होली के दिन मैं ट्रेन में था. जब कहीं रेलवे स्टेशन आ जाता था तो कुछ गुब्बारों के भय से हम खिड़कियाँ बंद कर लेते थे. लेकिन खंडवा में कोई ज़ोर न चला. कुछ लोग डिब्बों में घुस आए और उन्होंने रंग-गुलाल फेंकना शुरू किया. हमारे पास कुछ और तो था नहीं, सो पानी की बोतलों से ही काम चलाया. ट्रेन बिहार जा रही थी. कुछ महिला यात्रियों के पास महावर था. उन्होंने अपने पतियों को पानी में महावर घोल कर दे दिया.
महावर का लाल रंग किसी भी रासायनिक रंग को मात कर रहा था. जमकर होली खेली गयी. मुग़लसराय जा रहे एक बुढऊ भी जोश में आ गए. शिवजी की बूटी उन्होंने नासिक रोड स्टेशन पर ही चढ़ा ली थी. उन्होंने अपना सत्तू रंग-गुलाल की तरह इस्तेमाल कर लिया. सत्तू का ही टीका उन्होंने पूरे डिब्बे के यात्रियों को लगा मारा.
इतने में ट्रेन चल पड़ी. कुछ यात्री तो खंडवा में ही उतर गए लेकिन कुछ ट्रेन में ही चढ़े रह गए. उनको भी थोड़ा भांग का नशा था. हमने कहा कि चिंता की कोई बात नहीं है. खाना-पीना इफ़रात है. इटारसी से लौट आना. बस इतना सुनते ही उनका नशा हल्का हो गया और वे चैन खींचकर उतरते बने.
होली का आनंद, उमंग और खुलापन ही ऐसा है कि अगर आप सहज हैं, मनुष्य हैं, खुले हैं, अकुंठित हैं, तो कहीं भी रंगों से वंचित नहीं रहेंगे. चाहे देस हो या परदेस. उन लोगों की कल्पना कीजिये जो अपनों से दूर सीमा पर डटे देश की रक्षा कर रहे होते हैं, या वे लोग जो किसी फ़र्ज़ को निभाते हुए नौकरी या व्यवसाय की वजह से होली खेलने घर नहीं पहुँच पाते. आप क्या समझते हैं, वे रंगों के इस पर्व से वंचित रह जाते हैं? नहीं जनाब, वे आपस में ही होली खेल लेते हैं और रंगों को रूठने नहीं देते. ट्रेन की यात्रा करते वक्त यह भावना मेरे मन में बेतरह डूबती-उतराती रही.
...और तभी खिड़की से वसंत का राजा पुष्प टेसू मुझे नज़र आया. महाराष्ट्र से जैसे ही आप मध्य प्रदेश की सीमा में प्रवेश करते हैं, टेसू के वृक्ष और उन पर लदे फूल, रेल पटरी के दोनों तरफ आपका सफर सुहाना करते हुए साथ-साथ चलते हैं. कहीं भी चले जाइए- मालवा, निमाड़, महाकौशल, विन्ध्य, बघेलखंड, बुंदेलखंड, वे पूरे मध्य प्रदेश में आपके साथ चलेंगे. कुछ-कुछ इस तर्ज़ पर कि- 'तू जहाँ- जहाँ चलेगा मेरा साया साथ होगा'. वसंत ऋतु आते ही टेसू के वृक्ष फूलों से इस तरह लद जाते हैं जैसे किसी ने उन पर लाल-लाल बल्ब लगा दिए हों. किसी-किसी वृक्ष पर आपको एक भी पत्ता नजर नहीं आयेगा- सिर्फ़ फूल ही फूल.
मेरे बगल की सीट पर एक चंचल बच्चा अपनी माँ के साथ बैठा था. बातचीत से जाहिर हुआ कि यह परिवार मुम्बई, बोरीवली (पश्चिम) में रहता है. बच्चा चौथी का इम्तिहान देकर आ रहा था. उसकी माँ बड़े जोश और गर्व में भरकर बता रही थी कि बच्चा अपनी क्लास में पहली से ही अव्वल रहा है. उसने मुझे कुछ अंगरेजी गीत भी सुनवाये जो उसकी किताब में थे. जिज्ञासावश मैंने उस बच्चे से ट्रेन की खिड़की के बाहर कुछ पेड़ दिखाकर उनके नाम जानना चाहे, तो वह बच्चा अचानक गुमसुम हो गया. उसकी माँ घबरा गयी. उसने बच्चे को चिप्स का पैकेट थमाकर उसका मन बहलाया .
जिन पेड़ों का नाम मैंने बच्चे से जानना चाहा था उनमे महुआ, जामुन, कहुआ (अर्जुन) और टेसू आदि थे. मैं यह सोच कर दंग रह गया कि जो पीढ़ी टेसू का वृक्ष नहीं पहचानती, वो यह कैसे समझ पायेगी कि कभी होली के लिए टेसू के फूलों को सुखाकर इसके चूर्ण से टनों रंग बनाया जाता था, जिसके इस्तेमाल से न त्वचा पर छाले पड़ते थे और न ही मन पर. वसंत और रिश्तों की ऊष्मा में टेसू की खुशबू घुल जाती थी, वह अलग.
...और तभी मेरी तंद्रा भंग हो गयी. अगला स्टेशन जो आ रहा था. हम लोग फिर सावधान हो गए. प्लेटफॉर्म के बाहर गाना बज रहा था- 'होली आयी रे कन्हाई रंग बरसे, सुना दे ज़रा बांसुरी...'
गुरुवार, 27 मार्च 2008
बुधवार, 19 मार्च 2008
टीवी पत्रकारिता का रसातल
टीवी पत्रकारिता देखिये, 'कहाँ' से 'कहाँ' पहुँच गयी है! स्वर्गीय एसपी सिंह ने जब 'आजतक' का आधे घंटे का न्यूज बुलेटिन शुरू किया था तह चन्द ही हफ्तों बाद देश के नेताओं का वही हाल हो गया था जो बीबीसी की सिगनेचर ट्यून सुनकर ब्रिटेन और अमेरिका के शीर्ष नेताओं का हुआ करता था. अंगरेजी समाचारों को अखंड सत्य मानने और जानने वाले धुरंधरों की धुकधुकी बढ़ जाती थी 'आजतक' की सिगनेचर ट्यून सुनने के बाद! और तो और मेरे साथ एक सांध्य दैनिक के दफ्तर में 'दिल का हाल कहे दिलवाला' गा-गाकर नाचनेवाला एक बन्दा जब एसपी 'आजतक' में चला गया था तो हम लोग उसे अमिताभ बच्चन की तरह देखने लगे थे.
कट टू-
आजतक चौबीस घंटे का हुआ. उसका कायापलट होना शुरू हो गया. समाचार की जगह गिमिक ने ले ली और उसमें वे सारी बुराइयां आती गयीं जो एक पैसे के पीछे भागने वाले चैनल की हो सकती हैं. एसपी जहाँ बिना बाईट के भी मर्मान्तक कैप्स्यूल तैयार कर लेते थे वहीं अब 'पान की पीक' और 'धूमिल' के शब्दों में कहें तो 'थीक है-थीक है' वाली बाइटें प्रचुर मात्रा में होने के बावजूद बेजान समाचार परोसे जाने लगे.
दीगर चौबीस घंटे के समाचार चैनलों में तो जैसे भूत-प्रेत, अंधविश्वास, अपराध और हिंसा परोसने की होड़-सी लग गयी. स्त्री को कम कपड़ों में दिखाने के मामले में तमाम चैनल दुस्सासन और द्रौपदी प्रसंग साक्षात साकार करने लगे. ड्रामा देखने के लिए अब हिन्दी फिल्में देखने की आवश्यकता ही नहीं है. समाचार पर्याप्त नाटकीय हो चुके हैं. अच्छा हुआ जो एसपी चले गए. वरना अब के चैनल देखकर चले जाते. उनकी मृत्यु का एक कारण एक न्यूज कैप्स्यूल तैयार करने के बाद उनके मन में पैदा हुई बेचैनी को भी गिनाया जाता है. वह इतने संवेदनशील थे.
कट टू-
एक समाचार चैनल है. मुम्बई और महाराष्ट्र का हिन्दी चैनल है. एंकर महाशय पत्रकारिता के कालपुरूष हैं. उन्होंने 'डेली' टेबलोइड में जान फूंकी थी यह सभी जानते हैं. लेकिन यहाँ बैठकर वह सारा समाचार जगत ज्योतिषियों के दम पर चलाते हैं. दो ज्योतिषी उनके परमामेंट हैं. अब एक टैरो कार्ड रीडर भी जुड़ गयी है. उनकी टीवी पत्रकारिता का एक नमूना पेश है:-
एंकर- पंडित जी आप बताएं, सचिन तेंदुलकर कितने साल अभी खेल सकेंगे?
पंडितजी- सचिन का राहू केतु में, सूर्य धनु राशि में... ब्ला....ब्ला....ब्ला...
एंकर- आपने इस चैनल पर पहली बार सुना है.. एकदम पहली बार... (अब दूसरे पंडित से) अच्छा आप बताइये क्या सरबजीत को पाक छोड़ देगा?
पंडितजी- सरबजीत की कुंडली तो हमारे पास नहीं है लेकिन भारत और पाकिस्तान की कुंडली है. इससे लगता है कि पाक को छोड़ना पडेगा...
एंकर- आपने इस चैनल पर पहली बार सुना है.. एकदम पहली बार... (अब टैरो कार्ड वाली से) आप बताएं अगली सरकार किसकी बनाती दिखती है?
तीनों ज्योतिषी एक राय होकर कहते हैं- भाजपा की बनेगी.. क्योंकि सोनिया की कुंडली में अमुक दोष है और आडवाणी जी की कुंडली में फलां शुभ योग है... (यानी देश भर के तमाम ज्योतिषी भाजपा की सरकार बनते देखना चाहते हैं. धर्म का झंडा उसी ने थाम रखा है. वरना पृथ्वी कब की रसातल में चली गयी होती.
भाजपा सरकार में अचानक यज्ञों और धर्म सम्मेलनों की बाढ़ आ गयी थी. इसकी जाँच करवाई जाए तो किसी बोफोर्स घोटाले से कम मामला नहीं निकलेगा).
यह चंडाल चर्चा घंटे भर रोज चला करती है. इस चैनल पर. दूसरे चैनलों पर भी एक से एक जटाधारी और कास्ट्यूम ड्रामा में भाग लेने आए प्रतियोगियों जैसे बाबा लोग दिन में कई बार भविष्य बताया करते हैं. अब आप ही तय कीजिये कि टीवी पत्रकारिता कहाँ से कहाँ जा पहुँची है?
.....और यह भी कि आगे यह किस रसातल में जा गिरेगी!!
कट टू-
आजतक चौबीस घंटे का हुआ. उसका कायापलट होना शुरू हो गया. समाचार की जगह गिमिक ने ले ली और उसमें वे सारी बुराइयां आती गयीं जो एक पैसे के पीछे भागने वाले चैनल की हो सकती हैं. एसपी जहाँ बिना बाईट के भी मर्मान्तक कैप्स्यूल तैयार कर लेते थे वहीं अब 'पान की पीक' और 'धूमिल' के शब्दों में कहें तो 'थीक है-थीक है' वाली बाइटें प्रचुर मात्रा में होने के बावजूद बेजान समाचार परोसे जाने लगे.
