रेक पाकिस्तान रेडियो पर, जिसका ज़िक्र हम पहले कर चुके हैं.

ग़ज़ल गायिकी में स्थापित होने के साथ ही उन्हें पाकिस्तान फिल्म इंडस्ट्री ने हाथोंहाथ लिया. उनके गाये फ़िल्मी नगमें, दोगाने, गज़लें पाकिस्तानी फिल्म संगीत की विरासत बन गए हैं. मलिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ के साथ उनका गाया 'आपको भूल जाएँ हम, इतने तो बेवफा नहीं' (फिल्म-तुम मिले प्यार मिला, 1969), नाहीद अख्तर के साथ 'ये दुनिया रहे न रहे मेरे हमदम' (मेरा नाम है मोहब्बत, 1975), 'आज तक याद है वो प्यार का मंजर मुझको' (सेहरे के फूल), 'जब कोई प्यार से बुलाएगा' (ज़िंदगी कितनी हसीं है, 1967), 'दुनिया किसी के प्यार में जन्नत से कम नहीं' जैसे सैकड़ों सुपरहिट फ़िल्मी नगमें उनके नाम दर्ज़ हैं.

एक गायक के तौर पर मेहदी हसन कई बार भारत आये. भारत के संगीत रसिकों ने हमेशा उन्हें सर-आँखों पर बिठाया. उनके क्रेज़ का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब खान साहब पहली बार भारत आये तब 'टाइम्स ऑफ़ इण्डिया' ने पहले पेज पर किसी राष्ट्राध्यक्ष के आगमन की तरह बड़ी-सी तस्वीर छापी थी और कैप्शन दिया था- 'मेहदी हसन एराइव्स'. सच है, इस कायनात में ग़ज़लों का अगर कोई राष्ट्र होता हो तो वह उसके आजीवन राष्ट्राध्यक्ष ही थे. आख़िरी बार जब वह सन 2000 में भारत आये थे तो जल्द ही फिर आने का वादा करके गए थे लेकिन उनकी फेफड़ों की बीमारी ने ऐसा घेरा कि साँस साथ छोड़ने लगी. खुदा की आवाज़ का एहसास कराने वाले फ़नकार की धीरे-धीरे आवाज़ भी जाती रही और अंततः फ़नकार भी हमसे रुखसत लेकर सदा के लिए दुनिया से चला गया.

मुझे अब भी यह खबर झूठी लग रही है. मगर मृत्यु एक कड़वी सच्चाई है. मेंहदी साहब को श्रद्धांजलि देने के लिए उन्हीं के गाये शब्द उधार लेकर इतना ही कहता हूँ- ‘आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ.....’

शुक्रवार, 18 मई 2012

कवि तुषार धवल के चित्र: शिव, प्रकृति-पुरुष और वेलेंटाइन्स

एक कवि यदि चित्र बनाये तो कैसा होगा? वह जो शब्दों से एक संसार रचता है, वही अब लकीरों और रंगों से संसार रचे तो कैसा होगा? क्या शब्द लकीर ओढ़ लेते होंगे या फिर वहां सिर्फ शब्दातीत ही होता होगा? क्या कवि अपने भीतर के किसी अलग तहखाने से चित्र लाता है और किसी अन्य से कविता? या फिर उसकी कविता का वही संसार एक अलग रूप-रंग में चित्र के रूप में उद्भासित होता है ? इसकी पड़ताल के लिए अलग अलग समय पर अलग अलग कवि-चित्रकारों की कृतियों को परखा गया है और अब तक इस बारे में कोई स्थाई राय नहीं बन पाई है. वजह ये कि हर रचनाकार का अपना सृजन धर्म अलहदा होता है, और यही वह कुंजी है जो विपुल सृजन के विश्व का ताला खोलती और उसे समृद्ध करती है.

देश और दुनिया में ऐसे कवियों की कमी नहीं है जो चित्रकार भी हैं, या थे. उन्हीं तमाम लोगों की कतार में एक और नाम है तुषार धवल का. यूँ तो तुषार धवल को हिंदी के लोग एक कवि के तौर पर जानते हैं, पर चित्रकार के रूप में भी वे सक्रिय हैं, और इसे हममें से कम लोग ही जानते होंगे.

पिछले माह दिनांक 9 अप्रैल से 14 अप्रैल के मध्य मुंबई की प्रतिष्ठित 'सिमरोज़ा आर्ट गैलेरी' में तुषार धवल के चित्रों की प्रदर्शनी आयोजित की गयी जिसका नाम unconscious calling रखा गया. दरअसल यह नाम भी चित्रकार के मन की परतें खोलता प्रतीत होता है! तुषार दरअसल सृजन धर्मिता को अचेतन मन से उठता हुआ पाते हैं. यहाँ उन पर फ्रायड के मनोवैज्ञानिक चिंतन का प्रभाव देखा जा सकता है. प्रदर्शित चित्रों में तुषार धवल के चित्रों की तीन श्रृंखलाओं ने विशेष तौर पर ध्यान आकर्षित किया. ये चित्र श्रृंखलाएं थीं :- शिव, प्रकृति-पुरुष, और वेलेंटाइन्स. इन सभी चित्रों में जहाँ क्रमशः उनकी चित्र यात्रा को देखा जा सकता है वहीँ उनके अचेतन मन पर उठती छवियों को भी समझा जा सकता है. ये सभी चित्र एक ओर स्त्री-पुरुष संबंधों की बौद्धिक, मनोवैज्ञानिक, भावनात्मक और सामाजिक पड़ताल करते हैं तो दूसरी ओर उनमें फंतासी का भी विपुल प्रयोग दीखता है. यहाँ स्त्री-पुरुष अपने शारीरिक आयामों को तोड़ते हुए नज़र आते है, जैसे एक भीतरी तत्त्व इनकी देह रचना को तोड़ बाहर निकल कर खुद को व्यक्त करना चाह रहा है. यहाँ तुषार की ही ये काव्य पंक्तियाँ बरबस याद आ जाती हैं--