दीगर चौबीस घंटे के समाचार चैनलों में तो जैसे भूत-प्रेत, अंधविश्वास, अपराध और हिंसा परोसने की होड़-सी लग गयी. स्त्री को कम कपड़ों में दिखाने के मामले में तमाम चैनल दुस्सासन और द्रौपदी प्रसंग साक्षात साकार करने लगे. ड्रामा देखने के लिए अब हिन्दी फिल्में देखने की आवश्यकता ही नहीं है. समाचार पर्याप्त नाटकीय हो चुके हैं. अच्छा हुआ जो एसपी चले गए. वरना अब के चैनल देखकर चले जाते. उनकी मृत्यु का एक कारण एक न्यूज कैप्स्यूल तैयार करने के बाद उनके मन में पैदा हुई बेचैनी को भी गिनाया जाता है. वह इतने संवेदनशील थे.
कट टू-
एक समाचार चैनल है. मुम्बई और महाराष्ट्र का हिन्दी चैनल है. एंकर महाशय पत्रकारिता के कालपुरूष हैं. उन्होंने 'डेली' टेबलोइड में जान फूंकी थी यह सभी जानते हैं. लेकिन यहाँ बैठकर वह सारा समाचार जगत ज्योतिषियों के दम पर चलाते हैं. दो ज्योतिषी उनके परमामेंट हैं. अब एक टैरो कार्ड रीडर भी जुड़ गयी है. उनकी टीवी पत्रकारिता का एक नमूना पेश है:-
एंकर- पंडित जी आप बताएं, सचिन तेंदुलकर कितने साल अभी खेल सकेंगे?
पंडितजी- सचिन का राहू केतु में, सूर्य धनु राशि में... ब्ला....ब्ला....ब्ला...
एंकर- आपने इस चैनल पर पहली बार सुना है.. एकदम पहली बार... (अब दूसरे पंडित से) अच्छा आप बताइये क्या सरबजीत को पाक छोड़ देगा?
पंडितजी- सरबजीत की कुंडली तो हमारे पास नहीं है लेकिन भारत और पाकिस्तान की कुंडली है. इससे लगता है कि पाक को छोड़ना पडेगा...
एंकर- आपने इस चैनल पर पहली बार सुना है.. एकदम पहली बार... (अब टैरो कार्ड वाली से) आप बताएं अगली सरकार किसकी बनाती दिखती है?
तीनों ज्योतिषी एक राय होकर कहते हैं- भाजपा की बनेगी.. क्योंकि सोनिया की कुंडली में अमुक दोष है और आडवाणी जी की कुंडली में फलां शुभ योग है... (यानी देश भर के तमाम ज्योतिषी भाजपा की सरकार बनते देखना चाहते हैं. धर्म का झंडा उसी ने थाम रखा है. वरना पृथ्वी कब की रसातल में चली गयी होती.
भाजपा सरकार में अचानक यज्ञों और धर्म सम्मेलनों की बाढ़ आ गयी थी. इसकी जाँच करवाई जाए तो किसी बोफोर्स घोटाले से कम मामला नहीं निकलेगा).
यह चंडाल चर्चा घंटे भर रोज चला करती है. इस चैनल पर. दूसरे चैनलों पर भी एक से एक जटाधारी और कास्ट्यूम ड्रामा में भाग लेने आए प्रतियोगियों जैसे बाबा लोग दिन में कई बार भविष्य बताया करते हैं. अब आप ही तय कीजिये कि टीवी पत्रकारिता कहाँ से कहाँ जा पहुँची है?
.....और यह भी कि आगे यह किस रसातल में जा गिरेगी!!
गुरुवार, 13 मार्च 2008
तुम्हारे प्रतिरोध की भाषा क्या है?
समाज में अक्सर जिन्हें दबा-कुचला समझा जाता है, वे दबंगों के सामने कभी ऊंची आवाज़ में बोलते नहीं देखे-सुने जाते. लेकिन अपनी आत्मा को जीवित रखने के लिए ये लोग प्रतिरोध की नई भाषा गढ़ लेते हैं, जो कभी दबंगों (ऊंची जातियों) के सामने बोल दी जाती है, तो कभी उनकी पीठ पीछे इसका इस्तेमाल किया जाता है.
प्राचीन संस्थागत समाजों में प्रतिरोध की इस भाषा के रूप ज्यादा रचनात्मक होते हैं. जाहिर है, ग्रामीण समाज में इस भाषा और इसके मुहावरों की जड़ें ज्यादा रचनात्मक, ज्यादा गहरी, ज्यादा मारक तथा ज्यादा उपयुक्त होती हैं. मुझे बघेली बोली की एक कहावत याद आती है--- 'इतनै होती कातनहारी, काहे फिरती जाँघ उंघारी.'
(शालीनता का ख़याल रखते हुए यहाँ 'जाँघ' लिखा गया है, असल प्रयोग में 'जांघ' की जगह गुप्तांग का नाम लिया जाता है.)
कहावत का अभिधार्थ यह है कि अगर सूत कातने में इतनी ही प्रवीणता होती तो बिना कपड़ों के क्यों घूमना पड़ता. लेकिन कहावतें अभिधा में कभी नहीं होतीं. इनमें गहरी व्यंजना छिपी होती है. इस कहावत में व्यंजना यह है कि राजाजी इतने ही गुणी होते तो इतनी फजीहत क्यों होती (किसी भी सन्दर्भ में).
अब यह बात राजाजी से आमने-सामने तो की नहीं जा सकती. इसलिए कमज़ोर तबके के लोग या तो आपस में या फिर पीठ-पीछे इस कहावत का इस्तेमाल करके अपनी भड़ास निकाल लिया करते हैं.
बच्चे अपेक्षाकृत सबसे कमज़ोर तबके के माने जाते हैं. लेकिन पिटाई करनेवाले मास्टर जी से बदला चुकाने के लिए वे भी अपनी कवितायें गढ़ लेते हैं जो कभी आपस में खेल-कूद के दौरान या काफी दूर से पंडित जी को जाते देखकर सुनायी जाती है. एक नमूना पेश है-
'पंडित जी, पंडित जी पाँय लागी,
पकड़ चुटैया दै मारी.'
-यानी ऐसे मास्टर जी को प्रणाम करते है, जिनकी चोटी पकड़ कर हम पटक दें.
अब बताइये, ऐसे बच्चों को इसकी भी परवाह नहीं होती कि अगर मास्टर जी ने सुन लिया तो अगले दिन स्कूल में क्या होगा! मुर्गा बनना पड़ेगा, बेंत खाने पड़ेंगे या मेज़ पर खड़ा होना पड़ेगा! लेकिन क्या कीजियेगा, प्रतिरोध की भाषा मनुष्य न गढे तो वह या तो कुंठित हो जायेगा, हीनभावना का शिकार हो जायेगा, या फिर उसका स्वाभिमान ही मर जायेगा. दबी-कुचली जातियाँ प्रतिरोध की इसी भाषा के चलते समाज में अपनी ही नज़रों में गिरने से बची रही हैं और अब जाकर उनमें प्रतिकार की शक्ति भी पैदा हो रही है.
शहरी जीवन में भी ऐसी भाषा का इस्तेमाल देखा जा सकता है. हालांकि इसमें अभिव्यंजना का स्तर उतना गहरा और मारक नहीं होता जितना कि ग्रामीण जीवन में. फिर भी लोग शहर में भी प्रतिरोध की अपनी भाषा विकसित कर ही लेते हैं.
कल 'बेस्ट' की बस में सफर करते वक्त मैंने एक युवक को अपनी प्रेमिका से यह कहते सुना- 'यार मेरा बॉस तो एकदम 'हरी साडू' है.'
प्रेमिका- 'हरी साडू? क्या मतलब?'
प्रेमी- 'हरी यानी एच...ए...आर...आई... और एच फॉर हिटलर, ए फॉर एरोगैंट, आर फॉर रास्कल...'
प्रेमिका- 'अच्छा तो टीवी पर उस नौकरी वाले विज्ञापन का भूत तुम्हारे सिर से अब तक नहीं उतरा... अगर तुम्हारे बॉस को पता चला न तो वह 'हरी साडू' से एकदम 'राज ठाकरे' बन जायेगा. अब बोलो, परप्रांतीय बनना चाहते हो क्या?'
इतना सुनना था कि बस में सवार अन्य लोग बुक्का फाड़ कर हंस पड़े.
प्राचीन संस्थागत समाजों में प्रतिरोध की इस भाषा के रूप ज्यादा रचनात्मक होते हैं. जाहिर है, ग्रामीण समाज में इस भाषा और इसके मुहावरों की जड़ें ज्यादा रचनात्मक, ज्यादा गहरी, ज्यादा मारक तथा ज्यादा उपयुक्त होती हैं. मुझे बघेली बोली की एक कहावत याद आती है--- 'इतनै होती कातनहारी, काहे फिरती जाँघ उंघारी.'
(शालीनता का ख़याल रखते हुए यहाँ 'जाँघ' लिखा गया है, असल प्रयोग में 'जांघ' की जगह गुप्तांग का नाम लिया जाता है.)
कहावत का अभिधार्थ यह है कि अगर सूत कातने में इतनी ही प्रवीणता होती तो बिना कपड़ों के क्यों घूमना पड़ता. लेकिन कहावतें अभिधा में कभी नहीं होतीं. इनमें गहरी व्यंजना छिपी होती है. इस कहावत में व्यंजना यह है कि राजाजी इतने ही गुणी होते तो इतनी फजीहत क्यों होती (किसी भी सन्दर्भ में).
अब यह बात राजाजी से आमने-सामने तो की नहीं जा सकती. इसलिए कमज़ोर तबके के लोग या तो आपस में या फिर पीठ-पीछे इस कहावत का इस्तेमाल करके अपनी भड़ास निकाल लिया करते हैं.
बच्चे अपेक्षाकृत सबसे कमज़ोर तबके के माने जाते हैं. लेकिन पिटाई करनेवाले मास्टर जी से बदला चुकाने के लिए वे भी अपनी कवितायें गढ़ लेते हैं जो कभी आपस में खेल-कूद के दौरान या काफी दूर से पंडित जी को जाते देखकर सुनायी जाती है. एक नमूना पेश है-
'पंडित जी, पंडित जी पाँय लागी,
पकड़ चुटैया दै मारी.'
-यानी ऐसे मास्टर जी को प्रणाम करते है, जिनकी चोटी पकड़ कर हम पटक दें.
अब बताइये, ऐसे बच्चों को इसकी भी परवाह नहीं होती कि अगर मास्टर जी ने सुन लिया तो अगले दिन स्कूल में क्या होगा! मुर्गा बनना पड़ेगा, बेंत खाने पड़ेंगे या मेज़ पर खड़ा होना पड़ेगा! लेकिन क्या कीजियेगा, प्रतिरोध की भाषा मनुष्य न गढे तो वह या तो कुंठित हो जायेगा, हीनभावना का शिकार हो जायेगा, या फिर उसका स्वाभिमान ही मर जायेगा. दबी-कुचली जातियाँ प्रतिरोध की इसी भाषा के चलते समाज में अपनी ही नज़रों में गिरने से बची रही हैं और अब जाकर उनमें प्रतिकार की शक्ति भी पैदा हो रही है.
शहरी जीवन में भी ऐसी भाषा का इस्तेमाल देखा जा सकता है. हालांकि इसमें अभिव्यंजना का स्तर उतना गहरा और मारक नहीं होता जितना कि ग्रामीण जीवन में. फिर भी लोग शहर में भी प्रतिरोध की अपनी भाषा विकसित कर ही लेते हैं.
कल 'बेस्ट' की बस में सफर करते वक्त मैंने एक युवक को अपनी प्रेमिका से यह कहते सुना- 'यार मेरा बॉस तो एकदम 'हरी साडू' है.'
प्रेमिका- 'हरी साडू? क्या मतलब?'
प्रेमी- 'हरी यानी एच...ए...आर...आई... और एच फॉर हिटलर, ए फॉर एरोगैंट, आर फॉर रास्कल...'
प्रेमिका- 'अच्छा तो टीवी पर उस नौकरी वाले विज्ञापन का भूत तुम्हारे सिर से अब तक नहीं उतरा... अगर तुम्हारे बॉस को पता चला न तो वह 'हरी साडू' से एकदम 'राज ठाकरे' बन जायेगा. अब बोलो, परप्रांतीय बनना चाहते हो क्या?'
इतना सुनना था कि बस में सवार अन्य लोग बुक्का फाड़ कर हंस पड़े.
मंगलवार, 4 मार्च 2008
गाँव गया था, गाँव से नहीं भागा!
साथियो,
इस बार कई दिन गाँव में डटा रहा. ठंड का लुत्फ़ उठाया. 'होरा' चाबा गया. भुने हुए आलू और भांटा (बैंगन) का भरता खाया गया. लहसन के हरे-भरे ताज़ा पत्ते सहज उपलब्ध थे, धनिया भी. नमक की डली के साथ इसकी चटनी लाजवाब होती है. इन सबका स्वाद लिया. (हरे चने की पुष्ट घेन्टियों को पौधे सहित आग में भून्जने से होरा बनता है. चूंकि यह होली के नजदीक आने का समय होता है इसलिए इसे होरा कहते हैं.)
जब भी गाँव जाता हूँ यही सब खाता-पीता हूँ. गनीमत है कि हमारे यहाँ यह सब अब तक पुराने बीजों वाले रूप में उपलब्ध है. देसी टमाटर का स्वाद मुम्बई में आते ही तरसाने लगता है. तब गाँव की ओर भागता हूँ. मटर और सेम की फलियाँ किसान घर-घर ख़ुद बेच जाते हैं. सुबह इन्हीं की पुकारों से होती है. मूली ऐसी रसीली कि बेचनेवाला किसी छोटे बच्चे का मन रखने के लिए वहीं आधी तोड़ कर पकड़ा देता है. यह मौसम अमरूदों का भी था. देसी अमरूद. ...बचपन में चुरा कर खाए गए इन अमरूदों का स्वाद अब भी ज्यों का त्यों है. कौन जाने यह अपने मूल बीज की कितने करोड़वीं नस्ल है. क्या यही स्वाद हमारी अगली पीढ़ियों के लिए भी बचा रहेगा?
गाँव जाने पर एक और चीज स्थायी भाव की तरह मिलती है. वह है हमारे यहाँ का बस स्टैंड. यह दूसरे बस स्टैनडों से अलग है. यहाँ सब एक दूसरे को जानते-पहचानते हैं. दुआ-सलाम करते हैं. कोई जोड़ीदार शहर की तरफ जा रहा हो तो उसे बस में चढ़ते-चढ़ते तक गालियाँ देते हैं. इस तरह जानेवाले की यात्रा मंगलमय बनाते हैं.
कुछ लोग बस स्टैंड में आपको सुबह के छः बजे से रात के बारह बजे तक मिल जायेंगे. कोई भी ऋतु हो, ये आपको ताश खेलते मिलेंगे. ताश साधारण से लेकर जुआ तक हो सकती है. फिर अगले दिन सुबह की चाय पर बस स्टैंड में सिर्फ़ इस बात पर चर्चा होगी कि अगर कल छठी बाजी में एक्का आ जाता तो मजाल क्या थी कि ठाकुर साहब जीत जाते, या फिर गुलाम ही आ जाता तो तिवारी जी पाँच सौ रुपये जीतकर भला मूंछों पर ताव देते हुए घर कैसे चले जाते?
फिर पूरे दिन यही ताश चर्चा चलेगी. स्कूल जा रहे शिक्षक भी इस चर्चा में शामिल हो जायेंगे. उसके बाद ताश के खिलाड़ियों की तलाश शुरू होगी और रात तक के लिए जम जायेगा जुए का फड़. अगले दिन फिर से वही पछतावा कि अगर बादशाह आ जाता तो... या बेगम फंस जाती तो...
बीच-बीच में धर्म की भी चर्चा कोई छेड़ता है. किसने इलाके में सत्यनारायण की कथा सुनी, श्रीमदभागवत की बैठकी कौन करवा रहा है या कोई पहुंचे हुए बाबाजी किसके घर ठहरे हैं - सारा समाचार यहाँ मिलता जायेगा. फिर कोई कहेगा, अरे भाई धरती में अभी धर्म बचा हुआ है. जिस दिन धर्म न रहा उसी दिन धरती रसातल में चली जायेगी.
ताश के खिलाड़ी जानते हैं कि यह आदमी दिन में दस बार यही बात कहता है. इसलिए वे अपने पत्तों पर नज़र गडाये हूँ-हाँ करते रहते हैं. तमाशबीन भी कम नहीं होते. इन्हीं की वजह से कभी-कभी अचानक झगड़ा भी शुरू हो जाता है. बार-बार हार रहा पत्तेबाज़ चिल्लाएगा- 'अरे यार तुम मेरे पत्ते देखकर दूसरे की ताश बनवा रहे हो!' तमाशबीन कहेगा- 'जीतने पर चाय-पान के पैसे देने का वादा करो तो तुम्हारी ताश भी बनवाऊँ.' फिर ये बातें रबर की तरह बढ़ती जाती हैं. लेकिन कम ही ऐसा होता है कि मारपीट हो जाए. शाम को महुए की दारू भी तो साथ-साथ पीनी है!
आप कितने भी दिनों बाद गाँव गए हों, लोग बस इतना पूछेंगे- अरे भैया, कब आए?' उसके बाद आप चाहे जितने दिन रहो, बस वही 'एक्का-बादशाह-गुलाम-बेग़म' की चर्चा सुनते बैठे रहो. कोई दूसरा विषय नहीं छेड़ेगा. आप कोशिश करेंगे तो बात वहीं ताश के पत्तों पर आकर ठहरेगी. इसीलिए मैं दो-तीन दिनों में ही गाँव से भाग आता हूँ और जनकवि कैलाश गौतम की मशहूर कविता याद करता हूँ- 'गाँव गया था, गाँव से भागा.'
लेकिन इस बार मंजर बदला हुआ था और चर्चा का विषय भी. हुआ दरअसल यह है कि मध्यान्ह भोजन योजना पर निगरानी रखने के लिए मध्य प्रदेश सरकार ने स्व-सहायता समितियाँ गठित कर दी हैं. इन समितियों में गाँव के ही लोग होते हैं. इनकी कार्यकारिणी होती है. बाकायदा एक अध्यक्ष होता है. पहले यह योजना स्कूल शिक्षक की देखरेख में ही चलती थी. ये लोग छात्रों की मनमानी उपस्थिति दिखाकर राशन का तिया-पांचा करते थे. निर्धारित दिन पर निर्धारित भोजन की जगह कुछ भी सस्ता-मस्ता बनवाकर खिला देते थे और झूठे बिल बनाते थे. प्राथमिक शाला का हर शिक्षक महीने में कम से कम तीन-चार हजार रुपया इस योजना का फायदा उठाकर अवैध तरीके से कमा लेता था.
अब यह सम्भव नहीं हो पा रहा है. शिक्षकों के कलेजे में आग सुलग रही है. वही स्थिति हो गयी है कि रहा भी न जाए, सहा भी न जाए और कहा भी न जाए. स्व-सहायता समिति वाले ही छात्रों की उपस्थिति के हिसाब से राशन बाँटते हैं. निर्धारित दिन के हिसाब से खाद्यान मुहैया करवाते हैं.
दूसरी मुश्किल शिक्षकों के सामने यह भी खड़ी हो गयी है कि पहले जहाँ छात्रों की उपस्थित ९० प्रतिशत से ऊपर दिखा दी जाती थी वह अब घटकर ५०-६० प्रतिशत के आसपास रह गयी है. इससे जिला और ब्लाक स्तर के अधिकारी भी खफा हैं. उनका कहना है कि जुलाई-अगस्त में स्कूल खुलते समय ९०% उपस्थिति थी तो अब परीक्षा के समय २०-३०% छात्र कहाँ गए? यही फर्जीवाड़ा आजकल हमारे बस स्टैंड की चौपाल चर्चा का विषय बना हुआ है.
अब शिक्षक सीधे स्कूल चले जाते हैं क्योंकि उनके साथ ताश खेलनेवाले स्व-सहायता समितियों में आ गए हैं और स्थिति साँप और नेवला वाली हो गयी है. वैसे मुझे पूरा यकीन है कि पैसा खाने के लिए ये साँप और नेवले जल्दी ही हाथ मिला लेंगे और जल्द ही हमारा बस स्टैंड ताश चर्चा से गुलज़ार हो जायेगा.
इस बार कई दिन गाँव में डटा रहा. ठंड का लुत्फ़ उठाया. 'होरा' चाबा गया. भुने हुए आलू और भांटा (बैंगन) का भरता खाया गया. लहसन के हरे-भरे ताज़ा पत्ते सहज उपलब्ध थे, धनिया भी. नमक की डली के साथ इसकी चटनी लाजवाब होती है. इन सबका स्वाद लिया. (हरे चने की पुष्ट घेन्टियों को पौधे सहित आग में भून्जने से होरा बनता है. चूंकि यह होली के नजदीक आने का समय होता है इसलिए इसे होरा कहते हैं.)
जब भी गाँव जाता हूँ यही सब खाता-पीता हूँ. गनीमत है कि हमारे यहाँ यह सब अब तक पुराने बीजों वाले रूप में उपलब्ध है. देसी टमाटर का स्वाद मुम्बई में आते ही तरसाने लगता है. तब गाँव की ओर भागता हूँ. मटर और सेम की फलियाँ किसान घर-घर ख़ुद बेच जाते हैं. सुबह इन्हीं की पुकारों से होती है. मूली ऐसी रसीली कि बेचनेवाला किसी छोटे बच्चे का मन रखने के लिए वहीं आधी तोड़ कर पकड़ा देता है. यह मौसम अमरूदों का भी था. देसी अमरूद. ...बचपन में चुरा कर खाए गए इन अमरूदों का स्वाद अब भी ज्यों का त्यों है. कौन जाने यह अपने मूल बीज की कितने करोड़वीं नस्ल है. क्या यही स्वाद हमारी अगली पीढ़ियों के लिए भी बचा रहेगा?
गाँव जाने पर एक और चीज स्थायी भाव की तरह मिलती है. वह है हमारे यहाँ का बस स्टैंड. यह दूसरे बस स्टैनडों से अलग है. यहाँ सब एक दूसरे को जानते-पहचानते हैं. दुआ-सलाम करते हैं. कोई जोड़ीदार शहर की तरफ जा रहा हो तो उसे बस में चढ़ते-चढ़ते तक गालियाँ देते हैं. इस तरह जानेवाले की यात्रा मंगलमय बनाते हैं.