"आओ तन बदल लें
गहरे अंतर में
दरक गए हैं सीमान्त
काल की शिखा से तोड़ लाया यह पल
परिधि को तोड़ निकला
अनंत यात्रा यह भी इस कथा की ...”

अपनी कविताओं की ही तरह अपने चित्रों में भी तुषार भौतिक से पार-भौतिक तक की यात्रा करते हैं. फिर चाहे वह शिव का सूक्ष्म निरूपण हो या फिर ‘शेष 1’, जिसमें उन्हें पहली बार एक नया फॉर्म प्राप्त हुआ, या फिर प्रकृति-पुरुष और वेलेंटाइन्स. सबमें चित्रकार इस भौतिक विश्व के पीछे की उर्जा को तलाश रहा है. अपने नए मुहावरों में तुषार के चित्रित चरित्र 'मुंडा हुआ सर, लम्बी खिंची हुई गर्दन और गोल उठे हुए कंधे' वाले हैं और प्रायः इनकी नाक या आँख नहीं होती है. तुषार का मानना है कि प्राणिमात्र की भाव भंगिमाओं का यदि अध्ययन किया जाये तो उनकी गर्दन के खिंचाव से ही उनके भीतर के भावों को समझा जा सकता है. साथ ही वे मछली, कमल और अर्धचन्द्र को बिम्बों के रूप में लाते हैं. गौरतलब है कि ये बिम्ब तुषार की कविताओं में भी आते हैं. इसी तलाश में अभिव्यक्ति के नए नए फॉर्मों पर वे अभी काम कर रहे हैं. उनकी रेखाओं में एक आंतरिक लय, जो उनकी कविताओं में भी पाई जाती है, स्पष्ट दीखती है. इसके साथ कोमल रंगों के चटख सम्मिलन से वे एक सूक्ष्म विश्व की रचना करते हैं जो प्रायः दृश्यमान नहीं है. एक और बात, अपनी "काला राक्षस" जैसी लम्बी कविता में जिस तरह तुषार ने फंतासी का इस्तेमाल किया है, लगभग वही रूप इन चित्रों में भी नज़र आता है.

इस प्रदर्शनी का उद्घाटन श्रीमती संगीता जिंदल, जो 'आर्ट इंडिया' नामक प्रतिष्ठित कला पत्रिका की संपादक हैं, ने किया. उद्घाटन समारोह में मुंबई और पुणे कला जगत के कई परिचित चेहरों के साथ साथ फिल्म जगत से जुड़े लोग, साहित्य सेवी तथा नौकरशाही से जुड़े लोग शरीक हुए.

यह कहा जा सकता है कि तुषार की कविता और चित्रकारी एक दूसरे की स्पर्धी नहीं बल्कि सहधर्मिणी एवं सहगामिनी हैं तथा कहीं-कहीं एक दूसरे की पूरक भी. जिस तरह एक कलाकार के भीतर अनेक रचनात्मक जगत एक साथ सक्रिय रहते हैं उसी तरह उसके अंतरतम में कई विधाएं एकसाथ प्रस्फुटित होने के इंतज़ार में रहती हैं. कोई कथ्य या विषयवस्तु धरातल पर किस रूप में खिले, यह कह पाना या तय कर पाना हमेशा कठिन होता है. इन अर्थों में तुषार जी की चित्रकारी और कविता एक दूसरे का संबल तथा विस्तार भी है. तुषार एक कवि के रूप में अधिक मुखर होंगे या एक चित्रकार के रूप में, या फिर दोनों ही में उनकी गति सम-इन्द्रधनुषी सिद्ध होगी, यह समय ही सिद्ध करेगा. उनकी इस उज्जवल रचनाधर्मी यात्रा के लिए हमारी शुभकामनायें!