कुछ लोग बस स्टैंड में आपको सुबह के छः बजे से रात के बारह बजे तक मिल जायेंगे. कोई भी ऋतु हो, ये आपको ताश खेलते मिलेंगे. ताश साधारण से लेकर जुआ तक हो सकती है. फिर अगले दिन सुबह की चाय पर बस स्टैंड में सिर्फ़ इस बात पर चर्चा होगी कि अगर कल छठी बाजी में एक्का आ जाता तो मजाल क्या थी कि ठाकुर साहब जीत जाते, या फिर गुलाम ही आ जाता तो तिवारी जी पाँच सौ रुपये जीतकर भला मूंछों पर ताव देते हुए घर कैसे चले जाते?
फिर पूरे दिन यही ताश चर्चा चलेगी. स्कूल जा रहे शिक्षक भी इस चर्चा में शामिल हो जायेंगे. उसके बाद ताश के खिलाड़ियों की तलाश शुरू होगी और रात तक के लिए जम जायेगा जुए का फड़. अगले दिन फिर से वही पछतावा कि अगर बादशाह आ जाता तो... या बेगम फंस जाती तो...
बीच-बीच में धर्म की भी चर्चा कोई छेड़ता है. किसने इलाके में सत्यनारायण की कथा सुनी, श्रीमदभागवत की बैठकी कौन करवा रहा है या कोई पहुंचे हुए बाबाजी किसके घर ठहरे हैं - सारा समाचार यहाँ मिलता जायेगा. फिर कोई कहेगा, अरे भाई धरती में अभी धर्म बचा हुआ है. जिस दिन धर्म न रहा उसी दिन धरती रसातल में चली जायेगी.
ताश के खिलाड़ी जानते हैं कि यह आदमी दिन में दस बार यही बात कहता है. इसलिए वे अपने पत्तों पर नज़र गडाये हूँ-हाँ करते रहते हैं. तमाशबीन भी कम नहीं होते. इन्हीं की वजह से कभी-कभी अचानक झगड़ा भी शुरू हो जाता है. बार-बार हार रहा पत्तेबाज़ चिल्लाएगा- 'अरे यार तुम मेरे पत्ते देखकर दूसरे की ताश बनवा रहे हो!' तमाशबीन कहेगा- 'जीतने पर चाय-पान के पैसे देने का वादा करो तो तुम्हारी ताश भी बनवाऊँ.' फिर ये बातें रबर की तरह बढ़ती जाती हैं. लेकिन कम ही ऐसा होता है कि मारपीट हो जाए. शाम को महुए की दारू भी तो साथ-साथ पीनी है!
आप कितने भी दिनों बाद गाँव गए हों, लोग बस इतना पूछेंगे- अरे भैया, कब आए?' उसके बाद आप चाहे जितने दिन रहो, बस वही 'एक्का-बादशाह-गुलाम-बेग़म' की चर्चा सुनते बैठे रहो. कोई दूसरा विषय नहीं छेड़ेगा. आप कोशिश करेंगे तो बात वहीं ताश के पत्तों पर आकर ठहरेगी. इसीलिए मैं दो-तीन दिनों में ही गाँव से भाग आता हूँ और जनकवि कैलाश गौतम की मशहूर कविता याद करता हूँ- 'गाँव गया था, गाँव से भागा.'
लेकिन इस बार मंजर बदला हुआ था और चर्चा का विषय भी. हुआ दरअसल यह है कि मध्यान्ह भोजन योजना पर निगरानी रखने के लिए मध्य प्रदेश सरकार ने स्व-सहायता समितियाँ गठित कर दी हैं. इन समितियों में गाँव के ही लोग होते हैं. इनकी कार्यकारिणी होती है. बाकायदा एक अध्यक्ष होता है. पहले यह योजना स्कूल शिक्षक की देखरेख में ही चलती थी. ये लोग छात्रों की मनमानी उपस्थिति दिखाकर राशन का तिया-पांचा करते थे. निर्धारित दिन पर निर्धारित भोजन की जगह कुछ भी सस्ता-मस्ता बनवाकर खिला देते थे और झूठे बिल बनाते थे. प्राथमिक शाला का हर शिक्षक महीने में कम से कम तीन-चार हजार रुपया इस योजना का फायदा उठाकर अवैध तरीके से कमा लेता था.
अब यह सम्भव नहीं हो पा रहा है. शिक्षकों के कलेजे में आग सुलग रही है. वही स्थिति हो गयी है कि रहा भी न जाए, सहा भी न जाए और कहा भी न जाए. स्व-सहायता समिति वाले ही छात्रों की उपस्थिति के हिसाब से राशन बाँटते हैं. निर्धारित दिन के हिसाब से खाद्यान मुहैया करवाते हैं.
दूसरी मुश्किल शिक्षकों के सामने यह भी खड़ी हो गयी है कि पहले जहाँ छात्रों की उपस्थित ९० प्रतिशत से ऊपर दिखा दी जाती थी वह अब घटकर ५०-६० प्रतिशत के आसपास रह गयी है. इससे जिला और ब्लाक स्तर के अधिकारी भी खफा हैं. उनका कहना है कि जुलाई-अगस्त में स्कूल खुलते समय ९०% उपस्थिति थी तो अब परीक्षा के समय २०-३०% छात्र कहाँ गए? यही फर्जीवाड़ा आजकल हमारे बस स्टैंड की चौपाल चर्चा का विषय बना हुआ है.
अब शिक्षक सीधे स्कूल चले जाते हैं क्योंकि उनके साथ ताश खेलनेवाले स्व-सहायता समितियों में आ गए हैं और स्थिति साँप और नेवला वाली हो गयी है. वैसे मुझे पूरा यकीन है कि पैसा खाने के लिए ये साँप और नेवले जल्दी ही हाथ मिला लेंगे और जल्द ही हमारा बस स्टैंड ताश चर्चा से गुलज़ार हो जायेगा.
मंगलवार, 5 फ़रवरी 2008
राज ठाकरे से घबराए लोगो, सुनो!
शिवसेना ने जो बोया था, महाराष्ट्र नव निर्माण सेना उसे काटने की कोशिश कर रही है. राज ठाकरे की पैदाइश से भी पहले शिवसेना ने 'उठाओ लुँगी, बजाओ पुंगी' का नारा उत्तर भारतीयों के खिलाफ नहीं बल्कि पिछली सदी के सातवें दशक में दक्षिण भारतीयों के ख़िलाफ़ दिया था और हमले किए थे. इसी की चपेट में जोगेश्वरी और गोरेगाँव के तबेले भी आए थे और लोगों को जान बचाकर उत्तर-दक्षिण भारत भागना पड़ा था.
'लाल बावटा' की तब बड़ी ताकत थी. यह मिलों का दौर था. वामपंथी यूनियनें तगड़ी थीं. युवा बाल ठाकरे ने 'फ्री प्रेस जनरल' में कार्टून बनाना छोड़कर मराठी अस्मिता के नाम पर शिवसेना का गठन किया. कहने वाले कहते हैं कि यह कांग्रेस की शह पर हुआ था ताकि वाम पंथियों की ताकत मुम्बई और महाराष्ट्र से ख़त्म की जा सके. असलियत जो भी रही हो, नतीजा वही हुआ कि वाम पंथी ताकतों का मुबई से सफाया हो गया, परेल इलाके में शक्तिशाली वाम पंथी नेता की हत्या कर दी गयी. और यूनियनों पर शिवसेना का नियंत्रण होने लगा.
शिवसेना और महाराष्ट्र नव निर्माण सेना की हरकतों, हालत और हालात में काफी समानताएं हैं. शिवसेना भी तब सड़कों पर नंगा नाच करती थी, बाद में भी करती रही; मनसे भी कर रही है. दोनों पार्टियां 'मराठी माणूस' की राजनीति करने वाली हैं. शिवसेना की हिंसा को भी कांग्रेस की शह बताया जाता था और आज भी लोग यही समझ रहे हैं कि मनसे के कार्यकर्ता जब गरीब टैक्सी वालों तथा पानी पूरी, वडा पाव वालों के साथ मार पीट कर रहे हैं तो कांग्रेस की शह पर ही पुलिस मूक तमाशा देखती रहती है.
इस विश्लेषण में हम यह भूल जाते हैं कि पुलिस कहीं की भी हो, ख़ुद आगे बढ़कर दंगाइयों को नहीं रोकती. यह एक आम पुलिसिया प्रवृत्ति है. यूपी, बिहार, दिल्ली, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, राजस्थान, गुजरात.. जहाँ कहीं भी भीड़ की हिंसा देखी गयी है वहाँ पुलिस मूक दर्शक ही रही है. सब कुछ निबट जाने तथा 'ऊपर' से दबाव पड़ने के बाद पुलिस लाठियाँ भांजती नज़र आती है, मुबई में ही यही देखा गया.
जो लोग मनसे विरुद्ध एक 'उत्तर भारतीय मनसे' बनाने की वकालत कर रहे हैं उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि ज़बानी ज़मा खर्च करना सुरक्षित रहने तथा लोगों की नज़र में वीर बनने का तरीका हो सकता है लेकिन सड़क पर उतर कर लाठी गोली चलाना काफी मुश्किल काम है. वह भी ऐसी धरती पर जहाँ का आपने अन्न खाया है, जहाँ की कमाई से आप अपने बीवी-बच्चे पाल रहे हैं.
ऐसे लोगों से मैं पूछता हूँ कि जब मनसे ने रेलवे भर्ती बोर्ड की मुम्बई परीक्षा देने आये हजारों परप्रांतीय छात्रों के साथ कल्याण में मारपीट की थी तब इन्होने क्यों कोई जुलूस या मोर्चा नहीं लिकाला? पिछले साल जब सब्जियों की खेती करने वाले निरीह बिहारी मजदूरों के साथ गंदे पानी का इस्तेमाल करने का आरोप लगाकर खेतों में जाकर मारपीट की गयी थी तब ये कहाँ सो रहे थे?
...और जब यूपी-बिहार से आने वाली ट्रेनों से उतरने वाले गरीब लोगों के साथ रेलवे स्टेशनों पर पुलिसिया बर्ताव होता है तब किसी को बुरा क्यों नहीं लगता? कोई विवाद होने की सूरत में जब पुलिस वाले आपका 'उपनाम' देख कर रपट दर्ज करने या न करने का फैसला लेते हैं तब ये क्या करते हैं? राशन कार्ड बनवाने की लाइन में खड़े आदमी को यूपी-बिहार-बंगाल का होने की वजह से सरकारी कर्मचारी ही कैसी-कैसी गालियाँ देते हैं, कभी आपने सुना है? क्या यह सब आज शुरू हुआ है? मैंने ऊपर कहा है कि यह सब शिवसेना का बोया हुआ है. उसने महाराष्ट्र की पुलिस को अंग्रेजों के ज़माने की पुलिस (भारतीयों के ख़िलाफ़) बना दिया है.