रविवार, 22 अप्रैल 2012

प्रायवेट स्कूलों में 25% आरक्षण और आदम के बच्चे

ज़रा सोचिये कि जब धारावी की झोपड़पट्टी का कोई बच्चा किसी इंटरनेशनल स्कूल में शान से क्लास अटेंड करेगा तो कितना अद्भुत नज़ारा होगा! धर्म, जाति, भाषा, वर्ग के कितने बंधन चकनाचूर होंगे. कई फ़िल्मी कहानियां हकीक़त बन सकती हैं. कई हाथ आसमान छू सकते हैं. कई सपने साकार हो सकते हैं. समाज में समरसता का एक नया दौर शुरू हो सकता है. कई किताबी बातें अमली जामा पहन सकती हैं.
यह कल्पना करके ही रोमांच हो आता है कि मुंबई के जुहू कोलीवाड़ा में रहनेवाले गरीब मच्छीमारों के बच्चे 2 फर्लांग दूर जुहू तारा रोड पर स्थित उस जमनाबाई नरसी स्कूल में दाखिला ले सकेंगे जहां फ़िल्मी सितारों और उद्योगपतियों के बच्चे पढ़ते हैं! वे करीब से देख सकेंगे कि किस फिल्म सितारे का बेटा अपने टिफिन में क्या लेकर आया है,किस उद्योगपति के बेटे ने किस विलायती कंपनी के जूते पहन रखे हैं या यूनीफॉर्म की दुनिया में नया फैशन क्या चल रहा है. वे यह भी जान सकेंगे कि पॉकेट मनी क्या बला होती है और उनके माता-पिता की महीने भर की कमाई से ज्यादा पैसे इस मद में अमीर बच्चे किस मासूमियत से उड़ा देते हैं.


ज़रा सोचिये कि जब धारावी की झोपड़पट्टी का कोई बच्चा किसी इंटरनेशनल स्कूल में शान से क्लास अटेंड करेगा तो कितना अद्भुत नज़ारा होगा! धर्म, जाति, भाषा, वर्ग के कितने बंधन चकनाचूर होंगे. कई फ़िल्मी कहानियां हकीक़त बन सकती हैं. कई हाथ आसमान छू सकते हैं. कई सपने साकार हो सकते हैं. समाज में समरसता का एक नया दौर शुरू हो सकता है. कई किताबी बातें अमली जामा पहन सकती हैं.


यह मुमकिन होने जा रहा है राईट टू एजूकेशन एक्ट के प्रावधानों पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर लग जाने के चलते. प्रावधान यह है कि देश भर के प्रायवेट स्कूलों को गरीब तबके के बच्चों के लिए 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित करनी ही करनी हैं. बिना सरकारी मदद वाली अल्पसंख्यक प्रायवेट स्कूलों को इस दायरे से बाहर रखा गया है.


केंद्र सरकार ने सभी राज्यों से कहा है कि वे उपलब्ध सीटों तथा लाभान्वित होनेवाले छात्रों की सूची यथाशीघ्र भेजें. एक अनुमान के मुताबिक़ महाराष्ट्र में करीब 6000 प्रायवेट स्कूल हैं और इनमें 88000 से अधिक गरीब छात्रों को दाखिला दिया जा सकता है. ऐसे में पूरे देश की कल्पना कीजिये. एक करोड़ से ज्यादा गरीब छात्र पहले ही वर्ष लाभान्वित हो सकते हैं. लेकिन कहना जितना आसान है, करना उतना ही कठिन.

आर्थिक रूप से पिछड़े छात्रों को 25 प्रतिशत आरक्षण मिलना कम से कम इस साल तो संभव नहीं लगता. राज्य सरकारों ने अभी तक इस सम्बन्ध में स्कूलों को विशेष दिशा-निर्देश जारी नहीं किये हैं. दूसरी ओर प्रायवेट स्कूल दावा कर रहे हैं कि उनके यहाँ सीटें पहले ही फुल हो चुकी हैं क्योंकि अगले सत्र के एडमीशन की प्रक्रिया पूरी हो गयी है. उधर शिक्षा कार्यकर्ताओं का कहना है कि ये स्कूल जून के पहले एडमीशन प्रक्रिया बंद नहीं कर सकते. एनजीओ 'फोरम फॉर फेयरनेस इन एजूकेशन' के अध्यक्ष जयंत जैन ने धमकी दी है कि अगर इसी साल से सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर अमल नहीं हुआ तो हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की जायेगी. तर्क यह है कि प्रायवेट स्कूलों को एडमीशन लेने में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए थी. हाई कोर्ट की औरंगाबाद खंडपीठ ने पिछले साल ही यह रूलिंग दी थी कि स्कूलों को जून के आसपास एडमीशन लेना चाहिए.


जाहिर है कि बहुत कठिन है डगर पनघट की. समाज विज्ञान भले ही सिद्ध कर चुका है कि अगर समान अवसर मिले तो कामयाबी पाने के लिए गरीब-अमीर होना कोई मायने नहीं रखता. लेकिन सामाजिक समरसता की जिसे पड़ी हो वह अपना घर फूंके. प्रायवेट स्कूलों की हीला-हवाली से जाहिर है कि वे अपने माल कमाऊ बिजनेस मॉडल को आसानी से चौपट नहीं होने देंगे.

अब 'देवताओं' के बच्चों के साथ क्लासरूम में बैठने वाले 25 प्रतिशत 'आदम' के बच्चों से यह तो नहीं कहा जा सकता कि फलां ब्रांड के जूते पहन कर आओ, ज्ञानवर्द्धक पिकनिक के नाम पर लाखों का चेक डैडी से कटवा कर भेजो, एनुवल फंक्शन के नाम पर हजारों रुपये कंट्रीब्यूट करो. उनसे यह भी नहीं कह सकते कि सुप्रीम कोर्ट की कृपा से आये हो तो एसी क्लासरूम से बाहर जाकर बैठो. यह भी नहीं कह सकते कि तुम्हारे जैसे झोपड़ावासियों की संगत में ये महलवासी बच्चे बिगड़ रहे हैं इसलिए स्कूल आना ही बंद कर दो. इस सूरत-ए-हाल में प्रायवेट स्कूल वाले क्या करें! फिलहाल उन्हें यही सूझ रहा है कि सीटें न होने का बहाना बनाया जाए. क्या करें, देश की सबसे बड़ी अदालत का आदेश है, टाला भी नहीं जा सकता.


आशंकाओं कुशंकाओं के बावजूद इतना तो तय है कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश पूरी तरह इस सत्र से न सही अगले सत्र से लागू करना ही होगा. चाहे प्रायवेट स्कूल वाले अपने यहाँ सीटें बढाएं या नए स्कूल खोलें, गरीब बच्चों को 25 प्रतिशत सीटों पर बिठाकर पढ़ाना ही पड़ेगा. ऐसे में सरकारों को इस बात की कड़ी निगरानी करनी पड़ेगी कि प्रायवेट स्कूलों के अन्दर गरीब बच्चों के साथ शिक्षण अथवा व्यवहार में किसी तरह का भेदभाव न होने पाए. सबसे अहम बात यह है कि शिक्षा कार्यकर्ताओं को चौकस रहना पड़ेगा कि कहीं किसी गरीब की जगह अमीर बच्चे को झोपड़ावासी या नौकरानी-पुत्र बनाकर एडमीशन देने का खेल शुरू न हो जाए यानी बैक डोर इंट्री. और अगर यह सिलसिला चला तो आगे चलकर घृणा के नए प्रतिमान भी स्थापित हो सकते हैं!

सोमवार, 16 अप्रैल 2012

U-19: उन्मुक्त आकाश में चमका चंद


इन्डियन प्रीमियर लीग में इन दिनों दुनिया भर के क्रिकेट सितारे जगमगा रहे हैं. लेकिन इसी बीच ऑस्ट्रेलिया जाकर भारत का चाँद चमक उठा और सब लोग देखते ही रह गए. जी हाँ, भारत की अंडर-19 क्रिकेट टीम ने ऑस्ट्रेलिया में ऑस्ट्रेलिया अंडर-19 टीम को छठी का दूध याद दिला दिया और इसमें कप्तान उन्मुक्त चंद उन्मुक्त होकर चमके. मौका चार देशों की अंडर-19 क्रिकेट टीमों के फाइनल मुकाबले का था. कंगारुओं को धूल चटाने के लिए उन्मुक्त चंद ने 9 चौकों और 6 छक्कों की मदद से नाबाद 112 रनों की ज़ोरदार पारी खेली. इस शानदार जीत में मध्यम तेज़ गति के गेंदबाज़ संदीप शर्मा का योगदान भी अहम रहा जिन्होंने निर्धारित 10 ओवरों में 51 रन देकर विपक्षी टीम के 4 विकेट झटके. फाइनल में भारत ने ऑस्ट्रेलिया को 7 विकेट से रौंदा.
यह जीत इसलिए भी ख़ास हो जाती है कि ऑस्ट्रेलियाई टीम में सीनियर टीम के तेज़ गेंदबाज़ पैट कमिंस भी शामिल थे. कप्तान उन्मुक्त चंद ने इस पूरे टूर्नामेंट में कंगारुओं को धोते हुए कुल 281 रन जोड़े और सर्वाधिक छक्के जड़ने का रिकॉर्ड भी उन्हीं के नाम रहा. उन्होंने कुल 13 छक्के जड़े हैं. सेमी फाइनल में इंग्लैण्ड के खिलाफ उन्मुक्त ने अगर 94 रनों की आतिशी पारी न खेली होती तो भारत का बैरंग वापस होना तय था. यह मैच भारत ने 63 रनों के बड़े अंतर से जीता जिसमें उन्मुक्त को 'मैन ऑफ़ द मैच' चुना गया था. फाइनल मुकाबले में तो ख़ैर वह 'मैन ऑफ़ द मैच' रहे ही.

पिछले दिनों जिस तरह भारतीय टीम ऑस्ट्रेलिया से बुरी तरह नाकाम होकर लौटी थी उसकी निराशा कुछ हद कम हुई है. भारतीय टीम टेस्ट सीरीज में बुरी तरह पराजित होने के बाद त्रिकोणीय सीबी सीरीज के फाइनल तक में नहीं पहुँच पाई थी. लेकिन आईसीसी अंडर-19 वर्ल्ड कप ऑस्ट्रेलिया में ही होना है. इस टूर का फायदा उन्मुक्त एंड कंपनी-- जिसमें कमल पासी, विकास मिश्रा, बाबा अपराजित, अक्षदीप, हरमीत सिंह, अखिल हेरावाड़कर, मन वोहरा, विजय जोल, एस पटेल, ए नाथ जैसे प्रतिभावान युवा क्रिकेटर शामिल हैं, को उस दौरान भी मिलेगा क्योंकि उन्होंने ऑस्ट्रेलियाई परिस्थितियों में खेलने का स्वाद चख लिया है. वे आत्मविश्वास से लबालब रहेंगे. पूर्व भारतीय कप्तान दिलीप वेंगसरकर ने भारतीय अंडर-19 टीम को बधाई देते हुए कहा है कि यह किसी भी क्रिकेटर के कैरियर का महत्वपूर्ण दौर होता है और अब ये क्रिकेटर बड़े-बड़े सपने देख सकते हैं. यकीनन स्टार परफॉर्मर कप्तान उन्मुक्त चंद का भविष्य उज्जवल नज़र आ रहा है.