'बड़े' लोग इसलिए भयभीत हैं कि कहीं यह मामला उनके घर तक न पहुँच जाए. अब तक गरीब पिटता रहा तो ठीक था. लेकिन अब पानी इनके सर से ऊपर बहने लगा है. ये लोग हिंसा का जवाब हिंसा से देने की बातें करने लगे हैं. लेकिन क्या इन्हें नहीं लगता कि जब हिंसा बढ़ेगी तो ये हवाई जहाज या रेल के एसी डिब्बे में घुसकर भाग खड़े होंगे और गरीब बेचारा सड़कों पर मारा काटा जायेगा. मेरे एक जान-पहचाने वाले उत्तर भारतीय ने दस साल पहले यहीं 'उत्तर सेना' बनायी थी और घाटकोपर की एक गंदी खोली में रहता था. उसने मध्य और पश्चिम रेलवे ट्रैक के बगल की दीवारें कई जगह 'उत्तर सेना' के बैनरों से पोत दी थीं. आज न उस ' शूरवीर' का कहीं पता है न उसकी सेना का.
हम सभी जानते हैं कि राज ठाकरे असंवैधानिक काम कर रहे हैं. उनका यह कदम देश को तोड़ने वाला है. उन्हें गिरफ्तार करके जेल में डाल देना चाहिए. लेकिन उन हजारों लोगों का क्या करेंगे जो उनके पीछे इसी समाज में रह जायेंगे. राज ठाकरे किसी व्यक्ति का नहीं बल्कि नफ़रत की उस राजनीति का नाम है जो भाषा, क्षेत्र, वर्ण, जाति और सम्प्रदाय के नाम पर भारतीय जनता को बांटने का काम करती है. यह भावना समूल नष्ट करने की जरूरत है.
और उन कांग्रेसी सरकारों का क्या करेंगे जो शिवसेना से लेकर महाराष्ट्र नव निर्माण सेना तक बार-बार ऐसी असंवैधानिक गतिविधियों की देख-रेख करती रही हैं?
-विजयशंकर चतुर्वेदी.
'लाल बावटा' की तब बड़ी ताकत थी. यह मिलों का दौर था. वामपंथी यूनियनें तगड़ी थीं. युवा बाल ठाकरे ने 'फ्री प्रेस जनरल' में कार्टून बनाना छोड़कर मराठी अस्मिता के नाम पर शिवसेना का गठन किया. कहने वाले कहते हैं कि यह कांग्रेस की शह पर हुआ था ताकि वाम पंथियों की ताकत मुम्बई और महाराष्ट्र से ख़त्म की जा सके. असलियत जो भी रही हो, नतीजा वही हुआ कि वाम पंथी ताकतों का मुबई से सफाया हो गया, परेल इलाके में शक्तिशाली वाम पंथी नेता की हत्या कर दी गयी. और यूनियनों पर शिवसेना का नियंत्रण होने लगा.
शिवसेना और महाराष्ट्र नव निर्माण सेना की हरकतों, हालत और हालात में काफी समानताएं हैं. शिवसेना भी तब सड़कों पर नंगा नाच करती थी, बाद में भी करती रही; मनसे भी कर रही है. दोनों पार्टियां 'मराठी माणूस' की राजनीति करने वाली हैं. शिवसेना की हिंसा को भी कांग्रेस की शह बताया जाता था और आज भी लोग यही समझ रहे हैं कि मनसे के कार्यकर्ता जब गरीब टैक्सी वालों तथा पानी पूरी, वडा पाव वालों के साथ मार पीट कर रहे हैं तो कांग्रेस की शह पर ही पुलिस मूक तमाशा देखती रहती है.
इस विश्लेषण में हम यह भूल जाते हैं कि पुलिस कहीं की भी हो, ख़ुद आगे बढ़कर दंगाइयों को नहीं रोकती. यह एक आम पुलिसिया प्रवृत्ति है. यूपी, बिहार, दिल्ली, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, राजस्थान, गुजरात.. जहाँ कहीं भी भीड़ की हिंसा देखी गयी है वहाँ पुलिस मूक दर्शक ही रही है. सब कुछ निबट जाने तथा 'ऊपर' से दबाव पड़ने के बाद पुलिस लाठियाँ भांजती नज़र आती है, मुबई में ही यही देखा गया.
जो लोग मनसे विरुद्ध एक 'उत्तर भारतीय मनसे' बनाने की वकालत कर रहे हैं उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि ज़बानी ज़मा खर्च करना सुरक्षित रहने तथा लोगों की नज़र में वीर बनने का तरीका हो सकता है लेकिन सड़क पर उतर कर लाठी गोली चलाना काफी मुश्किल काम है. वह भी ऐसी धरती पर जहाँ का आपने अन्न खाया है, जहाँ की कमाई से आप अपने बीवी-बच्चे पाल रहे हैं.
ऐसे लोगों से मैं पूछता हूँ कि जब मनसे ने रेलवे भर्ती बोर्ड की मुम्बई परीक्षा देने आये हजारों परप्रांतीय छात्रों के साथ कल्याण में मारपीट की थी तब इन्होने क्यों कोई जुलूस या मोर्चा नहीं लिकाला? पिछले साल जब सब्जियों की खेती करने वाले निरीह बिहारी मजदूरों के साथ गंदे पानी का इस्तेमाल करने का आरोप लगाकर खेतों में जाकर मारपीट की गयी थी तब ये कहाँ सो रहे थे?
...और जब यूपी-बिहार से आने वाली ट्रेनों से उतरने वाले गरीब लोगों के साथ रेलवे स्टेशनों पर पुलिसिया बर्ताव होता है तब किसी को बुरा क्यों नहीं लगता? कोई विवाद होने की सूरत में जब पुलिस वाले आपका 'उपनाम' देख कर रपट दर्ज करने या न करने का फैसला लेते हैं तब ये क्या करते हैं? राशन कार्ड बनवाने की लाइन में खड़े आदमी को यूपी-बिहार-बंगाल का होने की वजह से सरकारी कर्मचारी ही कैसी-कैसी गालियाँ देते हैं, कभी आपने सुना है? क्या यह सब आज शुरू हुआ है? मैंने ऊपर कहा है कि यह सब शिवसेना का बोया हुआ है. उसने महाराष्ट्र की पुलिस को अंग्रेजों के ज़माने की पुलिस (भारतीयों के ख़िलाफ़) बना दिया है.
'बड़े' लोग इसलिए भयभीत हैं कि कहीं यह मामला उनके घर तक न पहुँच जाए. अब तक गरीब पिटता रहा तो ठीक था. लेकिन अब पानी इनके सर से ऊपर बहने लगा है. ये लोग हिंसा का जवाब हिंसा से देने की बातें करने लगे हैं. लेकिन क्या इन्हें नहीं लगता कि जब हिंसा बढ़ेगी तो ये हवाई जहाज या रेल के एसी डिब्बे में घुसकर भाग खड़े होंगे और गरीब बेचारा सड़कों पर मारा काटा जायेगा. मेरे एक जान-पहचाने वाले उत्तर भारतीय ने दस साल पहले यहीं 'उत्तर सेना' बनायी थी और घाटकोपर की एक गंदी खोली में रहता था. उसने मध्य और पश्चिम रेलवे ट्रैक के बगल की दीवारें कई जगह 'उत्तर सेना' के बैनरों से पोत दी थीं. आज न उस ' शूरवीर' का कहीं पता है न उसकी सेना का.
हम सभी जानते हैं कि राज ठाकरे असंवैधानिक काम कर रहे हैं. उनका यह कदम देश को तोड़ने वाला है. उन्हें गिरफ्तार करके जेल में डाल देना चाहिए. लेकिन उन हजारों लोगों का क्या करेंगे जो उनके पीछे इसी समाज में रह जायेंगे. राज ठाकरे किसी व्यक्ति का नहीं बल्कि नफ़रत की उस राजनीति का नाम है जो भाषा, क्षेत्र, वर्ण, जाति और सम्प्रदाय के नाम पर भारतीय जनता को बांटने का काम करती है. यह भावना समूल नष्ट करने की जरूरत है.
और उन कांग्रेसी सरकारों का क्या करेंगे जो शिवसेना से लेकर महाराष्ट्र नव निर्माण सेना तक बार-बार ऐसी असंवैधानिक गतिविधियों की देख-रेख करती रही हैं?
-विजयशंकर चतुर्वेदी.
अबोध, मूर्ख और भावुक होती है जनता!
बुर्जुआ समाज और संस्कृति-१२
(अब तक आपने पढ़ा कि समाज से अलग, निस्संग जीवन व्यक्ति के लिए असहनीय होता है. अब आगे...)
संग साथ की प्रवृत्ति सहजात होती है, मनोविज्ञान में इसे सामाजिक प्रवृत्ति कहा जाता है. मनुष्य ही क्यों, चींटियाँ, मधुमक्खियाँ, मछलियाँ, चिडियाँ, हाथी, हिरण, वानर इत्यादि अनेक प्राणियों में एकजुट होकर रहने की सहजात प्रवृत्ति है. यह भाव ही सामाजिक बन्धन का आधार है.
दैहिक सानिध्य के अलावा भी दूसरों से एकात्म-बोध की अनुभूति हो सकती है. संन्यासी या क्रांतिकारी, निर्जन कक्ष में, निस्संग होते हुए भी दूसरों के साथ भावनात्मक सम्पर्क रखते हैं. ईश्वर, धर्म, देशप्रेम, और राष्ट्रीयता की भावना इत्यादि आदर्शों और विश्वास से भी कई लोगों के हृदय में भाईचारे की भावना पैदा होती है तथा उससे प्रेरित हो जीवन उत्सर्ग कर पलायन और निस्संगता भोगते हैं. लेकिन भावनात्मक बोध लुप्त होते ही मनोबल क्षीण पड़ता जाता है. उसी तरह भावनात्मक संबंधों के अभाव में, भीड़ में रहकर भी कोई अकेला महसूस कर सकता है. जिनके मन में ईर्ष्या-द्वेष के अलावा कुछ नहीं होता, वे हजारों की भीड़ में रहकर भी अकेले रहते हैं.
बुर्जुआ समाज में व्यक्ति दिनों-दिन अकेला और असहाय होता जा रहा है, सहयोगिता की भावना लुप्तप्राय है. जिस कार्य में समष्टिगत स्वार्थ होता है, वहाँ सभी का एक ही लक्ष्य होता है तथा स्वभावतः सहयोगिता का भाव रहता है. लेकिन जहाँ हरेक दूसरे का शत्रु है, दूसरे को परास्त कर प्रतियोगिता में आगे जाना है वहाँ सहयोगिता कैसे होगी? हालांकि कई संगठित प्रतिष्ठान आदि हैं, लेकिन उनका उद्देश्य भी किसी दूसरे प्रतिष्ठान को पराजित करना है. इस समाज में सामाजिक दायित्व पालन करने का आवाहन, जो प्रायः नेताओं के भाषणों में होता है, छलना मात्र है, प्रतिपक्ष को विभ्रांत करने का कौशल है. सहयोगिता के परदे के पीछे सभी प्रतियोगी और अकेले हैं.
बुर्जुआ समाज में सभी युद्धजीवी हैं. सभी एक दूसरे को धकियाते हुए, उद्विग्न, भयातुर और असुरक्षित हैं. गरीब की चिंता चूल्हा जला पाने की है, नौकरी वालों को छंटनी का भय है, अमीर को प्रतियोगिता और मुद्रास्फीति से बाज़ार मंदा होने की चिंता है, कामगार को हड़ताल की आशंका है. बुर्जुआ, साम्यवादियों के आक्रमण से भयभीत हैं, यहाँ तक कि स्वदेशी सरकार सब कुछ जब्त कर सकती है, यह निरंतर भय का कारण है.