शुक्रवार, 13 अप्रैल 2012

स्वाइन फ़्लू का दैत्य फिर दे रहा है दस्तक

जहां मैं रहता हूँ वहां से भिवंडी ज्यादा दूर नहीं है. भिवंडी को यूं तो लोग वहां के पावरलूम कारख़ानों के लिए याद करते हैं (और किसी ज़माने में हुए भीषण दंगों के लिए भी) लेकिन भिवंडी के लोग आजकल भगवान को याद कर रहे हैं. यहाँ स्वाइन फ़्लू ने दस्तक दे दी है. भिवंडी के कोनगाँव इलाके के कोलीवाड़ा में रहने वाले 57 वर्षीय मधुकर नाईक को स्वाइन फ़्लू हो गया है और उन्हें इलाज के लिए मुंबई के कस्तूरबा गांधी हॉस्पिटल ले जाया गया है. लगभग डेढ़ वर्ष पहले कोनगाँव इलाके में ही स्वाइन फ़्लू से दो लोगों की मौत हो गई थी. इस इलाके में फिर से स्वाइन फ़्लू का मरीज पाए जाने से भय का वातावरण व्याप्त है. हालांकि नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ वायरोलॉजी के विशेषज्ञों का कहना है कि जिन लोगों का सामना इस बीमारी से पहले हो चुका है उन्हें डरने की ज़रुरत नहीं है तथा स्वाइन फ़्लू सिर्फ ग्रामीण व अर्द्ध-शहरी इलाकों में ही दबिश दे रहा है. जबकि हकीक़त यह है कि मुंबई में ही स्वाइन फ़्लू के अब तक 14 मामले दर्ज़ हो चुके हैं.
बीते दो महीनों के दौरान भारत में स्वाइन फ़्लू के 689 मामले सामने आये हैं जिनमें से 36 लोगों की दर्दनाक मौत दर्ज़ की गयी है. इनमें महाराष्ट्र सबसे ज्यादा प्रभावित लग रहा है. स्वाइन फ़्लू के 400 मामले अकेले इस राज्य में देखे गए और 18 लोगों की जान चली गयी. मरनेवालों में 13 पुणे, 3 नासिक, 1 औरंगाबाद और 1 धुले ज़िला का निवासी था. महाराष्ट्र के अलावा आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और राजस्थान में स्वाइन फ़्लू कहर ढा रहा है. तमिलनाडु के स्वास्थ्य मंत्री वीएस विजय अपने राज्य में अब तक 29 मामलों की पुष्टि कर चुके हैं.दिल्ली को ही लीजिये, नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल ने राजधानी में 6 स्वाइन फ़्लू मामलों की पुष्टि की है जिनमें से 2 मामले तो हाल ही के हैं. आखिर यह घातक स्वाइन फ़्लू है क्या बला?

यह है स्वाइन एन्फ़्लुएन्ज़ा. इसे स्वाइन फ्लू, हॉग फ्लू या पिग फ्लू भी कहा जाता है. सन 2009 से पिछला स्वाइन फ्लू सन् 1968 में दर्ज़ हुआ था जिसे बतौर हांगकांग फ्लू जाना जाता है. इस नए वायरस के भिन्न रूप अथवा अपर रूप का नाम है- ए (एच1एन1).

स्वाइन एन्फ़्लुएन्ज़ा वायरस आम तौर पर सुअरों में पनपने वाले एन्फ़्लुएन्ज़ा कुल के वायरसों का एक भिन्न रूप है. सन् 2009 तक ज्ञात स्वाइन एन्फ़्लुएन्ज़ा वायरसों के भिन्न रूप हैं एन्फ़्लुएन्ज़ा 'सी' वायरस और एन्फ़्लुएन्ज़ा 'ए' वायरस के उप प्रक्रार, जिन्हें हम ‘एच1एन1’, ‘एच1एन2’, ‘एच3एन1’, ‘एच3एन2’ तथा ‘एच2एन3’ के रूप में जानते हैं. स्वाइन एन्फ़्लुएन्ज़ा संयुक्त राज्य अमेरिका, टेक्सास, कैलीफोर्निया, मेक्सिको, कनाडा, दक्षिण अमेरिका, यूके, इटली, स्वीडन, कीनिया, चीन, ताइवान और जापान में पाए जाने सुअरों में एक आम और स्थानीय बीमारी है.

स्वाइन एन्फ़्लुएन्ज़ा वायरस का मानव में संक्रमण आम तौर पर नहीं होता है. और अगर होता है तो उसे जूनोटिक स्वाइन फ्लू कहा जाता है. जो लोग सुअरों के बाड़ों में बहुत नजदीक रहकर काम करते हैं उन्हें संक्रमण का खतरा अधिक रहता है. बीसवीं शताब्दी के मध्य में एन्फ़्लुएन्ज़ा वायरस के उप प्रकारों की पहचान संभव हो पायी थी. उसके बाद ही इस तरह के वायरसों के संक्रमण की तीव्रता का ठीक-ठीक अंदाजा लगाया जाने लगा. आज वैज्ञानिक यह पता लगा चुके हैं कि इस बार मनुष्यों में फैला स्वाइन फ्लू एन्फ़्लुएन्ज़ा 'ए' वायरस के उप प्रकार एच१एन१ का नया भिन्न रूप है. इस भिन्न रूप के जींस स्वाइन एन्फ़्लुएन्ज़ा वायरस के जींस से मिलते जुलते हैं.

सबसे पहले सन् 1918 में फैली फ्लू महामारी के दौरान स्वाइन एन्फ़्लुएन्ज़ा को मानव एन्फ़्लुएन्ज़ा से सम्बंधित बीमारी बताने की कोशिश हुई थी. इस महामारी के दौरान आदमी और सुअर एक ही समय फ्लू से पीड़ित हुए थे. हालांकि सुअरों में एन्फ़्लुएन्ज़ा फैलने के कारक वायरस की शिनाख्त इसके करीब 12 वर्ष बाद सन् 1930 में ही हो सकी थी. इसके अगले 60 वर्षों तक स्वाइन एन्फ़्लुएन्ज़ा का कारक विशेष तौर पर एच1एन1 वायरस के एक भिन्न रूप को बताया जाता रहा. यह सन् 1997 से 2002 के बीच का दौर था जब उत्तरी अमेरिका के सुअरों में फैले एन्फ़्लुएन्ज़ा का जिम्मेदार तीन अलग-अलग उप प्रकारों तथा पांच अलग-अलग जीनोंटाइपों के नए भिन्न रूपों को ठहराया गया.

सन् 1997-98 के दौरान इस वायरस का एच2एन3 भिन्न रूप सामने आया. इस भिन्न रूप में मानव, सुअर और पक्षियों के मिले-जुले जींस मौजूद थे. उत्तरी अमेरिका में स्वाइन फ्लू के लिए आज सबसे बड़ा जिम्मेदार यही वायरस है. एच1एन1 तथा एच3एन2 के जीनोम मिलने से एच1एन2 भिन्न रूप उत्पन्न हुआ है. कनाडा में सन् 1999 के दौरान एच4एन6 वायरस का एक भिन्न रूप प्रजातियों की सीमा पार करके पक्षियों से सुअरों में प्रवेश कर गया था. सौभाग्य से इस भिन्न रूप को एक ही सुअर बाड़े में सीमित करके नियंत्रित कर लिया गया था.

स्वाइन फ्लू का एच1एन1 रूप उसी वायरस से सम्बंधित है जिसके चलते सन् 1918 में फ्लू महामारी फैली थी. सुअरों में बने रहने के साथ-साथ 1918 महामारी का वायरस रूप बदल-बदल कर पूरी बीसवीं शताब्दी के दौरान मानवों में संक्रमण करता रहा है. इससे मानवों में सामान्य मौसमी एन्फ़्लुएन्ज़ा फैलता देखा गया है. यद्यपि सुअरों से मनुष्य में सीधा फ्लू संक्रमण न के बराबर होता है फिर भी सन् 2005 के बाद अमेरिका में 12 ऐसे मामले दर्ज़ हुए.

मनुष्यों में स्वाइन फ्लू अनगिनत बार फैलता देखा गया है जिसे जोनोसिस कहा जाता है. लेकिन हर बार इसका फैलाव सीमित रहता है. हाँ, सुअरों में यह आम और लगातार मौजूद रहने वाली बीमारी है जिससे कई देशों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है. एक आंकड़े के मुताबिक स्वाइन फ्लू के चलते अकेले ब्रिटेन के मांस उद्योग को 65 मिलियन पाउंड की चपत हर साल लगती है.

स्वाइन एन्फ़्लुएन्ज़ा का इतिहास सन 1918 की फ्लू महामारी से प्रारंभ होता है. हालांकि इसके वायरस का उद्गम कब, कहाँ और कैसे हुआ यह आज तक अज्ञात है. यह फ्लू मनुष्यों से सुअरों में फैला या सुअरों से मनुष्यों में; यह भी स्थापित नहीं किया जा सका है. इसका एक कारण यह भी है कि 1918 की फ्लू महामारी का पता पहले मनुष्यों में चला था उसके बाद सुअरों में. अगला मामला हमें 5 मई 1976 के दिन अमेरिका के फोर्ट डिक्स में देखने को मिलता है. एक सैनिक कमजोरी और थकान की शिकायत के बाद अगले ही दिन मर जाता है और उसके 4 साथी सैनिक अस्पताल में भर्ती कराये जाते हैं. दो हफ्तों बाद स्वास्थ्य अधिकारी ऐलान करते हैं कि सैनिक की मौत एच1एन1 वायरस के एक भिन्न रूप के संक्रमण से हुई है. इस भिन्न रूप को 'ए/न्यू जर्सी/1976 (एच1एन1) नाम दिया गया था.