आज शांति है तो कल युद्ध आरंभ हो सकता है. विद्रोह और दंगे हो सकते हैं. आज के मित्र देश, कल शत्रु हो सकते हैं. अस्थिरता इस समाज की विशेषता है. रोज़ नए फैशन, नए विचार आते-जाते हैं, सरकारों का उत्थान-पतन हो रहा है, एक तानाशाह दूसरे को हटा रहा है, दूसरा तीसरे को, वर्ष भर नए क़ानून बनते जाते हैं, चीज़ों के दाम बढ़ते जाते हैं, रुपयों के कमते जाते हैं, आज शिक्षानीति तो कल अर्थनीति में बदलाव आ रहे हैं.
कुछ समझ पाने से पहले हर व्यवस्था, दूसरी का विकल्प बन जाती है. आदमी की मानसिकता समुद्र के तूफान में फंसी नौका के नाविक जैसी है. इस अस्थिरता से मुक्ति की उम्मीद में जनता तानाशाहों की शरणागत होती है. हजारों वर्षों की लड़ाई के बाद जिन नागरिक अधिकारों का अर्जन जनता ने किया है उसे इतनी सहजता से उन्मादग्रस्त और हिंसक तानाशाहों के हाथों विसर्जन की यह प्रक्रिया विस्मयकारी है.
एरिक फ्रॉम ने कहा है कि बुर्जुआ समाज में सुरक्षा का अभाव और निरंतर अनिश्चितता की पीड़ा की व्याकुलता से ही फासिज़्म पैदा होता है. किसी भी चालाक भाग्यान्वेशी के संकट मोचन का झूठा आश्वासन देते ही, जनता उसके पीछे यों दौड़ती है, जैसे रेगिस्तान में मृगतृष्णा के पीछे प्यासा. स्वभावतया जनता अबोध, मूर्ख और भावुक होती है. जितना विवेक जनता के पास है, वह भी महाप्रलय के परिकल्पित भय से लुप्तप्राय है.
बुर्जुआ समाज में व्यक्ति स्वातंत्र्य, सुरक्षा के एवज में मिला है. प्राचीनकाल में व्यक्तित्व के विकास में कई अतार्किक , अन्यायपूर्ण और अलंघनीय बाधाएं थीं. जो जिस जति, श्रेणी, कुल या गोत्र में जन्म लेता, उसे उसके दायरे से बाहर जाने की अनुमति नहीं थी. पूंजीवाद ने इन सभी धारणाओं पर झाड़ू फेर दी. अब चांडाल-पुत्र में योग्यता हो तो वह शिक्षक हो सकता है, ब्राम्हण मछली बेच सकता है. बदनामी का डर नहीं है. अपनी सुविधा के हिसाब से काम कीजिये. लेकिन यह परिस्थिति कुछ ऐसे पैदा हुई कि सर का दर्द दूर करने के लिए उसे काट दें.
बहुतों की रूचि के मुताबिक काम नहीं जुटता है. योग्यता और रूचि के अनुसार काम न होने पर व्यक्ति क्या करेगा? वह भी न मिले तो? बेकार बैठे हुए व्यक्ति-स्वातंत्र्य का 'आनंद' ही लेगा. करोड़ों बेकार घूमते हैं. पूंजीवाद एक हाथ से देकर दूसरे से दुगुना लेता है. स्वाधीनता दी है, जीविका का निश्चित उपाय और सुरक्षा नहीं दी है. इससे जनता में अस्थिरता पैदा हुई है जो प्राचील काल में नहीं थी.
'पहल' से साभार
(अगली किस्त में जारी...)
(अब तक आपने पढ़ा कि समाज से अलग, निस्संग जीवन व्यक्ति के लिए असहनीय होता है. अब आगे...)
संग साथ की प्रवृत्ति सहजात होती है, मनोविज्ञान में इसे सामाजिक प्रवृत्ति कहा जाता है. मनुष्य ही क्यों, चींटियाँ, मधुमक्खियाँ, मछलियाँ, चिडियाँ, हाथी, हिरण, वानर इत्यादि अनेक प्राणियों में एकजुट होकर रहने की सहजात प्रवृत्ति है. यह भाव ही सामाजिक बन्धन का आधार है.
दैहिक सानिध्य के अलावा भी दूसरों से एकात्म-बोध की अनुभूति हो सकती है. संन्यासी या क्रांतिकारी, निर्जन कक्ष में, निस्संग होते हुए भी दूसरों के साथ भावनात्मक सम्पर्क रखते हैं. ईश्वर, धर्म, देशप्रेम, और राष्ट्रीयता की भावना इत्यादि आदर्शों और विश्वास से भी कई लोगों के हृदय में भाईचारे की भावना पैदा होती है तथा उससे प्रेरित हो जीवन उत्सर्ग कर पलायन और निस्संगता भोगते हैं. लेकिन भावनात्मक बोध लुप्त होते ही मनोबल क्षीण पड़ता जाता है. उसी तरह भावनात्मक संबंधों के अभाव में, भीड़ में रहकर भी कोई अकेला महसूस कर सकता है. जिनके मन में ईर्ष्या-द्वेष के अलावा कुछ नहीं होता, वे हजारों की भीड़ में रहकर भी अकेले रहते हैं.
बुर्जुआ समाज में व्यक्ति दिनों-दिन अकेला और असहाय होता जा रहा है, सहयोगिता की भावना लुप्तप्राय है. जिस कार्य में समष्टिगत स्वार्थ होता है, वहाँ सभी का एक ही लक्ष्य होता है तथा स्वभावतः सहयोगिता का भाव रहता है. लेकिन जहाँ हरेक दूसरे का शत्रु है, दूसरे को परास्त कर प्रतियोगिता में आगे जाना है वहाँ सहयोगिता कैसे होगी? हालांकि कई संगठित प्रतिष्ठान आदि हैं, लेकिन उनका उद्देश्य भी किसी दूसरे प्रतिष्ठान को पराजित करना है. इस समाज में सामाजिक दायित्व पालन करने का आवाहन, जो प्रायः नेताओं के भाषणों में होता है, छलना मात्र है, प्रतिपक्ष को विभ्रांत करने का कौशल है. सहयोगिता के परदे के पीछे सभी प्रतियोगी और अकेले हैं.
बुर्जुआ समाज में सभी युद्धजीवी हैं. सभी एक दूसरे को धकियाते हुए, उद्विग्न, भयातुर और असुरक्षित हैं. गरीब की चिंता चूल्हा जला पाने की है, नौकरी वालों को छंटनी का भय है, अमीर को प्रतियोगिता और मुद्रास्फीति से बाज़ार मंदा होने की चिंता है, कामगार को हड़ताल की आशंका है. बुर्जुआ, साम्यवादियों के आक्रमण से भयभीत हैं, यहाँ तक कि स्वदेशी सरकार सब कुछ जब्त कर सकती है, यह निरंतर भय का कारण है.
आज शांति है तो कल युद्ध आरंभ हो सकता है. विद्रोह और दंगे हो सकते हैं. आज के मित्र देश, कल शत्रु हो सकते हैं. अस्थिरता इस समाज की विशेषता है. रोज़ नए फैशन, नए विचार आते-जाते हैं, सरकारों का उत्थान-पतन हो रहा है, एक तानाशाह दूसरे को हटा रहा है, दूसरा तीसरे को, वर्ष भर नए क़ानून बनते जाते हैं, चीज़ों के दाम बढ़ते जाते हैं, रुपयों के कमते जाते हैं, आज शिक्षानीति तो कल अर्थनीति में बदलाव आ रहे हैं.
कुछ समझ पाने से पहले हर व्यवस्था, दूसरी का विकल्प बन जाती है. आदमी की मानसिकता समुद्र के तूफान में फंसी नौका के नाविक जैसी है. इस अस्थिरता से मुक्ति की उम्मीद में जनता तानाशाहों की शरणागत होती है. हजारों वर्षों की लड़ाई के बाद जिन नागरिक अधिकारों का अर्जन जनता ने किया है उसे इतनी सहजता से उन्मादग्रस्त और हिंसक तानाशाहों के हाथों विसर्जन की यह प्रक्रिया विस्मयकारी है.
एरिक फ्रॉम ने कहा है कि बुर्जुआ समाज में सुरक्षा का अभाव और निरंतर अनिश्चितता की पीड़ा की व्याकुलता से ही फासिज़्म पैदा होता है. किसी भी चालाक भाग्यान्वेशी के संकट मोचन का झूठा आश्वासन देते ही, जनता उसके पीछे यों दौड़ती है, जैसे रेगिस्तान में मृगतृष्णा के पीछे प्यासा. स्वभावतया जनता अबोध, मूर्ख और भावुक होती है. जितना विवेक जनता के पास है, वह भी महाप्रलय के परिकल्पित भय से लुप्तप्राय है.
बुर्जुआ समाज में व्यक्ति स्वातंत्र्य, सुरक्षा के एवज में मिला है. प्राचीनकाल में व्यक्तित्व के विकास में कई अतार्किक , अन्यायपूर्ण और अलंघनीय बाधाएं थीं. जो जिस जति, श्रेणी, कुल या गोत्र में जन्म लेता, उसे उसके दायरे से बाहर जाने की अनुमति नहीं थी. पूंजीवाद ने इन सभी धारणाओं पर झाड़ू फेर दी. अब चांडाल-पुत्र में योग्यता हो तो वह शिक्षक हो सकता है, ब्राम्हण मछली बेच सकता है. बदनामी का डर नहीं है. अपनी सुविधा के हिसाब से काम कीजिये. लेकिन यह परिस्थिति कुछ ऐसे पैदा हुई कि सर का दर्द दूर करने के लिए उसे काट दें.
बहुतों की रूचि के मुताबिक काम नहीं जुटता है. योग्यता और रूचि के अनुसार काम न होने पर व्यक्ति क्या करेगा? वह भी न मिले तो? बेकार बैठे हुए व्यक्ति-स्वातंत्र्य का 'आनंद' ही लेगा. करोड़ों बेकार घूमते हैं. पूंजीवाद एक हाथ से देकर दूसरे से दुगुना लेता है. स्वाधीनता दी है, जीविका का निश्चित उपाय और सुरक्षा नहीं दी है. इससे जनता में अस्थिरता पैदा हुई है जो प्राचील काल में नहीं थी.
'पहल' से साभार
(अगली किस्त में जारी...)
सोमवार, 4 फ़रवरी 2008
हिन्दी में आधुनिक ज्ञान के शास्त्र तो लिखिए!
पिछले दिनों 'रिजेक्ट माल' और 'कबाड़खाना' में भाषा पर चर्चा चली। इसमें भाई इरफान, अभय तिवारी और उदयप्रकाश से लेकर किसी जनसेवक जी महाराज तक के विचार आप जान चुके। मैंने भी हिन्दी के प्रयोग को लेकर कुछ फुटकर विचार रखे थे. इन्हें आप उपर्युक्त ब्लोगों में पढ़ चुके हैं. अब अपने ब्लॉग पर डाल रहा हूँ. कृपया गौर फरमाएं-)
मेरी जानकारी में हिन्दुस्तानी अमीर खुसरो के समय उन सिपाहियों के बीच से उभरी है जो मुग़ल सेना में साथ-साथ रहते थे. इनमें कुछ पश्चिमी उत्तर प्रदेश के तथा अधिकांश ईरान, खुरासान, तुर्की और आज के अफगानिस्तान तथा उज़बेकिस्तान के जवान हुआ करते थे. इनकी आपसी बोल-चाल के मिश्रण से जो भाषा उभरी वह उत्तर भारत में पसरती गयी. यही रोजमर्रा के कामकाज में इस्तेमाल होने लगी और आगे चलकर इसी में व्यापार होने लगा, नौकरियाँ मिलने लगीं. आम सैनिक कार्रवाइयों तथा जनता के बीच अहम ऐलानों की भाषा भी यही बनती गयी. इसे ही उर्दू कहा जाता है. तत्कालीन शासकों को भी अरबी-फारसी की दुरूहता के आगे जनता की इस बोली-ठोली को तसलीम करना पड़ा.