सितम्बर 1988 में अमेरिका के विस्कोंसिन राज्य की वालवर्थ काउंटी में बारबरा एन वीनर्स नामक गर्भवती महिला की स्वाइन फ्लू से जान चली गयी थी. यह वायरस उन हाट-मेलों में पाया गया जहां सुअर बिक्री या प्रदर्शनी के लिए लाये जाते थे. बारबरा भी ऐसे ही एक मेले में अपने पति के साथ गयी थी. हालांकि यह वायरस सीमित ही रहा. इसके बाद 1998 के दौरान अमेरिका के चार राज्यों में स्वाइन फ्लू देखा गया, साल भर के अन्दर ही इसने पूरे अमेरिका के सुअरों को अपनी चपेट में ले लिया. वैज्ञानिकों ने पता लगाया कि इस बार का वायरस मानव तथा पक्षियों में पाए जाने वाले फ्लू वायरस के भिन्न रूपों का मिश्रण है. अगस्त 2007 में फिलिप्पीन्स के कृषि विभाग ने भी देश भर के सुअरों में फ्लू महामारी फैल जाने की बात कबूली थी.

...और साल 2009 का स्वाइन फ्लू. यह एच1एन1 उप प्रकार के एक ऐसे भिन्न रूप से फैला जो पहले सुअरों में नहीं पाया जाता था. महामारी फैलने के बाद 2 मई 2009 को यह वायरस एल्बर्टा (कनाडा) के एक सुअर बाड़े में पाया गया जिसके तार मेक्सिको में फैली फ्लू महामारी से जुड़ते थे. मेक्सिको में तो यह बीमारी फरवरी-मार्च 2009 में ही फैल जाने की शुरुआती रपटें मिलने लगी थीं. कहा जा रहा था कि स्मिथफूड्स फार्म के एक सुअर बाड़े में अपनाए जा रहे गलत तरीकों की वजह से स्वाइन फ्लू पैदा हुआ और मनुष्यों में फैल गया. हालांकि स्मिथफूड्स ने इसका तत्काल खंडन भी कर दिया था.

देखने वाली बात यह है कि अमेरिकी ‘बीमारी नियंत्रण एवं रोकथाम केंद्र’ ने स्पष्ट तौर पर कहा कि अमेरिका में पाए गए स्वाइन फ्लू के वायरस का नया भिन्न रूप मेक्सिको के वायरस से पूरी तरह मेल खाता था. बता दें कि अमेरिका की सीमा मेक्सिको से सटी हुई है. स्वाइन फ्लू से पहली मौत 13 अप्रैल 2009 को मेक्सिको की ओआक्साका काउंटी में दर्ज की गयी थी. कनाडा में भी स्वाइन फ्लू वायरस तब पाया गया जब एक मजदूर मेक्सिको से वहां के एक सुअर बाड़े में कुछ ही दिन पहले लौटा था. इससे साबित होता है कि इस बार का स्वाइन फ्लू दैत्य मेक्सिको में पैदा हुआ था.

स्वाइन एन्फ़्लुएन्ज़ा भारत समेत विश्व के हर सुअर पालन करने वाले देश में मौजूद है. सुअरों में यह पूरे साल फैलता रहता है. इसकी रोकथाम के लिए कई देश अक्सर सुअरों को टीका लगवाते हैं. भारत में अब तक इस बात के कोई संकेत नहीं मिले हैं कि मानवों में मिले स्वाइन फ़्लू का सम्बन्ध सुअरों में मौजूद वायरस से है. फिर भी एहतियात के तौर पर भारत सरकार के पर्यावरण, खाद्यान्न एवं ग्रामीण विभाग ( डीईएफआरए) ने सुअर पालकों को निर्देश जारी किए कि वे उच्चस्तर की साफ-सफाई रखें. यद्यपि एन्फ़्लुएन्ज़ा ए (एच1एन1) वायरस पूरे विश्व में मानव से मानव में फैल रहा है और कई देशों में मौत का तांडव भी खेल रहा है. इसीलिए 'विश्व स्वास्थ्य संगठन' की दुनिया भर में फैलते जा रहे स्वाइन फ़्लू पर पैनी नजर है. भारत सरकार भी इस बार पहले से ज्यादा तैयार दिख रही है क्योंकि 2009 का अनुभव उसे है और उससे लोगों ने भी सबक सीखा होगा. टीके अस्पतालों तक पहुंचाए जा रहे हैं और जहां ज़रूरी है वहां चिकत्सा अधिकारियों को अतिरिक्त एलर्ट भी किया जा रहा है. इसके बावजूद हाल ही में सक्रिय हुए इस वायरस को हलके में लेना महंगा पड़ सकता है क्योंकि लोगों की जान जाने का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है.



एन्फ़्लुएन्ज़ा लोगों में फैलता कैसे है?