उत्तर और पूर्वी भारत के जिस इलाके में जिस बोली का असर था, उसने उर्दू को अपना लहजा, अपना तेवर दिया. जैसे पछांही, अवधी, ब्रज, मगही, बघेली, बुन्देली, बांग्ला, उड़िया, इत्यादि.
वो कहते हैं न कि जिस भाषा में धंधा हो सकता है वही भाषा जिंदा बचती है. यह बात आज भी सच है. इसलिए मैं इसे हिन्दी-उर्दू या हिन्दी-अंग्रेजी के झगड़े से जोड़ कर नहीं देख पाता क्योकि इबारत स्पष्ट है. जो लोग इसे हिन्दू-मुस्लिम की भाषा या भारतीय-विदेशी का संघर्ष बताते हैं, उनका ऐसा करना समझ में आता है.
और अब तो हिन्दी-उर्दू के नाम पर कई सफ़ेद हाथी पल रहे हैं. ये कैसे मूल बात समझने देंगे?
मेरे जानते फारसी या संस्कृत आमजन की भाषा कभी नहीं रही. भारतेंदु हरिश्चन्द्र के ज़माने में जब हिन्दी पद्य से भाषा का गद्य में संक्रमण हुआ तब भाषा कुछ वैसी होती थी जैसी कि आज भी कर्मकांडी पंडित सत्यनारायण की कथा सुनते हुए उपयोग में लाते हैं-- (एक नमूना)-- 'तो सुकदेव जी महराज नारद जी से कहते भये.'
हिन्दी की शुरुआती कहानियों में (रानी केतकी की कहानी) यही हिन्दी आपको मिलेगी. इसे हिन्दी या उर्दू न कहकर खड़ी बोली कहा गया. यानी पद्यात्मक और घुमावदार न होकर जो थोड़े प्रयत्न से सीधे-सीधे बोली और लिखी जा सके. अगर हिन्दी की यात्रा इसी रास्ते चलती तो आज हिन्दी-उर्दू का झगड़ा शुरू न होता, न ही संस्कृतनिष्ठ हिन्दी का पचड़ा सामने आता. क्योकि उस भाषा में अद्भुत प्रवाह था और वह भाषा के संक्रमण की स्वाभाविक प्रक्रिया थी.. उसे काशी के पंडित नहीं आगे बढ़ा रहे थे. वह सदल मिश्र, लल्लूलाल और इंशा अल्लाह खान तथा भारतेंदु जैसे जनता के लोगों के हाथ में थी.
लेकिन यहीं से उस हिन्दी -उर्दू का दुर्भाग्य शुरू होता है. इसे संस्कृत के पंडों ने झपट लिया. जैसे तुलसी दास को भाषा (अवधी) में रामचरितमानस लिखने पर काशी और अयोध्या के पंडों ने (मानस का हंस) जाति बाहर करने की कोशिशें की थीं, उसी तरह हिन्दी को विद्वज्जनों की भाषा में ढाल दिया गया. उधर उर्दू वालों ने अरबी-फ़ारसी के शब्द और शब्द बन्ध ठूंसने शुरू किए. नतीजा ये हुआ कि यह जनता के लिए दोनों तरफ से एक दुरूह भाषा बनती गयी. आगे चलकर इसे हिन्दुओं और मुसलमानों की भाषा का जामा पहना दिया गया. दोनों तरफ से सियासत शुरू हुई. अंग्रेजों ने इसे हवा दी और आज आज़ाद भारत में जिस तरह मुस्लिम राजनीति पस्त है उसी तरह उर्दू भी.
लेकिन हिन्दी ने इस भाषिक जकडन से मुक्त होने की कोशिश लगातार की है. परीक्षा में पास-फेल होने का झंझट ख़त्म होने के बाद कई लेखकों और अन्य क्षेत्र के जानकारों ने इसी हिन्दी का दामन थामा है. महात्मा गांधी इसी हिन्दी के हिमायती थे और इसे हिन्दुस्तानी कहते थे. मज़े की बात तो यह है कि जनता नेताओं के भाषण इसी हिन्दुस्तानी में समझती थी.
जैसा कि मैंने ऊपर याद दिलाया है कि भाषा वही ज़िंदा रहती है जिसमें धंधा चलता हो. इसमें यह और जोड़ लीजिये कि लोग उसी भाषा की ओर लपकते हैं जिसमें रोज़गार मिलता हो. आज कितने मुसलमान उर्दू पढ़ना चाहते हैं और कितने हिन्दू हिन्दी?
मैं जिस शहर में रहता हूँ, वहाँ शिवसेना मराठी के अलावा और कुछ चलने नहीं देना चाहती. लेकिन लोकल ट्रेन में उसका वश नहीं चलता. शिवसेना के कट्टर से कट्टर आदमी की बगल में मराठी आदमी भी बैठा हो तो वह हिन्दी में ही बात शुरू करता है. फिर यहाँ की हिन्दी का स्वरूप और उसका विकास देखना भी दिलचस्प है.
उलझन यह है कि लिखते समय आप किस तरह की हिन्दी का उपयोग करें? यह लिखने के स्वरूप पर निर्भर करता है. अगर औपचारिक लेखन है तो उसमें भाषा, शब्द-पद, वाक्य और व्याकरण के ख़ास नियमों को ध्यान में रखा जाना चाहिए. लेखन अगर अनौपचारिक है तो इन सारे बंधनों से छूट मिलनी चाहिए. ब्लॉग लेखन को लोग फिलहाल अनौपचारिक मान रहे हैं. तब इतनी हाय-तौबा क्यों? जो मर्जी लिखिए, हिंग्लिश में लिखिए, मुम्बईया में लिखिए, महमूद की हैदराबादी हिन्दी में लिखिए, या टिपिकल बिहारी में लिखिए.
जहाँ तक नुक्ते की बात है तो मेरा मत यह है कि या तो सही जगह नुक्ता लगाइये, या इसे भूल ही जाइए. ग़लत जगह नुक्ता लगाने से अर्थ का अनर्थ हो सकता है. अगर हम 'ख़ुदा' को 'खुदा' और 'ज़ेब' को 'जेब' लिखेंगे तो वही फ़जीहत होगी जो 'बदन' और 'वदन' का फ़र्क न कर पाने से होती है. यहाँ बता देने में कोई गुरेज नहीं है- ज़ेब का अर्थ है शोभा और अगर कभी आपकी जेब कटी होगी तो जेब का अर्थ आप जानते ही होंगे. बदन का अर्थ है देह, और वदन का अर्थ मुख.
हिन्दी भाषा की प्रकृति अविरल बहने की ही रही है.चाहे इसे विद्वानों ने कितना भी अपने कब्जे में करना चाहा, यह नदी के उद्दाम वेग की तरह आगे बढ़ती रही है. संस्कृत के तत्सम और तद्भव शब्द इसी में आपको मिलेंगे. अंग्रेजी के कितने ही शब्द हिन्दी कुल में शामिल हो चुके हैं. कुछ शब्द तो ऐसे हैं कि आपको सिर्फ इसी हिन्दी में मिलेंगे. जैसे जुगाड़मेंट. इसी हिन्दी में कई शब्द आपको उर्दू के लग सकते हैं लेकिन वे हैं असल में तुर्की, पुर्तगाली या फ्रांसीसी के.
अरबी, फ़ारसी और अग्रेज़ी से आए शब्दों की फेहरिस्त लम्बी है. इसकी वजह यह है कि इन्होंने भारत पर बड़े अरसे तक शासन किया. यहाँ यह भी ध्यान रखना चाहिए कि मुग़ल तुर्क थे इसलिए तुर्की के शब्द भी हिन्दी में बहुत मिलेंगे. कुछ उदाहरण पेश करता हूँ-
अंग्रेज़ी शब्द- साकइल, रेल, टिकट, स्टैंप, पुलिस, निब, स्टोव, टेलीफोन, फोटो, सिनेमा आदि.
फ़ारसी शब्द- औरत, खजांची, खुशामद, जमीन, सरकार, सिफारिश, अंगूर, आबाद, आस्तीन, गुलाब, चपाती, जंजीर, दरी, नमक, नाश्ता, परदा, प्याला आदि.
तुर्की शब्द- तोप, तमगा, दारोगा, बारूद, बंदूक, कुली, बेगम, बहादुर, लाश आदि.
फ्रांसीसी- रेस्तरां, कूपन, अंग्रेज़ी, कारतूस, रिपोर्ताज आदि.
जापानी- रिक्शा
पुर्तगाल- गिरजा, पादरी, काजू, चाबी, बिस्किट, कमीज़, तौलिया आदि.
उत्तर तथा पूर्वी भारत की बोलियों के तो हजारों शब्द हिन्दी में घुले-मिले हुए हैं. इन सबके हिन्दी में आने की एक यात्रा रही है. देवभाषा से पाली, प्राकृत और अपभ्रंस होते हुए.
फिर भी अगर कोई जिद करे कि वह तो पूर्वी हिन्दी लिखेगा. तो उसे किसने रोका है? कोई कहे कि वह संस्कृतनिष्ठ हिन्दी लिखेगा तो उसे कौन मना करता है? लेकिन उससे जब नफ़ा-नुकसान होगा तो वह ख़ुद राह लग जायेगा.
रही बात ज्ञान-विज्ञान की. तो भाई, पहले हिन्दी में आधुनिक ज्ञान के शास्त्र लिखो, नयी-नयी खोजें करो, तब न अपनी शब्दावालियां बनाओगे? या खाली कूदते रहोगे कि कम्यूटर अंग्रेजी में क्यों पढ़ाया जाता है या जीव विज्ञान के शब्द-पद ऐसी अबूझ हिन्दी में क्यों है? समझना चाहिए कि ये शब्द-पद या तो पर्यायवाची हैं या समानार्थी. अगर आपका शोध नहीं है तो आपकी शब्दावली भी नहीं होगी. तब तो ऐसे ही रट्टा मारना पड़ेगा और हिन्दी का रोना उसी तरह रोना पड़ेगा जिस तरह उर्दू वाले रोते हैं.
फिर भी हिन्दी की यह उदारता है कि स्पुतनिक तथा सॉफ्टवेयर जैसे शब्द लगते ही नहीं कि ये रूसी और अंग्रेज़ी के हैं. है न ये अजस्र और अविरल धारा!
मेरा सुझाव यह है कि फिलहाल आप इसी हिन्दी का इस्तेमाल करें, जिसका बखान मैं ऊपर कर आया हूँ. और हो सके तो इसमें कुछ योगदान करते चलें.
मेरी जानकारी में हिन्दुस्तानी अमीर खुसरो के समय उन सिपाहियों के बीच से उभरी है जो मुग़ल सेना में साथ-साथ रहते थे. इनमें कुछ पश्चिमी उत्तर प्रदेश के तथा अधिकांश ईरान, खुरासान, तुर्की और आज के अफगानिस्तान तथा उज़बेकिस्तान के जवान हुआ करते थे. इनकी आपसी बोल-चाल के मिश्रण से जो भाषा उभरी वह उत्तर भारत में पसरती गयी. यही रोजमर्रा के कामकाज में इस्तेमाल होने लगी और आगे चलकर इसी में व्यापार होने लगा, नौकरियाँ मिलने लगीं. आम सैनिक कार्रवाइयों तथा जनता के बीच अहम ऐलानों की भाषा भी यही बनती गयी. इसे ही उर्दू कहा जाता है. तत्कालीन शासकों को भी अरबी-फारसी की दुरूहता के आगे जनता की इस बोली-ठोली को तसलीम करना पड़ा.
उत्तर और पूर्वी भारत के जिस इलाके में जिस बोली का असर था, उसने उर्दू को अपना लहजा, अपना तेवर दिया. जैसे पछांही, अवधी, ब्रज, मगही, बघेली, बुन्देली, बांग्ला, उड़िया, इत्यादि.
वो कहते हैं न कि जिस भाषा में धंधा हो सकता है वही भाषा जिंदा बचती है. यह बात आज भी सच है. इसलिए मैं इसे हिन्दी-उर्दू या हिन्दी-अंग्रेजी के झगड़े से जोड़ कर नहीं देख पाता क्योकि इबारत स्पष्ट है. जो लोग इसे हिन्दू-मुस्लिम की भाषा या भारतीय-विदेशी का संघर्ष बताते हैं, उनका ऐसा करना समझ में आता है.
और अब तो हिन्दी-उर्दू के नाम पर कई सफ़ेद हाथी पल रहे हैं. ये कैसे मूल बात समझने देंगे?
मेरे जानते फारसी या संस्कृत आमजन की भाषा कभी नहीं रही. भारतेंदु हरिश्चन्द्र के ज़माने में जब हिन्दी पद्य से भाषा का गद्य में संक्रमण हुआ तब भाषा कुछ वैसी होती थी जैसी कि आज भी कर्मकांडी पंडित सत्यनारायण की कथा सुनते हुए उपयोग में लाते हैं-- (एक नमूना)-- 'तो सुकदेव जी महराज नारद जी से कहते भये.'
हिन्दी की शुरुआती कहानियों में (रानी केतकी की कहानी) यही हिन्दी आपको मिलेगी. इसे हिन्दी या उर्दू न कहकर खड़ी बोली कहा गया. यानी पद्यात्मक और घुमावदार न होकर जो थोड़े प्रयत्न से सीधे-सीधे बोली और लिखी जा सके. अगर हिन्दी की यात्रा इसी रास्ते चलती तो आज हिन्दी-उर्दू का झगड़ा शुरू न होता, न ही संस्कृतनिष्ठ हिन्दी का पचड़ा सामने आता. क्योकि उस भाषा में अद्भुत प्रवाह था और वह भाषा के संक्रमण की स्वाभाविक प्रक्रिया थी.. उसे काशी के पंडित नहीं आगे बढ़ा रहे थे. वह सदल मिश्र, लल्लूलाल और इंशा अल्लाह खान तथा भारतेंदु जैसे जनता के लोगों के हाथ में थी.
लेकिन यहीं से उस हिन्दी -उर्दू का दुर्भाग्य शुरू होता है. इसे संस्कृत के पंडों ने झपट लिया. जैसे तुलसी दास को भाषा (अवधी) में रामचरितमानस लिखने पर काशी और अयोध्या के पंडों ने (मानस का हंस) जाति बाहर करने की कोशिशें की थीं, उसी तरह हिन्दी को विद्वज्जनों की भाषा में ढाल दिया गया. उधर उर्दू वालों ने अरबी-फ़ारसी के शब्द और शब्द बन्ध ठूंसने शुरू किए. नतीजा ये हुआ कि यह जनता के लिए दोनों तरफ से एक दुरूह भाषा बनती गयी. आगे चलकर इसे हिन्दुओं और मुसलमानों की भाषा का जामा पहना दिया गया. दोनों तरफ से सियासत शुरू हुई. अंग्रेजों ने इसे हवा दी और आज आज़ाद भारत में जिस तरह मुस्लिम राजनीति पस्त है उसी तरह उर्दू भी.
लेकिन हिन्दी ने इस भाषिक जकडन से मुक्त होने की कोशिश लगातार की है. परीक्षा में पास-फेल होने का झंझट ख़त्म होने के बाद कई लेखकों और अन्य क्षेत्र के जानकारों ने इसी हिन्दी का दामन थामा है. महात्मा गांधी इसी हिन्दी के हिमायती थे और इसे हिन्दुस्तानी कहते थे. मज़े की बात तो यह है कि जनता नेताओं के भाषण इसी हिन्दुस्तानी में समझती थी.
जैसा कि मैंने ऊपर याद दिलाया है कि भाषा वही ज़िंदा रहती है जिसमें धंधा चलता हो. इसमें यह और जोड़ लीजिये कि लोग उसी भाषा की ओर लपकते हैं जिसमें रोज़गार मिलता हो. आज कितने मुसलमान उर्दू पढ़ना चाहते हैं और कितने हिन्दू हिन्दी?
मैं जिस शहर में रहता हूँ, वहाँ शिवसेना मराठी के अलावा और कुछ चलने नहीं देना चाहती. लेकिन लोकल ट्रेन में उसका वश नहीं चलता. शिवसेना के कट्टर से कट्टर आदमी की बगल में मराठी आदमी भी बैठा हो तो वह हिन्दी में ही बात शुरू करता है. फिर यहाँ की हिन्दी का स्वरूप और उसका विकास देखना भी दिलचस्प है.
उलझन यह है कि लिखते समय आप किस तरह की हिन्दी का उपयोग करें? यह लिखने के स्वरूप पर निर्भर करता है. अगर औपचारिक लेखन है तो उसमें भाषा, शब्द-पद, वाक्य और व्याकरण के ख़ास नियमों को ध्यान में रखा जाना चाहिए. लेखन अगर अनौपचारिक है तो इन सारे बंधनों से छूट मिलनी चाहिए. ब्लॉग लेखन को लोग फिलहाल अनौपचारिक मान रहे हैं. तब इतनी हाय-तौबा क्यों? जो मर्जी लिखिए, हिंग्लिश में लिखिए, मुम्बईया में लिखिए, महमूद की हैदराबादी हिन्दी में लिखिए, या टिपिकल बिहारी में लिखिए.
जहाँ तक नुक्ते की बात है तो मेरा मत यह है कि या तो सही जगह नुक्ता लगाइये, या इसे भूल ही जाइए. ग़लत जगह नुक्ता लगाने से अर्थ का अनर्थ हो सकता है. अगर हम 'ख़ुदा' को 'खुदा' और 'ज़ेब' को 'जेब' लिखेंगे तो वही फ़जीहत होगी जो 'बदन' और 'वदन' का फ़र्क न कर पाने से होती है. यहाँ बता देने में कोई गुरेज नहीं है- ज़ेब का अर्थ है शोभा और अगर कभी आपकी जेब कटी होगी तो जेब का अर्थ आप जानते ही होंगे. बदन का अर्थ है देह, और वदन का अर्थ मुख.
हिन्दी भाषा की प्रकृति अविरल बहने की ही रही है.चाहे इसे विद्वानों ने कितना भी अपने कब्जे में करना चाहा, यह नदी के उद्दाम वेग की तरह आगे बढ़ती रही है. संस्कृत के तत्सम और तद्भव शब्द इसी में आपको मिलेंगे. अंग्रेजी के कितने ही शब्द हिन्दी कुल में शामिल हो चुके हैं. कुछ शब्द तो ऐसे हैं कि आपको सिर्फ इसी हिन्दी में मिलेंगे. जैसे जुगाड़मेंट. इसी हिन्दी में कई शब्द आपको उर्दू के लग सकते हैं लेकिन वे हैं असल में तुर्की, पुर्तगाली या फ्रांसीसी के.
अरबी, फ़ारसी और अग्रेज़ी से आए शब्दों की फेहरिस्त लम्बी है. इसकी वजह यह है कि इन्होंने भारत पर बड़े अरसे तक शासन किया. यहाँ यह भी ध्यान रखना चाहिए कि मुग़ल तुर्क थे इसलिए तुर्की के शब्द भी हिन्दी में बहुत मिलेंगे. कुछ उदाहरण पेश करता हूँ-
अंग्रेज़ी शब्द- साकइल, रेल, टिकट, स्टैंप, पुलिस, निब, स्टोव, टेलीफोन, फोटो, सिनेमा आदि.
फ़ारसी शब्द- औरत, खजांची, खुशामद, जमीन, सरकार, सिफारिश, अंगूर, आबाद, आस्तीन, गुलाब, चपाती, जंजीर, दरी, नमक, नाश्ता, परदा, प्याला आदि.
तुर्की शब्द- तोप, तमगा, दारोगा, बारूद, बंदूक, कुली, बेगम, बहादुर, लाश आदि.
फ्रांसीसी- रेस्तरां, कूपन, अंग्रेज़ी, कारतूस, रिपोर्ताज आदि.
जापानी- रिक्शा
पुर्तगाल- गिरजा, पादरी, काजू, चाबी, बिस्किट, कमीज़, तौलिया आदि.
उत्तर तथा पूर्वी भारत की बोलियों के तो हजारों शब्द हिन्दी में घुले-मिले हुए हैं. इन सबके हिन्दी में आने की एक यात्रा रही है. देवभाषा से पाली, प्राकृत और अपभ्रंस होते हुए.
फिर भी अगर कोई जिद करे कि वह तो पूर्वी हिन्दी लिखेगा. तो उसे किसने रोका है? कोई कहे कि वह संस्कृतनिष्ठ हिन्दी लिखेगा तो उसे कौन मना करता है? लेकिन उससे जब नफ़ा-नुकसान होगा तो वह ख़ुद राह लग जायेगा.
रही बात ज्ञान-विज्ञान की. तो भाई, पहले हिन्दी में आधुनिक ज्ञान के शास्त्र लिखो, नयी-नयी खोजें करो, तब न अपनी शब्दावालियां बनाओगे? या खाली कूदते रहोगे कि कम्यूटर अंग्रेजी में क्यों पढ़ाया जाता है या जीव विज्ञान के शब्द-पद ऐसी अबूझ हिन्दी में क्यों है? समझना चाहिए कि ये शब्द-पद या तो पर्यायवाची हैं या समानार्थी. अगर आपका शोध नहीं है तो आपकी शब्दावली भी नहीं होगी. तब तो ऐसे ही रट्टा मारना पड़ेगा और हिन्दी का रोना उसी तरह रोना पड़ेगा जिस तरह उर्दू वाले रोते हैं.
फिर भी हिन्दी की यह उदारता है कि स्पुतनिक तथा सॉफ्टवेयर जैसे शब्द लगते ही नहीं कि ये रूसी और अंग्रेज़ी के हैं. है न ये अजस्र और अविरल धारा!
मेरा सुझाव यह है कि फिलहाल आप इसी हिन्दी का इस्तेमाल करें, जिसका बखान मैं ऊपर कर आया हूँ. और हो सके तो इसमें कुछ योगदान करते चलें.
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