समझा जाता है कि यह नया एन्फ़्लुएन्ज़ा वायरस आम मौसमी फ़्लू की तरह ही फैलता है. संक्रमित व्यक्ति के बात करते समय, खांसते समय या छींकते समय उसके मुंह या नाक से जो छोटी बूँदें निकलती हैं, उनको सांस द्वारा अन्दर ले लेने से संक्रमण हो सकता है. इस वायरस से संक्रमित कोई चीज जैसे टिश्यू पेपर या दरवाजे के हैंडिल के संपर्क में आने के बाद अपनी नाक या आँख छूने से भी संक्रमण हो जाता है.

संक्रमित सुअरों के लक्षण क्या हैं?

सुअरों में स्वाइन एन्फ़्लुएन्ज़ा होने पर वे बेहद सुस्त पड़ जाते हैं. बुखार एवं खांसी के अलावा उन्हें सांस लेने में भारी कष्ट होता है. किसी संक्रमित सुअर की सांस से निकली बूँदें सांस के जरिए अन्दर जाने से सुअरों में स्वाइन फ़्लू फैलता जाता है. वे संक्रमित सुअर के प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष संपर्क में आने पर भी संक्रमित होते जाते हैं.

मनुष्य में स्वाइन फ़्लू के क्या लक्षण हैं?

स्वाइन फ़्लू से ग्रस्त मनुष्य में ठीक वैसे ही लक्षण दिखाई देते हैं जैसे कि उसके सामान्य मौसमी फ़्लू से संक्रमित होने पर नजर आया करते हैं. मसलन बुखार, थकान, भूख की कमी, खांसी और गला दुखना. कुछ लोगों को उल्टी-दस्त की शिकायत भी हो सकती है. उदाहरण के लिए मेक्सिको में ए (एच1एन1) वायरस से पीड़ित लोगों को भयंकर पीड़ा झेलनी पड़ी और उनकी मृत्यु भी हो गयी. जबकि भारत सहित अन्य देशों में इस एन्फ़्लुएन्ज़ा के लक्षण नरम रहे हैं और लोग पूरी तरह ठीक भी हुए हैं.

एन्फ़्लुएन्ज़ा संक्रमित व्यक्ति क्या करे?

अगर आप किसी फ़्लू जैसा महसूस कर रहे हैं तो घर से बाहर हरगिज न निकलें और जितना हो सके कम से कम लोगों के संपर्क में रहें. टेलीफोन पर अपने पारिवारिक चिकित्सक से बात करें और उसकी सलाह पर पूरी तरह अमल करें. अपनी मर्जी से कोई भी दवा खरीदकर न खाएं. हालांकि कुछ दवाएं प्रचलन में हैं लेकिन फ़्लू की तीव्रता के अनुसार ही इन्हें लेने या न लेने की सलाह चिकित्सक देते हैं. अगर भारत में खतरा बढ़ता है तो भारतीय स्वास्थ्य सुरक्षा एजेंसी अगले दिशा-निर्देश जारी करेगी.

रोकथाम के उपाय

एन्फ़्लुएन्ज़ा ए (एच1एन1) से संक्रमित व्यक्ति जब खांसता या छींकता है तो वह अपने आसपास की सतह पर विषाणु फैला देता है. इतना ही नहीं उसके द्वारा इस्तेमाल किए गए टिश्यू पेपर या बिना धुले हाथों के छू जाने से भी विषाणु फैलते हैं. इसलिए सतह को साफ रखना जरूरी हो जाता है ताकि आसपास के लोगों में संक्रमण न हो सके. डिटर्जेंट और पानी से सतह साफ करना आसान है लेकिन जहां हाथ नहीं पहुंचता वहां ब्रशों और विषाणुनाशक उत्पादों का प्रयोग करना उचित रहता है. किचन प्लेटफोर्म, टायलेट फ्लश और दरवाजों के हैंडिल ऐसी ही कुछ जगहें हैं जहां विषाणुनाशकों का प्रयोग करना चाहिए. जिन चीजों को घर अथवा दफ्तर के लोग अक्सर छूते हैं उनका स्वच्छ रहना अत्यावश्यक है. इनमें कम्प्यूटर कीबोर्ड, टेलीफोन रिसीवर, हैंडिल, स्विच, नलों की टोंटी आदि शामिल हैं.

अपने आसपास बढ़िया साफ-सफाई रख कर एन्फ़्लुएन्ज़ा समेत हर किस्म के वायरस के संक्रमण से बचा जा सकता है.

स्वास्थ्य सुरक्षा एजेंसी ने लोगों से कहा है कि वे हर समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखें:-

अ) साबुन और पानी से अपने हाथ दिन में कई बार धोएं.
ब) छींकते अथवा खांसते समय अपना मुंह और नाक टिश्यू पेपर से ढँक लें.
स) इस्तेमाल किए गए टिश्यू पेपर को सावधानी और जिम्मेदारी से कचरे की टोकरी में डालें.
द) दरवाजे के हैंडिल जैसी कड़ी सतहों को हमेशा साफ रखें.
इ) सुनिश्चित करें कि बच्चे भी इन बातों का ख़याल रखें.

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